होली के आस पास ही ईरानियों का नया साल नौरोज़ शुरू हो जाता है , जिस तरह से उल्लास पूर्वक होली मनाई जाती है ठीक वैसे ही कुछ ईरानियों का नौरोज़ भी मनाया जाता है। मीर तकी मीर उर्दू के जाने माने शायर थें उन्होंने होली को भारतीय नौरोज़ तक कह दिया है, वे लिखते हैं-
जश्ने नौरोजे हिंद होली है
राग-ओ-रंग और बोली-ठोली
कमाल की बात यह रही है कि होली को इतना महत्व सँस्कृत के कवियों ने नही दिया जितना मुस्लिम कवियों ने दिया है। इसका कारण क्या हो सकता है?होली पर कुछ मुस्लिम कवियों की नज़्मों पर नज़र डालिये...
फाइज देहलवी लिखते हैं-
आज है रोजे-वसंत अय दोस्तां,
सर्व कद हैं, बोस्तां के दरमियां..
अज अबीर-ओ-रंगे-केशर और गुलाल
अब्र छाया है सफेद-ओ-जर्द-ओ-लाल...
मीर तकी मीर लिखते हैं-
होली खेला आसिफुद्दौला वजीर,
रंगे-सुहबत से अजब है खुर्द और पीर।
नजीर अकबराबादी होली पर नज़्म लिखते हैं-
जब फागुन रंग झमकते हों,
और दफ के शोर खड़कते हों
तब देख बहारें होली की...
परियों के रंग दमकते हों
तब देख बहारें होली की..
लड़-भिड़ के नजीर फिर निकला,
कीचड़ में लत्थड़-पत्थड़ हो
जब ऐसे ऐश झमकते हों
तब देख बहारें होली की...
ऐसे ही शाह 'हातिम' लिखते हैं,
मुहैया सब है अब अस्बाबे होली
उठो यारो भरो रंगों से झोली..
कोई है सांवरी कोई है गोरी,
कोई चंपा बरन उम्रों में थोड़ी
बृज की खड़ी बोली से हिंदी को जनक कहे जाने वाले अमीर ख़ुसरो होली में रंग खेलने के बारे में लिखते हैं-
आज रंग है, ये मां रंग है री
मेरे महबूब के घर रंग है री
मेरे अल्लाह तू है हर
मेरे महबूब के घर रंग है री
मुगलकालीन होली तो बहुत भव्यता लिए हुए होती थी,मोहम्मद शाह रंगीला तो होली का इतना शौकीन था कि उसने अपने नाम के पीछे ' रंगीला' लगा लिया था। रंगीला हर होली को लालकिले में बड़ा मेला लगवाता था जिसमें आम- ख़ास लोग होली खेलते।
मुस्लिम सूफ़ी बाबा बुल्लेशाह होली के रंगों को अल्लाह से जोड़ते हुए लिखते हैं।
होरी खेलूंगी कह कर बिस्मिल्लाह
नाम नबी की रतन चढी, बूँद पडी इल्लल्लाह
रंग-रंगीली उही खिलावे, जो सखी होवे फ़ना-फी-अल्लाह
होरी खेलूंगी कह कर बिस्मिल्लाह
गुलाल, अबीर , रंग शब्द अरबी/ फ़ारसी हैं सँस्कृत में इनका कोई समानार्थी शब्द नही है।
होली के बारे में ब्राह्मणिक ग्रन्थो में कोई प्रमाणिक जानकारी नही है, मानवगृह्य सूत्र में होली को शूद्रों पर्व कहा गया है।
तो! क्या आपको नही लगता है कि भारत में ईरानियों के आने में बाद होली को महत्ब दिया गया ? या नौरोज़ की याद में होली को विस्तृत रूप से मनाया जाने लगा । ब्राह्मणिक ग्रन्थो में आप जानते हैं कि 'म्लेच्छ' किन्हें कहा गया है, क्या इसी लिए होली को शूद्रों का पर्व कह दिया गया ? सोचिये......
होली पर गुजिया बनती है और नौरोज़ पर भी इसी तरह की डिश ....है न आश्चर्य!!
-संजय
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