Friday, 23 April 2021

क्या क़ुरान मानव निर्मित है।

क्या क़ुरआन मानव रचित ग्रन्थ है ?

डा. जी डबल्यू लिड्ज़ कहते हैः

“प्रायः कहा जाता है कि पवित्र क़ुरआन के लेखक मुहम्मद सल्ल. हैं और उस में जो भी बातें हैं तौरात और ईंजील से ली गई हैं, यह ग़लत है, मेरा विश्वास है कि क़ुरआन ईश-वाणी है “।

प्रिय मित्र! यदि आप निम्नलिखित तथ्यों पर चिंचन मनन करेंगे तो स्वयं आप क़ुरआन को ईश्वर की वाणी मानने पर विवश होंगेः

(1) क़ुरआन की भाषा शैली:

क़ुरआन का सब से महान चमत्कार यह है कि इसकी शैली मानव शैली से सर्वथा भिन्न है। वह अरब जिन में क़ुरआन का अवतरण हुआ था अपने शुद्ध साहित्यिक रसासवादन के लिए अति प्रसिद्ध थे, उनको अपनी भाषा शैली पर बड़ा गर्व था। ऐसे लोगों को क़ुरआन ने चुनौति दी –

” और यदि उसके विषय में जो हमने अपने बन्दे पर उतारा है, तुम किसी संदेह में हो तो उस जैसी कोई सूरः ले आओ और अल्लाह से हट कर अपने सहायकों को बुला लो जिनके आ मौजूद होने पर तुम्हें विश्वास है, यदि तुम सच्चे हो”। ( सूरः 2 आयत 23-24)

लेकिन इतिहास साक्षी है कि पूरे अरब उसके समान एक अध्याय तो क्या एक श्लोक भी पेश करने में असमर्थ्य रहे हालाँकि वह मुहम्मद सल्ल. के विरोद्ध में पूरे साहसी थे और आपत्ति का ओई अवसर खोना नहीं चाहते थे, तथा अरबी भाषा पर भी पूरी महारत रखते थे। यदि कुरआन मानव रचना होता तो कुछ लोग अवश्य उसके समान पेश कर सकते थे परन्तु न कर सके।

यह ग्रन्थ आज तक संसार वालों के लिए चुनौति बना हुआ है तथा रहती दुनिया तक बना रहेगा।

(2) उम्मी नबी पर क़ुरआन का अवरणः

यह भी एक सत्य है कि ईश्वर ने अन्तिम ग्रन्थ क़ुरआन के अवतरण के लिए ऐसे संदेष्टा का चयन किया जो न लिखना जानते थे न पढ़ना। मुहम्मद सल्ल0 के जन्म के पूर्व ही उनके पिता का देहांत हो गया। छः वर्ष की आयु हुई तो माता भी चल बसीं और आठ वर्ष के हुए तो दादा का साया भी सर से उठ गया कारणवश शिक्षा-दिक्षा से वंचित रहे और न ही उन्हें किसी विद्वान की संगति प्राप्त हुई थी आखिर ऐसे व्यक्ति से लिए यह कैसे सम्भव हो सकता था कि वह ऐसी अनुपम साहित्यिक पुस्तुक तैयार कर ले। यह ईश्वर की चाहत थी कि अन्तिम संदेष्टा पढ़े लिखे न हों ताकि कोई उन पर यह आरोप न लगाए कि वह क़ुरआन को अपनी ओर से बना कर अरबों की आखों में धूल झोंक रहे हैं।

आप अशिक्षित ( उम्मी ) होने के बावजूद लोगों में पवित्रता, सच्चाई और अमानतदारी से प्रसिद्ध थे यहाँ तक कि लोगों ने आपको सादिक़ (सच्चा) और अमीन (अमानतदार) की उपाधि से रखी थी। क्या ऐसा व्यक्ति जो लोगों के बीच सच्चाई और अमानदतारी से प्रसिद्ध हो अपनी बात ईश्वर की ओर सम्बन्धित कर सकता है? यह बात बुद्धिसंगत नहीं हो सकती । ज्ञात यह हुआ कि मुहम्मद सल्ल0 का पूरा ज्ञान ईश्वरीय ज्ञान था।

(3) क़ुरआन की शैली और मुहम्मद सल्ल0 की शैली में अन्तरः

मुहम्मद सल्ल0 के प्रवचनों को हदीस कहा जाता है। आपके इन प्रवचनों की शैली और क़ुरआन की शैली दोनों को मिला कर देखें तो दोनों सर्वथा भिन्न देखाई देंगे। कोई भी व्यक्ति जो क़ुरआन और हदीस को पढ़ेगा दो चार वाक्य पढ़ कर ही इस परिणाम पर पहुंच जाएगा कि यह दोनों वाणियाँ किसी एक व्यक्ति की नहीं हो सकतीँ। क्योंकि क़ुरआन का स्वर अत्यन्त मनमोहक है अपितु क़ुरआन की शैली मानव शैली से सर्वथा भिन्न है। यही कारण था कि जब मक्का वाले मुहम्मद सल्ल0 को क़ुरआन पढ़ते हुए सुनते तो आश्चर्यचकित रह जाते थे।
मुहम्मद साहिब का कट्टर शत्रु वलीद बिन मुग़ीरा ने जब आपको क़ुरआन पढ़ते हुए सुना तो बोल पड़ाः ” ईश्वर की सौगंध! उसमें मिठास है, उसमें ताज़गी और हरापन है (मानो यह ऐसा वृक्ष है ) जिसका निचला भाग छाँव वाला है और ऊपरी भाग फलदार है। यह मानव रचित हो ही नहीं सकता।”हम भी एक ऐतिहासिक तथ्य है कि वह अरब जिनके अन्दर मानवता नाम की कोई चीज़ नहीं थी जब क़ुरआनी शिक्षाओं को ले कर उठे तो थोड़े ही दिनों में चीन की सीमाओं से लेकर फ्रांस तक पहुंच गए और क़ुरआन के आधार पर एक ऐसी संस्कृति की स्थापना की जिस से प्रभावित हो कर गाँधी जी को कहना पड़ाः ” जब हमारा देश स्वतंत्र होगा तो हम उसमें अबू-बक्र तथा ऊमर जैसी शासन लाएंगे।”

(4) क़ुरआन हर प्रकार के विभेदों से मुक्त हैः

मानव कितना बड़ा विद्वान क्यों न हो जाए उस से ग़लतियाँ और कोताहियाँ हाती ही रहती हैं। उसका लेखन और भाषण त्रुटियों से सुरक्षित नहीं रह सकता। ईसी लिए क़ुरआन में एक स्थान पर ईश्वर का कथन हैः ” क्या यह लोग क़रआन में चिंतन मनन नहीं करते, यदि यह ईश्वर के अतिरिक्त किसी अन्य की ओर से होता तो अवश्य उसमें बहुत कुछ मतभेद पाते।” (सूरः 4 आयत 82)परन्तु क़ुरआन हर प्रकार की ग़लतियों आपत्तियों और कमियों से सुरक्षित है। यदि किसी को क़ुरआन में किसी प्रकार की आपत्ति नज़र आ रही हो तो वास्तव में ऐसा क़ुरआन का ज्ञान न होने के कारण होगा जिसके निवारण हेतु उसे क़ुरआन के विद्वानों से सम्पर्क करना चाहिए। क़ुरआन का आदेश हैः
” यह अत्यन्त महान ग्रन्थ है जिसके पास असत्य फटक भी नहीं सकता, न उसके आगे से, न उसके पीछे से, यह है अवतरित किया हुआ हिकमत वाले तथा गुणों वाले अल्लाह की ओर से” ( सूरः49 आयत 41-42)

कुरआन ने दिलों को जीता

क़ुरआन के ईश्-वाणी होने का एक महत्वपूर्ण प्रमाण उसके अन्दर शुद्ध साहित्यिक रसासवादन का पाया जाना है। जिस किसी ने क़ुरआन को दिल व दिमाग़ लगाकर सुना उस से प्रभावित हुए बिना न रहा। जिस किसी ने उसे मन से पढ़ा उसे दिल दे बैठा। यह कोई काल्पनिक वृत्तांत नहीं अपितु ऐतिहासिक तथ्य है।

वह अरब जिनके बीच क़ुरआन का अवतरण हो रहा था जब वह स्वयं क़ुरआन पढ़ते अथवा सुनते तो विश्वास कर लेते कि यह ग्रन्थ मानव रचित नहीं , ईश्वाणी है।

मुहम्मद साहिब का कट्टर शत्रु वलीद बिन मुग़ीरा ने जब आपको क़ुरआन पढ़ते हुए सुना तो बोल पड़ाः ” ईश्वर की सौगंध! उसमें मिठास है, उसमें ताज़गी और हरापन है (मानो यह ऐसा वृक्ष है ) जिसका निचला भाग छाँव वाला है और ऊपरी भाग फलदार है। यह मानव रचित हो ही नहीं सकता।”बल्कि इतिहास साक्षी है कि कितने लोगों ने क़ुरआन को सुनने के बाद उसके साहित्यिक रसासवादन से प्रभावित हो कर इस्लाम को स्वीकार कर लिया।

तलवार ले कर निकले पर दिल दे बैठेः

उमर बिन खत्ताब ( जो मुहम्मद सल्ल0 के देहांत के पश्चात दूसरे महान शासक हुए) इस्लाम स्वीकार करने से पूर्व मुहम्मद सल्ल0 के कट्टर शत्रु थे। एक दिन तलवार लटकाए इस संकल्प के साथ घर से निकले कि मुहम्मद सल्ल0 का सफाया ही कर दिया जाए ताकि न रहे बाँस न बजे बाँसरी। रास्ते में सूचना मिली के उनकी बहन और बहनोई भी इस्लाम स्वीकार कर चुके हैं। उमर ने सीधे बहन बहनोई का रुख किया। उनके घर पहुंचे और पूछाः क्या तुम दोनों इस्लाम स्वीकार कर चुके हो? -बहनोई ने कहा:अच्छा उमर यह बताओ यदि सत्य तुम्हारे धर्म के बजाए किसी और घर्म में हो तो? उमर का इतना सुनना था कि अपने बहनोई पर चढ़ बैठे और उन्हें बुरी तरह कुचल दिया। उनकी बहन ने पलट कर उन्हें अपने पति से अलग करना चाहा तो बहन को ऐसा चाँटा मारा कि चेहरा खून से लतपत हो गया। बहन ने कहाः उमर तुम से जो बन सकता हो कर लो परन्तु इस्लाम दिल में बैठ चुका है इसे तुम निकाल नहीं सकते। भाई को अपने दोष का एह्सास हुआ उन्हों ने पछताते हुए पूछाः अच्छा यह ग्रन्थ जो तुम्हारे पास है ज़रा मुझे भी पढ़ने का दो। बहन ने कहाः तुम अभी अपवित्र हो, उठो और स्नान करके आओ। उमर ने उठ कर स्नान किया, फिर क़ुरआन ली और पढ़ना शुरू कियाः अनुवादः ईश्वर के नाम से जो अत्यंत दयावान और कृपाशील है। कहने लगेः यह तो बड़े पवित्र नाम हैं। उसके बाद सूरः ताहा पढना शूरू किया जब प्रथम आयत से 14वी आयतः अनुवादः “निःसंदेह मैं ही अल्लाह हूं। मेरे अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं अतः मेरी ही पूजा करो और मेरे लिए ही नमाज़ पढो।” तक पढ़ी। कहने लगेः यह तो बड़ी उत्तम और प्रिय वाणी है मुझे मुहम्मद सल्ल0 का पता बताओ। उमर ने अपनी तलवार लटकाई और उस घर की ओर चले जिसमें रसूल सल्ल0 अपने साथियों के साथ एकत्र होते थे। जब रसूल सल्ल0 को देखा तो पुकार उठेः ” मैं साक्षी हूं कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं और में साक्षी हूं कि मुहम्मद सल्ल0 अल्लाह के संदेष्टा हैं।”

शासक की आँखें बहने लगीं:

हब्शा (इथियोपिया) का शासक अस्हमा ईसाई था। जब कुछ मुसलमानों ने मक्का वालों के कठोर व्यवहार से तंग आकर हब्शा में शरण लिया तो वहाँ पर उन लोगों को बादशाह की सेवा में लाया गया। मुसलमानों के अध्यक्ष जाफर (रज़ि0) ने उसके समक्ष सूरः मर्यम की कुछ आयतें पढ़ीं। सुनते ही बादशाह की आँखों से आँसू आ गए। फिर उसके बाद उसने इस्लाम भी स्वीकार कर ली।

क़ुरआन के मधूर भनक ने दिल जीत लियाः

तुफैल बिन अमर अद्दौसी यमन के दौस समुदाय के नायक थे। काबा के दर्शन हेतु मक्का आए को लोगों ने मुहम्मद सल्ल0 के विरोद्ध में उनको इतना भड़काया कि उन्होंने कान में रूई ठूंस ली थी ताकि क़ुरआन की कोई बात कान में न पड़ने पाए। काबा में आए और काबा में रखी 360 मूर्तियों की पूजा करने के बाद एक किनारे में मुहम्मद सल्ल0 को देखा कि आप क़ुरआन का पाठ कर रहे थे। सोचा कि मैं तो बुद्धि-ज्ञान रखता हूं अपने समाज का नायक हूं, सही ग़लम में तमीज़ कर सकता हूं क्यों न मुहम्मद सल्ल0 की बात सुनी जाए, हल्का सा कान से रूई खिस्काया तो ज़रा भनक लगी, निकट हुए तो क़ुरआन के रसासवादन ने उन्हें सुनने पर विवश किया, वह बैठ कर क़ुरआन सुनने लगे। अंततः उन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिय़ा।

क्या यह लोग स्वयं पैदा हो गए हैं

जुबैर बिन मुतईम ने मुहम्मद सल्ल0 को यह आयत पढ़ते हुए सुना – अनुवादः क्या यह लोग स्वयं पैदा हो गए हैं, अथवा वह स्वयं पैदा करने वाले हैं, क्या आकाश और धरती को इन्हीं लोगों ने पैदा किया है।” (सूरः 52 आयत 35) यह सुन कर कहते हैं कि मेरा दिल उड़ने लगा, अंततः मैंने इस्लाम स्वीकार कर ली।

यह मात्र कुछ उदाहरण थे वरना ऐसी हज़ारों मिसालें पाई जाती हैं जिन से ज्ञात होता है कि कुरआन ने दिलों को जीता और उस पर पूर्ण रूप में क़ाबू पाया। यही कुरआन का सब से बड़ा चमत्कार है। आज भी यदि कोई क़ुरआन को समझ कर पढ़ेगा अथवा सुनेगा तो उसके रसासवादन से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता।

कुरआन के संख्यात्मक चमत्कार

क़ुरआन ईश्वर की ओर से अवतरित सम्पूर्ण मानव के लिए एक उत्तम उपहार और रहती दुनिया तक के लिए एक महान चमत्कार है। क़ुरआन स्वयं घोषणा करता हैः “आप कह दीजिए कि यदि प्रत्येक मानव तथा सारे जिन्नात मिल कर इस क़ुरआन के समान लाना चाहें तो उन सब के लिए इसके समान लाना असम्भव है। यधपि वह (परस्पर) एक दूसरे के सहायक भी बन जाएं।” (सूरः बनी इस्राईल 17 आयत 88)

क़ुरआन उस अल्लाह की वाणी है जो संसार का उत्पत्तिकर्ता, शासक और ज्ञानी है। जो लोगों के वर्तमान अतीत और भविष्य का जानने वाला है। क़रआन का चमत्कार रहती दुनिया तक बाक़ी रहेगा।

प्रतिदिन नवीन शौध के आधार पर क़ुरआन से सम्बन्धित अदभूत प्रकार की चमत्कारियाँ हमारे समक्ष प्रकट हो रही हैं। उन चमत्कारियों में से एक कुरआन के शब्दों में संख्यात्मक समानताओं का पाया जाना है जो स्पष्ट प्रमाण हैं कि कुरआन पृथ्वी व आकाश के सृष्टिक्रता की ओर से अवतरित किया हुआ महान ग्रन्थ है।

