Friday, 15 January 2021

बनू क़ुरैज़ा और क़ाब बिन अशरफ।

*सवाल : अगर इसलाम शांति का मज़हब है तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने "बनु क़ुरैज़ा" के लोगों को कत्ल करने का फैसला क्यों दीया? इसी तरह कअब बिन अशरफ को क्यों कत्ल किया गया? वह तो सिर्फ एक शायर था।* 

*जवाब:* :- शांति का मज़हब होने का मतलब यह नही है कि अपराधियों और दुष्टों को सज़ा ना दी जाए बल्कि शान्ति कायम रखने के किए अपराधियों को सज़ा देना ज़रूरी है। बनु क़ुरैज़ा के मर्दों को देशद्रोह, विश्वासघात और मदीना के तमाम मुसलमानों के कत्ल की साज़िश के जुर्म में कत्ल की सज़ा दी गई थी।

सनक्षेप में मामला यह था :-

जब नबी सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम मुसलमानों के साथ मक्क के गैर मुस्लिमों के ज़ुल्म और सितम से मजबूर होकर मदीना वालो के आमंत्रण पर मक्का से मदीना तशरीफ़ ले गए तब मदीना के लोगों ने मुसलमानों का इस्तकबाल किया, नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के मदीना पहुंचने पर वहां मौजूद मदीने के मुस्लिम कबीलों और मक्का के मुस्लिमो में भाईचारा कायम हो गया वहाँ के मुस्लिम कबीले जिनमे इसलाम आने से पूर्व मतभेद थे वे सभी दूर हो गए।

उस समय कोई मुल्की या मिलीट्री निज़ाम तो नही हुआ करता था और सभी की सुरक्षा एक बड़ी फिक्र थी।उस वक्त मदीना में मुस्लिमो के अलावा तीन यहूदी कबीले भी मौजूद थे । नबी सल्लाहो अलैहि व सल्लम ने उनके साथ भी समझौते किये और सभी ने मिलकर आपस मे Alliance (संधि) की कि सब मिलकर मदीना की हिफाज़त करेंगे। तुम्हारा दुश्मन हमारा दुश्मन होगा और हम तुम्हारी तुम्हारे दुश्मनों के खिलाफ मदद करेंगे। और हमारा दुश्मन तुम्हारा दुश्मन होगा और तुम्हें हमारी हमारे दुश्मनों के खिलाफ मदद करना होगी।
इसके अलावा भी कई समझौते हुए।

जिन सभी का मुसलमानो ने बड़ी द्रढ़ता से पालन किया। मगर इसके उलट यहूदियों ने हमेशा मदीने की हुकूमत के साथ गद्दारी की और दुश्मनों का ही साथ दिया। 
जैसे मक्का के दुश्मनों ने जब पहली बार मुसलमानों पर हमला किया उस समय यहूदियों के एक कबीले ने मुसलमानों के साथ गद्दारी की और दुश्मनों का साथ दिया। यह इतना बड़ा जुर्म था की उन के हर व्यक्ति को फांसी की सजा मिलनी चाहिए थी मगर नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उनको माफ कर दिया और जिला वतन कर दिया। दूसरी लड़ाई के बाद यहूदियों के दूसरे कबीले ने गद्दारी की इसबार भी आपने उन्हें माफ करके जिला वतन कर दिया। 

 लेकिन इसके बाद जब गजवा ए खंदक हुआ और मक्का के दुश्मनों के साथ अरब के और भी बहुत सारे कबीले मुसलमानों पर हमला करने के लिए मदीना आए तो मुसलमानों ने उनसे बचने के लिए मदीना के आसपास खंदक (गहरी खाई) खोदी।यह एक बोहत ही बड़ा हमला था और  उस वक्त मुसलमानों की संख्या दुश्मन के मुकाबले में बहुत थोड़ी थी। मदीना के हालात भी बोहत सख्त थे और हर व्यक्ति की जान पर पड़ी थी। ऐसे नाजुक वक्त में बनू कुरेजा के यहूदियों ने दुश्मनों के साथ ना सिर्फ हाथ मिलाया और मुसलमानों की पीठ में खंजर घोंपने का काम किया बल्कि तमाम षडयंत्रो के साथ तमाम मुस्लिमो का कत्ले के आम हो जाने का पूरा मंसूबा बनाया जैसे ना केवल वे दुश्मनों की मदद करेंगे बल्कि जब वे बाहर से हमलावर होंगे तो यह अंदर से घात करेंगे ताकि मुसलमान दोनों तरफ से घिर जाए और उनके बचने की कोई शक्ल ना बचे ।दुश्मनो के साथ मिलकर उन्होंने मुसलमानों पर हमले की साजिश की। मगर अल्लाह ताला ने उनकी तमाम साजिशों को किसी तरह नाकाम कर दिया। इस भयानक साज़िश का इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि उस वक्त उन्होने डेढ़ हजार तलवारे, दो हजार भाले, 300 जिरह( लोहे का सूट जिसे जंग में पहना जाता है) 500 ढालें मुसलमानों से लड़ने के लिए तैयार कर रखी थी। जबका चोला दोस्ती alliance का पहन रखा था ।

 इसको आप यूँ समझे कि भारत के चाइना से अगर लड़ाई चल रही हो और भारत के किसी शहर के लोग चाइना की मदद करते हुए पीछे से भारती फौज पर हमला करें दुश्मनो से मिलकर उन्हें खत्म करने की साज़िश करे तो उन्हें क्या सज़ा मिलना चाहिए? क्या उन्हें फांसी और कत्ल से बढ़कर सजा नहीं मिलनी चाहिए?

आज भी किसी भी देश के कानून में सिर्फ देशद्रोह करना या दुश्मन से गुप्त सूचना साझा करना ही मौत की सज़ा की श्रेणी में आता है। तो अगर कोई इस से भी बढ़कर सूचना साझा करना तो छोड़िए बल्कि दुश्मन से मिलकर विश्वासघात करे, पीठ पीछे हमले की साज़िश करे अपने लोगो की म्रत्यु सुनिष्चित करे तो उसकी क्या सज़ा होना चाहिए ?

 यही काम बनू कुरेजा वालों ने भी किया। इसलिए बनू कुरेजा के सभी बालिग मर्दों को कत्ल की सज़ा दी गई। 

और ऐसा भी नही है कि वे इस सज़ा से अंजान थे बल्कि अपना अपराध और उसकी सज़ा से वे भली भांति परिचित थे। तभी इस संदर्भ में जब मुहम्मद सल्लाहो अलैहि व सल्लम ने अपराधियों से पूछा कि क्या इस मामले में तुम्हे सा'द इब्ने मुआज़ का फैसला कबूल होगा? (सा'द इब्ने मुआज़ जो की यहूदियों के खास मित्र कबिले औस के सरदार थे) तो सभी ने  कहा हाँ हमे कबुल होगा।

तब साद इब्ने मुआज़ ने उन्हें कत्ल का फैसला सुनाया जिसे उन्होंने कबूल किया क्योंकि इस संगीन जुर्म की सज़ा यही है और यह खुद यहूदियों की किताब Deuteronomy 20: 12 में भी दर्ज है। और आज भी किसी भी किसी भी देश के कानून में इसकी यही सज़ा होगी। इसे मुहम्मद सल्लाहो  अलैहि व सल्लम की भी स्वीक्रति मिली।

    इस वाक्ये से नबी सल्लल्लाहो  वसल्लम के इन तिहाई रहम दिल और दयालु होने का भी पता चलता है।क्योंकि जब यहूदियों ने पहली बार गद्दारी की थी तो आप जानते थे कि अगर इनको इसी तरह खुला छोड़ दिया तो यह हमारे खिलाफ दोबारा साजिश करने लगेंगे। लेकिन फिर भी उन्होंने उन्हें माफ किया और सज़ा ए मौत के बजाए सिर्फ जिला वतन किया।यही उन्होंने दूसरी बार भी किया ।मगर बनू कुरेजा ने इस से ना कोई नसीहत हासिल की ने स्वयं को सुधारा बल्कि उल्टा वे तो अपनी साज़िश और षड्यंत्र में और आगे बढ़ गए अतः उनका जुर्म भी बोहत ज़्यादा बड़ा और जान बूझ के किया हुआ था। इसलिए उनहे मौत की सज़ा दी गई।

उसी तरह *का'ब बिन अशरफ* भी एक अपराधी था। शायर होने का ये मतलब नही की वह कोई मोतबर शख्सियत था। जिस तरह से कुछ डॉक्टर , इंजीनियर भी अपराधी होते हैं और अपने पेशे का ही इस्तेमाल अपराध में कर देते हैं। उसी तरह का'ब बिन अशरफ भी जंग भड़काने ,लोगों को उकसाने और फितना करने में अपने पेशे के इस्तेमाल करता था। कई जंगे भड़काने और कई लोगो की मौत का जिम्मेदार था। उसके औऱ भी कई जुर्म थे जैसे जंग ए बदर के बाद मक्का वालो को फिर मूसलीमो के साथ जंग के लिए उकसाना ,मदीना में आकर मुसलमानो को उनकी महिलाओं आदि के बारे में आहत करने वाली बातें करना निरन्तर मुस्लिमो को मानसिक और शारीरिक यातना देने की कोशिशें करते रहना यहाँ तक कि आप मुहम्मद सल्लाहो अलैही व सल्लम के कत्ल की साज़िश में भी शामिल था। 

अतः शांति स्थापित रखने के लिए यह ज़रूरी है कि अशांति फैलाने वाले फितना फसाद और जंग भड़काने वाले जघन्य अपराधियो को सख्त सजा दी जाए ताकि दुसरो को भी नसीहत हो और तमाम फितना फसाद की कोशिश करने वाले अपनी हरकतों से बाज़ रहें। इसीलिए उसे भी उसके अपराध की सज़ा दी गई।


■■■■■■■■■

क्या बनू क़ुरैज़ा ने राजद्रोह किया?

 क्या मुहम्मद ﷺ ने बनू-क़ुरैज़ा का कत्लेआम किया(नाउजुबिल्लाह) या उन्हें राजद्रोह की सजा मिली?

इस्लाम की दावत देने की जिम्मेदारी हर मुसलमान पर है। और इस्लाम के विरोधियों ने इस्लाम पर कई तरह के ऐतराज(आक्षेप) लगाए हैं, जिससे आम जनता के मन में इस्लाम की गलत छवि बन गई है।

इन्हीं गलतफहमियों में से एक है; मदीना में मौजूद तीन कबीलों में से एक यहूदी कबीले बनू-क़ुरैज़ा से हुई जंग।

असल में ये युद्ध किसी जमीनी क्षेत्र या संसाधनों पर अधिकार के लिए नहीं लड़ा गया था, बल्कि मदीने की सुरक्षा के लिए मुसलमानों और यहूदियों के मध्य हुई सन्धि को तोड़ने के जुर्म में राजद्रोह की सजा के फलस्वरूप यहूदियों से युद्ध किया गया था।

मदीना में तीन यहूदी कबीले आबाद थे::

1⃣ बनू क़ैनकाअ– ये अंसार में से खज़रज के मित्र थे और इनकी आबादी मदीने के अंदर थी।

2⃣ बनू क़ुरैज़ा, और

3️⃣ बनू नज़ीर — ये दोनों औस के मित्र थे और इन दोनों की आबादी मदीने के बाहरी हिस्से में थी।

हम यहां पर सिर्फ यहूदियों के बनू-क़ुरैज़ा कबीले के बारे में बात करेंगे क्योंकि जो एतराज किया जाता है, वो इसी कबीले के बारे में किया जाता है।

 ऐतराज यह किया जाता है कि मुहम्मद ﷺ ने बनू क़ुरैज़ा के लोगों का कत्ल-ए-आम किया, उनका नरसंहार किया। और इनके बीवी बच्चों को गुलाम बना लिया।

 बनू क़ुरैज़ा को लाचार, बेबस, बेचारा, मासूम, बेगुनाह और दयनीय बता कर इनका बचाव किया जाता है। और मुहम्मद ﷺ पर इसका इल्ज़ाम लगा दिया जाता है।

यह ऐतराज करने वालों में अक्सर तो वही लोग होते हैं जो इस घटना के इतिहास के बारे में कुछ नहीं जानते हैं और बस जो सुना उसे नकल करते रहते हैं। कुछ वो होते हैं जो बस थोड़ा बहुत जानते हैं। और बहुत कम लोग वो होते हैं जो सब कुछ जानते हैं लेकिन फिर भी लोगों को गुमराह करने और इस्लाम पर इल्ज़ाम धरने की अपनी हर कोशिश करते हैं।

अब इसकी हकीकत क्या है ये हम पर जानना लाज़मी है। जब तक इसकी पूरी जांच पड़ताल नहीं की जाये तब तक सही निर्णय तक नहीं पहुंचा जा सकता है।

इस लेख में हम बिंदुवार तरीके से इस घटना का विश्लेषण करेंगे और यह भी जानेंगे कि मदीना में रसूल ﷺ के आगमन से ही यहूदियों का व्यवहार रसूलल्लाह ﷺ और मदीना की इस्लामी रियासत के साथ कैसा था?

वह बिंदु कुछ इस तरह से हैं:-

1️⃣ यहूद की मुसलमानों से दुश्मनी की मिसाल और सच मालूम होने के बाद भी यहूद का हठधर्मी दिखाना।

2️⃣ मुहम्मद ﷺ ने यहूदियों के साथ समझौता किया था और आज के यहूदी इतिहासकार इस बात को मानते हैं

3️⃣ यहूदियों का मदीना में दंगा भड़काने की कोशिशें

4️⃣ बनू क़ुरैज़ा ने खन्दक की जंग से पहले भी रसूलल्लाह से ﷺ जंग की थी, जिस पर उन्हें माफ कर दिया गया

5️⃣ जंग-ए-अहज़ाब(खंदक) और बनू- क़ुरैज़ा का धोखा

6️⃣ बनू क़ुरैज़ा का हथियार और रसद मुहैया करवाना

7️⃣ बनू क़ुरैज़ा का मदीना की औरतों और बच्चों पर हमलावर होने की कोशिशें

8️⃣ बनू-क़ुरैज़ा ने अपना मध्यस्थ(जज) खुद चुना और बनू-क़ुरैज़ा को उनके किये का फल मिला

9️⃣ बनू-क़ुरैज़ा का फैसला उनकी किताब तौरात (Old Testament) के आधार पर किया गया।

1️⃣0️⃣ क्या बनू क़ुरैज़ा के सारे मर्दों को क़त्ल कर दिया गया?

