मुहम्मद साहब के समय में जो तीन युद्ध हुए उनमें “जंग-ए-बदर” और मौता इन दोनों में जान व माल की अधिक हानि हुई परंतु किसी में भी 100 से अधिक व्यक्ति नहीं मारे गए, और धन की कोई ऐसी हानि नहीं हुई जो किसी राष्ट्र या कौम/कबीले को प्रभावित कर सके, जहाँ तक समय की बात है अगर उक्त प्रकार के सभी युद्धों में लगे समय को जोड़ लिया जाए तो उसकी कुल अवधि दो दिन से भी कम होती है।
इसका आंकलन अगर हिन्दू धर्म युद्धों में हुई जान व माल व समय की हानि से करें तो बहुत विपरित आंकड़े प्राप्त होते हैं क्योंकि उनमें हुई जान व माल की हानि से संबंधित कोई संख्या करोड़ों से कम नहीं, महाभारत के अनुसार इस लड़ाई में एक अरब छियासठ करोड़ व्यक्ति मारे गये थे
“गीता हक़ीक़त के आइने में”पृ.24, लेखक वी.आर.नारला, प्रकाशित यूनीवर्सल पीस फाउन्डेशन, देहली
वह तीन घटनाएँ जिन में युद्ध की स्थिति उत्त्पन्न हुई वह ”जंग-ए-बद्र“, ”जंग-ए-ओहद“, और ”जंग-ए-मौता“ हैं।
पहली दो घटनाएँ उस समय की हैं जब मुहम्मद सल्ल. के मक्का छोड़कर मदीना आ जाने के उपरांत मक्केवालों ने भारी सेना द्वारा मदीने पर चढ़ाई कर दी। ऐसी स्थिति में जब शत्रु आपको नष्ट कर देने के तत्पर हो और बावजूद इस के कि आप उस से बचकर बहुत दूर जाकर रहने लगें, परन्तु वह फिर भी आपका पीछा न छोड़े और विशाल सेना लेकर आपको एवं आपके साथियों को मार डालने के लिए वहीं चढ़ आए। ऐसे समय मे दो प्रकार की स्थितियों का ही सामना होता है। या तो आप हाथ पर हाथ रख कर बैठ जाएं और शत्रुओं के द्वारा गाजर, मूली की तरह काट दिए जाएं और सदैव के लिए नष्ट कर दिए जाएं। या यह है कि स्वयं की रक्षा के लिए हर सम्भव प्रयास किए जाएं।
इस संसार में कौन सा राष्ट्र या समाज ऐसा है जो उक्त जैसी स्थिति में आत्म रक्षा के लिए हर सम्भव प्रयास करने या आवश्यकता पड़ने पर हथियार उठाने की अनुमति नहीं देता ?
जहाँ तक पहली स्थिति की बात है इस्लाम में अपने ऊपर हमले की स्थिति में आत्मरक्षा के उपायों को अपनाए बिना हाथ पर हाथ रख कर मारा जाना आत्मदाह की भाँति माना जाता है,
क़ुरआन में युद्ध की आयतें बद्र और ओहद जैसी विशेष परिस्थितियों में उतरी हैं। जब मक्के वाले मुहम्मद सल्ल. और उनके अनुयाइयों को नष्ट करने के इरादे से मदीने पर चढ़ आए थे। ख़्याल रहे कि कुरआन पूरा एक समय में नहीं उतारा गया है, बल्कि आवश्यकतानुसार समय-समय पर देवदूत (हज़रत-ए-जिबरील) ईश्वर की ओर से एक आयत, दो आयतें या अधिक, जैसी भी ज़रूरत होती थी लाकर मुहम्मद सल्ल. को सुना देते थे वह सुनकर उसे याद करते एवं किसी लिखने वाले को बुलाकर उसे लिखवा लेते थे। और अपने अनुयाइयों को सुना देते थे। इस प्रकार पूरा कुरआन तेईस वर्ष में उतारा गया है।
यह थी ईश्वरवाणी (पवित्र कुरआन) के अवतरण की स्थिति। अब प्रश्न यह है कि ऐसी स्थिति में जब मुहम्मद सल्ल. अपना वतन एवं घरबार छोड़ कर मक्के से मदीने चले आए थे। परन्तु मक्के वालों ने वहाँ पर भी चढ़ाई कर दी, तो क्या ऐसे समय में उन्हे गले लगाने के उपदेश दिए जाते।
यहाँ पर एक बार फिर भगवान कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उस उपदेश का वर्णन करना उचित होगा जो उन्होंने कौरवों और पाण्डवों के बीच हुए “महाभारत युद्ध” के समय अर्जुन को युद्ध पर उभारने हेतु दिया था कि इस समय युद्ध करना ही धर्म है। युद्ध नहीं करोगे तो अधर्म हो जाएगा। अतः यह मानना पड़ेगा कि ऐसी परिस्थितियां भी उत्पन्न होती हैं, जब युद्ध करना भी अनिवार्य हो जाता है, और उस समय युद्ध करना ही धर्म का हिस्सा होता है।
क़ुरआन में जंग के जो आयतें दी गई हैं उनकी शब्दावली से यह बात स्पष्ट रूप से सामने आती है कि युद्ध करने की अनुमति देने वाली आयतें विशेष समय का विशेष उपदेश हैं।
क्या तुम नही लड़ोंगे ऐसे लोगों से जिन्होंने संधि को तोड़ा है और मुहम्मद सल्ल. को निकाल बाहर करने के तत्पर रहे।
सूरह तौबाह आयत 13
देखें, संधि को किसने तोड़ा था?