क़ुरआनी शब्दों में समानताओं और चमत्कारियों का पाया जाना वास्तव में बड़ा आश्चर्यजनक विषय है। मुसलमान विद्वानों ने नवीनतम सांख्यिकीय उपकरण और कंप्यूटर के माध्यम से आज के आधुनिक युग में इस गणितीय चमत्कार को मानव के सामने पेश किया है।

यह चमत्कार संख्या पर आधारित है और आँकड़े स्वयं बालते हैं जिसे न चर्चा का विषय बनाया जा सकता है और न ही इसका इनकार किया जा सकता है। अल्लाह ने चाहा कि शब्दों का यह चमत्कार आज के युग में उदित हो ताकि प्रगतिशिल लोगों के लिए क़ुरआन विश्वास का आधार बने। क़ुरआन कहता हैः ” हम अवश्य उन्हें अपनी निशानियाँ धरती व आकाश में देखाएंगे और स्वयं उनकी अपनी ज़ात में भी यहाँ तक कि उन पर खुल जाए कि सत्य यही है।” ( हा मीम सज्दा 41 आयत 53)

तो लीजिए यह हैं कुछ क़ुरआन के संख्यात्मक आंकड़ेः

क़ुरआन में कुछ शब्द ऐसे हैं जो अपने समान शब्द अथवा अपने से विलोम शब्द के साथ दोहराए गए हैं उदाहरण के लिए देखिएः

हयात (जीवन) 145 बार दोहराया गया है ………. तो मौत 145 बार ही दोहराया गया है।

सालिहात (नेकियाँ) 167 बार दोहराया गया है ……. तोसय्येआत (बुराइयाँ) 167 बार ही दोहराया गया है।
दुनिया 115 बार दोहराया गया है……… तो आखिरत 115 बारही दोहराया गया है।
मलाईकः (स्वर्गदूतों) 88 बार दोहराया गया है ………. तो शैतान88 बार ही दोहराया गया है।
मुहब्बः (प्यार) 83 बार दोहराया गया है………..तो ताअत ( आज्ञाकारिता) 83 बार ही दोहराया गया है।
हुदा (मार्गदर्शन) 79 बार दोहराया गया है ………..तो रहमत(दया) 79 बार ही दोहराया गया है।
शिद्दत (तीव्रता) 102 बार दोहराया गया है ………. तो सब्र (धैर्य)102 बार ही दोहराया गया है।

अस्सलाम (शांति)50 बार दोहराया गया है ………. तो तय्येबात(पाकीज़गियाँ) 50 बार ही दोहराया गया है।

इब्लीस (शैतान) 11 बार दोहराया गया है ……… तो अल्लाह से शरण मांगना 11 बार ही दोहराया गया है।

जहन्नम (नरक) और उसके डेरिवेटिव 77 बार दोहराया गया है ……. तो जन्नत (स्वर्ग) और उसके डेरिवेटिव 77 बार ही दोहराया गया है।

अर्र-जुल (पुरुष) 24 बार दोहराया गया है ……… तो अल-मरअः(स्त्री) 24 बार ही दोहराया गया है।

क़ुरआन में कुछ शब्द ऐसे हैं जिनके बीच संतुलित और सटीक रूप में सांख्यिकिय बराबरी पाई जाती हैः उदाहरण-स्वरूप

साल में 12 महीने होते हैं ………… तो शह्र ( महीना) 12 बार ही दोहराया गया है

साल में 365 दिन होते हैं तो शब्द यौम (दिन) 365 बार ही दोहराया गया है।
अब हमें बताईए कि क़ुरआन के शब्दों की संख्याओं में भी इस प्रकार संतुलन का पाया जाना क्या यह स्पष्ट प्रमाण नहीं कि यह ग्रन्थ मानव रचित नहीं अपितु संसार के सृष्टा की ओर से अवतरित किया हुआ है।
संदर्भ: (1) मोजज़तुल-अरक़ाम वत्तरक़ीम फिल क़ुरआनिल करीम- (पवित्र कुरआन के संख्यात्मक चमत्कार) अब्दुल रज्जाक नौफल – – दारुल-किताब अल-अरबी 1982
(2) अलइजाज़ अल-अददी लिलक़ुरआन अल-करीम (पवित्र कुरआन के संख्यात्मक चमत्कार) : अब्दुल रज्जाक

क़ुरआन और विज्ञान

क़ुरआन के ईश-वाणी होने के लिए यह प्रमाण काफी है कि उसने आज से साढ़े चौदह सौ वर्ष पूर्व उन वैज्ञानिक बातों की भी चर्चा की है जिसकी खोज विज्ञान आज के युग में कर सका है इस प्रकार के विभिन्न वैज्ञानिक तथ्य क़ुरआन में बयान किए गए हैं। “पवित्र क़ुरआम कोई विज्ञान की पुस्तक नहीं है अपितु मार्गदर्शक ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ में छ हज़ार से अधिक आयतें हैं उनमें से एक हज़ार से अधिक आयतों का सम्बन्ध विज्ञान से है।” (क़ुरआन और आधुनिक विज्ञान डा0 ज़ाकिर नाइक पृष्ठ 12)
हम निम्म में कुछ प्रमुख उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं:

भ्रूण का विकासः
पवित्र क़ुरआन में मानव भ्रूण के विकास की विभिन्न अवस्थाओं को इस प्रकार बयान किया गया हैः

” हमने इनसान को मिट्टी के सत से बनाया, फिर हमने उसे एक सुरक्षित ठहरने की जगह टपकी हुई बुंद बना कर रखा। फिर हमने उस बूंद को लोथड़ा का रूप दिया। फिर हमने उस लोथड़े को बूटी का रूप दिया। फिर हमने बोटी की हड्डियाँ बनाईँ। फिर हमने उस हड्डियों पर मास चढ़ाया। फिर हमने उसे एक दूसरा ही सर्जन रूप दे कर खड़ा किया।” ( सूरः 23 आयत 12-14)

कनाडा यूनीवर्सिटी के प्रोफेसर मूरे इस आयतों के सम्बन्ध में लिखते हैं:

“अत्यधिक अनुसंधान के पश्चात जो तथ्य हमें क़ुरआन और हदीस से प्राप्त हुए हैं वास्तव में वह बहुत चौंकाने वाले हैं क्योंकि यह तथ्य सातवीं ईसवी के हैं जब भ्रूणकी के बारे में बहुत कम अध्ययन हुआ था। भ्रूण के सम्बन्ध में सब से पहला अनुसंधान जो ऐरिक स्टेट द्वारा टिकन के अण्डे पर किया गया उसमें भी इस अवस्थाओं का बिल्कुल उल्लेख नहीं है।”

इसके बाद प्रोफेसर मूरे ने अपना निष्कर्ष कुछ इस प्रकार दिया हैः

“हमारे लिए स्पष्ट है कि यह तथ्य मुहम्मद सल्ल0 पर अल्लाह की ओर से ही आया है क्योंकि इस (भ्रुणकी) सम्बन्ध की खोज हज़रत मुहम्मद सल्ल0 की मृत्यु के बहुत बाद में हुई। यह हमारे लिए स्पष्ट करता है कि मुहम्मद सल्ल0 अल्लाह के भेजे हुए संदेष्टा हैं।”

( Moore, K.L, The Development Human, 3th Edition, W.B Saunders co. 1982)

यातनाएं खाल को होती हैं शरीर को नहीं:

प्रोफेसर तेगासान ने जब सन्1995 में रियाज़ (सऊदी अरब) में होने वाली सभा में निम्न आयत पर चिन्तन मनन कियाः

” जिन लोगों ने हमारी आयतों का इन्कार किया उन्हें हम जल्द ही आग में जोंकेंगे। जब उनकी खालें पक जाएंगी तो हम उन्हें दूसरी खालों से बदल दिया करेंगे ताकि वह यातनाओं का मज़ा चखते रहें”।

तो अन्त में उन्होंने अपना विचार इन शब्दों में व्यक्त किया :

” मैं विश्वास करता हूं कि क़ुरआन में जो कुछ भी 14-00 वर्ष पूर्व लिखा जा चुका सत्य है जो आज अनेकों वैज्ञानिक स्रोतों द्वारा प्रमाणित किया जा सकता है। चूंकि हज़रत मुहम्मद सल्ल0 पढ़े लिखे न थे अतः वह अल्लाह के संदेष्टा ही हैं और उन्होंने योग्य सृष्टा की ओर से अवतरित ज्ञान को ही समस्त मनुष्यों तक पहुंचाया, वह योग्य सृष्टा अल्लाह ही है। इस लिए लगता है कि वह समय आ गया है कि मैं गवाही देते हुए पढ़ूं: ” ईश्वर के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं और मुहम्मद सल्ल0 अल्लाह के भेजे हुए (अन्तिम) संदेष्टा हैं।”

यही वह वैज्ञानिक तथ्य था जिस से प्रभावित हो कर उसी समय उन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया।

पहाड़ों की सृष्टि की हिकमतः

विज्ञान ने आधुनिक खोज द्वारा यह सिद्ध किया है कि पहाड़ों की जड़ पृथ्वी के नीचे हैं जो पृथ्वी को डुलकने से बचाता है और पृथ्वी को स्थिर रखने के लिए महत्वपूर्ण भुमिका अदा करता है। इस तथ्य की ओर क़ुरआन ने आज से साढ़े चौदह सौ वर्ष पूर्व संकेत कर दिया थाः “क्या हमने पृथ्वी को बिछौना और पर्वतों को मेख़ नहीं बनाया?” । ( सूरः 78 आयत 6-7) एक दूसरे स्थान पर फरमायाः ” और हमनें ज़मीन में पहाड़ जमा दिए ताकि वह इन्हें ले कर ढुलक न जाए”। ( सूरः 21 आयत 31)

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क़ुरआन ईश्वरीय ग्रन्थ या हज़रात मोहम्मद (स अ) की रचना (भाग 2)

क्या क़ुरआन मानव रचित ग्रन्थ है ?

डा. जी डबल्यू लिड्ज़ कहते हैः

“प्रायः कहा जाता है कि पवित्र क़ुरआन के लेखक मुहम्मद सल्ल. हैं और उस में जो भी बातें हैं तौरात और ईंजील से ली गई हैं, यह ग़लत है, मेरा विश्वास है कि क़ुरआन ईश-वाणी है “।

प्रिय मित्र! यदि आप निम्नलिखित तथ्यों पर चिंचन मनन करेंगे तो स्वयं आप क़ुरआन को ईश्वर की वाणी मानने पर विवश होंगेः

(1) क़ुरआन की भाषा शैली:

क़ुरआन का सब से महान चमत्कार यह है कि इसकी शैली मानव शैली से सर्वथा भिन्न है। वह अरब जिन में क़ुरआन का अवतरण हुआ था अपने शुद्ध साहित्यिक रसासवादन के लिए अति प्रसिद्ध थे, उनको अपनी भाषा शैली पर बड़ा गर्व था। ऐसे लोगों को क़ुरआन ने चुनौति दी –

” और यदि उसके विषय में जो हमने अपने बन्दे पर उतारा है, तुम किसी संदेह में हो तो उस जैसी कोई सूरः ले आओ और अल्लाह से हट कर अपने सहायकों को बुला लो जिनके आ मौजूद होने पर तुम्हें विश्वास है, यदि तुम सच्चे हो”। ( सूरः 2 आयत 23-24)

लेकिन इतिहास साक्षी है कि पूरे अरब उसके समान एक अध्याय तो क्या एक श्लोक भी पेश करने में असमर्थ्य रहे हालाँकि वह मुहम्मद सल्ल. के विरोद्ध में पूरे साहसी थे और आपत्ति का ओई अवसर खोना नहीं चाहते थे, तथा अरबी भाषा पर भी पूरी महारत रखते थे। यदि कुरआन मानव रचना होता तो कुछ लोग अवश्य उसके समान पेश कर सकते थे परन्तु न कर सके।

यह ग्रन्थ आज तक संसार वालों के लिए चुनौति बना हुआ है तथा रहती दुनिया तक बना रहेगा।

(2) उम्मी नबी पर क़ुरआन का अवरणः

यह भी एक सत्य है कि ईश्वर ने अन्तिम ग्रन्थ क़ुरआन के अवतरण के लिए ऐसे संदेष्टा का चयन किया जो न लिखना जानते थे न पढ़ना। मुहम्मद सल्ल0 के जन्म के पूर्व ही उनके पिता का देहांत हो गया। छः वर्ष की आयु हुई तो माता भी चल बसीं और आठ वर्ष के हुए तो दादा का साया भी सर से उठ गया कारणवश शिक्षा-दिक्षा से वंचित रहे और न ही उन्हें किसी विद्वान की संगति प्राप्त हुई थी आखिर ऐसे व्यक्ति से लिए यह कैसे सम्भव हो सकता था कि वह ऐसी अनुपम साहित्यिक पुस्तुक तैयार कर ले। यह ईश्वर की चाहत थी कि अन्तिम संदेष्टा पढ़े लिखे न हों ताकि कोई उन पर यह आरोप न लगाए कि वह क़ुरआन को अपनी ओर से बना कर अरबों की आखों में धूल झोंक रहे हैं।

आप अशिक्षित ( उम्मी ) होने के बावजूद लोगों में पवित्रता, सच्चाई और अमानतदारी से प्रसिद्ध थे यहाँ तक कि लोगों ने आपको सादिक़ (सच्चा) और अमीन (अमानतदार) की उपाधि से रखी थी। क्या ऐसा व्यक्ति जो लोगों के बीच सच्चाई और अमानदतारी से प्रसिद्ध हो अपनी बात ईश्वर की ओर सम्बन्धित कर सकता है? यह बात बुद्धिसंगत नहीं हो सकती । ज्ञात यह हुआ कि मुहम्मद सल्ल0 का पूरा ज्ञान ईश्वरीय ज्ञान था।

(3) क़ुरआन की शैली और मुहम्मद सल्ल0 की शैली में अन्तरः

मुहम्मद सल्ल0 के प्रवचनों को हदीस कहा जाता है। आपके इन प्रवचनों की शैली और क़ुरआन की शैली दोनों को मिला कर देखें तो दोनों सर्वथा भिन्न देखाई देंगे। कोई भी व्यक्ति जो क़ुरआन और हदीस को पढ़ेगा दो चार वाक्य पढ़ कर ही इस परिणाम पर पहुंच जाएगा कि यह दोनों वाणियाँ किसी एक व्यक्ति की नहीं हो सकतीँ। क्योंकि क़ुरआन का स्वर अत्यन्त मनमोहक है अपितु क़ुरआन की शैली मानव शैली से सर्वथा भिन्न है। यही कारण था कि जब मक्का वाले मुहम्मद सल्ल0 को क़ुरआन पढ़ते हुए सुनते तो आश्चर्यचकित रह जाते थे।
मुहम्मद साहिब का कट्टर शत्रु वलीद बिन मुग़ीरा ने जब आपको क़ुरआन पढ़ते हुए सुना तो बोल पड़ाः ” ईश्वर की सौगंध! उसमें मिठास है, उसमें ताज़गी और हरापन है (मानो यह ऐसा वृक्ष है ) जिसका निचला भाग छाँव वाला है और ऊपरी भाग फलदार है। यह मानव रचित हो ही नहीं सकता।”हम भी एक ऐतिहासिक तथ्य है कि वह अरब जिनके अन्दर मानवता नाम की कोई चीज़ नहीं थी जब क़ुरआनी शिक्षाओं को ले कर उठे तो थोड़े ही दिनों में चीन की सीमाओं से लेकर फ्रांस तक पहुंच गए और क़ुरआन के आधार पर एक ऐसी संस्कृति की स्थापना की जिस से प्रभावित हो कर गाँधी जी को कहना पड़ाः ” जब हमारा देश स्वतंत्र होगा तो हम उसमें अबू-बक्र तथा ऊमर जैसी शासन लाएंगे।”