1️⃣1️⃣ बनू क़ुरैज़ा की घटना पर आलोचक ये भी आपत्ति करते हैं कि इसमें बच्चों को क़त्ल किया गया।

1️⃣2️⃣ यहूदी विरोधी पूर्वाग्रह (Anti-Semitism) का आरोप

1️⃣3️⃣ राजद्रोह के मामले में अंतरराष्ट्रीय कानून

हजरत मुहम्मद ﷺ के मदीना आगमन से पहले इन तीनों कबीलों का काम औस और खज़रज के बीच लड़ाई भड़काने का था और यह यहूदी कबिले( बनी क़ैनकाअ, बनी क़ुरैज़ा और बनी नज़ीर) तीनों अपने अपने ‘मित्रों’ को सूद पर कर्जा देते थे, और उनसे माल कमाते थे। जैसा कि आजकल भी कई विकसित देश अपने हथियार बेचने के लिए विकासशील देशों में हिंसा भड़का कर अपने स्वार्थ साधते हैं और इन यहूदी क़बीलों ने औस और खजरज पर इतना कर्ज़ा चढ़ा दिया था कि उन्हें अपनी जमीनें और बाग़ात से भी हाथ धोना पड़ा।

जारी है.......!!

■■■■■■

क्या बनू-क़ुरैज़ा ने राजद्रोह किया?

1️⃣ यहूद की मुसलमानों से दुश्मनी की मिसाल और सच मालूम होने के बाद भी यहूद का हठधर्मी दिखाना।

 _इस्लाम के प्रारंभिक दिनों से ही यहूदी लोग मुहम्मद ﷺ. को सच्चा नबी जानने के बावजूद घमंड में सच्चाई को झुठलाते रहे और उन्होंने इस्लाम के खिलाफ प्रोपेगैंडा फैलाने में सबसे बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया और मुसलमान आबादी को हर किस्म से नुकसान पहुंचाने की साजिशें की।_ 

⛔ इसकी कुछ मिसालें हमें इस तरह मिलती है:

जब अल्लाह के रसूल ﷺ मदीना में तशरीफ़ लाये तो उम्मुल मोमिनीन हज़रत सफिया के वालिद हुई बिन अखतब और हज़रत सफिया के चचा अबू यासिर, मुहम्मद ﷺ के पास आये और वापस आ कर कुछ बात की जिसको हज़रत सफिया रिवायत करती हैं

हज़रत सफिया कहती हैं, मेरे चचा मेरे वालिद हुई बिन-अखतब से कह रहे थे कि

“क्या यह वही है?”

उन्होंने कहा, ‘हाँ, खुदा की कसम।’

चचा ने कहा, ‘आप उन्हें ठीक ठीक पहचान रहे हैं?’

पिता ने कहा, ‘हाँ।’

चचा ने कहा, ‘तो अब आपके मन मे उनके बारे में क्या इरादे हैं?

पिता ने कहा, ‘ दुश्मनी, खुदा की कसम, जब तक जिंदा रहूंगा।’

📚 इब्ने-हिशाम 1/555-556

यह एक मिसाल थी जिसमें यहूदियों ने मुसलमानों से दुश्मनी जाहिर की है, इस दुश्मनी की आगे और मिसालें बयान की गई है। और इस दुश्मनी के पीछे क्या वजह है यह भी बताया जाएगा।

इसी की गवाही सहीह बुख़ारी की इस रिवायत से भी मिलती है, जिसमें हज़रत अब्दुल्लाह बिन सलाम रज़ियल्लाहु अन्हु के मुसलमान होने की घटना बयान की गई है । वह एक बहुत ही ऊंचे यहूदी विद्वान थे । आपको जब बनू नज्जार में अल्लाह के रसूल ﷺ के आने की ख़बर मिली, तो वह आप ﷺ की सेवा में बिना देर किए हाज़िर हुए और कुछ सवाल किए, जिन्हें सिर्फ एक नबी ही जानता है और जब नबी की ओर से उनके जवाब सुने, तो वहीं उसी वक़्त मुसलमान हो गए, फिर अब्दुल्लाह बिन सलाम ने आप ﷺ से कहा:

 “यहूदी एक बोहतान लगाने वाली क़ौम है । अगर उन्हें इससे पहले कि आप मेरे बारे में उनसे कुछ मालूम करें, अगर उन्हें मेरे इस्लाम लाने का पता लग गया, तो वे आपके पास बोहतान गढ़ेंगे।”

 इसलिए अल्लाह के रसूल ﷺ ने यहूदियों को बुला भेजा, वे आए ( और उधर अब्दुल्लाह बिन सलाम घर के अन्दर छिप गए थे ), तो अल्लाह के रसूल ﷺ ने पूछा,”अब्दुल्लाह बिन सलाम तुम्हारे बीच में कैसे आदमी हैं ?”

 उन्होंने कहा, “हमारे सबसे बड़े विद्वान हैं और सबसे बड़े विद्वान के बेटे है। हमारे सबसे अच्छे आदमी हैं और सबसे अच्छे आदमी के बेटे हैं।”

 एक रिवायत के शब्द ये हैं कि “हमारे सरदार हैं और हमारे सरदार के बेटे हैं।” और एक दूसरी रिवायत के शब्द ये हैं कि, “हमारे सब से अच्छे आदमी हैं और सबसे अच्छे आदमी के बेटे हैं और हम में सबसे अफ़ज़ल हैं और सबसे अफ़ज़ल आदमी के बेटे हैं।”

 अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया,” अच्छा यह बताओ, अगर अब्दुल्लाह मुसलमान हो जाएं तो ?”

 यहूदियों ने दो या तीन बार कहा, “अल्लाह उनको इससे बचाए रखे।”

 इसके बाद हज़रत अब्दुल्लाह बिन सलाम निकले और फरमाया ‘अश्हदु अल-ला इला-ह इल्लल्लाह व अश्हदु अन-न मुहम्मदुर रसूलुल्लाह ( मैं गवाही देता हूं कि अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक नहीं और मैं गवाही देता हूं कि मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं। )

इतना सुनना था कि यहूदी बोल पड़े,

 'यह हमारा सबसे बुरा आदमी है और सबसे बुरे आदमी का बेटा है। और (उसी वक़्त) उनकी बुराइयां शुरू कर दी।’

 एक रिवायत में है कि इस पर हज़रत अब्दल्लाह बिन सलाम (रज़ियल्लाहु अ़न्हु) ने फ़रमाया:

 ‘ऐ यहूदियों ! अल्लाह से डरो। उस अल्लाह की कसम, जिसके सिवा कोई माबूद नहीं, तुम लोग जानते हो कि आप अल्लाह के रसूल है और हक़ लेकर तशरीफ़ लाए हैं ।’

 लेकिन यहूदियों ने कहा कि ‘तुम झूठ कहते हो।’

📚 सहीह बुखारी 4480

📚 सहीह बुखारी 3329

यह पहला तजुर्बा था जो अल्लाह के रसूल ﷺ को यहूदियों के बारे में हासिल हुआ और मदीने में दाखिले के पहले ही दिन हासिल हुआ।

 यही अब्दुल्लाह बिन सलाम जो कि एक यहूदी विद्वान(आलिम) है, फरमाते हैं कि जब अल्लाह के रसूल ﷺ मदीना तशरीफ़ लाये तो लोग आपकी तरफ दौड़ पड़े और कहने लगे 

 “अल्लाह के रसूल आ गए”

 “अल्लाह के रसूल आ गए”

 “अल्लाह के रसूल आ गए”

चुनाचे मैं भी लोगों के साथ आया ताकि आपको देखूं, फिर जब मैंने आप ﷺ का चेहरा मुबारक देखा तो पहचान गया कि “ये किसी झूठे का चेहरा नहीं हो सकता।”

📚 जामेअ तिर्मिज़ी 2485 (सहीह)

 इसी तरह अब्दुल्लाह बिन सलाम (रज़ियल्लाहु अ़न्हु) से ही रिवायत है कि किस तरह यहूदी अपनी धार्मिक किताब यानी तौरात की आयतों को छुपाते थे और और समाज में बुराइयों के पनपने का मौका देते थे। आप (रज़ियल्लाहु अ़न्हु) कहते हैं कि एक मौके पर यहूदी अल्लाह के रसूल सल्ल. की खिदमत में अपने में से एक शख्स का मुकदमा लेकर आये जिसने जिना(बलात्कार) किया था।

अल्लाह के रसूल ने अपनी आदत के मुताबिक उनकी ही किताब यानी तौरात मंगवाई, और उसमें से इसकी सजा का हुक्म सुनाने के लिए कहा। जिस हुक्म को एक यहूदी ने अपने हाथ से छिपा लिया था, लेकिन तौरात के आलिम अब्दुल्लाह बिन सलाम (रज़ियल्लाहु अ़न्हु) ने उसकी ये खयानत पकड़ ली और तौरात के मुताबिक सजा दी गई जो रज्म की सजा थी।

 इससे हमें ये भी पता चला कि यहूदियों ने अपनी ही किताब को छोड़ रखा था और नबी सल्ल. यहूदियों के फैसले उनके पास मौजूद आसमानी किताब के जरिये किया करते थे।

📚 सुनन अबू दाऊद 4446 (सहीह)

यहूदियों की यह कुछ मिसाल है, ऐसी और भी मिसाल मिलती हैं।

अब इन दोनों घटनाओं की अच्छी तरह जांच करने के बाद मालूम होता है कि इन मे दो बात समान हैं

1️⃣ एक तो यह कि यहूदियों को ये मालूम हो गया था कि ये जो रसूल आया है वही हमारा भी रसूल है।

2️⃣ और दूसरी यह कि यहूदी सत्य स्पष्ट हो जाने के बाद अब दुश्मनी निभाने का वादा कर चुके थे।

इन सब के पीछे एक बात समझ लेनी चाहिए कि यहूदी और ईसाई दोनों की किताब तौरात और बाइबिल में लिखा था कि इस जमाने मे, इस जगह पर एक रसूल आएगा और यहूदी इस बात को भली भांति जानते भी थे यानी वो अल्लाह के रसूल सल्ल. से इतनी अच्छी तरह परिचित थे कि जैसे अपनी औलाद से होते हैं।

📚 क़ुरआन सूरह अनआम 6:20

यहूदियों कि इस हठधर्मी की एक बड़ी वजह यह थी कि वो मानते थे कि नबी और रसूल, अल्लाह बस उन्हीं की कौम में भेजता है और भेजता रहेगा और किसी दूसरी कौम में नहीं भेजता और न ही भेजेगा। ऐसा इसलिए था कि वो मानते थे कि यहूदी अल्लाह की चुनी हुई कौम है और पिछले 3500 साल से नबी और रसूल उन्हीं में से आ रहे थे। इसलिए उन्हें गलत फहमी हो गयी कि अब नबी और रसूल बस हमारी कौम में ही आएंगे। इसलिए वो यह मानने को तैयार न थे कि किसी दूसरी कौम में रसूल आ सकता है और वो भी ऐसी कौम जिन्हें वो उम्मी (अनपढ, जाहिल और गैर यहूदी) समझते थे। बस यही वजह थी कि वो लोग मुहम्मद ﷺ के बारे में सच जान लेने के बाद भी झुठला रहे थे।

 इसी वजह से वो यह भी सोच कर बैठे थे कि जब हमारी कौम में वो रसूल आएगा तो हम(यानी यहूदी) रसूल के साथ मिल कर यसरीब(मदीना) की आबादी को मार काट कर यहां से भगा देंगे।

जारी है......!!


■■■■■


क्या बनू क़ुरैज़ा ने राजद्रोह किया?

2️⃣ मुहम्मद ﷺ ने यहूदियों के साथ समझौता किया था और आज के यहूदी इतिहासकार इस बात को मानते हैं

यहूदियों की इस तरह की दुश्मनी स्पष्ट हो जाने के बाद भी मुहम्मद ﷺ ने इनके साथ एक समझौता किया। जिसका मकसद यह था कि इंसानियत को अम्न व सलामती, सुख-शांति मिले।

चुनांचे आपने उदारता और विशालहृदयता के वो नियम बनाए, जिन्हें इस तास्सुब और अतिवादिता से भरी दुनिया में कोई सोच भी नहीं सकता था ।

अल्लाह के रसूल ﷺ ने उनके साथ एक समझौता किया, जिसमें उन्हें दीन व मजहब और जान व माल की बिल्कुल आज़ादी दी गई थी ।

 समझौते की धाराएं:

● बनू औफ के यहूदी मुसलमानों के साथ मिलकर एक ही उम्मत होंगे। यहूदी अपने दीन पर अमल करेंगे और मुसलमान अपने दीन पर। खुद उनका भी यही हक़ होगा, और उनके गुलामों और संबंधित लोगों का भी और बनू औफ के अलावा दूसरे यहूदियों का भी यही हक़ होंगे।

● यहूदी अपने खर्च के ज़िम्मेदार होंगे और मुसलमान अपने खर्च के ।

● और जो ताक़त इस समझौते के किसी फरीक से लड़ाई करेगी, सब उसके खिलाफ आपस मे सहायता करेंगे।

● और इस समझौते में शरीक गिरोहों के आपसी सम्बंध एक दूसरे का हित चाहने, भलाई करने और फायदे पहुंचाने की बुनियाद पर होंगे, गुनाह पर नहीं।

● कोई आदमी अपने मित्र की वजह से अपराधी न ठहराया जाएगा ।

● मज़लूम की मदद की जाएगी।

● जब तक लड़ाई चलती रहेगी, यहूदी भी मुसलमानों के बीच खर्च सहन करेंगे ।

● इस समझौते के तमाम शरीक लोगों पर मदीने में हंगामा करना और क़त्ल का खून हराम होगा।

● इस समझौते के फ़रीकों में कोई नई बात या झगड़ा पैदा हो जाए, जिसमें फसाद का डर हो, तो इसका फ़ैसला अल्लाह और मुहम्मद रसूलुल्लाह ﷺ फरमाएंगे ।

● कुरैश और उसके मददगारों को पनाह नहीं दी जाएगी।

● जो कोई यसरिब पर धावा बोल दे , उससे लड़ने के लिए सब आपस में सहयोग करेंगे और हर फ़रीक़ अपने-अपने लोगों की रक्षा करेगा ।

● यह समझौता किसी ज़ालिम या मुजरिम के लिए आड़ न बनेगा।

📗 इब्ने हिशाम 1/231-232

यह वो समझौता था जिसमे दोनों फरीक के बराबर के हक़ थे।

वर्तमान यहूदी इतिहास के जानकार ने भी इस बात को स्वीकार किया है कि अल्लाह के रसूल (ﷺ) और मदीना के यहूदियों के बीच में समझौता हुआ था. कुछ प्रमाण देखें:

 “The first treaty which the Messenger of God concluded with the Jews of Medina took place when he concluded a truce with the Nadir, Qurayza, and Qaynuqa in Medina, stipulating that they refrain from supporting the pagans and help the Muslims…!”