एवं मुहम्मद सल्ल. को किसने घर से बाहर निकाला था? अब वह ही लड़ मरने के लिए आ चढे़ हैं, तो कुरआन की कुछ आयत में उन्हीं से तो लड़ने की बात की जा रही है।
युद्ध संबंधी आयतों की पृष्ठभूमि जाने बगैर ही प्रश्न चिन्ह लगा देना उचित नहीं है
किसी भी प्रकार यह सिद्ध नहीं किया जा सकता कि क़ुरआन के किसी एक अक्षर से भी छल, कपट, लड़ाई झगड़ा या किसी की बेवजह हत्या करने की सीख मिलती हो। किन्तु ऐसा भी नहीं, कि अपने ऊपर हमला होते हुए भी वह अपने अनुयाइयों को हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाने की अनुमति देता हो। विशेष परिस्थितियों में युद्ध की अनुमति दी गई है, परन्तु यह भी नसीहत है। “और सुलह करना (लडा़ई-झगड़े) से बेहतर है। ”सूरह निसा, आयत 128
और एक दुसरे स्थान पर कहा गया है - और अगर शत्रु (युद्ध के बीच) सुलह करना चाहे तो तुम सुलह कर लो और ईश्वर पर भरोसा करो, वह सबकुछ सुनता और जानता है, यहाँ तक की उनका इरादा धोखे का भी हो, (तो तुम परवाह न करो) तुम्हारे लिए ईश्वर काफी है। ससूरह अनफाल आयत नं. 61, 62सूरह अनफाल आयत नं. 61, 62
परन्तु फिर भी अगर सुलह नही हो पाती और युद्ध की ही स्थिति उत्पन्न होती है तो उसके लिए क्या क्या शर्ते हैं। उन्हे बडी़ धार्मिक पुस्तकों में देखा जा सकता है जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं।
1. महिला बच्चों एवं बूढ़ों का वध न किया जाए।
2. फलदार वृक्षों को न काटा जाए खेती को न उजाड़ा जाए।
3. धर्मस्थलों में रहने वाले धार्मिक गुरूओं को न छेड़ा जाए।
4. खेती की भूमि को एवं खेती को बर्बाद न किया जाए, फल एवं छायादार वृक्ष ना काटा जाए, जानवरों को न मारा जाए, आदि।
युद्ध क्षेत्र में महिला, बच्चे या बूढ़े क्या करते है? स्पष्ट है कि वह युद्ध करने वालों की सहायता के लिए होते हैं, परन्तु जिस धर्म में युद्ध क्षेत्र में भी बच्चों बूढ़ों एवं महिलाओं का वध करना जायज़ न हो,
फिर इसके विपरीत कार्य करके अगर कोई उन्हें धर्म से जोड़ता है तो वह धार्मिक नहीं हो सकता अपितु वह धर्मविरोधी है।
फिर क्या वजह है कि आतंकवादी घटनाओं का ज़िम्मा केवल मुसलमानों के सर डालकर उनके तार इस्लाम से जोड़ दिए जाते हैं, जब कि कुरआन में आतंकवादी घटनाओं को पृथ्वी पर फ़साद बरपा करने की संज्ञा दी गई हैं। एवं फसाद बरपा करने वालों को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा गया है -
और जो लोग पृथ्वी पर फ़साद बरपा करते है। उनपर लानत है एवं उनके लिए बुरा ठिकाना (नरक) है। सूरह, रअद - 13, आयत - 24
ऐसा भी नहीं कि इस प्रकार की घटनाओं को अंजाम देने वाले केवल मुसलमान ही हों। श्रीलंका में तमिलों की बग़ावत, भारत में नक्सलवाद एवं आसाम सहित पूर्वी मावादी भगवा आतंकबादी एक जानवर के लिए इंसानो का कत्लयाम करने वाले गो आतंकी गुजरात दंगाई और यूपी प्रान्तों में घटने वाली आतंकी घटनाओं में कोई मुसलमान लिप्त नहीं है, परन्तु इन्हें कोई हिन्दू आतंकवाद नहीं कहता।
बर्मा में इंसानो पे जुल्म और उनका कत्लयाम इस कदर की जानवर भी देख कर शरमा जाये फिर भी उन्हें कोई आतंकबादी नहीं कहता
इराक सिरया फिलिस्तीन में बमबरी करके लाखो की तादाद में बेकसूर मासूम बच्चों औरतो बुढो का कत्लयाम कियाजाय फिर भी उन्हें आतंकी नही बोला जाता ।।
आखिर ऐसा क्यों
इन सारे मुद्दों पे गौर किया जाये तो बात समझ में आजाती है
इसमें मिडिया और इस्लाम के दुश्मनो का अहम भूमिका रहा है
यह तो सुरु से चलता आरहा है हक़ और बातिल की लड़ाई
झूट और सचाई की लड़ाई जब आप हक़ और सचाई पे होंगे तो लाखो दुश्मन हो जाते है
यह वह लोग होते है जिनको या तो आप के हक़ और सचाई का मालूमात नहीं होता है या तो फिर वाह बातिल झुटे लोग होते जिन्हें हक़ और सचाई से दुश्मनी होती है
क्यों की वह बातिल और झुटे होते ही है
यही हुवा है इस्लाम और मुस्लिम समुदाय के साथ इस्लाम अपनाने वालो की भारी संख्या को देख कर कुछ लोग डरे और सहमे हुई है सायद इस लिए इस्लाम को बदनाम करने का कोई चांस नही छोड़ते है यहाँ तक की इस्लाम के अच्छाइयों को भी बुराई में तब्दील करके इस्लाम और पूरी मुस्लिम समाज को बदनाम करते है कुछ लोग इस्लाम की सही तालीम जानकारी ना होने की वजह से बदनाम करते है तो कुछ लोग जानते और समझते हुवे भी बदनाम करते है
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