(4) क़ुरआन हर प्रकार के विभेदों से मुक्त हैः

मानव कितना बड़ा विद्वान क्यों न हो जाए उस से ग़लतियाँ और कोताहियाँ हाती ही रहती हैं। उसका लेखन और भाषण त्रुटियों से सुरक्षित नहीं रह सकता। ईसी लिए क़ुरआन में एक स्थान पर ईश्वर का कथन हैः ” क्या यह लोग क़रआन में चिंतन मनन नहीं करते, यदि यह ईश्वर के अतिरिक्त किसी अन्य की ओर से होता तो अवश्य उसमें बहुत कुछ मतभेद पाते।” (सूरः 4 आयत 82)परन्तु क़ुरआन हर प्रकार की ग़लतियों आपत्तियों और कमियों से सुरक्षित है। यदि किसी को क़ुरआन में किसी प्रकार की आपत्ति नज़र आ रही हो तो वास्तव में ऐसा क़ुरआन का ज्ञान न होने के कारण होगा जिसके निवारण हेतु उसे क़ुरआन के विद्वानों से सम्पर्क करना चाहिए। क़ुरआन का आदेश हैः
” यह अत्यन्त महान ग्रन्थ है जिसके पास असत्य फटक भी नहीं सकता, न उसके आगे से, न उसके पीछे से, यह है अवतरित किया हुआ हिकमत वाले तथा गुणों वाले अल्लाह की ओर से” ( सूरः49 आयत 41-42)

कुरआन ने दिलों को जीता

क़ुरआन के ईश्-वाणी होने का एक महत्वपूर्ण प्रमाण उसके अन्दर शुद्ध साहित्यिक रसासवादन का पाया जाना है। जिस किसी ने क़ुरआन को दिल व दिमाग़ लगाकर सुना उस से प्रभावित हुए बिना न रहा। जिस किसी ने उसे मन से पढ़ा उसे दिल दे बैठा। यह कोई काल्पनिक वृत्तांत नहीं अपितु ऐतिहासिक तथ्य है।

वह अरब जिनके बीच क़ुरआन का अवतरण हो रहा था जब वह स्वयं क़ुरआन पढ़ते अथवा सुनते तो विश्वास कर लेते कि यह ग्रन्थ मानव रचित नहीं , ईश्वाणी है।

मुहम्मद साहिब का कट्टर शत्रु वलीद बिन मुग़ीरा ने जब आपको क़ुरआन पढ़ते हुए सुना तो बोल पड़ाः ” ईश्वर की सौगंध! उसमें मिठास है, उसमें ताज़गी और हरापन है (मानो यह ऐसा वृक्ष है ) जिसका निचला भाग छाँव वाला है और ऊपरी भाग फलदार है। यह मानव रचित हो ही नहीं सकता।”बल्कि इतिहास साक्षी है कि कितने लोगों ने क़ुरआन को सुनने के बाद उसके साहित्यिक रसासवादन से प्रभावित हो कर इस्लाम को स्वीकार कर लिया।

तलवार ले कर निकले पर दिल दे बैठेः

उमर बिन खत्ताब ( जो मुहम्मद सल्ल0 के देहांत के पश्चात दूसरे महान शासक हुए) इस्लाम स्वीकार करने से पूर्व मुहम्मद सल्ल0 के कट्टर शत्रु थे। एक दिन तलवार लटकाए इस संकल्प के साथ घर से निकले कि मुहम्मद सल्ल0 का सफाया ही कर दिया जाए ताकि न रहे बाँस न बजे बाँसरी। रास्ते में सूचना मिली के उनकी बहन और बहनोई भी इस्लाम स्वीकार कर चुके हैं। उमर ने सीधे बहन बहनोई का रुख किया। उनके घर पहुंचे और पूछाः क्या तुम दोनों इस्लाम स्वीकार कर चुके हो? -बहनोई ने कहा:अच्छा उमर यह बताओ यदि सत्य तुम्हारे धर्म के बजाए किसी और घर्म में हो तो? उमर का इतना सुनना था कि अपने बहनोई पर चढ़ बैठे और उन्हें बुरी तरह कुचल दिया। उनकी बहन ने पलट कर उन्हें अपने पति से अलग करना चाहा तो बहन को ऐसा चाँटा मारा कि चेहरा खून से लतपत हो गया। बहन ने कहाः उमर तुम से जो बन सकता हो कर लो परन्तु इस्लाम दिल में बैठ चुका है इसे तुम निकाल नहीं सकते। भाई को अपने दोष का एह्सास हुआ उन्हों ने पछताते हुए पूछाः अच्छा यह ग्रन्थ जो तुम्हारे पास है ज़रा मुझे भी पढ़ने का दो। बहन ने कहाः तुम अभी अपवित्र हो, उठो और स्नान करके आओ। उमर ने उठ कर स्नान किया, फिर क़ुरआन ली और पढ़ना शुरू कियाः अनुवादः ईश्वर के नाम से जो अत्यंत दयावान और कृपाशील है। कहने लगेः यह तो बड़े पवित्र नाम हैं। उसके बाद सूरः ताहा पढना शूरू किया जब प्रथम आयत से 14वी आयतः अनुवादः “निःसंदेह मैं ही अल्लाह हूं। मेरे अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं अतः मेरी ही पूजा करो और मेरे लिए ही नमाज़ पढो।” तक पढ़ी। कहने लगेः यह तो बड़ी उत्तम और प्रिय वाणी है मुझे मुहम्मद सल्ल0 का पता बताओ। उमर ने अपनी तलवार लटकाई और उस घर की ओर चले जिसमें रसूल सल्ल0 अपने साथियों के साथ एकत्र होते थे। जब रसूल सल्ल0 को देखा तो पुकार उठेः ” मैं साक्षी हूं कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं और में साक्षी हूं कि मुहम्मद सल्ल0 अल्लाह के संदेष्टा हैं।”

शासक की आँखें बहने लगीं:

हब्शा (इथियोपिया) का शासक अस्हमा ईसाई था। जब कुछ मुसलमानों ने मक्का वालों के कठोर व्यवहार से तंग आकर हब्शा में शरण लिया तो वहाँ पर उन लोगों को बादशाह की सेवा में लाया गया। मुसलमानों के अध्यक्ष जाफर (रज़ि0) ने उसके समक्ष सूरः मर्यम की कुछ आयतें पढ़ीं। सुनते ही बादशाह की आँखों से आँसू आ गए। फिर उसके बाद उसने इस्लाम भी स्वीकार कर ली।

क़ुरआन के मधूर भनक ने दिल जीत लियाः

तुफैल बिन अमर अद्दौसी यमन के दौस समुदाय के नायक थे। काबा के दर्शन हेतु मक्का आए को लोगों ने मुहम्मद सल्ल0 के विरोद्ध में उनको इतना भड़काया कि उन्होंने कान में रूई ठूंस ली थी ताकि क़ुरआन की कोई बात कान में न पड़ने पाए। काबा में आए और काबा में रखी 360 मूर्तियों की पूजा करने के बाद एक किनारे में मुहम्मद सल्ल0 को देखा कि आप क़ुरआन का पाठ कर रहे थे। सोचा कि मैं तो बुद्धि-ज्ञान रखता हूं अपने समाज का नायक हूं, सही ग़लम में तमीज़ कर सकता हूं क्यों न मुहम्मद सल्ल0 की बात सुनी जाए, हल्का सा कान से रूई खिस्काया तो ज़रा भनक लगी, निकट हुए तो क़ुरआन के रसासवादन ने उन्हें सुनने पर विवश किया, वह बैठ कर क़ुरआन सुनने लगे। अंततः उन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिय़ा।

क्या यह लोग स्वयं पैदा हो गए हैं

जुबैर बिन मुतईम ने मुहम्मद सल्ल0 को यह आयत पढ़ते हुए सुना – अनुवादः क्या यह लोग स्वयं पैदा हो गए हैं, अथवा वह स्वयं पैदा करने वाले हैं, क्या आकाश और धरती को इन्हीं लोगों ने पैदा किया है।” (सूरः 52 आयत 35) यह सुन कर कहते हैं कि मेरा दिल उड़ने लगा, अंततः मैंने इस्लाम स्वीकार कर ली।

यह मात्र कुछ उदाहरण थे वरना ऐसी हज़ारों मिसालें पाई जाती हैं जिन से ज्ञात होता है कि कुरआन ने दिलों को जीता और उस पर पूर्ण रूप में क़ाबू पाया। यही कुरआन का सब से बड़ा चमत्कार है। आज भी यदि कोई क़ुरआन को समझ कर पढ़ेगा अथवा सुनेगा तो उसके रसासवादन से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता।

कुरआन के संख्यात्मक चमत्कार

क़ुरआन ईश्वर की ओर से अवतरित सम्पूर्ण मानव के लिए एक उत्तम उपहार और रहती दुनिया तक के लिए एक महान चमत्कार है। क़ुरआन स्वयं घोषणा करता हैः “आप कह दीजिए कि यदि प्रत्येक मानव तथा सारे जिन्नात मिल कर इस क़ुरआन के समान लाना चाहें तो उन सब के लिए इसके समान लाना असम्भव है। यधपि वह (परस्पर) एक दूसरे के सहायक भी बन जाएं।” (सूरः बनी इस्राईल 17 आयत 88)

क़ुरआन उस अल्लाह की वाणी है जो संसार का उत्पत्तिकर्ता, शासक और ज्ञानी है। जो लोगों के वर्तमान अतीत और भविष्य का जानने वाला है। क़रआन का चमत्कार रहती दुनिया तक बाक़ी रहेगा।

प्रतिदिन नवीन शौध के आधार पर क़ुरआन से सम्बन्धित अदभूत प्रकार की चमत्कारियाँ हमारे समक्ष प्रकट हो रही हैं। उन चमत्कारियों में से एक कुरआन के शब्दों में संख्यात्मक समानताओं का पाया जाना है जो स्पष्ट प्रमाण हैं कि कुरआन पृथ्वी व आकाश के सृष्टिक्रता की ओर से अवतरित किया हुआ महान ग्रन्थ है।

क़ुरआनी शब्दों में समानताओं और चमत्कारियों का पाया जाना वास्तव में बड़ा आश्चर्यजनक विषय है। मुसलमान विद्वानों ने नवीनतम सांख्यिकीय उपकरण और कंप्यूटर के माध्यम से आज के आधुनिक युग में इस गणितीय चमत्कार को मानव के सामने पेश किया है।

यह चमत्कार संख्या पर आधारित है और आँकड़े स्वयं बालते हैं जिसे न चर्चा का विषय बनाया जा सकता है और न ही इसका इनकार किया जा सकता है। अल्लाह ने चाहा कि शब्दों का यह चमत्कार आज के युग में उदित हो ताकि प्रगतिशिल लोगों के लिए क़ुरआन विश्वास का आधार बने। क़ुरआन कहता हैः ” हम अवश्य उन्हें अपनी निशानियाँ धरती व आकाश में देखाएंगे और स्वयं उनकी अपनी ज़ात में भी यहाँ तक कि उन पर खुल जाए कि सत्य यही है।” ( हा मीम सज्दा 41 आयत 53)

तो लीजिए यह हैं कुछ क़ुरआन के संख्यात्मक आंकड़ेः

क़ुरआन में कुछ शब्द ऐसे हैं जो अपने समान शब्द अथवा अपने से विलोम शब्द के साथ दोहराए गए हैं उदाहरण के लिए देखिएः

हयात (जीवन) 145 बार दोहराया गया है ………. तो मौत 145 बार ही दोहराया गया है।

सालिहात (नेकियाँ) 167 बार दोहराया गया है ……. तोसय्येआत (बुराइयाँ) 167 बार ही दोहराया गया है।
दुनिया 115 बार दोहराया गया है……… तो आखिरत 115 बारही दोहराया गया है।
मलाईकः (स्वर्गदूतों) 88 बार दोहराया गया है ………. तो शैतान88 बार ही दोहराया गया है।
मुहब्बः (प्यार) 83 बार दोहराया गया है………..तो ताअत ( आज्ञाकारिता) 83 बार ही दोहराया गया है।
हुदा (मार्गदर्शन) 79 बार दोहराया गया है ………..तो रहमत(दया) 79 बार ही दोहराया गया है।
शिद्दत (तीव्रता) 102 बार दोहराया गया है ………. तो सब्र (धैर्य)102 बार ही दोहराया गया है।

अस्सलाम (शांति)50 बार दोहराया गया है ………. तो तय्येबात(पाकीज़गियाँ) 50 बार ही दोहराया गया है।

इब्लीस (शैतान) 11 बार दोहराया गया है ……… तो अल्लाह से शरण मांगना 11 बार ही दोहराया गया है।

जहन्नम (नरक) और उसके डेरिवेटिव 77 बार दोहराया गया है ……. तो जन्नत (स्वर्ग) और उसके डेरिवेटिव 77 बार ही दोहराया गया है।

अर्र-जुल (पुरुष) 24 बार दोहराया गया है ……… तो अल-मरअः(स्त्री) 24 बार ही दोहराया गया है।

क़ुरआन में कुछ शब्द ऐसे हैं जिनके बीच संतुलित और सटीक रूप में सांख्यिकिय बराबरी पाई जाती हैः उदाहरण-स्वरूप

साल में 12 महीने होते हैं ………… तो शह्र ( महीना) 12 बार ही दोहराया गया है

साल में 365 दिन होते हैं तो शब्द यौम (दिन) 365 बार ही दोहराया गया है।
अब हमें बताईए कि क़ुरआन के शब्दों की संख्याओं में भी इस प्रकार संतुलन का पाया जाना क्या यह स्पष्ट प्रमाण नहीं कि यह ग्रन्थ मानव रचित नहीं अपितु संसार के सृष्टा की ओर से अवतरित किया हुआ है।
संदर्भ: (1) मोजज़तुल-अरक़ाम वत्तरक़ीम फिल क़ुरआनिल करीम- (पवित्र कुरआन के संख्यात्मक चमत्कार) अब्दुल रज्जाक नौफल – – दारुल-किताब अल-अरबी 1982
(2) अलइजाज़ अल-अददी लिलक़ुरआन अल-करीम (पवित्र कुरआन के संख्यात्मक चमत्कार) : अब्दुल रज्जाक

क़ुरआन और विज्ञान

क़ुरआन के ईश-वाणी होने के लिए यह प्रमाण काफी है कि उसने आज से साढ़े चौदह सौ वर्ष पूर्व उन वैज्ञानिक बातों की भी चर्चा की है जिसकी खोज विज्ञान आज के युग में कर सका है इस प्रकार के विभिन्न वैज्ञानिक तथ्य क़ुरआन में बयान किए गए हैं। “पवित्र क़ुरआम कोई विज्ञान की पुस्तक नहीं है अपितु मार्गदर्शक ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ में छ हज़ार से अधिक आयतें हैं उनमें से एक हज़ार से अधिक आयतों का सम्बन्ध विज्ञान से है।” (क़ुरआन और आधुनिक विज्ञान  पृष्ठ 12)
हम निम्म में कुछ प्रमुख उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं:

भ्रूण का विकासः
पवित्र क़ुरआन में मानव भ्रूण के विकास की विभिन्न अवस्थाओं को इस प्रकार बयान किया गया हैः

” हमने इनसान को मिट्टी के सत से बनाया, फिर हमने उसे एक सुरक्षित ठहरने की जगह टपकी हुई बुंद बना कर रखा। फिर हमने उस बूंद को लोथड़ा का रूप दिया। फिर हमने उस लोथड़े को बूटी का रूप दिया। फिर हमने बोटी की हड्डियाँ बनाईँ। फिर हमने उस हड्डियों पर मास चढ़ाया। फिर हमने उसे एक दूसरा ही सर्जन रूप दे कर खड़ा किया।” ( सूरः 23 आयत 12-14)

कनाडा यूनीवर्सिटी के प्रोफेसर मूरे इस आयतों के सम्बन्ध में लिखते हैं:

“अत्यधिक अनुसंधान के पश्चात जो तथ्य हमें क़ुरआन और हदीस से प्राप्त हुए हैं वास्तव में वह बहुत चौंकाने वाले हैं क्योंकि यह तथ्य सातवीं ईसवी के हैं जब भ्रूणकी के बारे में बहुत कम अध्ययन हुआ था। भ्रूण के सम्बन्ध में सब से पहला अनुसंधान जो ऐरिक स्टेट द्वारा टिकन के अण्डे पर किया गया उसमें भी इस अवस्थाओं का बिल्कुल उल्लेख नहीं है।”

इसके बाद प्रोफेसर मूरे ने अपना निष्कर्ष कुछ इस प्रकार दिया हैः

“हमारे लिए स्पष्ट है कि यह तथ्य मुहम्मद सल्ल0 पर अल्लाह की ओर से ही आया है क्योंकि इस (भ्रुणकी) सम्बन्ध की खोज हज़रत मुहम्मद सल्ल0 की मृत्यु के बहुत बाद में हुई। यह हमारे लिए स्पष्ट करता है कि मुहम्मद सल्ल0 अल्लाह के भेजे हुए संदेष्टा हैं।”