 “पहली संधि जो अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने मदीना के यहूदियों के साथ संपन्न की, वो उस समय थी जब आप (ﷺ) ने बनी नज़ीर, कुरैज़ा और क़ैनुक़ाअ़ के साथ मदीना में एक समझौता किया, यह शर्त रखते हुए कि वे काफ़िरों का समर्थन करने से बचेंगे, और मुसलमानों की मदद करेंगे।”

📗 Dhimmis and Others: Jews and Christians and the World of Classical Islam [Israel Oriental Studies], by Michael Lecker, volume 17, page 31

इस बात की पूरी चर्चा एक ईसाई स्कौलर ‘Dr. Montgomery Watt’ की मशहूर किताब ‘Muhammad at Medina’ में भी मौजूद है.

 "एक तरफ़ जब मुस्लिम फौज अपना बचाव करने में लगी हुई थी, उधर दूसरी तरफ बनू क़ुरैज़ा, मुह़म्मद (ﷺ) से किए गए समझौते को तोड़ने में लगे थे. बात का निचोड़ ये कि बनी नज़ीर का सरदार ‘ह़ुयै इब्ने अख़त़ब’, बनी क़ुरैज़ा के सरदार ‘कअ़ब इब्ने असद क़ुरज़ी’ के पास आया और बोला कि मुह़म्मद (ﷺ) से किए हुए समझौते को तोड़ दो. पहले तो ‘कअ़ब इब्ने असद क़ुरज़ी’ मना करता रहा, मगर बाद में उसकी बातों में आ गया"

📗 Muhammad at Medina, page 196

जब मुहम्मद (ﷺ) को बनू क़ुरैज़ा की धोखाधड़ी की ख़बर पहुंची, तो आप (ﷺ) ने कुछ लोगों को बनू क़ुरैज़ा के पास भेजा ताकि हक़ीक़त मालूम हो जाए. जब वो लोग बनू क़ुरैज़ा के पास पहुंचे और उनसे पूछा, तो उन्होंने अल्लाह के रसूल (ﷺ) को बुरा कहा और साफ-साफ कह दिया कि: “हमारे और तुम्हारे बीच कोई समझौता नहीं.”

📗 Muhammad at Medina

ये किस्सा भी ‘Dr. Montgomery Watt’ की इसी किताब ‘Muhammad at Medina’ में देखा जा सकता है.

उनके संधि तोड़ने के बारे में एक और हवाला ग़ैर मुस्लिमों की किताब से देखें:

 The Massacre of the Banu Quraiza, A re-examination of a tradition – [Jerusalem Studies in Arabic and Islam, (Magnes Press, Hebrew University of Jerusalem – 1986)] by, Professor Meir J. Kister, Vol. 8, page 81


■■■■■

क्या बनू क़ुरैज़ा ने राजद्रोह किया?

यहूदियों का मदीना में दंगा भड़काने की कोशिशें

इब्ने इस्हाक़ का बयान है कि एक बूढ़ा यहूदी शाश बिन कैस, जो क़ब्र में पाव लटकाए हुए था, बड़ा ज़बरदस्त दुश्मन था और मुसलमानों से ज़बरदस्त दुश्मनी और जलन रखता था, एक बार सहाबा किराम की एक मज्लिस के पास से गुज़रा, जिसमें औस व खज़रज दोनों ही क़बीले के लोग बैठे आपस में बातें कर रहे थे। उसे यह देखकर कि अब उनके अन्दर अज्ञानता-युग की आपसी दुश्मनी की जगह इस्लाम की मुहब्बत और भाईचारे ने ले लिया है और उनकी पुरानी रंजिशों का खात्मा हो गया है, बड़ा रंज हुआ, कहने लगा

‘ओह ! इस इलाके में बनूकैला के लोग एक हो गए हैं, खुदा की क़सम ! इनके मिलन के बाद तो हमारा यहां गुज़र नहीं।’

चुनांचे उसने एक नौजवान यहूदी को, जो उसके साथ था, हुक्म दिया कि उनकी सभाओं में जाए और उनके साथ बैठ कर फिर बुआस की लड़ाई (औस और खज़रज की पुरानी जंग) और उससे पहले के हालात का वर्णन करे और इस सिलसिले में दोनों ओर से जो काव्य कहा गया है, कुछ पद उनमें से पढ़कर सुनाए। उस यहूदी ने ऐसा ही किया।

उसके नतीजे में औस व खज़रज में तू-तू, मैं-मैं शुरू हो गई। लोग झगड़ने लगे और अपने को बड़ा बताने लगे, यहां तक कि दोनों क़बीलों के एक-एक आदमी ने घुटनों के बल बैठकर रद्द व कद्द शुरू कर दी, फिर एक ने अपने सामने के व्यक्ति से कहा, अगर चाहो, तो हम इस लड़ाई को फिर जवान करके पलटा दें। मक्सद यह था कि हम इस आपसी लड़ाई के लिए फिर तैयार हैं, जो इससे पहले लड़ी जा चुकी है।

इस पर दोनों फ़रीक़ को ताव आ गया और बोले, चलो हम तैयार हैं । हर्रा में मुकाबला होगा । हथियार . . . . हथियार !

और लोग हथियार लेकर हर्रा की ओर निकल पड़े। क़रीब था कि खूनी लड़ाई हो जाती, लेकिन अल्लाह के रसूल ﷺ को खबर हो गई। आप अपने मुहाजिर सहाबा को साथ लेकर झट उनके पास पहुंचे और फ़रमाया

‘ऐ मुसलमानों की जमाअत ! अल्लाह ! अल्लाह ! क्या मेरे रहते हुए जाहिलियत की पुकार, और वह भी इसके बाद कि अल्लाह तुम्हें इस्लाम की हिदायत दे चुका है और इसके ज़रिए से तुमसे जाहिलियत का मामले और कुफ्र से निजात दिलाकर तुम्हारे दिलों को आपस में जोड़ चुका है।’

आपकी नसीहत सुनकर सहाबा को एहसास हुआ कि उनकी हरकत शैतान का एक झटका और दुश्मन की एक चाल थी । चुनांचे वे रोने लगे और औस व खज़रज के लोग एक दूसरे से गले मिले, फिर अल्लाह के रसूल ﷺ के साथ फरमाबरदार बनकर इस हालत में वापस आए कि अल्लाह ने उनके दुश्मन शास बिन कैस की मक्कारी की आग बुझा दी थी ।

इब्ने-हिशाम 1/555-556

यह है एक नमूना उन हंगामों और बेचैनियों का, जिन्हें यहूदी मुसलमानों के अन्दर पैदा करने की कोशिश करते थे और यह है एक मिसाल उस रोड़े की, जिसे ये यहूदी इस्लामी दावत के रास्ते में अटकाते रहते थे। इस काम के लिए उन्होंने विभिन्न योजनाएं बना रखी थीं।

वे झूठे प्रोपगंडे करते थे, सुबह मुसलमान होकर शाम को फिर काफ़िर हो जाते थे, ताकि कमजोर और सादा दिल किस्म के लोगों के दिलों में शक व शुबहे के बीज बो सकें।

क़ुरआन 3:72

किसी के साथ माली ताल्लुक़ होता और वह मुसलमान हो जाता तो उस पर खाने-कमाने की राहें तंग कर देते। चुनांचे अगर उसके ज़िम्मे कुछ बकाया होता, तो सुबह व शाम तक़ाज़े करते, और अगर खुद उस मुसलमान का कुछ बक़ाया उन पर होता, तो उसे अदा न करते, बल्कि ग़लत तरीके पर खा जाते और कहते कि तुम्हारा क़र्ज़ तो हमारे ऊपर उस वक़्त था, जब तुम अपने बाप-दादा के दीन पर थे, लेकिन अब जबकि तुमने अपना दीन बदल दिया है, तो अब हमारे और तुम्हारे लिए कोई राह नहीं।

स्पष्ट रहे कि यहूदियों ने ये सारी हरकतें बद्र से पहले ही शुरू कर दी और इस समझौते के होते हुए शुरू कर दी थीं जो उन्होंने अल्लाह के रसूल ﷺ से कर रखा था, मगर अल्लाह के रसूल ﷺ और सहाबा किराम (रज़ि.) का यह हाल था कि वे इन यहूदियों की हिदायत पाने की उम्मीद में इन सारी बातों पर सब्र करते जा रहे थे। इसके अलावा मुसलमानों का यह भी मक़सद था कि इलाके में सुख शांति का वातावरण बना रहे।

■■■■■


क्या बनू क़ुरैज़ा ने राजद्रोह किया?  

4️⃣  बनू क़ुरैज़ा ने खन्दक की जंग से पहले भी रसूलल्लाह से ﷺ जंग की थी, जिस पर उन्हें माफ कर दिया गया  

सहीह बुख़ारी, सहीह मुस्लिम और सुनन अबु दाऊद में वर्णित हदीस:-

  हज़रत इब्ने उमर (रजि.) ने बयान किया कि बनू-नज़ीर और बन-कुरेज़ा ने नबी करीम ﷺ से (मुआहदा तोड़कर) लड़ाई मोल ली। इसलिये आपने क़बीला बनू-नज़ीर को जिलावतन कर दिया लेकिन क़बीला बनू-कुरैज़ा को जिलावतन नहीं किया और इस तरह उन पर एहसान किया।  

📚  सहीह बुखारी 4028  
📚  सहीह मुस्लिम 4592  
📚  सुनन अबु दाऊद 3005  

मुसनद अहमद में वर्णित हदीस:-

  सैयदना अब्दुल्लाह बिन उम्र रज़ि.से रिवायत है के बनू-नज़ीर और बनू-क़ुरैज़ा के यहूदियों ने रसूलल्लाह ﷺ से जंग की, आप ﷺ ने बनू-नज़ीर को मदीना मुनव्वरा से जिलावतन कर दिया और बनू-क़ुरैज़ा को वहीं रहने दिया। और इन पर अहसान किया।  

📚  मुसनद अहमद 10746  

📝  नोट:- इस हदीस का आधा हिस्सा ही हम यहां बयान कर रहे हैं। क्योंकि इस हदीस में अलग अलग समय की घटना एक साथ बयान की गई है। इसलिए जो घटना जिस समय की होगी उसी मौके पर उसको लिख दिया जाएगा।  

पहले तो यहूदियों ने कहा की हम जब तक जिंदा रहेंगे,  दुश्मनी  ही करेंगे और अब इन्होंने मुहम्मद ﷺ से  जंग  करके दिखा भी दिया था कि  वो कितने बड़े झूठे, मक्कार और धोखेबाज़  हैं। 

 ये जानते भी थे कि यही रसूल ﷺ हमारे भी रसूल हैं। लेकिन दूसरी कौम में आने की वजह से इन्होंने आप ﷺ से दुश्मनी ही निभाई है। समझने वाली बात ये है कि यहूदी “कौम परस्त” लोग होते है। यानी कोई भी व्यक्ति अगर इनकी कौम या नस्ल के व्यक्ति है तो वही इनका भाई है बाकी दूसरों का तो इन पर खून बहाना और उनका माल हड़पना वैध है।  

  ‘‘हमारे उपर उम्मियों के बारे में (यानी उनका माल मारखाने में) कोई पकड़ नही हैं।’’  

📚  क़ुरआन 3:75  

  इनके संधि तोड़ने के बाद भी अल्लाह के रसूल ﷺ ने क़ुरैज़ा को मदीने में ही रहने दिया और उन पर अहसान किया, लेकिन ये कौम कहाँ सुधरने वाली थी, एहसान का बदला इन्होंने पीठ में छुरा घोंप कर दिया।  

एक बात ये की बनू-नज़ीर ने अल्लाह के रसूल ﷺ को धोखे से मारने की कोशिश की। इस पर विस्तार से हम बात करेंगे जब बनू-नज़ीर के बारे में लेख लिखेंगे.


■■■■■


क्या बनू क़ुरैज़ा ने राजद्रोह किया?  

5️⃣   जंग-ए-अहज़ाब(खंदक) और बनू- क़ुरैज़ा का धोखा  

जंग-ए-अहज़ाब या जंग-ए-खंदक शव्वाल 5 हिजरी में हुई थी।

अभी सब कुछ सुख-शांति से चल ही रहा था, इस्लाम फैल रहा था लोग इस्लाम कबूल कर रहे थे। पूरे अरब प्रायद्वीप में अमन-चैन था।

  लेकिन दूसरी तरफ द्वेष और घृणा से भरे लोग इस शांति को देख कर खुश नहीं थे। उन लोगों के दिलों में घृणा की वो आग जल रही थी जो अब ये चाहती थी के मदीना के मुसलमानों पर मुसीबत के वो पहाड़ लाये जाएं जिनसे टकराकर मुसलमान हमेशा के लिए खत्म हो जाएं।  

    इसी काम को आगे बढ़ाते हुए यहूद के एक क़बिले बनू-नज़ीर के बीस सरदार और नेताओं ने मक्का से 10,000 की फौज मदीना ला खड़ी करवाई।    

इसी पर अर-रहिकुल मख़्तूम में मौलाना सफीउर्रहमान मुबारकपूरी रह. लिखते हैं:

  यहूद क़बिले के बनू नज़ीर के बीस सरदार और नेता मक्का में क़ुरैश के पास हाज़िर हुए और उन्हें अल्लाह के रसूल ﷺ के खिलाफ लड़ाई पर उभारते हुए अपनी मदद का यकीन दिलाया । कुरैश ने उनकी बात मान ली।  

  चूंकि क़ुरैश जंगे उहुद के दिन मुसलमानों के ख़िलाफ़ मैदान में आने का एलान और वायदा कर चुके थे, इसलिए उनका विचार था कि अब इस प्रस्तावित लड़ाई द्वारा वे अपनी ख्याति भी वापस ले आएंगे और अपना किया हुआ वादा भी पूरा कर देंगे।  

  इसके बाद यहूदियों की यह टोली बनू ग़तफ़ान के पास गई और कुरैश ही की तरह उन्हें भी लड़ाई पर तैयार किया। वे भी तैयार हो गए। फिर इस मंडली ने अरब के बाक़ी क़बीलों में घूम-घूम कर लोगों को लड़ाई पर उभारा और इन कबीलों के भी बहुत से लोग तैयार हो गए।  

📚   इब्ने हिशाम 450  

  इन लोगों की इस घृणा ने वो काम कर दिया था जो अरब प्रायद्वीप में कभी नहीं हुआ होगा। एक ऐसी फौज जुटा ली थी जितनी बड़ी आज तक कभी नहीं जुटी होगी।  

  मदीना के बाहर खंदक के एक तरफ 10,000 की फौज जो मुसलमानों को खत्म करने के लिए आई थी और दूसरी तरफ 3000 मुसलमान जिन्हें कैसे भी करके अपना बचाव करना था और मुस्लिम विरोधी फौज को मदीना में अंदर नही आने देना था।  

    मदीना के दो तरफ पूर्व और पश्चिम दिशाओं में पहाड़ीयां थी और दक्षिणी तरफ बनू- क़ुरैज़ा का कबीला था, उत्तर दिशा से अरब कबीलों की फौज मदीने पर हमला कर सकती थी वहाँ खंदक खोद कर रास्ता रोक दिया गया था।    