( Moore, K.L, The Development Human, 3th Edition, W.B Saunders co. 1982)

यातनाएं खाल को होती हैं शरीर को नहीं:

प्रोफेसर तेगासान ने जब सन्1995 में रियाज़ (सऊदी अरब) में होने वाली सभा में निम्न आयत पर चिन्तन मनन कियाः

” जिन लोगों ने हमारी आयतों का इन्कार किया उन्हें हम जल्द ही आग में जोंकेंगे। जब उनकी खालें पक जाएंगी तो हम उन्हें दूसरी खालों से बदल दिया करेंगे ताकि वह यातनाओं का मज़ा चखते रहें”।

तो अन्त में उन्होंने अपना विचार इन शब्दों में व्यक्त किया :

” मैं विश्वास करता हूं कि क़ुरआन में जो कुछ भी 14-00 वर्ष पूर्व लिखा जा चुका सत्य है जो आज अनेकों वैज्ञानिक स्रोतों द्वारा प्रमाणित किया जा सकता है। चूंकि हज़रत मुहम्मद सल्ल0 पढ़े लिखे न थे अतः वह अल्लाह के संदेष्टा ही हैं और उन्होंने योग्य सृष्टा की ओर से अवतरित ज्ञान को ही समस्त मनुष्यों तक पहुंचाया, वह योग्य सृष्टा अल्लाह ही है। इस लिए लगता है कि वह समय आ गया है कि मैं गवाही देते हुए पढ़ूं: ” ईश्वर के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं और मुहम्मद सल्ल0 अल्लाह के भेजे हुए (अन्तिम) संदेष्टा हैं।”

यही वह वैज्ञानिक तथ्य था जिस से प्रभावित हो कर उसी समय उन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया।

पहाड़ों की सृष्टि की हिकमतः

विज्ञान ने आधुनिक खोज द्वारा यह सिद्ध किया है कि पहाड़ों की जड़ पृथ्वी के नीचे हैं जो पृथ्वी को डुलकने से बचाता है और पृथ्वी को स्थिर रखने के लिए महत्वपूर्ण भुमिका अदा करता है। इस तथ्य की ओर क़ुरआन ने आज से साढ़े चौदह सौ वर्ष पूर्व संकेत कर दिया थाः “क्या हमने पृथ्वी को बिछौना और पर्वतों को मेख़ नहीं बनाया?” । ( सूरः 78 आयत 6-7) एक दूसरे स्थान पर फरमायाः ” और हमनें ज़मीन में पहाड़ जमा दिए ताकि वह इन्हें ले कर ढुलक न जाए”। ( सूरः 21 आयत 31)


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क्या पवित्र कुरआन ईश्वरीय ग्रंथ है या हज़रत मुहम्मद की रचना? भाग (1)

प्रथम प्रमाण: आज यह बात सारे धार्मिक इतिहासकार स्वीकार कर चुके हैं, कि हज़रत मुहम्मद ईमानदारी से यह विश्वास रखते थे कि उन्हें ईश्वर की ओर से संदेश प्राप्त हो रहा था। उदाहरणार्थ विलियम मोंटगोमेरी वाट (William Montgomery Watt) अपनी पुस्तक, मुहम्मद, प्रॉफ़ेट एंड स्टेट्स्मेन (Muhammad, Prophet and Statesman) में लिखते हैं,

“One of the common allegations against Muhammad is that he was an impostor, who to satisfy his ambition and his lust propagated religious teachings which he himself knew to be false. Such insincerity makes the development of the Islamic religion incomprehensible. …Only a profound belief in himself and his mission explains Muhammad’s readiness to endure hardship and persecution during the Meccan period when from a secular point of view there was no prospect of success. Without sincerity how could he have won the allegiance and even devotion of men of strong and upright character like Abu-Bakr and ‘Umar?… There is thus a strong case for holding that Muhammad was sincere.” [Muhammad, Prophet and Statesman.Oxford University Press, 1961. Pg. 232.]

अनुवाद:

“मुहम्मद के विरुद्ध लगाए जाने वाले आरोपों में से एक आरोप यह है कि वह एक पाखंडी व्यक्ति था, जिसने अपनी महत्वाकांक्षा और वासना की संतुष्टि के लिए अपने मत का प्रचार किया, यह जानते हुए कि उसका मत झूठा है। लेकिन इस प्रकार की निष्ठाहीनता के बावजूद इस्लाम का विकास हो, यह समझ से बाहर है”… “मक्का के दौर में, जबकि इस्लाम की सफलता की कोई संभावना नहीं दिख रही थी, मुहम्मद का सभी प्रकार की कठिनाइयाँ और उत्पीड़न सहने का एकमात्र कारण ही यह था कि वे खुद में और अपने मिशन में ईमादारी के साथ गहरा विश्वास रखते थे। इस ईमानदारी के बगैर यह कैसे संभव था कि वे अबू बकर और उमर जैसे, मजबूत और ईमानदार चरित्र के व्यक्तियों का समर्थन और उनकी भक्ति जीत सकते थे? इस तरह यह पक्ष काफी मज़बूत है कि मुहम्मद निष्कपट और ईमानदार थे।” [Muhammad, Prophet and Statesman, प्रकाशक: Oxford University Press, 1961 संस्करण, पृष्ठ 232]

यह मेरा पहला प्रमाण है। यह तथ्य कि मुहम्मद साहब मक्का में 13 वर्षों तक भयंकर कठिनाइयों और उत्पीड़न को सहन करते रहे, साबित करता है कि वे इस बात पर गहरा विश्वास रखते थे कि वे ईश्वर की ओर से संदेश प्राप्त कर रहे हैं। हाँ मगर इस से यह साबित नहीं होता कि उनका यह विश्वास वास्तव में सही था। लेकिन इस संभावना का खंडन अवश्य होता है कि वे जान बूझ कर लोगों को धोका दे रहे थे। एक ऐसा व्यक्ति जो ईमानदारी से यह विश्वास रखता हो कि वह जो कुछ कर रह है वो ईश्वर के कहने पर कर रहा है और वह व्यक्ति जिसको मालूम हो कि वो दूसरों को धोका दे रहा है, इन दोनों में काफी अन्तर है।

दूसरा प्रमाण: आपत्ति करने वाले आपत्ति कर सकते हैं कि यद्यपि वे अपने विश्वास में ईमानदार थे, पर यह उनका भ्रम हो सकता था कि वे ईश्वर के दूत हैं। यह एक जायज़ प्रश्न है। परन्तू, हज़रत मुहम्मद के जीवन की कुछ घटनाएँ, इस प्रश्न का खंडन करती हैं। उदाहरणार्थ, विश्वसनीय अहादीस (हज़रत मुहम्मद  के जीवन, कथन, आदि का संग्रह) में एक घटना का वर्णन मिलता है कि हज़रत मुहम्मद के एक पुत्र हुए थे, जिंका नाम उनहों ने इब्राहीम रखा। इस पुत्र की  बचपन में ही मृत्यु हुई जब वह 2 वर्ष के थे। हदीस में इस घटना का यूं वर्णन मिलता है,

“अल्लाह के रसूल (स.) के जमाने में सूरज ग्रहण उस दिन हुआ जिन दिन आपके लाडले पुत्र इबरहीन की मृत्यु हुई। लोगों ने खयाल किया इबरहीन की मृत्यु के कारण सूर्य ग्रहण हुआ है (अर्थात आसमान भी गमगीन है)। इस पर अल्लाह के रसूल ने फरमाया की चंद और सूर्य का ग्रहण किसी की मृत्यु या पैदाइश से नहीं होता। जब तुम ग्रहण देखो तो नमाज़ पढ़ो और अल्लाह से दुआ करो।” [बुखारी किताब अल–कसूफ़, अध्याय 1]

अब यदि वे किसी भ्रम मे होते कि वे अल्लाह के रसूल हैं, तो लोगों की इस बात को मान लेते और स्वयं भी इसी प्रकार सोचते। यदि वे धोखेबाज़ होते तो इस घटना और लोगों के अंधविश्वास को अपने लाभ के लिए इस्तेमाल करते। परन्तू उनहों ने लोगों के इस अंधविश्वास को साफ नकार दिया कि ग्रहण का संबंध किसी के जनम एवं मृत्यु से होता है। इसी घटना की तुलना अब बाइबल के लेखकों के द्वारा रचे उस किस्से से कीजिए जिस में उनहों ने ईसाई मत के अनुसार ईश्वर के पुत्र ईसा मसीह को क्रूस पर चड़ाने के समय कुछ इसी प्रकार की प्रकृतिक घटनाओं का होना लिखा।  इन घटनाओं को बाइबल के लेखकों ने इस सबूत के तौर पर पेश किया है कि वास्तव में ईसा ईश्वर के पुत्र थे, जबकि यह केवल एक संयोग था। बाइबल का वर्णन कुछ इस प्रकार है,

“उस समय दिन के बारह बजे होंगे तभी तीन बजे तक समूची धरती पर गहरा अंधकार छा गया। सूरज भी नहीं चमक रहा था। उधर मन्दिर में परदे फट कर दो टुकड़े हो गये। यीशु ने ऊँचे स्वर में पुकारा, “हे परम पिता, मैं अपनी आत्मा तेरे हाथों सौंपता हूँ।” यह कहकर उसने प्राण छोड़ दिये। जब रोमी सेनानायक ने, जो कुछ घटा था, उसे देखा तो परमेश्वर की प्रशंसा करते हुए उसने कहा, “यह निश्चय ही एक अच्छा मनुष्य था!” [बाइबल, लूका अध्याय 23, श्लोक 44-47]

देखिए कि बाइबल के लेखक ने किस प्रकार एक प्रकृतिक मौसमी बदलाव और रूमी अंधविश्वासी के वचनों को अपने मत के फायिदे के लिए इस्तेमाल किया है। यह दूसरा प्रमाण था कि मुहम्मद (स.) निष्कपट होने के साथ साथ भ्रमित भी नहीं थे। वह ईश्वरीय प्रेरणा से बोलते थे।

तीसरा प्रमाण: मुहम्मद (स.) लिखना पढ़ना नहीं जानते थे। उनके विरोधी भी इस तथ्य को जानते थे। और जब पवित्र कुरआन ने इस तथ्य की तरफ इशारा किया तो उनके किसी भी विरोधी ने इस का इंकार नहीं किया। कुरआन ने मुहम्मद (स.) से फरमाया

وَمَا كُنتَ تَتْلُو مِن قَبْلِهِ مِن كِتَابٍ وَلَا تَخُطُّهُ بِيَمِينِكَ ۖ إِذًا لَّارْ‌تَابَ الْمُبْطِلُونَ

“इस (कुरआन) से पहले तुम न कोई किताब पढ़ते थे और न उसे अपने हाथ से लिखते ही थे। ऐसा होता तो ये मिथ्यावादी सन्देह में पड़ सकते थे” [सूरह अंकबूत 29, आयत 48]

पवित्र कुरआन ने एक उच्च सिद्धान्त बताया है कि हज़रत मुहम्मद (स.) से पूर्व सभी सच्चे पैगंबर अल्लाह की तरफ से थे, और सभी ने एक ईश्वर की उपासना की शिक्षा दी है। यह एक ऐसा सिद्धान्त है जिसे कोई भी व्यक्ति उन सभी पैगंबरों से संबन्धित धार्मिक ग्रन्थों को पढे बिना, काइम नहीं कर सकता। परन्तू अल्लाह के रसूल (स.) न दुनिया में फिरे और न कोई किताब पढ़ी। इस लिए कुरआन ने यह प्रमाण दिया कि मुहम्मद (स.) तो पढ़ना न जानते थे। यदि पढ़ना जानते तो संदेह की गुंजाइश हो सकती थी कि यह सिद्धान्त उनहों ने खुद बनाया।

चौथा प्रमाण: पवित्र कुरआन में कई स्थान ऐसे हैं जहां हज़रत मुहम्मद (स.) को कुछ बहुत छोटी गलतियों के लिए टोका और अनुशासित किया गया है, और वो भी ऐसी गलतियाँ कि जिन की तरफ किसी ने ध्यान भी नही दिया था। उदाहरणार्थ, हम सूरह अबस (सूरह नंबर 80) में पढ़ते हैं कि हज़रत मुहम्मद (स.) जब कुरेश कबीले के अभिजात वर्ग से बात कर रहे थे और इस्लाम की शिक्षाएँ समझा रहे थे तो एक अंधे व्यक्ति, अब्दुल्लाह बिन उम्मि मकतूम आगाए और उनहों ने अल्लाह के रसूल (स.) का ध्यान अपनी ओर फेरना चाहा, जिसे अल्लाह के रसूल (स) ने पसंद नहीं किया और उनहों ने त्योरी चढ़ाई और मुँह फेर लिया और कुरेश के बड़े लोगों से बात करते रहे। अल्लाह के रसूल (स) ने समझा कि यह तो अपने आदमी हैं, जब चाहे पूछ लेते। इस समय क्या ज़रूरत थी जबकि बड़े नास्तिक सरदारों को मैं अल्लाह का संदेश समझा रहा हूँ। इस पर पवित्र कुरआन में अल्लाह ने आयात नाज़िल फरमाईं जिन में अल्लाह के रसूल (स) को अनुशासित किया गया और बताया गया कि बड़े आदमियों की इतनी परवाह न करो कि उनकी और ध्यान देने से उन व्यक्तियों से ध्यान हट जाए जो स्वयं आप से कुछ सीखना चाहते हों। कुरआन का वर्णन इस तरह है

عَبَسَ وَتَوَلَّىٰ ﴿١﴾ أَن جَاءَهُ الْأَعْمَىٰ ﴿٢﴾ وَمَا يُدْرِ‌يكَ لَعَلَّهُ يَزَّكَّىٰ ﴿٣﴾ أَوْ يَذَّكَّرُ‌ فَتَنفَعَهُ الذِّكْرَ‌ىٰ ﴿٤﴾ أَمَّا مَنِ اسْتَغْنَىٰ ﴿٥﴾ فَأَنتَ لَهُ تَصَدَّىٰ ﴿٦﴾ وَمَا عَلَيْكَ أَلَّا يَزَّكَّىٰ ﴿٧﴾ وَأَمَّا مَن جَاءَكَ يَسْعَىٰ ﴿٨﴾ وَهُوَ يَخْشَىٰ ﴾ فَأَنتَ عَنْهُ تَلَهَّىٰ ﴿١٠) كَلَّا إِنَّهَا تَذْكِرَةٌ

माथे पर बल आ गए और मुँह फेर लिया, (1) इस कारण कि उसके पास अन्धा आ गया। (2) और आपको क्या मालूम शायद वह स्वयं को सँवारता–निखारता हो (3) या नसीहत हासिल करता हो तो नसीहत उसके लिए लाभदायक हो? (4) रहा वह व्यक्ति जो धनी हो गया है(5) आप उसके पीछे पड़े हैं – (6) हालाँकि वह अपने को न निखारे तो आप पर कोई ज़िम्मेदारी नहीं आती – (7) और रहा वह व्यक्ति जो स्वयं ही आप के पास दौड़ता हुआ आया, (8) और वह डरता भी है, (9) तो आप उससे बेपरवाई करते हैं (10) ऐसा न करो, निसंदेह यह तो एक नसीहत नामा है। (11)

हम यह जानते हैं कि जब कोई व्यक्ति आपस में बात कर रहे हों तो बीच में टोकना अच्छा नहीं लगता। यह एक स्वाभाविक बात है। तो अल्लाह के रसूल को इस साथी का टोकना अच्छा न लगना कुछ बड़ी बात नहीं थी। इसके अतिरिक्त उन्होने केवल अपने मुंह को फेर दिया और उस अंधे व्यक्ति को डांटा नहीं। यदि मान भी लिया जाए कि अल्लाह के रसूल (स) को मुंह नहीं फेरना चाहिए था, तब भी वो उस अंधे व्यक्ति से मिल कर माफी मांग लेते और बात खतम हो जाती। किसी और को इस घटना की खबर भी नहीं होती। और कुरेश के सरदारों के लिए भी कोई बड़ी बात नहीं थी। पर इस घटना को सदा के लिए पवित्र कुरआन का हिस्सा बना लेना और अल्लाह की तरफ से इस व्यवहार पर अनुशासित किए जाने का वर्णन कोई अपने द्वारा रची गई पुस्तक में क्यों रखे? इस से उसे क्या लाभ? स्वार्थी लोग तो अपने बड़े बड़े पापों को छुपा लेते हैं, चोटी और महत्वहीन गलतियों की तो बात ही नहीं। यदि मुहम्मद (स) ने स्वयं कुरआन को घड़ लिया होता तो अपनी इस महंत्वहीन गलती को क्यों इतना प्रचारित करते? यह साबित करता है कि कुरआन उनकी रचना नहीं है बल्कि अल्लाह की तरफ से उतरा संदेश है और जो अल्लाह ने उन की ओर उतारा उनको उनहों ने सबको सुनाया चाहे वह स्वयं उनको ही अनुशासित क्यों न कर रहा हो।

पांचवा प्रमाण: पवित्र कुरआन में अपने से पूर्व के इतिहास का वर्णन है। इस ऐतिहासिक जानकारी की स्वतंत्र जांच करने से पता चलता है कि हज़रत मुहम्मद और उनके साथियों को इसकी जानकारी नहीं थी और कुरआन ने जो उन्हें जानकारी दी वह बाद में सच साबित हुई। कई लोग यह आरोप लगाते हैं कि मुहम्मद साहब ने बाइबल में से पूर्व के पैगंबरों की जानकारी चुरा के कुरआन में रख दी। वे इस बात की तरफ ध्यान नहीं देते कि कुरआन तो अपने से पूर्व अल्लाह की ओर से आए हुए ग्रन्थों की पुष्टि करता है कि उनमें भी वही संदेश था जो कुरआन दोहरा रहा है। दो ग्रन्थों में समानता होने का अर्थ यह नहीं है कि एक ने दूसरे से जानकारी चराई है। इसका अर्थ यह है कि दोनों का मूल संदेश एक ही है क्यों कि दोनों एक ही मालिक की ओर से आए हैं। हाँ यहाँ यह ज़रूर स्मरण रहे कि कुरआन से पूर्व जो भी ग्रंथ आए उनमें स्वार्थी मनुष्यों ने अपने फाईदे के लिए परिवर्तन कर दिया था, जिस से उनके अंदर काफी गलत जानकारी भी मिल गई थी, जो कि वास्तविक इतिहास के विरुद्ध थी। अब यदि मुहम्मद साहब ने कुरआन को इन पूर्व के ग्रन्थों से चुराया होता तो इन ग्रन्थों में मनुष्य परिवर्तन के कारण होने वाली ऐतिहासिक गलतियों को भी वे कुरआन में सही मान कर रख देते। परन्तू जब हम वर्तमान बाइबल और कुरआन का तुलनात्मक अध्ययन करते हैं तो आश्चर्य होता है कि हमारा आधुनिक ऐतिहासिक ज्ञान कुरआन के वर्णन की पुष्टि करता है जबकि बाइबल मैं ठीक उनही घटनाओं का वर्णन इतिहास के विरुद्ध जाता है। एक उदाहरण से मेरी यह बात साफ हो जाएगी बाइबल के भाग ‘पुराना विधान’ (Old Testament) में, हज़रत इब्राहीम और हज़रत युसुफ के समय मिस्र के शासक को ‘फिरौन’ (Pharoah) कहा गया है। उदाहरणार्थ देखिए बाइबल में उत्पत्ति (Genesis) अध्याय 12, श्लोक 17,18,20 और उत्पत्ति (Genesis) अध्याय 41, श्लोक 14,25,46। यह इतिहासिक दृष्टि से गलत है क्यों कि फिरौन वंश के शासक हज़रत मूसा के समय के आस पास मिस्र की सत्ता में आए। हज़रत युसुफ के समय जो वंश वहाँ के शासक थे उन्हें हिक्सास (Hyksos) कहा जाता था, ना कि फिरौन (Pharoah)। हिक्सास एशियायी नस्ल के थे और मिस्र की सत्ता पर 1720 ईसा पूर्व कब्जा कर लिया था। 1550 ईसा पूर्व में मूल मिस्री जनता ने इनके विरुद्ध विद्रोह किया और इस प्रकार मिस्र पर हिक्सास का शासन समाप्त हुआ। अब यदि हज़रत मुहम्मद (स) ने बाइबल से कहानियाँ सुन कर उन को कुरआन में लिखा होता तो यह ऐतिहासिक गलती कुरआन में भी पाई जाती और कुरआन भी सूरह युसुफ में, हज़रत युसुफ के समय के मिस्री शासक को फिरौन कहता। परन्तू कुरआन में इस शासक को कोई उपाधि न देकर केवल ‘अल्मलिक’ (सम्राट, बादशाह) कहा गया है। उदाहरण के लिए देखिए सूरह युसुफ 12, आयत 43 और 50। जबकि हज़रत मूसा के समय के मिस्री शासक को साफ साफ ‘फिरौन’ कहा है। इस उदाहरण से पता चलता है कि हज़रत मुहम्मद (स) ने बाइबल से कुछ नकल नहीं किया है क्योंकि नकल करने पर प्रक्षिप्त बाइबल की गलती कुरआन में भी शामिल हो जाती। कुरआन इस लिए उस सर्वज्ञ ईश्वर का संदेश है जिसको सत्य का ज्ञान है और अपने संदेश कुरआन में प्रक्षिप्त बाइबल की गलती को भी सुधारा।

छटा प्रमाण: पवित्र कुरआन ने हैरत अंगेज़ भविष्यवाणियाँ कीं जो भविष्य में शत प्रतिशत सही साबित हुईं। क्योंकि भविष्य का ज्ञान केवल अल्लाह के पास है, इस कारण कुरआन अल्लाह का कलाम साबित होता है। यदि पवित्र कुरआन की कोई भविष्य वाणी गलत साबित होती तो साफ पता चल जाता कि यह एक अल्पज्ञ मनुष्य द्वारा रचा गया है। हम सब यह जानते हैं कि हज़रत मुहम्मद (स) धार्मिक प्रचार के पहले 13 साल के दौर को ‘मक्की’ दौर कहा जाता है, जिस में उनके प्रचार का केंद्र केवल मक्का शहर रहा। इन दस वर्षों में कुरआन के जीतने सूरह (अध्याय) लोगों को सुनाए गए उन्हें ‘मक्की’ सूरह कहा जाता है। इस के बाद, उनके मदीना जाने से उनकी मृत्यु तक के दौर को ‘मदनी’ दौर कहा जाता है। और इस दौर में जो कुरआन की सूरह लोगों को सिखाई गईं उनको ‘मदनी’ सूरह कहा जाता है। ‘मक्की’ दौर के 10 वर्ष हज़रत मुहम्मद (स) के लिए बहुत कठिन दौर था, जिस में आपके संदेश को मुश्किल से केवल 150 लोगों ने स्वीकार किया। इस दौर में उनका प्रचार ज़ाहिरी तौर से असफल लग रहा था। लेकिन इस दौर में कुरआन ने एक भविष्यवाणी की जो कुरआन की ‘मक्की’ सूरह नस्र सूरह नंबर 110 में पढ़ी जा सकती है। इस में उनसे कहा गया था।

إِذَا جَاءَ نَصْرُ اللَّهِ وَالْفَتْحُ ﴿١﴾ وَرَأَيْتَ النَّاسَ يَدْخُلُونَ فِي دِينِ اللَّهِ أَفْوَاجًا ﴿٢﴾ فَسَبِّحْ بِحَمْدِ رَبِّكَ وَاسْتَغْفِرْهُ ۚ إِنَّهُ كَانَ تَوَّابًا ﴿٣

जब अल्लाह की सहायता आ जाए और विजय प्राप्त हो, (1) और तुम लोगों को देखो कि वे अल्लाह के दीन (धर्म) में गिरोह के गिरोह प्रवेश कर रहे है, (2) तो अपने रब की प्रशंसा करो और उससे क्षमा चाहो। निस्संदेह वह बड़ा तौबा क़बूल करनेवाला है (3)

13 वर्ष के प्रचार में 150 सहयोगी पाना, वो भी भीषण कठिनाइयों का सामना कर के, ज़ाहिरी तौर से असफ़ल ही लगा था। लेकिन उसी जमाने में कुरआन ने ये घोषणा कर दी कि आगे अल्लाह का असाधारण सहयोग मिलेगा और तुम देखोगे कि लोग भारी संख्या में, गिरोह के गिरोह, इस्लाम में प्रवेश करेंगे। इस घोषणा की पूर्ति उस समय असंभव लग रही थी। लेकिन दुनिया ने देखा कि अगर पहले 13 वर्षों में मात्र 150 आदमी इस्लाम में प्रवेश हुए, तो अगले 10 वर्ष में सम्पूर्ण अरब इस्लाम में प्रवेश कर गया। इस से भी अगले 15 वर्षों में इस्लाम ने उस जमाने की विश्व की दो महाशक्तियों, रूमी साम्राज्य (Byzantine Empire) और ईरान के सासानी साम्राज्य (Sassanid Empire) को अपने अंदर समा लिया, और इस से भी अगले 10 वर्षों में इस्लाम पश्चिम में स्पेन से पूर्व में भारत और इंडोनेशिया तक प्रवेश कर गया। इस तरह शानदार अंदाज़ में कुरआन के ईश्वरीय संदेश होने का प्रमाण मिल गया। इस्लाम के इस हैरत अंगेज़ फेलाव पर टिप्पणी करते हुए पश्चिमी इतिहासकार फिलिप क. हिट्टी Philip K. Hitti ने अपनी पुस्तक ‘दी अरब्स – ए शार्ट हिसटरि’ The Arabs- A Short History में यूं लिखा है

“If someone in the first third of the seventh Christian century had the audacity to prophesy that within a decade some unheralded, unforeseen power from the hitherto barbarians and little known land of Arabia was to make its appearance, hurl itself against the only two powers of the age, fall heir to the one-the Sassanids, and strip the other, the Byzantine of its fairest provinces, he would undoubtedly be declared a lunatic. Yet that was what happened. After the death of the Prophet, sterile Arabia seems to have been converted as if by magic into a nursery of heroes the like of whom, both in number and quality, would be hard to find anywhere.” [The Arabs- A Short History, by Philip K. Hitti, 1960, chapter Islam on the March, Pg. 42]

अनुवाद:

“सातवीं शताब्दी के पहले तिहाई जमाने में यदि किसी व्यक्ति को यह भविष्यवाणी करने की हिम्मत होती की एक दशक के अंदर अंदर, अब तक बर्बर और लगभग अंजान अरबवासीयों में से कोई अप्रत्याक्षित शक्ति उभर कर विश्व की दो महाशक्तियों से टकर लेगी, और इन में से एक– सासानी साम्राज्य की वारिस बनेगी और दूसरी, बाईज़न्टाइन साम्राज्य, को अपने अनेक अच्छे खासे प्रान्तों से वंचित कर देगी, तो उस व्यक्ति को अवश्य पागल घोषित कर दिया जाता। लेकिन वास्तव में हुआ यही। पैगंबर साहब की मृत्यु के बाद, बांझ अरबदेश, जैसे किसी जादू से, ऐसे महानायकों का घर बन गया जिनके जैसे व्यक्ति, संख्या और आचरण में कहीं भी ढूंढ पाना अतिकठिन होगा।” [The Arabs- A Short History, by Philip K. Hitti, 1960 संस्करण, अध्याय Islam on the March, पृष्ठ 42]

यह जादू कुछ और नहीं था बल्कि ईश्वर की विशेष सहायता थी जो उनके साथ थी, क्योंकि उनहों ने अपने आप को इस काबिल बनाय था। तो यह मैं ने पवित्र कुरआन की अनेक भविष्यवाणियों में से एक भविष्यवाणी बताई। कुछ अन्य भविष्यवाणियाँ जो कुरआन में हैं उनका केवल संक्षिप्त वर्णन कर देता हूँ। 1. रूमी साम्राज्य ससानियों से हार के बाद दुबारा जीत जाएंगे। यह भविष्यवाणी सूरह रूम (30) की प्रथम आयात में पढ़ी जा सकती है। 2. पवित्र कुरआन ने पहले मक्की जमाने में ही आने वाले बदर के युद्ध में मुस्लिम फौज के हाथों मक्का के कुफ़्फ़ार की हार की भविष्यवाणी की थी जो सही साबित हुई। देखिए सूरह कमर 54 की आयत 44। इस तरह की बहुत सारी भविष्यवाणियाँ हैं जो कुरआन ने की और उस जमाने के लोगों ने उनको पूरा होते देखा। स्वयं हम भी कुरआन की एक भविष्यवाणी के पूरा होने की पुष्टि कर सकते हैं। कुरआन ने अपने बारे में भविष्यवाणी की थी

إِنَّا نَحْنُ نَزَّلْنَا الذِّكْرَ وَإِنَّا لَهُ لَحَافِظُونَ

“यह अनुसरण (कुरआन) निश्चय ही हमने अवतरित किया है और हम स्वयं इसके रक्षक हैं” [सूरह हिजर 15, आयत 9]

1400 वर्षों में कुरआन का एक अक्षर भी नहीं बदला जा सका। मुस्लिम आज जो कुरआन पढ़ते हैं, यह वही कुरआन है को 1400 वर्ष पूर्व हज़रत मुहम्मद (स) से उनके साथियों ने सुना, उनहों ने इसे अपनी संतानों को सिखाया, और उनहों ने अपने बच्चों को। यह मस्जिदों में, मदरसों में रोज़ पढ़ा जाता। दिन में 5 नमाजों में इसकी तिलावत सब सुनते। लाखों की संहया में मुस्लिम समाज के लोगों ने इसे याद किया और महफ़ूज किया। ऐसा इतिहास किसी अन्य धार्मिक ग्रंथ का नहीं है। अन्य धार्मिक ग्रंथ एक वर्ग विशेष तक सीमित रहने के कारण प्रक्षिप्त हो गए। जिस भाषा में वह ग्रंथ थे, वह भाषा धीरे धीरे लगभग लुप्त हो गईं, या एक वर्ग विशेष तक ही सीमित रह गई। आप स्वयं देख सकते हैं। वेदों की ‘संस्कृत’ (Sanskrit) के साथ क्या हुआ? तौरात की भाषा ‘इबरानी’ (Ancient Hebrew) के साथ क्या हुआ? इंजील की भाषा ‘आरमेइक’ (Aramaic) के साथ क्या हुआ? बोद्ध ग्रंथ धम्मपद की भाषा ‘पालि’ (Pali) के साथ क्या हुआ? यह सब ग्रंथ और इनकी भाषाएँ अधिकतर लोगों से दूर हो गए। केवल उन मतों के विशेष ज्ञानी वर्ग तक ही सीमित रह गए और इसी कारण उनका प्रक्षिप्त होना या उनमें परिवर्तन करना बहुत आसान हो गया। इस के विपरीत पवित्र कुरआन की ‘अरबी’ (Arabic) भाषा लुप्त नहीं हुई, बल्कि आज ‘संयुक्त राष्ट्र संगठन’ (UNO) की पाँच प्रमुख भाषाओं में से एक भाषा है। और कुरआन भी किसी विशेष वर्ग तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आम मुसलमानों के घरों में ही रहा। आम मुसलमान इसे याद करते रहे और रोज़ इसको पढ़ते रहे जिस कारण इसका प्रक्षिप्त होना या इसमें किसी भी प्रकार का परिवर्तन होना संभव है ही नहीं। 

ये कुरआन को ईश्वरीय ग्रंथ साबित करने के कुछ सरल प्रमाण है जो पाठकों के सामने रखा गया  हैं। इस के अतिरिक्त कई प्रमाण हैं, जिनको भाग (2) में आपके सामने रखा जायेगा मानवता को कुरआन का यही निमंत्रण है कि आओ इस संदेश पर विचार करो, और तुम जानोगे कि यह तुम्हारे बनाने वाले की ही ओर से आया है। कुरआन के ही शब्दों में ही इस लेख को समाप्त करता हूँ,

يَا أَيُّهَا النَّاسُ قَدْ جَاءَتْكُمْ مَوْعِظَةٌ مِنْ رَبِّكُمْ وَشِفَاءٌ لِمَا فِي الصُّدُورِ وَهُدًى وَرَحْمَةٌ لِلْمُؤْمِنِينَ