    अब मुस्लिम विरोधी फौज का मदीने में दाखिल होने का एक ही रास्ता बचा था कि ये फौज दक्षिण दिशा से मदीने पर हमला करे इसके लिए जरूरी था कि अरब फौज का बनू-क़ुरैज़ा से समझौता हो जाए या बनू-क़ुरैज़ा मुसलमानों से किया हुआ समझौता तोड़ दे।    
  आख़िर में यही हुआ बनू-क़ुरैज़ा ने मुसलमानों से समझौता तोड़ा और मुस्लिम विरोधी फौज से समझौता कर लिया।  

    बनू नज़ीर का सबसे बड़ा अपराधी, हुइ बिन अख़तब, बनू कुरैज़ा के मुहल्ले में आया और उनके सरदार काब बिन असद कुरजी के पास हाज़िर हुआ। यह काब बिन असद वही आदमी है जो बनू कुरैज़ा की ओर से वायदा इक़रार करने का अधिकारी था और जिसने रसूल ﷺ से यह समझौता किया था कि लड़ाई के मौक़ों पर आपकी मदद करेगा।    

    हुइ ने आकर उसके दरवाजे पर दस्तक दी , तो उसने दरवाज़ा अन्दर से बंद कर लिया । मगर हुइ उससे ऐसी-ऐसी बातें करता रहा कि आखिरकार उसने दरवाज़ा खोल ही दिया।    

    हुइ ने कहा, ऐ काब! मैं तुम्हारे पास ज़माने की इज़्ज़त और चढ़ा हुआ समुद्र लेकर आया हूं। मैं ने कुरैश को उसके सरदारों और नेताओं सहित लाकर रूमा के मजमअल अस्याल (मदीना के उत्तर पश्चिम में एक स्थान) में उतार दिया है और बनू-ग़तफ़ान से उनके सरदारों और नेताओं समेत उहुद के पास ज़म्ब नक़मी में पड़ाव डलवा दिया है। इन लोगों ने मुझसे वायदा – इक़रार किया है कि वे मुहम्मद ﷺ और उनके साथियों का पूरा सफ़ाया किए बिना यहां से न टलेंगे।    

    काब ने कहा , ख़ुदा की क़सम ! तुम मेरे पास ज़माने की ज़िल्लत और बरसा हुआ बादल लेकर आए हो जो सिर्फ़ गरज-चमक रहा है, पर उस में कुछ रह नहीं गया है। हुइ ! तुझ पर अफ़सोस ! मुझे मेरे हाल पर छोड़ दे। मैंने मुहम्मद ﷺ में सच्चाई और वफ़ादारी के सिवा कुछ नहीं देखा है।    

    मगर हुइ उसको बराबर चोटी और कंधे में बटता और लपेटता रहा यानी हर हथकंडे का इस्तेमाल करता रहा, यहां तक कि उसे (समझौता तोड़ने के लिए) राजी कर ही लिया।    

    अलबत्ता उसे इस मक्सद के लिए वायदा व करार करना पड़ा कि अगर कुरैश ने मुहम्मद ﷺ को ख़त्म किए बगैर वापसी की राह ली, तो मैं भी तुम्हारे साथ तुम्हारे क़िले में दाखिल हो जाऊंगा, फिर जो अंजाम तुम्हारा होगा, वही मेरा भी होगा।    

    हुइ के इस क़ौल-क़रार के बाद काब बिन असद ने रसूल ﷺ से किया हआ समझौता तोड़ दिया और मुसलमानों के साथ तय की हुई ज़िम्मेदारियों से बरी होकर उनके ख़िलाफ़ मुशरिकों की ओर से लड़ाई में शरीक हो गया।    

    इसके बाद बनू-क़ुरैज़ा के यहूदी अमली तौर पर जंगी कार्रवाइयों में लग गए।    

📚  इब्ने हिशाम 453  

इस तरह से काब बिन असद ने समझौता तोड़ा और मुस्लिम विरोधी फौज की मदद की। यहाँ तक कि बनू-क़ुरैज़ा खाने पीने का सामान भी मदीना पर चढ़ाई करने वाली अरब फौज को भेज रही थी।

जारी है...!!!

■■■■■■

क्या बनू क़ुरैज़ा ने राजद्रोह किया?  


6️⃣  बनू क़ुरैज़ा का हथियार और रसद मुहैया करवाना  

  इसके अलावा इतिहास के पन्नो से ये बात भी खुलकर सामने आती है कि यह यहूदी कबीला मुसलमानों को सिर्फ धोखा देकर शांत नहीं बैठ गया बल्कि इसने अरब फौजों की हथियार और रसद सामग्री से मदद की और अप्रत्यक्ष तौर पर मदीना के मुसलमानों के साथ जंग जारी रखी।  

क़ुरआन में उनकी इसी बुरी रविश का बयान इस तरह किया गया है:

  वे(यहूदी) वही लोग जिनके साथ तूने समझौता किया, फिर वे हर मौक़े पर उसको तोड़ते हैं और ज़रा भी ख़ुदा से नहीं डरते।  

📚  सूरह अनफाल आयत 56  

इस आयत की तफ्सीर में मशहूर इतिहासकार तबरी रह. ने अपनी तफ्सीर में लिखा है:

  यहूदियों का कहना था, “ऐ मुहम्मद (सल्ल.) ! हम तुमसे वादा करते हैं कि न तो तुमसे जंग करेंगे, न तुमसे जंग करने वालों की मदद करेंगे।” …. फिर उन्होंने ये संधि समझौता तोड़ डाला और तुमसे जंग की और तुम्हारे खिलाफ दुश्मन की मदद की।  

📚   तफ्सीर तबरी (सं. शाकिर)    जिल्द 14 पेज 21-22  

इमाम मुक़ातिल बिन सुलैमान ने अपनी तफ्सीर में लिखा है:

  यहूदियों ने पैगम्बर से की गई संधि तोड़ डाली और मक्का के बहुदेववादीयों को हथियारों के जरिये मदद की। जिसके जरिये वो पैगम्बर और मुसलमानों से लड़ें।  

📚  [तफ्सीर मुक़ातिल जिल्द 1 पेज 147a]  

हुसैन बिन मसऊद अल बगवी लिखते हैं कि:

  इस आयत में बनू क़ुरैज़ा के यहूदियों का ज़िक्र हैं ( जिन्होंने पहले से ये संधि कर रखी थी कि हम आपके दुश्मनों को हथियार वगैरह से मदद नहीं पहुंचाएंगे) लेकिन उन्होंने ये समझौता तोड़ डाला लेकिन मुहम्मद सल्ल. ने वापस दूसरी संधि की जिसे इन्होंने तब तोड़ दिया जब इन्होंने काफिरों को भड़का कर जंगे अहजाब में जमा कर दिया। काब बिन अशरफ ने मक्के में जाकर वहां के लोगों से मुहम्मद सल्ल. के खिलाफ गठजोड़ कर लिया।  

📚  [तफ्सीर मआलिम उतन्जील / तफ्सीर बगवी जिल्द 2 पेज 257]  

    बहरहाल यहूदियों के वचन-भंग करने की खबर रसूल ﷺ को मालूम हुई तो आपने तुरन्त उसकी खोज की और तवज्जोह फ़रमाई, ताकि बनू कुरैज़ा के इरादे मालूम हो जाएं और उसकी रोशनी में फ़ौजी दृष्टिकोण से जो क़दम उठाना मुनासिब हो, उसे उठाया जाए । चुनांचे आपने इस खबर की पड़ताल के लिए हज़रत साद बिन मुआज़, साद बिन उबादा, अब्दुल्लाह बिन रवाहा और ख्वात बिन जुबैर रजि० को रवाना फ़रमाया और हिदायत की, कि जाओ, देखो, बनी कुरैज़ा के बारे में जो कुछ मालूम हुआ है, वह वाक़ई सही है या नहीं । अगर सही है, तो वापस आकर सिर्फ मुझे बता देना और वह भी इशारों-इशारों में, लोगों के बाजू मत तोड़ना और अगर वे वायदा-क़रार पर क़ायम रहें, तो फिर लोगों के दर्मियान एलानिया उसका ज़िक्र कर देना।
    
  जब ये लोग बनू कुरैज़ा के करीब पहुंचे, तो उन्हें बड़ी ढिठाई और दुष्टता पर उतारू पाया। उन्होंने (बनू-क़ुरैज़ा ने) एलानिया गालियां बकी, दुश्मनी की बातें की और अल्लाह के रसूल ﷺ की तौहीन की। कहने लगे,“अल्लाह का रसूल कौन ? हमारे और मुहम्मद ﷺ के बीच न क़ौल है न करार।“  

  यह सुनकर वे लोग वापस आ गए और अल्लाह के रसूल ﷺ की सेवा में पहुंचकर स्थिति की ओर इशारा करते हुए सिर्फ इतना कहा, अज़्ल व कारा। उद्देश्य यह था कि जिस तरह अज़्ल व कारा ने रजीअ के लोगों के साथ ग़द्दारी की थी, उसी तरह यहूदी भी ग़द्दारी पर तुले हुए हैं ।  

📚  इब्ने हिशाम 453  

इस संधि को तोड़ने का बयान उस हदीस में भी है जिसका हमने ऊपर आधा हिस्सा बयान किया था। वो हदीस आगे कुछ इस तरह से बयान की गई है:-

  …बनू-क़ुरैज़ा ने समझौता तोड़ दिया और जंग-ए-अहज़ाब में दुश्मन का साथ दिया और आप ﷺ से जंग की…  

📚 सहीह बुखारी 4028 
📚 सहीह मुस्लिम 4592
📚 सुनन अबु दाऊद 3005

    एक हदीस में यह बात वर्णित है कि अल्लाह के रसूल ﷺ अपने लोगों को चेता रहे थे कि बनू-क़ुरैज़ा तुम पर हमला कर सकते हैं क्योंकि वो समझौता तोड़ चुके थे। यह 5 हिजरी में जंग-ए-खंदक/जंग-ए-अहज़ाब के दौरान की बात है। जब मुसलमान क़ुरैश और दूसरे कबीलों से मदीना का बचाव कर रहे थे।    

  एक नौजवान ने अपने घर जाने की इजाज़त मांगी, तो आप ﷺ ने फरमाया के हथियार लेकर जा क्योंकि मुझे बनू-क़ुरैज़ा का डर है (जिन्होंने दगा बाज़ी की थी और मौका देख कर मुशरिकों के साथ हो गए थे)  

📚  सहीह मुस्लिम 5839

मुवत्ता इमाम मालिक में वर्णित हदीस:-

  एक नौजवान ने अपने घर जाने की इजाज़त मांगी, तो आप ﷺ ने फरमाया के हथियार लेकर जा क्योंकि मुझे बनू–क़ुरैज़ा का डर है वो तुम्हें नुकसान पहुंचा सकते हैं।  

📚 मुवत्ता इमाम मालिक किताब 54 हदीस 33 /अरबी हवाला किताब 54 हदीस 1798

जारी है...!!!

■■■■


क्या बनू क़ुरैज़ा ने राजद्रोह किया?  


7️⃣  बनू क़ुरैज़ा का मदीना की औरतों और बच्चों पर हमलावर होने की कोशिशें  

  बनू-क़ुरैज़ा ने अपना समझौता तोड़ने के बाद मुसलमानों को एक और मानसिक आघात दिया, वो ये कि जिस वक़्त मुसलमान मदीने से बाहर खन्दक पर अरब फौजों का सामना कर रहे थे, उस वक़्त बनू क़ुरैज़ा लगातार मदीने की औरतों और बच्चों पर हमलावर होने की कोशिश कर रहे थे।  

  इसकी एक मिसाल हजरत सफिया बिन अब्दुल मुत्तलिब रज़ि के वाकये में मिलती है।  

  इब्ने इस्हाक़ का बयान है कि हज़रत सफ़िया बिन्त अब्दुल मुत्तलिब रजि., हज़रत हस्सान बिन साबित रजि. के फ़ारेअ नामी किले के अन्दर थीं । हज़रत हस्सान औरतों और बच्चों के साथ वहीं थे । हज़रत सफ़िया रजि. कहती हैं कि हमारे पास से एक यहूदी गुज़रा और किले का चक्कर काटने लगा । यह उस वक़्त की बात है, जब बनू-कुरैज़ा रसूलुल्लाह सल्ल ० से किया हुआ वायदा-क़रार तोड़कर आपसे लड़ने पर उतर आए थे और हमारे और उनके दर्मियान कोई न था, जो हमारी रक्षा करता । रसूलुल्लाह सल्ल ० मुसलमानों समेत दुश्मन (अरब फौजों) से मुक़ाबला करने में लगे हुए थे अगर इस पर कोई हमलावर हो जाता, तो आप उन्हें छोड़कर आ नहीं सकते थे इसलिए मैंने कहा, “ऐ हस्सान ! यह यहूदी, जैसा कि आप देख रहे हैं , क़िले का चक्कर लगा रहा है और मुझे ख़ुदा की क़सम ! डर है कि यह बाकी यहूदियों को भी हमारी कमज़ोरी से आगाह कर देगा । उधर रसूलुल्लाह सल्ल ० और सहाबा किराम रजि ० इस तरह फंसे हुए हैं कि हमारी मदद को नहीं आ सकते, इसलिए आप जाइए और उसका काम तमाम कर दीजिए।”  

📚   इब्ने हिशाम 458 

    एक तरफ मदीना को ख़त्म करने के लिए अब तक कि सबसे बड़ी 10,000 लोगों की फौज खड़ी थी और वो भी मुसलमानों से तीन गुना ज़्यादा।
    
    खाने के लिए खाना कम पड़ रहा था और लोगों ने अपने पेटों पर पत्थर बांध रखे थे। यहाँ तक कि अल्लाह के रसूल ﷺ ने दो पत्थर बांध रखे थे। और दूसरी तरफ मुस्लिम फौज में मौजूद मुनाफ़िक़(कपटाचारी) फरार हो जाने के बहाने तलाश कर रहे थे।    

इस पर अल्लाह ने इरशाद फरमाया:-

  और जब कपटाचारी और वे लोग जिन के दिलों में रोग है कहने लगे, “अल्लाह और उस के रसूल ने हम से जो वादा किया था वह तो धोखा मात्र था।” और जबकि उन में से एक गिरोह ने कहा, “ऐ यसरिब वालो, तुम्हारे लिए ठहरने का कोई मौक़ा नहीं। अतः लौट चलो।” और उन का एक गिरोह नबी से यह कहकर (वापस जाने की) अनुमति चाह रहा था कि “हमारे घर असुरक्षित हैं।” यद्यपि वे असुरक्षित न थे। वे तो बस भागना चाहते थे।  