हे लोगो! निसंदेह तुम्हारे रब्ब की तरफ से तुम्हारे पास एक किताब आ चुकी है जो (सरासर) उपदेश है और वह हृदय में पाए जाने वाले रोगों को दूर करने वाली और इस पर विश्वास रखने वालों के लिए मार्गदर्शन और दया है” [सूरह युनूस 10, आयत 57]


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क़ुरआन के वैज्ञानिक सत्य
 
    
क़ुरआन न हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) की रचना है, न किसी दूसरे इन्सान की। यह तो ईश्वर द्वारा अवतरित ग्रंथ है जो सभी इन्सानों के मार्गदर्शन के लिए भेजी गई है और मुसलमानों का इस पर कोई आधिपत्य नहीं है। इसकी अद्भुत शैली से यह बात स्वयं ही स्पष्ट हो जाती है कि यह एक ईश-ग्रंथ है और इसके लिए किसी अतिरिक्त प्रमाण की आवश्यकता नहीं पड़ती।
वैसे तो क़ुरआन विज्ञान की पुस्तक नहीं है परन्तु इसमें कुछ ऐसे वैज्ञानिक सत्य मौजूद हैं, जिन्हें अब से 1400 वर्ष पूर्व ईश्वर के अतिरिक्त कोई नहीं जान सकता था और जिनका ज्ञान इन्सान को बीसवीं शताब्दी में पहुंचकर अनेक उपकरणों का प्रयोग करने के बाद हुआ। यह इसके ईश-ग्रंथ होने का एक ठोस प्रमाण है। इन सभी अंशों को एकत्रित किया जाए तो एक लम्बी सूची बन जाएगी और अगर विस्तार से इनका वर्णन किया जाए तो अनगिनत पुस्तकें तैयार हो जाएंगी। इनमें से कुछ यहां संक्षेप में प्रस्तुत हैं।
विश्व की रचना
आधुनिक खगोल-भौतिकी (Astro Physics) इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि सम्पूर्ण विश्व एक महाविस्फोट के नतीजे में अस्तित्व में आया। इससे पूर्व न तो कोई भौतिक तत्व था, न ही समय। इसी शून्य की स्थिति से इस विश्व की रचना हुई। सन् 1992 में नासा ने COBE अन्तरिक्ष-यान द्वारा लिए गए चित्रों के आधार पर भी यही निष्कर्ष निकाला कि महाविस्फोट से ही इस विश्व का आरंभ हुआ है उससे पूर्व शून्य के अतिरिक्त कुछ भी नहीं था। क़ुरआन में ईश्वर ने इस सत्य को इस प्रकार व्यक्त किया है—
‘‘वह तो आकाशों और धरती का आविष्कारक है।’’ (क़ुरआन, 6:101)

संसार का विस्तार हो रहा है

इस विशाल संसार की सीमाएं स्थिर या स्थैतिक नहीं हैं बल्कि इनमें हर पल विस्तार हो रहा है। बीसवीं शताब्दी के आरंभ में रूस के भौतिक-शास्त्री अलेक्जेंडर फ्रीडमैन ने यह खोज की कि यह संसार स्थिर नहीं है और इसकी सीमाओं में निरंतर विस्तार हो रहा है। 1929 में ‘हबल’ दूरबीन से इसकी पुष्टि भी हो गई। इसके पहले हज़ारों वर्षों से यही धारणा थी कि यह विश्व एक स्थिर इकाई है।
अब से 1400 वर्ष पूर्व जबकि न तो भौतिक विज्ञान का कोई अस्तित्व था न दूरबीन का, क़ुरआन ने इस सत्य की घोषणा कर दी थी।
‘‘आसमान (अर्थात् ब्रह्माण्ड) को हमने अपने ज़ोर से बनाया और हम ही उसका विस्तार भी कर रहे हैं।’’ (क़ुरआन, 51:47)

सूर्य और अन्य सभी ग्रहों की अपने-अपने कक्ष में परिक्रमा 

खगोलशास्त्र ने अब यह सत्य स्थापित कर दिया है कि सूर्य और अन्य सभी ग्रह जो कि आकाश में पाए जाते हैं, अपने-अपने कक्ष में परिक्रमा कर रहे हैं। सूर्य 72,000 किमी॰ प्रतिघंटे की रफ़्तार से प्रतिदिन 17,280,000 किमी॰ की दूरी तय करता है। इस सौरमंडल में स्थित सभी ग्रह एवं उपग्रह भी सूर्य के साथ ही चक्कर लगाते हैं। अनुमान है कि इस संसार में 200 अरब आकाशगंगा अपने-अपने सूर्य और अनगिनत ग्रह-उपग्रह के साथ अपने-अपने कक्ष में परिक्रमा कर रहे हैं।
कु़रआन ने इस सत्य को 1400 वर्ष पूर्व इस प्रकार व्यक्त किया है—
‘‘और वह अल्लाह ही है जिसने रात और दिन बनाए और सूरज और चांद की रचना की। सब एक-एक कक्ष में तैर रहे हैं।’’ (क़ुरआन, 21:33)

लोहे का स्रोत

आधुनिक युग में खगोलशास्त्रियों ने यह खोज की है कि पृथ्वी पर जितना भी लोहा पाया जाता है उसका उत्पादन पृथ्वी पर नहीं, बल्कि अंतरिक्ष में फैले हुए बड़े-बड़े सितारों पर हुआ था और उल्कापिंड के पृथ्वी से टकराने से यहां तक पहुंचा है।
क़ुरआन ने लोहे के पृथ्वी के बाहर से यहां आने की बात 1400 वर्ष पूर्व ही बता दी थी।
‘‘...और हमने लोहा उतारा जिसमें बड़ा ज़ोर है और लोगों के लिए लाभ है...।’’ (क़ुरआन, 57:25)
यहां ‘‘उतारा’’ शब्द इस ओर संकेत कर रहा है कि लोहा पृथ्वी पर उत्पन्न नहीं हुआ बल्कि बाहर से आया है।

संसार में हर चीज़ जोड़े के रूप में पाई जाती है

1933 में ब्रिटेन के वैज्ञानिक ‘पॉल डिराक’ ने यह खोज की कि संसार में हर चीज़ जोड़े के रूप में पाई जाती है। इस खोज के लिए उसे नॉबेल पुरस्कार भी दिया गया।
अब से 1400 वर्ष पूर्व ईश्वर इस सत्य की घोषणा क़ुरआन में इन शब्दों में कर चुका था—
‘‘पवित्र है वह सत्ता जिसने सब प्रकार के जोड़े पैदा किए चाहे वे ज़मीन की वनस्पतियों में से हों या ख़ुद उनकी अपनी जाति (अर्थात् मानवजाति) में से या उन चीज़ों में से जिनको ये जानते तक नहीं हैं।’’ (क़ुरआन, 36:36)
‘‘और हर चीज़ के हमने जोड़े बनाए हैं। शायद कि तुम उससे शिक्षा ग्रहण करो।’’ (क़ुरआन, 51:49)

समय की सापेक्षता

बीसवीं शताब्दी के आरंभ में ‘आइंसटाइन’ ने सबसे पहले ‘सापेक्षता के सिद्धांत’ के माध्यम से ‘समय की सापेक्षता’ को उजागर किया। इससे पूर्व लोगों को इसका कोई ज्ञान नहीं था और वह यह नहीं जानते थे कि समय पर अन्य तथ्यों का प्रभाव भी पड़ता है। उसने प्रमाणित किया कि भार और गति के परिवर्तन से समय भी परिवर्तित होता है। ईश्वर ने 1400 वर्ष पूर्व ही क़ुरआन में इस ओर संकेत कर दिया था।
‘‘ये लोग अज़ाब के लिए जल्दी मचा रहे हैं। अल्लाह हरगिज़ अपने वादे के ख़िलाफ़ नहीं करेगा, मगर तेरे रब के यहां का एक दिन तुम्हारी गणना के हज़ार वर्ष के बराबर हुआ करता है।’’ (क़ुरआन, 22:47)
‘‘वह आसमान से ज़मीन तक दुनिया के मामलों का संचालन करता है और इस संचालन का ब्योरा उसके पास जाता है एक ऐसे दिन में जिसकी माप तुम्हारी गणना से एक हज़ार वर्ष है।’’ (क़ुरआन, 32:5)

पृथ्वी के वातावरण की परतें

अब वैज्ञानिकों ने यह खोज कर ली है कि हमारी पृथ्वी के चारों ओर का पूरा वातावरण सात परतों में बना है। इन परतों के नाम इस प्रकार हैं—
क्षोभ-मंडल (Tropo-sphere), समताप-मंडल (Strato-sphere), मध्य-मंडल (Meso-sphere), ताप-मंडल (Thermo-sphere), आयन-मंडल (Iono-sphere), बाह्य-मंडल (Exosphere) और ओज़ोन-मंडल (Ozone-sphere)।
ईश्वर ने क़ुरआन के माध्यम से इन्सानों को इस सत्य से 1400 पूर्व ही अवगत करा दिया था। साथ ही उसने यह भी अवगत करा दिया था कि इनमें से हर परत की अलग भूमिका है जो उसके लिए निर्धारित कर दी गई है।
‘‘वही तो है जिसने तुम्हारे लिए धरती की सारी चीज़ें पैदा की, फिर ऊपर की ओर रुख़ किया और सात आसमान ठीक तौर पर बनाए। और वह हर चीज़ का ज्ञान रखने वाला है।’’ (क़ुरआन, 2:29)

वर्षा उपक्रम

बीसवीं शताब्दी से पूर्व यह धारणा थी कि वर्षा में हवाओं की भूमिका मात्र बादलों को इधर-उधर उड़ाने की है। परन्तु आज मौसम विज्ञान का मानना है कि हवाएं बादलों को उड़ाने के अतिरिक्त समुद्र के पानी को बादल में परिवर्तित करने का काम भी करती हैं। यदि हवा में यह विशेषता न होती तो न बादल बनता और न वर्षा होती।
ईश्वर ने, जिसने इस सारे प्रक्रम की रचना की, 1400 वर्ष पूर्व क़ुरआन में इस सत्य को व्यक्त कर दिया था।
‘‘फलदायक हवाओं को हम ही भेजते हैं, फिर आसमान से पानी बरसाते हैं और उस पानी से तुम्हें सिंचित कर देते हैं।’’ (क़ुरआन, 15:22)
‘‘अल्लाह ही है जो हवाओं को भेजता है और वे बादल उठाती हैं, फिर वह उन बादलों को आसमान में फैलाता है जिस तरह चाहता है और उन्हें टुकड़ियों में बांटता है, फिर तू देखता है कि वर्षा की बूंदे बादल में से टपकी चली आती हैं। यह वर्षा जब वह अपने बन्दों में से जिन पर चाहता है बरसाता है तो अचानक वे ख़ुश और प्रसन्न हो जाते हैं, हालांकि इसके उतरने से पहले वे निराश हो रहे थे।’’ (क़ुरआन, 30:48-49)

दो प्रकार के समुद्र

समुद्र का पानी कहीं पर मीठा होता है और कहीं पर खारा। एक ही समुद्र होने के बाद भी यह पानी आपस में मिलते नहीं। इसका ज्ञान समुद्र वैज्ञानिकों को अब से कुछ ही वर्ष पूर्व हुआ है जब पृष्ठ-तनाव (Surface Tension) की खोज हो गई। क़ुरआन में ईश्वर ने इस अद्भुत तथ्य से मनुष्य को 1400 वर्ष पूर्व ही अवगत करा दिया था।
‘‘दोनों समुद्रों को उसने छोड़ दिया कि परस्पर मिल जाएं, फिर भी उनके बीच एक परदा पड़ा है जिसको वे पार नहीं करते।’’ (क़ुरआन, 55:19-20)
‘‘और वही है जिसने दो समुद्रों को मिला रखा है। एक स्वादिष्ट और मीठा, दूसरा कड़ुआ और खारा। और दोनों के बीच एक परदा पड़ा है। एक रुकावट है जो उन्हें गड्मड् होने से रोके हुए है।’’ (क़ुरआन, 25:53)

समुद्र की गहराई में लहरों और प्रकाश की स्थिति

उपकरणों की सहायता के बिना इन्सान समुद्र में 40 मीटर से अधिक गहराई तक प्रवेश नहीं कर सकता। परन्तु आधुनिक युग में ऐसे उपकरणों का आविष्कार हो गया है कि 200-300 मीटर की गहराई तक प्रवेश संभव हो गया है और वहां पर लहरों और प्रकाश की स्थिति के बारे में जानना बहुत सरल हो गया है। लंदन से प्रकाशित पुस्तक ‘समुद्र’ में इस विषय पर विस्तार से जानकारी उपलब्ध है। समुद्र-विज्ञान ने यह ज्ञात कर लिया है कि समुद्र की सतह के नीचे भी लहरें होती हैं और गहराई में धनत्व के साथ ही लहरों के स्वरूप में भी परिवर्तन हो जाता है। इन आन्तरिक लहरों को आंखों से नहीं देखा जा सकता। यह भी ज्ञात हुआ है कि समुद्र की सतह के नीचे गहराई के साथ अंधकार बढ़ता जाता है।
क़ुरआन के ईश-ग्रंथ होने का यह एक बड़ा प्रमाण है कि इसमें 1400 वर्ष पूर्व ही इन आन्तरिक लहरों और वहां पर व्याप्त अंधकार के बारे में चर्चा मिलती है।
‘‘या फिर (इन्कार करने वालों के कर्मों की) मिसाल ऐसी है जैसे एक गहरे समुद्र में अंधकार, कि ऊपर एक मौज छाई हुई है, उस पर एक और मौज और उसके ऊपर बादल, अंधकार पर अंधकार छाया हुआ है, आदमी अपना हाथ निकाले तो उसे भी न देखने पाए। जिसे अल्लाह प्रकाश न प्रदान करे उसके लिए फिर कोई प्रकाश नहीं।’’ (क़ुरआन, 24:40)

गर्भ में भ्रूण के विकास के विभिन्न चरण

भ्रूण-विज्ञान ने आज यह ज्ञात कर लिया है कि मां के गर्भ में भ्रूण किन-किन चरणों से गुज़रता हुआ एक जीवित शिशु की अवस्था को पहुंचता है। अब से 1400 वर्ष पूर्व इस विषय में किसी को कोई ज्ञान नहीं था। उस समय ईश्वर ने क़ुरआन में इस विषय पर जो बातें अवतरित की थीं उनके आधार पर निम्नलिखित सत्य की स्थापना हो गई थी—
(क) पुरुष के वीर्य के अति-सूक्ष्म अंश से ही मनुष्य के जीवन की नींव पड़ती है।
‘‘क्या इन्सान ने यह समझ रखा है कि वह यूं ही आज़ाद छोड़ दिया जाएगा? क्या वह एक तुच्छ पानी का वीर्य न था जो (मां के गर्भाशय में) टपकाया जाता है?’’  
(क़ुरआन, 75:36-37)

(ख) शिशु के लिंग का चयन पुरुष के शुक्राणु पर निर्भर करता है न कि स्त्री के।

‘‘और यह कि उसी ने नर और मादा का जोड़ा पैदा किया एक बूंद से जब वह टपकाई जाती है।’’ (क़ुरआन, 53:45-46)
(ग) भ्रूण आरंभिक अवस्था स्त्री के गर्भ में जोंक की तरह चिपका होता है।
‘‘जमे हुए ख़ून के एक लोथड़े से इन्सान की रचना की।’’ (क़ुरआन, 96:2)

(घ) भ्रूण को मां के गर्भ के अंधकार में तीन चरणों से गुज़रना पड़ता है।

‘‘...वह तुम्हारी मांओं के पेटों में तीन-तीन अंधकारमय परदों के भीतर तुम्हें एक के बाद एक रूप देता चला जाता है...।’’ (क़ुरआन, 39:6)
(ड़) मां के गर्भ में पहले हड्डी का निर्माण होता है फिर उस पर गोश्त की परत चढ़ाई जाती है।
‘‘फिर उस बूंद को लोथड़े का रूप दिया, फिर लोथड़े की बोटी बना दिया, फिर बोटी की हड्डियां बनाईं, फिर हड्डियों पर मांस चढ़ाया, फिर उसे एक दूसरी ही सृष्टि बना खड़ा किया।’’ (क़ुरआन, 23:14)