📚  सूरह अहज़ाब 33 आयत 12-13  

  और दूसरी तरफ बनू-क़ुरैज़ा ने अपना समझौता तोड़ दिया था और वो भी अब मुसलमानों से जंग करने के लिए तैयारिया शुरू कर चुके थे। और मदीना को पूरी तरह से नेस्तो-नाबूद करने के लिए पूरी तैयारियाँ हो चुकी थी।  

बनू क़ुरैज़ा की दुश्मनी का यह एक खुला सबूत था कि अब वो  मुहम्मद ﷺ के समझौते के तहत नहीं रहना चाहते हैं।  

  बल्कि आपके दुश्मन बनाना चाहते हैं।  

  आपसे लड़ना चाहते हैं।  

  आपको मदीना से निकाल देना चाहते हैं।  

  न निकले तो क़त्ल कर देना चाहते हैं। (नाउज़ुबिल्लाह)  

  दुबारा किया हुआ समझौता भी तोड़ देना चाहते हैं।  

  वो तैयार थे कि इस्लाम और मुसलमानों को मिटाने के लिए हर मुमकिन कोशिश करेंगे।  

    बनू- क़ुरैज़ा यह समझ रहे थे कि 10,000 की यह सेना जो मुसलमानों का नामो-निशान मिटाने आयी है वो ऐसा ही करके जाएगी। लेकिन अल्लाह का करना ऐसा हुआ कि यह फौज बिना लड़े ही वापस जाने पर मजबूर हो गयी।    

    अल्लाह ने उन पर तेज हवाओं का तूफान भेज दिया जिसने उनके खेमे, उखाड़ दिए हंडियां उलट दी, खेमों की खूंटिया उखाड़ दी, और उनके हौसले इस तरह पस्त हो गए कि वो अब वापस जाने को मजबूर हो गए। और मुसलमानों को मारने का सपना लिए वापस अपने घरों को लौट गए।    

बनू क़ुरैज़ा पर जंगी कार्रवाई रसूलल्लाह सल्ल. का फैसला नहीं बल्कि खुदा का फैसला था:

  जब रसूलल्लाह सल्ल. खन्दक (की जंग) से वापस आये तो आपने अपना जंगी सामान व हथियार उतारे और ग़ुस्ल करने लगे तो जिब्राईल अलै. (इन्सानी शक्ल में) आये, और वो अपने सर से धूल मिट्टी झाड़ रहे थे(जैसे वो जंग से वापस हुए हों) आपने कहा, “क्या आपने हथियार उतार दिये? खुदा की कसम हमने हथियार नहीं उतारे। उनकी तरफ कूच करो।”  

  रसूलल्लाह सल्ल. ने पूछा, “किस तरफ?”  

  जिब्राईल अलै. ने बनू क़ुरैज़ा की तरफ इशारा किया।  

  फिर रसूलल्लाह सल्ल. ने उनसे जंग की।  

  रसूलल्लाह सल्ल. के हुक्म पर वो (अपने किलों से) उतर आये तो रसूलल्लाह सल्ल. ने उनका फैसला हजरत साद बिन मआज रज़ि के सुपुर्द कर दिया।  

  उन्होंने कहा: मैं इनके बारे में फैसला करता हूँ कि इनके जंगजू मर्दों को कत्ल कर दिया जाये और बच्चों और औरतों को कैदी बना लिया जाये और इनके माल तकसीम कर लिए जायें।  

📚  सहीह मुस्लिम 4598  

  यहाँ से हम समझ सकते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्ल. ने बनू-क़ुरैज़ा के धोखा देने के बाद भी उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया था और आप आराम करने चले गए थे, इसका सबूत इस बात से मिलता है कि आपने अपने हथियार उतार दिए थे लेकिन यह घटना इतनी संगीन थी कि अल्लाह तआला ने इस पर फैसला सुनाया की बनू-क़ुरैज़ा ने जो मुसलमानों की जान के साथ खिलवाड़ किया था उसका हिसाब किताब भी अभी ही किया जाए।  

    इसके अलावा ये भी समझना जरूरी है कि अल्लाह के रसूल तकरीबन 25 दिन (इब्ने हिशाम 349) से जंगे खन्दक में व्यस्त थे, जो कि आपके जीवनकाल के सबसे कष्टदायी दिनों में से एक समय था। इस 25 दिनों के संघर्ष के बाद शारीरिक और मानसिक रूप से मुस्लिम सेना की हालात समझी जा सकती है, ये एक ऐसी जंग थी जिसमें मुसलमानों ने भूख की वजह से पेटों पर पत्थर बांधे थे और खुद अल्लाह के रसूल सल्ल. ने दो पत्थर बांधे थे। इसके ऊपर 25 दिनों का फिर से बनू क़ुरैज़ा का घेराव करना इसी वजह से घटित हुआ कि ये अल्लाह का हुक्म था और इसी वजह से अल्लाह के रसूल ने कूच करते वक़्त फरमाया:    

  “जो(आदेश) सुनने और मानने पर कायम हो वो बनू क़ुरैज़ा की तरफ कूच करे…”  

📚  मुसनद अहमद 11291  


■■■■■■■

क्या बनू क़ुरैज़ा ने राजद्रोह किया?  


8️⃣    बनू-क़ुरैज़ा ने अपना मध्यस्थ(जज) खुद चुना और बनू-क़ुरैज़ा को उनके किये का फल मिला    

    ख़न्दक़ से पलटकर जब नबी (सल्ल.) घर पहुँचे तो ज़ुहर के वक़्त जिबरील (अलैहि.) ने आकर हुक्म सुनाया कि अभी हथियार न खोले जाएँ, बनू-कुरैज़ा का मामला अभी बाक़ी है, उनसे भी इसी वक़्त निपट लेना चाहिए । यह हुक्म पाते ही नबी (सल्ल.) ने फ़ौरन एलान फ़रमाया कि “जो कोई सुनने और हुक्म मानने पर क़ायम हो वह अस्र की नमाज़ उस वक़्त तक न पढ़े जब तक बनी-कुरैज़ा के ठिकाने पर न पहुँच जाए ।”    

📚  इब्ने-हिशाम 348  

  इस एलान के साथ ही आप (सल्ल.) ने हज़रत अली (रजि.) को एक टुकड़ी के साथ फ़ौज के सिपह-सालार के तौर पर बनी–कुरैज़ा की तरफ़ रवाना कर दिया । वे जब वहाँ पहुँचे तो यहूदियों ने कोठों पर चढ़कर नबी (सल्ल.) और मुसलमानों पर गालियों की बौछार कर दी ।  

  जब हज़रत अली (रज़ियल्लाहु अ़न्हु) वहाँ पहुंचे तो बनू-क़ुरैज़ा ने अल्लाह के रसूल ﷺ के लिए गालियों की बौछार कर दी।  

📚  इब्ने-हिशाम 461  

    लेकिन यह बदज़बानी उनको इस बड़े जुर्म के बुरे अंजाम से कैसे बचा सकती थी कि उन्होंने ठीक लड़ाई के वक़्त समझौता तोड़ डाला और हमला करनेवालों से मिलकर मदीना की पूरी आबादी को तबाही के ख़तरे में डाल दिया ।    

  इब्ने कसीर की रिवायत में है कि आप सल्ल. ने बनू क़ुरैज़ा को आखिरी वक्त में भी संधि का मौका दिया तब भी वो लोग अपनी उद्दण्डता पर अड़े रहे और उन्होंने जवाब दिया, “ऐ अबुल कासिम (सल्ल.) ! आप इधर उधर की बातें न करें हम आपके सामने झुकने वाले नहीं है।”  

  आखिरकार आपने अपने सहाबा रज़ि को इस बस्ती की घेराबंदी का हुक्म दिया।  

📚  अल बिदाया वननिहाया 4/534  

    हज़रत अली (रजि.) की टुकड़ी को देखकर वे समझे थे कि ये सिर्फ धमकाने आए हैं । लेकिन जब नबी (सल्ल.) की सरबराही में पूरा इस्लामी लश्कर वहाँ पहुँच गया और उनकी बस्ती की घेराबन्दी कर ली गई तो उनके हाथों के तोते उड़ गए ।    

जब घेराव कड़ा हो गया तो यहूदियों के सरदार काब बिन असद ने उनके सामने तीन प्रस्ताव रखे:

  या तो इस्लाम कुबूल कर लें और मुहम्मद के दीन में दाखिल होकर अपनी जान, माल और बाल-बच्चों को बचा लें । काब बिन असद ने इस प्रस्ताव को रखते हुए यह भी कहा कि, “अल्लाह की क़सम ! तुम लोगों पर यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि वह वाक़ई नबी और रसूल हैं और वही हैं जिन्हें तुम अपनी किताब में पाते हो।”  

  या अपने बीवी-बच्चों को खुद अपने हाथों से क़त्ल कर दें, फिर तलवार सौंत कर नबी सल्ल ० की ओर निकल पड़ें और पूरी ताक़त से टकरा जाएं, इसके बाद या तो जीत जाएं या सबके सब मारे जाएं ।  

  या फिर अल्लाह के रसूल सल्ल ० और सहाबा किराम रजि ० पर धोखे से शनिवार के दिन पिल पड़ें, क्योंकि उन्हें इत्मीनान होगा कि आज लड़ाई नहीं होगी । ( यहूदी शरीअत-धर्म विधान में शनिवार को पवित्र माना जाता है और इस दिन युद्ध इत्यादि कार्यवाही करना निषेध समझा जाता है।) 

    लेकिन यहूदियों ने इन तीनों में से कोई भी प्रस्ताव नहीं माना, जिस पर उनके सरदार काब बिन असद ने (झल्लाकर) कहा, तुममें से किसी ने मां की कोख से जन्म लेने के बाद एक रात भी होशमंदी से नहीं गुज़ारी है ।    

    इन तीनों प्रस्तावों को रद्द कर देने के बाद बनू कुरैज़ा के सामने सिर्फ एक ही रास्ता रह जाता था कि अल्लाह के रसूल सल्ल ० के सामने हथियार डाल दें और अपनी किस्मत का फैसला आप पर छोड़ दें, लेकिन उन्होंने चाहा कि हथियार डालने से पहले अपने कुछ मुसलमान मित्रों से सम्पर्क बना लें । संभव है , पता लग जाए कि हथियार डालने का नतीजा क्या होगा ।    

📚  इब्ने-हिशाम 461-462  

घेराबन्दी की सख्ती को वे दो-तीन हफ़्तों से ज़्यादा बरदाश्त न कर सके और आखिरकार उन्होंने इस शर्त पर अपने आपको नबी (सल्ल.) के हवाले कर दिया कि औस क़बीले के सरदार सअद-बिन-मुआज़ (रजि.) उनके हक़ में जो भी फैसला कर देंगे, उसे दोनों तरफ़ के लोग मान लेंगे । उन्होंने हज़रत सअद (रजि.) को इस उम्मीद पर हकम (फ़ैसला करनेवाला) बनाया था कि जाहिलियत के ज़माने में औस और बनी-कुरैज़ा के बीच जो समझौते से बने अच्छे ताल्लुक़ात मुद्दतों से चले आ रहे थे, वे उनका लिहाज़ करेंगे और उन्हें भी उसी तरह मदीना से निकल जाने देंगे जिस तरह पहले बनी-कैनुक़ाअ और बनी-नज़ीर को निकल जाने दिया था ।

खुद औस क़बीले के लोग भी हज़रत सअद (रजि.) से माँग कर रहे थे कि उन लोगों के साथ नर्मी बरतें, जिनसे उनका समझौता है ।

  लेकिन हज़रत सअद (रजि.) अभी-अभी देख चुके थे कि पहले जिन दो यहूदी क़बीलों को मदीना से निकल जाने का मौक़ा दिया गया था, वे किस तरह सारे अरब के आस-पास के कबीलों को भड़काकर मदीना पर दस – बारह हज़ार का लश्कर चढ़ा लाए थे और यह मामला भी उनके सामने था कि इस आख़िरी यहूदी क़बीले ने ठीक बाहरी हमले के मौके पर समझौते की खिलाफवर्जी करके मदीनावालों को तबाह कर देने का क्या सामान किया था ।  

  इस फैसले पर अमल किया गया और जब बनू – कुरैज़ा की गढ़ियों में मुसलमान दाखिल हुए तो उन्हें पता चला कि अहज़ाब की जंग में हिस्सा लेने के लिए इन ग़द्दारों ने पन्द्रह सौ(1500) तलवारें, तीन सौ(300) जिरहें (कवच), दो हज़ार(2000) भाले और पन्द्रह सौ(1500) ढालें अपने पास जमा कर रखी थीं । अगर अल्लाह की मदद मुसलमानों के साथ न होती तो ये सारा जंगी सामान ठीक उस वक़्त मदीना पर पीछे से हमला करने के लिए इस्तेमाल होता जबकि मुशरिक एक साथ खन्दक पार करके टूट पड़ने की तैयारियाँ कर रहे थे । इस बात के खुल जाने के बाद तो इस बात में शक करने की कोई गुंजाइश ही न रही कि हज़रत सअद (रजि .) ने उन लोगों के मामले में जो फैसला दिया, वह बिल्कुल सही था।  

📚  गज़वा बनू क़ुरैज़ा : अल्लामा मुहम्मद अहमद बाशमैल पेज 178  

  इसके अलावा ऐसे प्रमाण भी मिलते हैं जिनसे ये साबित होता है कि बनू क़ुरैज़ा ने सिर्फ़ संधि ही नहीं तोड़ी, बल्कि मुसलमानों के दुश्मनों को हथियार भी मुहैया करवाये थे :  

“The Massacre of the Banu Quraiza, A re-examination of a tradition – [Jerusalem Studies in Arabic and Islam, (Magnes Press, Hebrew University of Jerusalem – 1986)] by, Professor Meir J. Kister, Vol. 8, page 95

  साद बिन मुआज़ रज़ि कबीला औस के सरदार थे और कबीला औस और कबीला बनू क़ुरैज़ा जाहिलियत के जमाने में हलीफ़ (मित्र) थे इसी वजह से बनू क़ुरैज़ा को उम्मीद थी कि वो उनके हक में फैसला सुनाएंग।  

  (जब हजरत साद बिन मआज़ रज़ि के हाथ की रग में लगे जख्म से खून बहना नहीं रुक रहा था तो) हजरत साद ने ने दुआ कि:  

  ऐ अल्लाह! मेरी जान उस वक़्त तक न निकालना जब तक बनू क़ुरैज़ा (के खात्मे से) मेरी आँखें ठंडी न हो जायें, फिर उनके घाव में से खून बहना रुक गया…. जब (बनू क़ुरैज़ा को आपने सजा सुना दी और उन्हें सजा मिल चुकी) तो उनकी रग खुल गई और आप शहीद हो गये।  

📚  जामेअ तिर्मिज़ी 1582  

    इसमें ये बात भी ध्यान रखनी चाहिए कि इस वक़्त मदीने के प्रशासक मुहम्मद सल्ल. थे और अगर आप चाहते तो हजरत साद को इस बात का बिल्कुल मौका न देते और अपना फैसला सुना देते लेकिन इतनी विकट परिस्थितियों में भी अल्लाह के रसूल सल्ल. ने इसका फैसला बनू क़ुरैज़ा के पुश्तैनी मित्र हजरत साद के सुपुर्द किया और उन्हीं के फैसले को मान्यता दी।    

    फिर साद बिन मुआज़ (रज़ियल्लाहु अ़न्हु) को बुलवाया गया। उनके हाथ जंगे खंदक के दौरान तीर लग गया था जिसकी वजह से बहुत खून बह गया और बनू-क़ुरैज़ा का मामला पूरा होने के बाद आपकी वफ़ात हो गयी।    

इस घटना का वर्णन हमें हदीस में कुछ इस तरह मिलता है:-

  अबू सईद खुदरी (रद़ियल्लाहु अ़न्हु) ने बयान किया कि कुरैज़ा के यहूदी हज़रत साद बिन मुआज़ को सालिस(मध्यस्थ) बनाने पर तैयार हो गये तो रसूलुल्लाह ﷺ ने उन्हें बुला भेजा। जब वो आए तो आँहज़रत ﷺ ने फर्माया कि अपने सरदार के लेने को उठो या यूँ फरमाया कि अपने में सबसे बेहतर शख्स को लेने के लिये उठो। फिर वो हुज़ूरे अकरम ﷺ के पास बैठ गये और आँहज़रत ﷺ ने फ़र्माया कि बनी-कुरैज़ा के लोग तुम्हारे फैसले पर राज़ी होकर (क़िले से) उतर आए हैं (अब तुम क्या फैसला करते हो) हज़रत साद (रद़ियल्लाहु अ़न्हु) ने कहा कि, “फिर मैं ये फैसला करता हूँ कि इनमें जो जंग के क़ाबिल हैं उन्हें क़त्ल कर दिया जाए और इनके बच्चों और औरतों को कैद कर लिया जाए।” आँहज़रत ﷺ ने फ़र्माया कि आपने वही फैसला किया जिस फैसले को फ़रिश्ता लेकर आया था और जो अल्लाह का हुक्म था ।  

📚  सहीह बुखारी 6262, 3043, 3804, 4121  

एक हदीस जिसका आधा हिस्सा हमने ऊपर बयान किया है उसमें भी इस घटना का वर्णन मिलता है:-

  अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ि कहते हैं कि बनू नज़ीर और बनू क़ुरैज़ा ने अल्लाह के नबी सल्ल. से शांति समझौता तोड़ कर लड़ाई मोल ली। इस पर आप सल्ल. ने कबीला बनू नजीर को जिला वतन कर दिया लेकिन बनू क़ुरैज़ा को जिला वतन नहीं किया यानी मदीने में रहने दिया और इस तरह उन पर अहसान फरमाया। फिर बनू क़ुरैज़ा ने वापस जंग की शुरुआत की। इसलिए आपने उनके मर्दों को कत्ल करवाया और औरतों बच्चों और माल को मुसलमानों में तकसीम किया। लेकिन उनमें से कुछ जो रसूलल्लाह सल्ल. की पनाह में आ गए थे उन्हें बख्श दिया गया और उन्होंने इस्लाम कबूल कर लिया। अल्लाह के रसूल सल्ल. ने तमाम यहूदियों को जिला वतन कर दिया था। इनमें बनू कैनकाअ भी शामिल थे जो हजरत अब्दुल्लाह बिन सलाम रज़ि का कबीला था। बनू हारिसा और बाकी तमाम यहूदी क़बीलों को भी।  

📚 सहीह बुखारी 4028
📚 सहीह मुस्लिम 4592
📚 सुनन अबु दाऊद 3005

ऊपर वर्णित हदीसों ये बात स्पष्ट हो जाती है::

◆ बनू-क़ुरैज़ा ने अपना जज खुद चुना था जिन्होंने उनका फैसला किया था।

◆ इस फैसले में बनू-क़ुरैज़ा के उन्ही लोगों को कत्ल किया जो जंग करने में सक्षम थे।

◆बाकी बच्चे और औरतों को गुलाम बना लिया गया।

◆ और कुछ लोगों को बरी कर दिया गया, जिन्होंने अल्लाह के रसूल ﷺ से पनाह ले ली थी और वो इस्लाम ले आये थे।

तौबा करने वालो के बारे में क़ुरआन कहता है:-

  “मगर जो लोग तौबा कर लें तुम्हारे उन पर क़ाबू पा लेने से पहले तो जान लो कि अल्लाह बख़्शने वाला, मेहरबान है।”  

📚  क़ुरआन 5:34  

बाकी जिन औरतों और बच्चों को गुलाम बनाया गया, इस मुद्दे को तफ्सील से समझने और इस्लाम और गुलामी के बारे में सही जानकारी के लिए इस पोस्ट को पढ़ें:

http://almawridindia.org/islam-aur-gulami/

  

■■■■■■■

क्या बनू क़ुरैज़ा ने राजद्रोह किया?  

9️⃣  बनू-क़ुरैज़ा का फैसला उनकी किताब तौरात (Old Testament) के आधार पर किया गया  

  साद बिन मुआज़ ने जो फैसला किया वो फैसला भी यहूदियों की अपनी किताब के मुताबिक फैसला था। और साद बिन मुआज़ को जज भी यहूदियों ने ही चुना था कि ये जो फैसला करेंगे वो हम सभी मानेगे और इसी पर अल्लाह के रसूल ﷺ भी संतुष्ट थे।  

  चूंकि साद बिन मुआज़ रज़ि. यहूदियों की किताब के आलिम थे, तो यहूदियों का फैसला भी इनकी किताब के ठीक मुताबिक हुआ जो कुछ इस तरह था और आज भी मौजूद है।  

וְאִם לֹ֤א תַשְׁלִים֙ עִמָּ֔ךְ וְעָשְׂתָ֥ה עִמְּךָ֖ מִלְחָמָ֑ה וְצַרְתָּ֖ עָלֶֽיהָ וּנְתָנָ֛הּ יְהוָ֥ה אֱלֹהֶ֖יךָ בְּיָדֶ֑ךָ וְהִכִּיתָ֥ אֶת כָּל זְכוּרָ֖הּ לְפִי חָֽרֶב רַ֣ק הַ֠נָּשִׁים וְהַטַּ֨ף וְהַבְּהֵמָ֜ה וְכֹל֩ אֲשֶׁ֨ר יִהְיֶ֥ה בָעִ֛יר כָּל־ שְׁלָלָ֖הּ תָּבֹ֣ז לָ֑ךְ וְאָֽכַלְתָּ֙ אֶת שְׁלַ֣ל אֹיְבֶ֔יךָ אֲשֶׁ֥ר נָתַ֛ן יְהוָ֥ה אֱלֹהֶ֖יךָ לָֽךְ

But if the city makes no peace with you, but makes war against you, then you shall besiege it; and when the Lord your God gives it into your hand you shall put all its males to the sword, but the women and the little ones, the cattle, and everything else in the city, all its spoil, you shall take as booty for yourselves; and you shall enjoy the spoil of your enemies, which the Lord your God has given you.

📚 Deuteronomy 20:12-14

  जब तू किसी नगर से युद्ध करने को उनके निकट जाए, तब पहिले उस से सन्धि करने का समाचार दे।  

  और यदि वह सन्धि करना अंगीकार करे और तेरे लिये अपने फाटक खोल दे, तब जितने उस में होंवे सब तेरे आधीन हो कर तेरे लिये बेगार करने वाले ठहरें।  

  परन्तु यदि वे तुझ से सन्धि न करें, परन्तु तुझ से लड़ना चाहें, तो तू उस नगर को घेर लेना;  

  और जब तेरा परमेश्वर यहोवा उसे तेरे हाथ में सौंप दे तब उस में के सब पुरूषों को तलवार से मार डालना।  

  परन्तु स्त्रियां और बालबच्चे, और पशु आदि जितनी लूट उस नगर में हो उसे अपने लिये रख लेना; और तेरे शत्रुओं की लूट जो तेरा परमेश्वर यहोवा तुझे दे उसे काम में लाना।  

📚  व्यवस्थाविवरण 20:10-14  

  यही वजह थी कि जब फैसला हुआ तो किसी भी यहूदी ने इस पर चूँ-चरा नहीं कि और सब ने इसको ज्यों का त्यों ही मान लिया।  

एक इस्लामिक स्कॉलर ‘मार्टिन लिंग्स’ ने अपनी किताब: “Muhammad: his life based on the earliest sources“, के पेज नंबर 232 पर एक हाशिया (Footnote no. 1) लगाया, जिसमें उन्होंने लिखा कि:

  “…हज़रत सअ़द इब्ने मआ़ज़ (रद़ियल्लाहु अ़न्हु) ने जो फ़ैसला किया था, वो यहूदियों ही के कानून के अनुसार था. जैसा कि Duet. 20:12 में है…!”  

फिर इसी बात को समर्थन किया एक ईसाई स्कौलर ‘Daniel C. Peterson’ ने अपनी किताब ‘Muhammad, Prophet of God‘ के पेज नंबर 127 पर. ‘Daniel C. Peterson’ अपनी इसी किताब के पेज नंबर 127 के Footnote no. 6 पर लिखते हैं:

“Perhaps, with some apologetic intent, the late English scholar Martin Lings notes, correctly, that Sa’d judgment accords with that of the law of Moses as recorded in Deut. 20:10-14…..!”

  “क्षमा के साथ! शायद इंग्लिश स्कौलर ‘मार्टिन लिंग्स’ ने सही लिखा है कि हज़रत सअ़द इब्ने मआ़ज़ (रद़ियल्लाहु अ़न्हु) का फ़ैसला, मूसा (अ़लैहिस्सलाम) के क़ानून के अनुसार ही था, जो ‘व्यवस्थाविवरण 20:10-14’ में वर्णित है…!”  

हजरत साद रज़ि का फैसला ऐन यहूदी कानून के मुताबिक था, ये हैरतअंगेज बात है कि जो यहूदी या ईसाई इस घटना पर ऐतराज करते है वो तौरात के इस फैसले से नजरें चुराते हैं।

    अगर ये फैसला इतना ही निंदनीय है तो सबसे पहले उन्हें ये अध्याय अपनी धार्मिक किताब से निकाल कर फेंकने चाहिए। इस घटना का असल दोष तो यहूदियों के कानून पर आना चाहिए न कि मुहम्मद सल्ल. या उनके मानने वालों पर।    

जारी है ...!!!


■■■■■

क्या बनू क़ुरैज़ा ने राजद्रोह किया?  

 
1️⃣0️⃣ क्या बनू क़ुरैज़ा के सारे मर्दों को क़त्ल कर दिया गया? 

 इस घटना को तोड़ मरोड़ कर पेश करने वाले लोगों का एक हथकंडा ये भी है कि वो इस जंगी कार्यवाही को नरसंहार/ Genocide की तरह पेश करते हैं, लेकिन जब ऐतिहासिक प्रमाणों को देखा जाता है तो ये बात सूरज की तरह रोशन हो जाती है कि उनका ये दावा सिर्फ तथ्यों के साथ छेड़छाड़ की उपज है, जिसका वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं। 

 इस्लाम की नहीं अपितु इस संसार की सबसे प्रमाणिक किताब क़ुरआन में इस घटना के बारे में साफ बयान मिलता है कि उनमें से एक गिरोह को ही क़त्ल किया गया, पूरी आबादी को नहीं। 

अल्लाह का इरशाद है:

  फिर अहले किताब में से जिन लोगों ने हमला करनेवालों का साथ दिया था, अल्लाह उनके किलों से उन्हें उतार लाया और उनके दिलों में उसने ऐसा रौब डाल दिया कि आज उनमें से एक गिरोह को तुम क़त्ल कर रहे हो और दूसरे गिरोह को क़ैद कर रहे हो।  

📚 (सूरह अहजाब 33:26)

इसी तरह अहादीस की किताबों में भी स्पष्ट शब्दों में बयान है कि

  उन (बनू क़ुरैज़ा) में से कुछ रसूलल्लाह सल्ल. की पनाह में आ गए थे तो उन्हें बख्श दिया गया और उन्होंने (बाद में) इस्लाम क़बूल कर लिया।  

📚 (बुखारी 4028, अबू दाऊद 3005)

 गौर करने वाली बात ये है कि अगर उस कौम का इस तरह नरसंहार होता जिस तरह आलोचक बयान करते हैं तो क्या बाकी बची कौम के लोग इस्लाम कबूल करते? इस्लाम में जबरन धर्म परिवर्तन निषेध है, और इस मौके पर कई यहूदीयों को मदिने से बाहर भी निकाला गया। अगर ये चाहते तो अमान(संरक्षण) हासिल करने के बाद दूसरे क़बीलों के साथ मदीने से जा सकते थे, लेकिन इन लोगों का इस्लाम कबूल करना साफ जाहिर करता है कि वो खुद जानते थे कि उनके कबीले के जुर्म के बावजूद उन्हें अमान मिल जाना ही इस बात की निशानी है कि ये न्याय कोई आम इन्सान नहीं बल्कि खुदा और उसका रसूल ही कर सकता है। 

इन संरक्षण पाने वाले लोगों में जिनका वर्णन प्रमुखता से मिलता है, वो ये हैं:

  जाबिर बिन बाता क़ुरज़ी नामी शख्श ने हज़रत साबित बिन कैस अंसारी पर जंग के मौके पर एहसान किया था तो उन्हें अल्लाह के रसूल सल्ल. ने न सिर्फ माफ किया बल्कि उन्हें बीवी बच्चों समेत उनकी जमीन जायदाद भी लौटाने का हुक्म दे दिया। लेकिन अपनी कौम के सरदारों की मौत की खबर सुन कर जाबिर बिन बाता ने खुद मौत को गले लगा लिया। इसके बाद भी रसूलल्लाह सल्ल. ने उनके घर वालों को आजाद कर दिया और उनकी जमीन जायदाद उनके बेटे को लौटा दी, सिवाय हथियारों के।  

📚  (किताब अल मगाज़ी – वाक़द  पज 254-255)

 इस वाकिये से साफ हुआ कि जाबिर को रसूलल्लाह सल्ल. ने माफ कर दिया था और लेकिन उन्होंने खुद मरना पसन्द किया। 

 अगली बात, इस वाकिये से ये भी साफ हो जाती है कि जाबिर का परिवार धोखाधड़ी में शामिल था और उन्होंने हथियार जमा कर रखे थे। जिसकी वजह से उन पर भी मुसलमानों के खिलाफ साजिश का मुक़द्दमा लगता था और सजा के पात्र थे। लेकिन इस पर भी रसूलल्लाह सल्ल. ने सिर्फ उन्हें माफ किया बल्कि जाबिर के बेटे को उनकी सारी सम्पत्ति लौटा दी। 