शिशु के लिए मां के दूध का महत्व

मां का दूध नवजात शिशु के शारीरिक एवं मानसिक विकास के लिए कितना आवश्यक है यह बात किसी से छिपी नहीं है। बाज़ार में बिकने वाला कृत्रिम दूध मां के दूध का बदल नहीं हो सकता। आहार विशेषज्ञों ने यह बात भी ज्ञात कर ली है कि जन्म के उपरांत दो वर्ष तक मां का दूध शिशु के लिए अति लाभदायक होता है।
यह जानकारी ईश्वर ने क़ुरआन में 1400 वर्ष पूर्व ही दे दी थी कि मां को दो वर्ष तक नवजात शिशु को अपना ही दूध पिलाना चाहिए।
‘‘और यह वास्तविकता है कि हमने इन्सान को अपने मां-बाप का हक़ पहचानने की स्वयं ताकीद की है। उसकी मां ने कमज़ोरी पर कमज़ोरी झेलकर उसे अपने पेट में रखा और दो वर्ष उसका दूध छूटने में लगे। (इसीलिए हमने इन्सान को नसीहत की कि) मेरे प्रति कृतज्ञता दिखाओ और अपने मां-बाप के प्रति कृतज्ञ हो, मेरी ही ओर तुझे पलटना है।’’ (क़ुरआन, 31:14)


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क्या पवित्र कुरआन ईश्वरीय ग्रंथ है या हज़रत मुहम्मद (स अ) की रचना? भाग (1)

प्रथम प्रमाण: आज यह बात सारे धार्मिक इतिहासकार स्वीकार कर चुके हैं, कि हज़रत मुहम्मद (स अ) ईमानदारी से यह विश्वास रखते थे कि उन्हें ईश्वर की ओर से संदेश प्राप्त हो रहा था। उदाहरणार्थ विलियम मोंटगोमेरी वाट (William Montgomery Watt) अपनी पुस्तक, मुहम्मद, प्रॉफ़ेट एंड स्टेट्स्मेन (Muhammad, Prophet and Statesman) में लिखते हैं,

“One of the common allegations against Muhammad is that he was an impostor, who to satisfy his ambition and his lust propagated religious teachings which he himself knew to be false. Such insincerity makes the development of the Islamic religion incomprehensible. …Only a profound belief in himself and his mission explains Muhammad’s readiness to endure hardship and persecution during the Meccan period when from a secular point of view there was no prospect of success. Without sincerity how could he have won the allegiance and even devotion of men of strong and upright character like Abu-Bakr and ‘Umar?… There is thus a strong case for holding that Muhammad was sincere.” [Muhammad, Prophet and Statesman.Oxford University Press, 1961. Pg. 232.]

अनुवाद:

हज़रत मुहम्मद (स अ)के विरुद्ध लगाए जाने वाले आरोपों में से एक आरोप यह है कि वह एक पाखंडी व्यक्ति थे, जिसने अपनी महत्वाकांक्षा  की संतुष्टि के लिए अपने मत का प्रचार किया, यह जानते हुए कि उनका मत झूठा है। लेकिन इस प्रकार की निष्ठाहीनता के बावजूद इस्लाम का विकास हो, यह समझ से बाहर है मक्का के दौर में, जबकि इस्लाम की सफलता की कोई संभावना नहीं दिख रही थी,
हज़रात मुहम्मद(स अ) का सभी प्रकार की कठिनाइयाँ और उत्पीड़न सहने का एकमात्र कारण ही यह था कि वे खुद में और अपने मिशन में ईमादारी के साथ गहरा विश्वास रखते थे। इस ईमानदारी के बगैर यह कैसे संभव था कि वे अबू बकर और उमर जैसे, मजबूत और ईमानदार चरित्र के व्यक्तियों का समर्थन और उनकी भक्ति जीत सकते थे? इस तरह यह पक्ष काफी मज़बूत है कि हज़रात मुहम्मद निष्कपट और ईमानदार थे।” [Hazrat Muhammad, Prophet and Statesman, प्रकाशक: Oxford University Press, 1961 संस्करण, पृष्ठ 232]

यह मेरा पहला प्रमाण है। यह तथ्य कि हज़रात मुहम्मद (स अ) मक्का में 13 वर्षों तक भयंकर कठिनाइयों और उत्पीड़न को सहन करते रहे, साबित करता है कि वे इस बात पर गहरा विश्वास रखते थे कि वे ईश्वर की ओर से संदेश प्राप्त कर रहे हैं। हाँ मगर इस से यह साबित नहीं होता कि उनका यह विश्वास वास्तव में सही था। लेकिन इस संभावना का खंडन अवश्य होता है कि वे जान बूझ कर लोगों को धोका दे रहे थे। एक ऐसा व्यक्ति जो ईमानदारी से यह विश्वास रखता हो कि वह जो कुछ कर रह है वो ईश्वर के कहने पर कर रहा है और वह व्यक्ति जिसको मालूम हो कि वो दूसरों को धोका दे रहा है, इन दोनों में काफी अन्तर है।

दूसरा प्रमाण: आपत्ति करने वाले आपत्ति कर सकते हैं कि यद्यपि वे अपने विश्वास में ईमानदार थे, पर यह उनका भ्रम हो सकता था कि वे ईश्वर के दूत हैं। यह एक जायज़ प्रश्न है। परन्तू, हज़रत मुहम्मद (स अ)के जीवन की कुछ घटनाएँ, इस प्रश्न का खंडन करती हैं। उदाहरणार्थ, विश्वसनीय सही अहादीस (हज़रत मुहम्मद (स अ)  के जीवन, कथन, आदि का संग्रह) में एक घटना का वर्णन मिलता है कि हज़रत मुहम्मद (स अ)के एक पुत्र हुए थे, जिंका नाम उनहों ने इब्राहीम रखा। इस पुत्र की  बचपन में ही मृत्यु हुई जब वह 2 वर्ष के थे। हदीस में इस घटना का यूं वर्णन मिलता है,

“अल्लाह के रसूल (स अ)) के जमाने में सूरज ग्रहण उस दिन हुआ जिन दिन आपके लाडले पुत्र इबरहीन की मृत्यु हुई। लोगों ने खयाल किया इबरहीन की मृत्यु के कारण सूर्य ग्रहण हुआ है (अर्थात आसमान भी गमगीन है)। इस पर अल्लाह के रसूल ने फरमाया की चंद और सूर्य का ग्रहण किसी की मृत्यु या पैदाइश से नहीं होता। जब तुम ग्रहण देखो तो नमाज़ पढ़ो और अल्लाह से दुआ करो।” [बुखारी किताब अल–कसूफ़, अध्याय 1]

अब यदि वे किसी भ्रम मे होते कि वे अल्लाह के रसूल हैं, तो लोगों की इस बात को मान लेते और स्वयं भी इसी प्रकार सोचते। यदि वे धोखेबाज़ होते तो इस घटना और लोगों के अंधविश्वास को अपने लाभ के लिए इस्तेमाल करते। परन्तू उनहों ने लोगों के इस अंधविश्वास को साफ नकार दिया कि ग्रहण का संबंध किसी के जनम एवं मृत्यु से होता है। इसी घटना की तुलना अब बाइबल के लेखकों के द्वारा रचे उस किस्से से कीजिए जिस में उनहों ने ईसाई मत के अनुसार ईश्वर के पुत्र ईसा मसीह को क्रूस पर चड़ाने के समय कुछ इसी प्रकार की प्रकृतिक घटनाओं का होना लिखा।  इन घटनाओं को बाइबल के लेखकों ने इस सबूत के तौर पर पेश किया है कि वास्तव में ईसा ईश्वर के पुत्र थे, जबकि यह केवल एक संयोग था। बाइबल का वर्णन कुछ इस प्रकार है,

“उस समय दिन के बारह बजे होंगे तभी तीन बजे तक समूची धरती पर गहरा अंधकार छा गया। सूरज भी नहीं चमक रहा था। उधर मन्दिर में परदे फट कर दो टुकड़े हो गये। यीशु ने ऊँचे स्वर में पुकारा, “हे परम पिता, मैं अपनी आत्मा तेरे हाथों सौंपता हूँ।” यह कहकर उसने प्राण छोड़ दिये। जब रोमी सेनानायक ने, जो कुछ घटा था, उसे देखा तो परमेश्वर की प्रशंसा करते हुए उसने कहा, “यह निश्चय ही एक अच्छा मनुष्य था!” [बाइबल, लूका अध्याय 23, श्लोक 44-47]

देखिए कि बाइबल के लेखक ने किस प्रकार एक प्रकृतिक मौसमी बदलाव और रूमी अंधविश्वासी के वचनों को अपने मत के फायिदे के लिए इस्तेमाल किया है। यह दूसरा प्रमाण था कि मुहम्मद (स अ)) निष्कपट होने के साथ साथ भ्रमित भी नहीं थे। वह ईश्वरीय प्रेरणा से बोलते थे।
तीसरा प्रमाण:हज़रत मुहम्मद (स अ) लिखना पढ़ना नहीं जानते थे। उनके विरोधी भी इस तथ्य को जानते थे। और जब पवित्र कुरआन ने इस तथ्य की तरफ इशारा किया तो उनके किसी भी विरोधी ने इस का इंकार नहीं किया। कुरआन ने मुहम्मद (स.) से फरमाया

وَمَا كُنتَ تَتْلُو مِن قَبْلِهِ مِن كِتَابٍ وَلَا تَخُطُّهُ بِيَمِينِكَ ۖ إِذًا لَّارْ‌تَابَ الْمُبْطِلُونَ

“इस (कुरआन) से पहले तुम न कोई किताब पढ़ते थे और न उसे अपने हाथ से लिखते ही थे। ऐसा होता तो ये मिथ्यावादी सन्देह में पड़ सकते थे” [सूरह  29, आयत 48]

पवित्र कुरआन ने एक उच्च सिद्धान्त बताया है कि हज़रत मुहम्मद (स अ) से पूर्व सभी सच्चे पैगंबर अल्लाह की तरफ से थे, और सभी ने एक ईश्वर की उपासना की शिक्षा दी है। यह एक ऐसा सिद्धान्त है जिसे कोई भी व्यक्ति उन सभी पैगंबरों से संबन्धित धार्मिक ग्रन्थों को पढे बिना, काइम नहीं कर सकता। परन्तू अल्लाह के रसूल (स अ) न दुनिया में फिरे और न कोई किताब पढ़ी। इस लिए कुरआन ने यह प्रमाण दिया कि मुहम्मद (स अ) तो पढ़ना न जानते थे। यदि पढ़ना जानते तो संदेह की गुंजाइश हो सकती थी कि यह सिद्धान्त उनहों ने खुद बनाया।


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क्या पवित्र कुरआन ईश्वरीय ग्रंथ है या हज़रत मुहम्मद (स अ) की रचना? भाग (2)

चौथा प्रमाण: पवित्र कुरआन में कई स्थान ऐसे हैं जहां हज़रत मुहम्मद (स अ) को कुछ बहुत छोटी गलतियों के लिए टोका और अनुशासित किया गया है, और वो भी ऐसी गलतियाँ कि जिन की तरफ किसी ने ध्यान भी नही दिया था। उदाहरणार्थ, हम  (सूरह: 80 आयत 1 से 11) में पढ़ते हैं कि हज़रत मुहम्मद (स अ) जब कुरेश कबीले के अभिजात वर्ग से बात कर रहे थे और इस्लाम की शिक्षाएँ समझा रहे थे तो एक अंधे व्यक्ति, अब्दुल्लाह बिन उम्मि मकतूम आगाए और उनहों ने अल्लाह के रसूल (स.) का ध्यान अपनी ओर फेरना चाहा, जिसे अल्लाह के रसूल (स अ) ने पसंद नहीं किया और उनहों ने त्योरी चढ़ाई और मुँह फेर लिया और कुरेश के बड़े लोगों से बात करते रहे। अल्लाह के रसूल(स अ) ने समझा कि यह तो अपने आदमी हैं, जब चाहे पूछ लेते। इस समय क्या ज़रूरत थी जबकि बड़े नास्तिक सरदारों को मैं अल्लाह का संदेश समझा रहा हूँ। इस पर पवित्र कुरआन में अल्लाह ने आयात नाज़िल फरमाईं जिन में अल्लाह के रसूल (स) को अनुशासित किया गया और बताया गया कि बड़े आदमियों की इतनी परवाह न करो कि उनकी और ध्यान देने से उन व्यक्तियों से ध्यान हट जाए जो स्वयं आप से कुछ सीखना चाहते हों। कुरआन का वर्णन इस तरह है

عَبَسَ وَتَوَلَّىٰ ﴿١﴾ أَن جَاءَهُ الْأَعْمَىٰ ﴿٢﴾ وَمَا يُدْرِ‌يكَ لَعَلَّهُ يَزَّكَّىٰ ﴿٣﴾ أَوْ يَذَّكَّرُ‌ فَتَنفَعَهُ الذِّكْرَ‌ىٰ ﴿٤﴾ أَمَّا مَنِ اسْتَغْنَىٰ ﴿٥﴾ فَأَنتَ لَهُ تَصَدَّىٰ ﴿٦﴾ وَمَا عَلَيْكَ أَلَّا يَزَّكَّىٰ ﴿٧﴾ وَأَمَّا مَن جَاءَكَ يَسْعَىٰ ﴿٨﴾ وَهُوَ يَخْشَىٰ ﴾ فَأَنتَ عَنْهُ تَلَهَّىٰ ﴿١٠) كَلَّا إِنَّهَا تَذْكِرَةٌ

माथे पर बल आ गए और मुँह फेर लिया, (1) इस कारण कि उसके पास अन्धा आ गया। (2) और आपको क्या मालूम शायद वह स्वयं को सँवारता–निखारता हो (3) या नसीहत हासिल करता हो तो नसीहत उसके लिए लाभदायक हो? (4) रहा वह व्यक्ति जो धनी हो गया है(5) आप उसके पीछे पड़े हैं – (6) हालाँकि वह अपने को न निखारे तो आप पर कोई ज़िम्मेदारी नहीं आती – (7) और रहा वह व्यक्ति जो स्वयं ही आप के पास दौड़ता हुआ आया, (8) और वह डरता भी है, (9) तो आप उससे बेपरवाई करते हैं (10) ऐसा न करो, निसंदेह यह तो एक नसीहत नामा है। (11)

हम यह जानते हैं कि जब कोई व्यक्ति आपस में बात कर रहे हों तो बीच में टोकना अच्छा नहीं लगता। यह एक स्वाभाविक बात है। तो अल्लाह के रसूल (स अ) को इस साथी का टोकना अच्छा न लगना कुछ बड़ी बात नहीं थी। इसके अतिरिक्त उन्होने केवल अपने मुंह को फेर दिया और उस अंधे व्यक्ति को डांटा नहीं। यदि मान भी लिया जाए कि अल्लाह के रसूल (स अ) को मुंह नहीं फेरना चाहिए था, तब भी वो उस अंधे व्यक्ति से मिल कर माफी मांग लेते और बात खतम हो जाती किसी और को इस घटना की खबर भी नहीं होती और कुरेश के सरदारों के लिए भी कोई बड़ी बात नहीं थी  पर इस घटना को सदा के लिए पवित्र कुरआन का हिस्सा बना लेना और अल्लाह की तरफ से इस व्यवहार पर अनुशासित किए जाने का वर्णन कोई अपने द्वारा रची गई पुस्तक में क्यों रखे? इस से उसे क्या लाभ? स्वार्थी लोग तो अपने बड़े बड़े पापों को छुपा लेते हैं, चोटी और महत्वहीन गलतियों की तो बात ही नहीं। यदि मुहम्मद (स अ) ने स्वयं कुरआन को घड़ लिया होता तो अपनी इस महंत्वहीन गलती को क्यों इतना प्रचारित करते? यह साबित करता है कि कुरआन उनकी रचना नहीं है बल्कि अल्लाह की तरफ से उतरा संदेश है और जो अल्लाह ने उन की ओर उतारा उनको उनहों ने सबको सुनाया चाहे वह स्वयं उनको ही अनुशासित क्यों न कर रहा हो।

पांचवा प्रमाण: पवित्र कुरआन में अपने से पूर्व के इतिहास का वर्णन है। इस ऐतिहासिक जानकारी की स्वतंत्र जांच करने से पता चलता है कि हज़रत मुहम्मद(स अ)और उनके साथियों को इसकी जानकारी नहीं थी और कुरआन ने जो उन्हें जानकारी दी वह बाद में सच साबित हुई। कई लोग यह आरोप लगाते हैं कि मुहम्मद साहब ने बाइबल में से पूर्व के पैगंबरों की जानकारी चुरा के कुरआन में रख दी। वे इस बात की तरफ ध्यान नहीं देते कि कुरआन तो अपने से पूर्व अल्लाह की ओर से आए हुए ग्रन्थों की पुष्टि करता है कि उनमें भी वही संदेश था जो कुरआन दोहरा रहा है। दो ग्रन्थों में समानता होने का अर्थ यह नहीं है कि एक ने दूसरे से जानकारी चुराई है। इसका अर्थ यह है कि दोनों का मूल संदेश एक ही है क्यों कि दोनों एक ही मालिक की ओर से आए हैं। हाँ यहाँ यह ज़रूर स्मरण रहे कि कुरआन से पूर्व जो भी ग्रंथ आए उनमें स्वार्थी मनुष्यों ने अपने फाईदे के लिए परिवर्तन कर दिया था, जिस से उनके अंदर काफी गलत जानकारी भी मिल गई थी, जो कि वास्तविक इतिहास के विरुद्ध थी। अब यदि हज़रत मुहम्मद (स अ) ने कुरआन को इन पूर्व के ग्रन्थों से चुराया होता तो इन ग्रन्थों में मनुष्य परिवर्तन के कारण होने वाली ऐतिहासिक गलतियों को भी वे कुरआन में सही मान कर रख देते। परन्तू जब हम वर्तमान बाइबल और कुरआन का तुलनात्मक अध्ययन करते हैं तो आश्चर्य होता है कि हमारा आधुनिक ऐतिहासिक ज्ञान कुरआन के वर्णन की पुष्टि करता है जबकि बाइबल मैं ठीक उनही घटनाओं का वर्णन इतिहास के विरुद्ध जाता है। एक उदाहरण से मेरी यह बात साफ हो जाएगी बाइबल के भाग ‘पुराना विधान’ (Old Testament) में, हज़रत इब्राहीम और हज़रत युसुफ के समय मिस्र के शासक को ‘फिरौन’ (Pharoah) कहा गया है। उदाहरणार्थ देखिए बाइबल में उत्पत्ति (Genesis) अध्याय 12, श्लोक 17,18,20 और उत्पत्ति (Genesis) अध्याय 41, श्लोक 14,25,46। यह इतिहासिक दृष्टि से गलत है क्यों कि फिरौन वंश के शासक हज़रत मूसा के समय के आस पास मिस्र की सत्ता में आए। हज़रत युसुफ के समय जो वंश वहाँ के शासक थे उन्हें हिक्सास (Hyksos) कहा जाता था, ना कि फिरौन (Pharoah)। हिक्सास एशियायी नस्ल के थे और मिस्र की सत्ता पर 1720 ईसा पूर्व कब्जा कर लिया था। 1550 ईसा पूर्व में मूल मिस्री जनता ने इनके विरुद्ध विद्रोह किया और इस प्रकार मिस्र पर हिक्सास का शासन समाप्त हुआ। अब यदि हज़रत मुहम्मद (स अ) ने बाइबल से कहानियाँ सुन कर उन को कुरआन में लिखा होता तो यह ऐतिहासिक गलती कुरआन में भी पाई जाती और कुरआन भी सूरह युसुफ में, हज़रत युसुफ के समय के मिस्री शासक को फिरौन कहता। परन्तू कुरआन में इस शासक को कोई उपाधि न देकर केवल ‘अल्मलिक’ (सम्राट, बादशाह) कहा गया है। उदाहरण के लिए देखिए (सूरह युसुफ 12, आयत 43 और 50) जबकि हज़रत मूसा के समय के मिस्री शासक को साफ साफ ‘फिरौन’ कहा है। इस उदाहरण से पता चलता है कि हज़रत मुहम्मद (स अ) ने बाइबल से कुछ नकल नहीं किया है क्योंकि नकल करने पर प्रक्षिप्त बाइबल की गलती कुरआन में भी शामिल हो जाती। कुरआन इस लिए उस सर्वज्ञ ईश्वर का संदेश है जिसको सत्य का ज्ञान है और अपने संदेश कुरआन में प्रक्षिप्त बाइबल की गलती को भी सुधारा।

छटा प्रमाण: पवित्र कुरआन ने हैरत अंगेज़ भविष्यवाणियाँ कीं जो भविष्य में शत प्रतिशत सही साबित हुईं। क्योंकि भविष्य का ज्ञान केवल अल्लाह के पास है क़ुरआन में तक़रीबन एक हज़ार से ज्यादा ऐसी आयत है जो भविष्य की ज्ञान देती है जिसे विज्ञान आज या कुछ साल पहले साबित किया है इस कारण भी कुरआन अल्लाह का कलाम साबित होता है।  हम सब यह जानते हैं कि हज़रत मुहम्मद (स अ) धार्मिक प्रचार के पहले 13 साल के दौर को ‘मक्की’ दौर कहा जाता है, जिस में उनके प्रचार का केंद्र केवल मक्का शहर रहा। इन दस वर्षों में कुरआन के जीतने सूरह (अध्याय) लोगों को सुनाए गए उन्हें ‘मक्की’ सूरह कहा जाता है। इस के बाद, उनके मदीना जाने से उनकी मृत्यु तक के दौर को ‘मदनी’ दौर कहा जाता है। और इस दौर में जो कुरआन की सूरह लोगों को सिखाई गईं उनको ‘मदनी’ सूरह कहा जाता है। ‘मक्की’ दौर के 10 वर्ष हज़रत मुहम्मद (स अ) के लिए बहुत कठिन दौर था, जिस में आपके संदेश को मुश्किल से केवल 150 लोगों ने स्वीकार किया। इस दौर में उनका प्रचार ज़ाहिरी तौर से असफल लग रहा था। लेकिन इस दौर में कुरआन ने एक भविष्यवाणी की जो कुरआन की ‘मक्की’ सूरह नस्र (सूरह:110 आयत 1 से 3)में पढ़ी जा सकती है। इस में उनसे कहा गया था।

إِذَا جَاءَ نَصْرُ اللَّهِ وَالْفَتْحُ ﴿١﴾ وَرَأَيْتَ النَّاسَ يَدْخُلُونَ فِي دِينِ اللَّهِ أَفْوَاجًا ﴿٢﴾ فَسَبِّحْ بِحَمْدِ رَبِّكَ وَاسْتَغْفِرْهُ ۚ إِنَّهُ كَانَ تَوَّابًا ﴿٣

जब अल्लाह की सहायता आ जाए और विजय प्राप्त हो, (1) और तुम लोगों को देखो कि वे अल्लाह के दीन (धर्म) में गिरोह के गिरोह प्रवेश कर रहे है, (2) तो अपने रब की प्रशंसा करो और उससे क्षमा चाहो। निस्संदेह वह बड़ा तौबा क़बूल करनेवाला है (3)

13 वर्ष के प्रचार में 150 सहयोगी पाना, वो भी भीषण कठिनाइयों का सामना कर के, ज़ाहिरी तौर से असफ़ल ही लगा था। लेकिन उसी जमाने में कुरआन ने ये घोषणा कर दी कि आगे अल्लाह का असाधारण सहयोग मिलेगा और तुम देखोगे कि लोग भारी संख्या में, गिरोह के गिरोह, इस्लाम में प्रवेश करेंगे। इस घोषणा की पूर्ति उस समय असंभव लग रही थी। लेकिन दुनिया ने देखा कि अगर पहले 13 वर्षों में मात्र 150 आदमी इस्लाम में प्रवेश हुए, तो अगले 10 वर्ष में सम्पूर्ण अरब इस्लाम में प्रवेश कर गया। इस से भी अगले 15 वर्षों में इस्लाम ने उस जमाने की विश्व की दो महाशक्तियों, रूमी साम्राज्य (Byzantine Empire) और ईरान के सासानी साम्राज्य (Sassanid Empire) को अपने अंदर समा लिया, और इस से भी अगले 10 वर्षों में इस्लाम पश्चिम में स्पेन से पूर्व में भारत और इंडोनेशिया तक प्रवेश कर गया। इस तरह शानदार अंदाज़ में कुरआन के ईश्वरीय संदेश होने का प्रमाण मिल गया। इस्लाम के इस हैरत अंगेज़ फेलाव पर टिप्पणी करते हुए पश्चिमी इतिहासकार फिलिप क. हिट्टी Philip K. Hitti ने अपनी पुस्तक ‘दी अरब्स – ए शार्ट हिसटरि’ The Arabs- A Short History में यूं लिखा है

“If someone in the first third of the seventh Christian century had the audacity to prophesy that within a decade some unheralded, unforeseen power from the hitherto barbarians and little known land of Arabia was to make its appearance, hurl itself against the only two powers of the age, fall heir to the one-the Sassanids, and strip the other, the Byzantine of its fairest provinces, he would undoubtedly be declared a lunatic. Yet that was what happened. After the death of the Prophet, sterile Arabia seems to have been converted as if by magic into a nursery of heroes the like of whom, both in number and quality, would be hard to find anywhere.” [The Arabs- A Short History, by Philip K. Hitti, 1960, chapter Islam on the March, Pg. 42]

अनुवाद:

“सातवीं शताब्दी के पहले तिहाई जमाने में यदि किसी व्यक्ति को यह भविष्यवाणी करने की हिम्मत होती की एक दशक के अंदर अंदर, अब तक बर्बर और लगभग अंजान अरबवासीयों में से कोई अप्रत्याक्षित शक्ति उभर कर विश्व की दो महाशक्तियों से टकर लेगी, और इन में से एक– सासानी साम्राज्य की वारिस बनेगी और दूसरी, बाईज़न्टाइन साम्राज्य, को अपने अनेक अच्छे खासे प्रान्तों से वंचित कर देगी, तो उस व्यक्ति को अवश्य पागल घोषित कर दिया जाता। लेकिन वास्तव में हुआ यही। पैगंबर हज़रत मोहम्मद (स अ) की मृत्यु के बाद, बांझ अरबदेश, जैसे किसी जादू से, ऐसे महानायकों का घर बन गया जिनके जैसे व्यक्ति, संख्या और आचरण में कहीं भी ढूंढ पाना अतिकठिन होगा।” [The Arabs- A Short History, by Philip K. Hitti, 1960 संस्करण, अध्याय Islam on the March, पृष्ठ 42]

यह जादू कुछ और नहीं था बल्कि ईश्वर की विशेष सहायता थी जो उनके साथ थी, क्योंकि उनहों ने अपने आप को इस काबिल बनाय था। तो यह मैं ने पवित्र कुरआन की अनेक भविष्यवाणियों में से एक भविष्यवाणी बताई। कुछ अन्य भविष्यवाणियाँ जो कुरआन में हैं उनका केवल संक्षिप्त वर्णन कर देता हूँ। 1. रूमी साम्राज्य ससानियों से हार के बाद दुबारा जीत जाएंगे। यह भविष्यवाणी सूरह रूम (30) की प्रथम आयात में पढ़ी जा सकती है। 2. पवित्र कुरआन ने पहले मक्की जमाने में ही आने वाले बदर के युद्ध में मुस्लिम फौज के हाथों मक्का के कुफ़्फ़ार की हार की भविष्यवाणी की थी जो सही साबित हुई। देखिए सूरह कमर 54 की आयत 44। इस तरह की बहुत सारी भविष्यवाणियाँ हैं जो कुरआन ने की और उस जमाने के लोगों ने उनको पूरा होते देखा। स्वयं हम भी कुरआन की एक भविष्यवाणी के पूरा होने की पुष्टि कर सकते हैं। कुरआन ने अपने बारे में भविष्यवाणी की थी

إِنَّا نَحْنُ نَزَّلْنَا الذِّكْرَ وَإِنَّا لَهُ لَحَافِظُونَ

“यह अनुसरण (कुरआन) निश्चय ही हमने अवतरित किया है और हम स्वयं इसके रक्षक हैं” [सूरह 15, आयत 9]

1438 वर्षों में कुरआन का एक अक्षर भी नहीं बदला जा सका। मुस्लिम आज जो कुरआन पढ़ते हैं, यह वही कुरआन है को 1438 वर्ष पूर्व हज़रत मुहम्मद (स अ) से उनके साथियों ने सुना, उनहों ने इसे अपनी संतानों को सिखाया, और उनहों ने अपने बच्चों को। यह मस्जिदों में, मदरसों में रोज़ पढ़ा जाता। दिन में 5 नमाजों में इसकी तिलावत सब सुनते। लाखों की संहया में मुस्लिम समाज के लोगों ने इसे याद किया और महफ़ूज किया। ऐसा इतिहास किसी अन्य धार्मिक ग्रंथ का नहीं है। अन्य धार्मिक ग्रंथ एक वर्ग विशेष तक सीमित रहने के कारण प्रक्षिप्त हो गए। जिस भाषा में वह ग्रंथ थे, वह भाषा धीरे धीरे लगभग लुप्त हो गईं, या एक वर्ग विशेष तक ही सीमित रह गई। आप स्वयं देख सकते हैं। वेदों की ‘संस्कृत’ (Sanskrit) के साथ क्या हुआ? तौरात की भाषा ‘इबरानी’ (Ancient Hebrew) के साथ क्या हुआ? इंजील की भाषा ‘आरमेइक’ (Aramaic) के साथ क्या हुआ? बोद्ध ग्रंथ धम्मपद की भाषा ‘पालि’ (Pali) के साथ क्या हुआ? यह सब ग्रंथ और इनकी भाषाएँ अधिकतर लोगों से दूर हो गए। केवल उन मतों के विशेष ज्ञानी वर्ग तक ही सीमित रह गए और इसी कारण उनका प्रक्षिप्त होना या उनमें परिवर्तन करना बहुत आसान हो गया। इस के विपरीत पवित्र कुरआन की ‘अरबी’ (Arabic) भाषा लुप्त नहीं हुई, बल्कि आज ‘संयुक्त राष्ट्र संगठन’ (UNO) की पाँच प्रमुख भाषाओं में से एक भाषा है। और कुरआन भी किसी विशेष वर्ग तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आम मुसलमानों के घरों में ही रहा। आम मुसलमान इसे याद करते रहे और रोज़ इसको पढ़ते रहे जिस कारण इसका प्रक्षिप्त होना या इसमें किसी भी प्रकार का परिवर्तन होना संभव है ही नहीं। 

क़ुरआन में कहा गया है (सूरह 2 आयत:23) यदि तुम क़ुरआन के सम्बन्ध में संदेह में पड़े हो तो उसके समान एक सूरह ही ले आओ यदि तुम सच्चे हो ) पर इतिहास साक्षी है कि आज तक कोई क़ुरआन के समान न एक टूकड़ा बना सका है और न बना सकता है।

ये कुरआन को ईश्वरीय ग्रंथ साबित करने के कुछ सरल प्रमाण है जो पाठकों के सामने रखा गया  हैं। इस के अतिरिक्त कई प्रमाण हैं, जिनको आगे भी  आपके सामने रखा जायेगा मानवता को कुरआन का यही निमंत्रण है कि आओ इस संदेश पर विचार करो, और तुम जानोगे कि यह तुम्हारे बनाने वाले की ही ओर से आया है। कुरआन के ही शब्दों में ही इस लेख को समाप्त करता हूँ,

يَا أَيُّهَا النَّاسُ قَدْ جَاءَتْكُمْ مَوْعِظَةٌ مِنْ رَبِّكُمْ وَشِفَاءٌ لِمَا فِي الصُّدُورِ وَهُدًى وَرَحْمَةٌ لِلْمُؤْمِنِينَ

हे लोगो! निसंदेह तुम्हारे रब्ब की तरफ से तुम्हारे पास एक किताब आ चुकी है जो (सरासर) उपदेश है और वह हृदय में पाए जाने वाले रोगों को दूर करने वाली और इस पर विश्वास रखने वालों के लिए मार्गदर्शन और दया है”
 [सूरह: 10 आयत: 57]




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