 इस्लामी विद्वानों ने बनू क़ुरैज़ा के उन लोगों के नामों का जिक्र किया है जिन्होंने मुसलमानों के खिलाफ धोखाधड़ी में साथ नहीं दिया तो उन्हें जिंदा छोड़ दिया गया। 

दूसरी सदी हिजरी के मशहूर विद्वान इमाम शाफ़ई लिखते हैं:

  उन(बनू क़ुरैज़ा) में से सभी ने रसूलल्लाह सल्ल. और सहाबा रज़ि के खिलाफ षड्यंत्र में हिस्सा नहीं लिया था। लेकिन उन्होंने षड्यंत्रकारीयों का समर्थन किया और उन्हें (अपने से) अलग नहीं किया। सिवाय चंद लोगों के जिनके इस अमल से उनकी जान और माल बच गये।  

📚 किताबुल उम्म Al-Shafi’i. al-Umm, n.p. 1321; repr. Kitab al-Sha’b, 1968, volume 4, page 107

📚 The Massacre of the Banu Quraiza. A re-examination of a tradition – [Jerusalem Studies in Arabic and Islam (Magnes Press, Hebrew University of Jerusalem – 1986)] by, Professor Meir J. Kister, 8, page 67

शैख मुहम्मद ग़ज़ाली लिखते हैं:

  बनू क़ुरैज़ा का घेराव 25 दिन चला जिसके दौरान जिन यहूदियों ने खन्दक की जंग के दौरान रसूलल्लाह सल्ल. के साथ धोखाधड़ी से इन्कार कर दिया था, उन्हें मुसलमानों ने (बख्श दिया) और उनकी वफादारी के बदले उन्हें मन मुताबिक जाने के लिए छोड़ दिया।  

📚 फ़िक़्ह उस्सीराह पेज 346

प्रसिद्ध विद्वान मौलाना मौदूदी ने लिखा है:

  बनू क़ुरैज़ा के कैदियों में से आपने जाबिर बिन बाता और अम्र बिन साद (या सुदा) की जान बख्श दी थी। …  

📚 तफहीमुल क़ुरआन, सूरह मुहम्मद अध्याय 47 आयत 4 टीका 8

📚  इब्ने हिशाम 463 

रेसिट हायलामाज़ लिखते हैं:

  साद बिन मुआज़ रज़ि का फैसला पूरे कबीला बनू क़ुरैज़ा पर लागू नहीं हुआ। उनमें से जो किशोर थे जैसे अतिया क़ुरज़ी, रिफाअ बिन शमवाल, अम्र बिन साद, इब्ने सयया के बेटे सलाबा और उसैद, और उनके चचेरे भाई असद बिन उबैद वगैरह इन नेक लोगों को छोड़ दिया गया।  

📚 The Prophet Muhammad, The Sultans of Hearts, by Resit Haylamaz volume 2, page 133

इसे इमाम तबरी ने भी अपनी तारीख में नकल किया है

  रिफाआ बिन शमूएल क़ुरज़ी, जो एक बालिग शख्स थे उन्हें भी सलमा बिन्ते कैस रज़ि की सिफारिश पर अमान दी गई थी।  

📚 तारीखे तबरी 1/246

जारी है ...!!!

■■■■■

क्या बनू क़ुरैज़ा ने राजद्रोह किया?  

 1️⃣1️⃣    बनू क़ुरैज़ा की घटना पर आलोचक ये भी आपत्ति करते हैं कि इसमें बच्चों को क़त्ल किया गया    

 
    ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार केवल युद्ध करने वाले पुरुष ही मारे गए थे। जो लोग जंग में सक्रिय रूप से भाग लेते थे और मुसलमानों के खिलाफ लड़ते थे, उन्हें ही क़त्ल किया गया। ऐतिहासिक दस्तावेज बतातें हैं:    

बुखारी की रिवायत में है कि

  हजरत साद बिन मुआज रज़ि ने फैसला सुनाया कि, “इनमें से जो जंग के क़ाबिल हैं उन्हें क़त्ल कर दिया जाये और इनके बच्चों और औरतों को कैद कर लिया जाए।”  

📚 सहीह बुखारी 6262 
📚 सहीह मुस्लिम 4592 
📚 सुनन अबु दाऊद 3005

इमाम वाक़िदी ने लिखा है:

  बनू कुरैजा के सिपाहियों को तलवार से क़त्ल किया गया..  

📚 तारीख व मग़ाज़ी वाक़िदी पेज 260

इमाम बलजारी लिखते हैं :

  आखिर में उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया और उन्होंने साद बिन मुआज़ अल-औसी को अपने मध्यस्थ के रूप में मान लिया। जिन्होंने फरमान दिया कि हर जवान क़त्ल किया जाये।  

📚 किताब फुतुह अल बिलदान जिल्द 1 पेज 40

ऊपर बयान की गए रिवायतों को पढ़ने से, यह बात स्पष्ट हो जाती है, केवल  वयस्क “योद्धा” मर्दों, जो मुसलमानों के खिलाफ युद्ध में भाग लेते थे, उन्हें क़त्ल ही किया गया।  

इसके अलावा हमें हजरत अतिया कुरज़ी, जो कि बनू क़ुरैज़ा के एक बच्चे थे, की बयान की गई रिवायतों को गौर से पढ़ना चाहिए,

उन्होंने कहा:

  जिन दिनों हजरत साद रज़ि ने बनू क़ुरैज़ा के बारे में फैसला सुनाया, मैं बच्चा था। उन्हें मेरे बारे में शक हुआ( कि ये बालिग है या नहीं) लेकिन जब उन्होंने देखा की मेरी शर्मगाह पर बाल नहीं थे तो मुझे छोड़ दिया गया। देख लो अब मैं तुम्हारे बीच में मौजूद हूँ।  

📚 सुनन नसाई हदीस 3460 📚 जामेअ तिर्मिज़ी 1584

इन रिवायत से साफ हो जाता है कि बनू क़ुरैज़ा के बच्चों को क़त्ल नहीं किया गया, साथ ही दूसरी रिवायतों (जैसे मुसनद अहमद 5100, 6080) के साथ पढ़ने से ये मालूम होता है कि जिन लड़को के बारे में शक था उन्हीं के शर्म गाह के बाल देखे गए। एक रिवायत में है कि  उन बच्चों को भी क़त्ल नहीं किया गया जिन्हें स्वप्नदोष नहीं होता था।  (सुनन नसाई 3459)

इस घटना के जनसंहार होने पर प्रश्न करते हुए विद्वान बरकत अहमद ने उन छोटी बड़ी घटनाओं को सूचीबद्ध किया है, जिन पर उस वक़्त के यहूदीयों, ईसाईयों या बहुदेववादियों की तरफ से आक्षेप किया गया था।

बरकत अहमद लिखते हैं:

  बनू क़ुरैज़ा की घटना सुलह हुदैबिया और खैबर विजय से पहले हुई थी। ये असम्भव था कि बहुदेववादी और कपटाचारी(मुनाफिक) इस घटना पर चुप बैठ जाते। जब अब्दुल्लाह बिन जहश द्वारा पवित्र महीनों में (नखला की) झड़प की और उसमें खूंरेजी की, जब बनू नजीर के खजूरों के पेड़ जलवा दिये गये, जब नबी सल्ल. ने अपने मुंहबोले बेटे की विधवा से विवाह किया। तो लोगों ने इसकी आलोचना की और क़ुरआन ने रसूलल्लाह सल्ल. की तरफ से पक्ष रखा। ये असम्भव बात थी कि पैगम्बर सल्ल. के घोर विरोधी बनू क़ुरैज़ा के ‘नरसंहार’ को बनू नजीर के खजूरों के पेडों से कम महत्व देते। और इस ‘नरसंहार’ की खबर सीरिया के जेरुसलम और अज़रात में नहीं पहुंची जहाँ मदीना के यहूदियों के घनिष्ठ संबंध थे, और न ही इराक के जिलावतन यहूदियों(Exilarchate) तक ये खबर पहुँची, जिन्हें मदीने के यहूदियों पर धार्मिक सत्ता हासिल थी।  

📚 Muhammad and the Jews: A Re-examination, [New Delhi: Vikas, 1979], by Barakat Ahmad, page 93 – 94

इसके अलावा अगर रसूलल्लाह सल्ल. की उन आदर्शों को देखा जाए जिन्हें उन्होंने युद्ध जैसी विकट परिस्थितियों में भी स्थापित किया तो ये बात साफ हो जाती है कि बच्चों को क़त्ल करना खुदा के पैगम्बर की प्रतिष्ठा के खिलाफ था।

इसके उदाहरण निम्न प्रकार हैं:

  एक जंग के मौके पर एक औरत की लाश देखकर पैगम्बर सल्ल. ने आदेश दिया कि औरतों और बच्चों को कत्ल न किया जाये।  

📚बुखारी 3015, 
📚मुस्लिम 4548, 
📚अबू दाऊद 2668,
📚तिर्मिज़ी 1569

युद्ध के लिए जाने वाली इस्लामी सेना को पैगम्बर सल्ल. ये आदेश देते थे:

  मरणासन्न बूढ़ों को न मारना, न ही बच्चों को मारना, न छोटे लड़कों को मारना और न औरतों को मारना, सुलह करना और नेकी करना बेशक अल्लाह नेकी करने वालों को पसन्द करता है।  

📚 सुनन अबू दाऊद 2614

पहले खलीफा हजरत अबू बक्र रज़ि जब किसी जंगी मुहिम को रवाना करते तो उस सेना के सेनापति को ये 10 बातें नसीहत करते:

  औरतों, बच्चों और बूढ़े लोगों को न मारना।  

  किसी फलदार दरख़्त को न काटना।  

  किसी बस्ती को न उजाड़ना।  

  खाने की जरूरत के अलावा किसी बकरी या ऊँट को भी मत मारना।  

  किसी खजूर के दरख़्त को मत जलाना/ किसी मधुमक्खी के छत्ते को मत जलाना।  

  गनीमत के माल में चोरी न करना और न ही बुजदिली दिखाना।  

📚 मुवत्ता मालिक किताब 21 हदीस 10 – 881

📚 इस्लाम में युद्ध सम्बन्धित नियमों को विस्तार से जानने के लिये लेख पढ़ें::

https://hindiquranohadees.wordpress.com/2020/05/23/7953/

जारी है ...!!!


■■■■■■■

क्या बनू क़ुरैज़ा ने राजद्रोह किया?  

  1️⃣2️⃣ यहूदी विरोधी पूर्वाग्रह (Anti-Semitism) का आरोप  

 
    एक और झूठ आलोचकों और इस्लाम का विरोध करने वालों की तरफ से फैलाया जाता है कि बनू-क़ुरैज़ा को नस्ल और जातिवादी घृणा के आधार पर मार दिया गया।    

    लेकिन यह बस एक सफेद झूठ के अलावा और कुछ नही है। जैसा कि हमने ऐतिहासिक प्रमाणों को देखा उनसे मालूम हुआ कि बनू-क़ुरैज़ा के कुछ लोगों को क़त्ल किया गया जो इस विश्वासघाती अपराध में न सिर्फ शामिल थे बल्कि उन्होंने मुसलमानों से किया हुआ समझौता तोड़ा और मुसलमानों के दुश्मन को हथियार, खाना और रसद भेज कर मुसलमानों के खिलाफ दुश्मनों की मदद की थी।    

    पैगंबर मोहम्मद सल्ल. के समय से मुस्लिम और अरब यहूदी सदियों से शांति और सद्भाव में रह रहे हैं।    

    वास्तव में हमारे पास ऐसे प्रामाणिक ऐतिहासिक सबूत हैं जहां बनू-कुरैजा घटना के बाद भी पैगंबर सल्ल. ने यहूदियों के साथ हमेशा प्यार, मेहरबानी और रहमदिली का मामला किया।    

  1). इस्लाम धर्म ने कभी भी अपने अनुयायियों को यहूदी नस्ल पर हिंसा का पाठ नहीं पढ़ाया। अरब और यहूदियों के बीच सशस्त्र हिंसा का दौर 1948 के राजनैतिक हालात की वजह से तूल पकड़ा वरना अरब के क्षेत्र में कई सदियों तक मुस्लिम, ईसाई और यहूदी साथ रहते हुए आये थे।  

  2). क़ुरआन हमें बताता है कि यहूदियों के बनाया हुआ खाना मुसलमान के लिए हलाल है और मुसलमानों का बनाया खाना यहूदीयों के लिए हलाल है। (क़ुरआन सूरह मायदा 5:5)  

    3). इस्लाम यह भी कहता है कि एक मुसलमान पर यहूदियों में जितने भी नबी और रसूल जैसे मूसा,सुलैमान और दाऊद (अलै.) इत्यादि आये हैं उन सब पर ईमान लाना और उनका सम्मान करना अनिवार्य है तभी एक शख्स मुसलमान हो सकता है।    

📚 (क़ुरआन सूरह बक़रह 2:136, 2:285, सूरह आले इमरान 3:84)

4). रसूलल्लाह सल्ल. यहूदियों के शव को भी सम्मान देते थे।

  अबी लैला से रिवायत है कि हज़रत कैस बिन साद और सहल बिन हनीफ रज़ि. कादसिया में मौजूद थे के इन के पास से एक जनाज़ा गुजरा तो वो दोनों खड़े हो गए इस पर इन दोनों से कहा गया के वो इस जमीन के (जिम्मी काफिर) लोगों में से है तो इन दोनों ने कहा :- “रसूलल्लाह सल्ल. के पास से एक जनाज़ा गुजरा तो आप सल्ल. खड़े हो गए,आप सल्ल से अर्ज़ किया गया, ये तो यहूद का जनाज़ा है तो आप सल्ल. ने फरमाया क्या ये एक नफ़्स(इंसान/आत्मा) नहीं।”  

📚 सहीह बुखारी 1312, सहीह मुस्लिम 2225, सुनन नसाई 1922

  हम नबी ए अकरम सल्ल. के साथ थे अचानक हमारे पास से एक जनाज़ा गुजरा तो आप इस के लिए खड़े हो गए फिर जब हम उसे उठाने के लिए बढ़े तो मालूम हुआ के ये किसी यहूदी का जनाजा है हम ने अर्ज़ किया; “अल्लाह के रसूल सल्ल. ये तो किसी यहूदी का जनाज़ा है”, तो आप सल्ल. ने फरमाया; मौत डरने की चीज़ है, लिहाजा जब तुम जनाज़ा देखो तो खड़े हो जाओ।  

📚 सहीह बुखारी 1311, सुनन अबु दाऊद 3174

  हज़रत जाबिर रज़ि. बयान करते हैं के नबी सल्ल. और आप के सहाबा रज़ि. एक यहूदी के जनाज़े को देख कर खड़े हो गए जो पास से गुजरा था यहां तक कि वो नज़रों से ओझल हो गया।  

📚 सुनन नसाई 1929

5) अल्लाह के रसूल सल्ल यहूदियों पर जातिगत टिप्पणी करने से मना करते थे:

  अल्लाह के रसूल सल्ल. की एक बीवी हज़रत सफिया रज़ि. यहूदी थी। एक बार आप सल्ल. की बीवी हज़रत हफ़सा रज़ि. ने “यहूदी की बेटी” कह दिया था, जिस पर अल्लाह के रसूल सल्ल. ने हज़रत हफ़सा रज़ि. को अल्लाह से डरने का कहा।  

  उम्मुल मोमिनीन सफ़िया रज़ि. के पास यह बात पहुंची की उम्मुल मोमिनीन हफ़सा रज़ि. ने उन्हें “यहूदी की बेटी” होने का ताना दिया है। तो वो रोने लगी, नबी ए अकरम सल्ल. इन के पास आये तो वो रो रही थी, आप ने पूछा “तुम क्यों रो रही हो?” तो उन्होंने कहा “हफ़सा ने मुझे ये ताना दिया है के मैं यहूदी की बेटी हूँ” तो नबी ए अकरम सल्ल. ने फरमाया : “तू एक नबी की बेटी है और तेरा चाचा भी नबी है और तू एक नबी कि बीवी है तो वो किस बात में तुझ पर फख्र कर रही है। फिर आप ने (हफ़सा रज़ि. से) से फरमाया : हफ़सा! “अल्लाह से डर।”  

📚 जामेअ तिर्मिज़ी 3894

    6) इसी तरह से क़ुरआन हमे बताता है कि एक मुस्लिम मर्द यहूदी औरत से शादी कर सकता है (सूरह मायदा 5:5) जिससे कि मुसलमानों और यहूदियों के बीच रक्त संबंध बने और आपस में दया और सद्भाव का माहौल बने।    

    7) पैगम्बर सल्ल. यहूदियों से व्यापार और लेन देन भी किया करते थे, एक बार आप सल्ल. ने एक यहूदी के पास अपना कवच गिरवी रखा और उस यहूदी से खाना लिया।    

  इब्राहीम नखई के मजलिस में हम ने उधार के लेन-देन में सामान गिरवी रखने का ज़िक्र किया तो उन्होंने कहा कि मुझ से असवद ने और उन्होंने आयशा रज़ि. से बयान किया के नबी करीम सल्ल. ने एक यहूदी से कुछ गेहूँ एक मुद्दत मुकर्रर करके आधा खरीदा और अपनी लोहे की एक ज़िरह(कवच) उस के पास गिरवी रखी।  

📚 सहीह बुखारी 2068

8) मुहम्मद सल्ल. ने यहूदी और मुसलमान दोनों को एक साथ सलाम किया

और जोर देकर कहा कि एक मुस्लिम को सबको सलाम करने चाहिए:

  नबी ए अकरम सल्ल. एक ऐसी सभा के पास से गुजरे जिस में मुसलमान और यहूदी दोनों थे तो आप ने उन्हें सलाम किया।  
📚  जामेअ तिर्मिज़ी 2702

  इब्ने अब्बास रज़ि. कहते हैं “जो कोई भी हो यहूदी, ईसाई या मजूसी(अग्निपूजक या बहुदेववादियों) सलाम करने वाले को सलाम लौटाओ। क्योंकि अल्लाह कहता है ; “जब तुमको सलाम किया जाए तो तुम भी सलाम का जवाब दो उससे बेहतर अंदाज़ में या जवाब में वही कह दो”(क़ुरआन 4:86)  

📚 अल-अदब अल-मुफ़्रद किताब 44; 1107

दूसरी रिवायत में है कि

  अल्लाह के रसूल सल्ल. का गुजर एक ऐसी संयुक्त सभा पर हुआ जिसमें मुस्लिम, बहुदेववादी और यहूदी शामिल थे तो आपने उन से सलाम किया।  

📚 रियाजुस्सालिहीन किताब 6, हदीस 868

9) अल्लाह के रसूल के भी सहाबा यहूदियों से व्यापारिक लेन देन किया करते थे, और मदीना में उन्हें व्यापारिक अधिकार दिए गए :

  अल्लाह के रसूल सल्ल. के एक सहाबी जाबिर रज़ि. ने एक यहूदी से कुछ पैसे उधार लिए थे। इस शर्त पर की खुज़ूर आने पर यहूदी को पैसे वापस कर दूंगा। यहूदी आया और अपने पैसे मांगने लगा लेकिन जाबिर रज़ि. पैसे लौटा न सके इस कि खबर जब अल्लाह के रसूल. को लगी तो आप ने वहाँ पहुंच कर यहूदी को बार-बार समझाया की जाबिर रज़ि. पैसे अगले साल लौटा देंगे लेकिन यहूदी नहीं माना फिर अल्लाह के रसूल सल्ल. ने जाबिर रज़ि. को हुक्म दिया कि खुज़ूर तोड़ो और कर्ज अदा करो, फिर जाबिर रज़ि. ने बड़ी मेहनत से खुज़ूर तोड़ी और कर्ज अदा किया।  

📚 सहीह बुखारी 5443, 2396 सुनन नसाई 3669

    इन हदीस के यह बात समझ आती है कि मदीना में मुहम्मद सल्ल. के पास पूरी ताकत और अधिकार था अगर आप चाहते तो यहूदी से कह सकते थे कि जब पैसे होंगे तब उसका उधार क़र्ज़ दिया जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ, आप सल्ल. ने उस यहूदी का सम्मान किया और उसी के तय शुदा वक्त में उसका क़र्ज़ अदा करवाया। यहां से मालूम होता है कि मुसलमान और यहूदी दोनों के अधिकार किस तरह अदा किए जाते थे। यहूदियों के साथ कभी नाइंसाफी नहीं होती थी ये हमारे नबी सल्ल. बेहतरीन अखलाक था जो हर किसी के लिए समान था।    

10) यहूदियों के रसूलल्लाह सल्ल. के साथ अपमानजनक रवैये बावजूद उन पर अत्याचार नहीं किया गया

  मदीना में कुछ यहूदी जो मुहम्मद सल्ल. के समय मे आपको अपमानित करने के लिए, जब भी आपको सल्ल. को देखते तो कहते “अस-सामु-अलैकुम यानी आप पर मौत हो” (नाउजुबिल्लाह). जब हज़रत आएशा रज़ि. ने ये बात सुनी तो बहुत गुस्सा हुई और जवाब दिया कि “तुम पे मौत हो और तुम हलाक हो”!  

  अल्लाह के रसूल सल्ल. ने हज़रत आएशा रज़ि. को समझाया कि, “नरमी से काम ले और कहें कि अल्लाह हर मामले में नर्मी को पसन्द करता है।”  

हज़रत आएशा रज़ि. बयान करती हैं कि

  कुछ यहूदी रसूलल्लाह सल्ल. की ख़िदमत में हाज़िर हुए और कहा “अस-सामु-अलैकुम यानी आप पर मौत हो” मैं इन की बात समझ गयी और मैं ने जवाब दिया “वा-अलैकुम अस-सामू वल-लअन यानी (तुम पर मौत हो और अल्लाह की लानत हो)”,  

  नबी करीम सल्ल. ने फरमाया: “आएशा सब्र से काम ले क्योंकि अल्लाह तआला सभी मामलों में नरमी को पसंद करता है” मैं ने अर्ज़ किया : या रसूलल्लाह! “क्या आप ने नहीं सुना के उन्होंने क्या कहा था?” नबी करीम सल्ल. ने फरमाया के मैं ने उनको जवाब दे दिया था कि “वालैकुम” “और तुम्हें भी।”  

📚 सहीह बुखारी 6256

11). बनू क़ुरैज़ा की घटना के सालों बाद भी अल्लाह के रसूल सल्ल. के साथी यहूदियों से मुहब्बत और एहसान का रवैया रखते थे:

  रसूलल्लाह सल्ल. की शिक्षाओं के अनुसार उनके सहाबा(अनुयायी/साथी) पड़ोसी के अधिकार को बहुत ही नरम दिली से अदा करते थे और अपना खाना उनके साथ बांट कर खाते थे।  

  मुजाहिद बयान करते हैं अब्दुल्लाह बिन अम्र रज़ि. के लिए उनके घर में एक बकरी ज़िबह की गई जब वो आये तो पूछा ; “क्या तुम लोगों ने हमारे यहूदी पड़ोसी के घर (गोश्त का) हदिया भेजा?” “क्या तुम लोगों ने हमारे यहूदी पड़ोसी के घर (गोश्त का) हदिया भेजा?” मैं ने रसूलल्लाह को फरमाते हुए सुना है : “मुझे जिब्राइल अलै. पड़ोसी के साथ हमेशा हुस्ने सुलूक( सर्वश्रेष्ठ आचरण) करने की हमेशा ताकीद करते रहे यहाँ तक के मुझे लगने लगा कि ये उसे वारिस बना देंगे।”  

📚 जामेअ तिर्मिज़ी 1943

  मुजाहिद रज़ि. बयान करते हैं के अब्दुल्लाह बिन अम्र रज़ि. ने एक बकरी ज़िबह की तो (घर वालों) से कहा; “क्या तुम लोगों ने मेरे यहूदी पड़ोसी को हदिया भेजा?”(न भेजा हो तो भेज दो) मैं ने रसूलल्लाह सल्ल. से सुना है आप फरमाते थे ; जिब्राइल मुझे बराबर पड़ोसी, के साथ हुस्ने सुलूक की वसीयत फरमाते रहे यहाँ तक के मुझे गुमान गुजरा के वो उसे वारिस बना देंगे।  

📚 सुनन अबू दाऊद 5152

यहाँ एक बार फिर ये साबित होता है कि हमारे नबी सल्ल. का व्यवहार हर किसी के साथ कितना बेहतरीन था चाहे वो किसी भी धर्म से संबंधित हो, सबके साथ एक जैसे व्यवहार से पेश आया करते थे।

12) मुहम्मद सल्ल. बीमार यहूदीयों की बीमारपुर्सी किया करते थे :

  एक यहूदी लड़का बीमार पड़ा तो नबी सल्ल. उस के पास इयादत(उसका हाल पूछने) के लिए आये और उस के सराहने बैठ गए फिर उस से फरमाया : “तुम मुसलमान हो जाओ”, उस ने अपने बाप की तरफ देखा जो उस के सराहने था तो उस से उस के बाप ने कहा : “अबुल क़ासिम! की इताअत करो”, वो मुसलमान हो गया, आप सल्ल. ये कहते हुए उठ खड़े हुए: “तमाम तारीफें उस ज़ात के लिये है जिस ने इस को मेरी वजह से आग से नजात दी।”  

📚 सुनन अबू दाऊद 3095

13) यहूदी भी मुहम्मद सल्ल. के बेहतरीन व्यवहार से प्रभावित थे

 और ये इस बात का सबूत था मुहम्मद सल्ल. अगर यहूदियों के दुश्मन होते तो यहूदी उनके रिश्तेदारों के साथ भला बर्ताव न करते :

 अली बिन अबी तालिब रज़ि., फातिमा रज़ि. के पास आये तो हसन और हुसैन रज़ि. रो रहे थे तो उन्होंने पूछा: “ये दोनों क्यों रो रहे हैं?” फातिमा रज़ि. ने कहा: “भूख ( की वजह से रो रहे हैं)” अली रज़ि. बाहर निकले तो बाजार में एक दीनार पड़ा पाया, वो फातिमा रज़ि. के पास आये और उन्हें बताया तो उन्होंने कहा : “फ़्लाँ यहूदी के पास जाएं और हमारे लिए आटा ले लीजिए” चुनांचे वो यहूदी के पास गए और उससे आटा खरीदा। तो यहूदी ने पूछा : “तुम उस के दामाद हो जो कहता है कि वो अल्लाह का रसूल है?” वो बोले हाँ! उसने कहा : “अपना दीनार रख लो और आटा ले जाओ।”  

📚 सुनन अबु दाऊद 1716

14) यहूदियों को 500 साल बाद मुसलमानों ने येरुशलम में आने की अनुमति दिलवाई

  रसूलल्लाह सल्ल. की शिक्षाओं का ही एक उदाहरण ये भी है कि जब येरुशलम दूसरे खलीफा हजरत उमर रज़ि के दौर में मुस्लिम शासन के अधीन आ गया तो तकरीबन 500 साल बाद यहूदियों को ईसाइयों की इच्छा के विपरीत येरुशलम में आने की इजाज़त दी गई, क्योंकि वो भी येरुशलम को धार्मिक स्थान मानते थे।  

📚 तारीखे तबरी जिल्द 2 पेज 418

Armstrong, Karen, Sacred Space: The Holiness of Islamic Jerusalem, Journal of Islamic Jerusalem studies (no 1, V ol.l, Winter 1997 AD), p. 14, (Hereinafter cited as: Armstrong, Sacred Space)

    इन सभी हदीसों से यह बात साबित होती है कि अल्लाह के रसूल सल्ल. हर इंसान के साथ रहमदिली का मामला करते थे। हर किसी से प्यार और सम्मान से पेश आते थे। अल्लाह के रसूल सल्ल. कभी किसी से नफरत नहीं करते थे यह आप के स्वभाव से खिलाफ बात थी। और जो लोग मुहम्मद सल्ल. पर यहूदी विरोधी होने का इल्जाम लगाते हैं उसकी वजह बस ये है कि वो अपने व्यक्तिगत लाभ के लिये आप सल्ल. के महान चरित्र को पर सवालिया निशान लगाते हैं।    

    एक बात यह भी गौर करने वाली है कि अल्लाह के रसूल सल्ल. के समय मे जितनी जंगे लड़ी गयी उन में मरने वालों की संख्या कितनी रही।    

    इस्लामी इतिहास के प्रसिद्ध विद्वान डॉ. हमीदुल्लाह साहब ने अपनी किताब पैग़म्बरे अमन सल्ल. में अल्लाह के रसूल सल्ल. की जिन्दगी में हुई जंगो और झड़पों में मरने वाले मुस्लिम और गैर मुस्लिम लोगों की संख्या का हिसाब लगाया है, जिसमें सारी गणना के बाद लिखते हैं:    

  पैग़म्बरे अमन की दस साल की मदनी जिन्दगी में हुई 82 जंगी कार्यवाहीयों में दोनों तरफ से मरने वाले लोगों की तादाद 1161 है।  

  इन 82 कार्यवाहीयों में इतनी हैरतअंगेज कम तादाद उस जमाने में है जब इन्तेक़ाम दर इन्तेक़ाम की शक्ल में होने वाली लम्बी जंगों में लाखों इंसानों की हलाकत एक मामूली बात समझी जाती थी।  

📚 पैग़म्बरे अमन पेज 90

जारी है ...!!!

■■■■■■

क्या बनू क़ुरैज़ा ने राजद्रोह किया?  

  मुकम्मल पोस्ट इस लिंक से पढ़ें  
https://hindiquranohadees.wordpress.com/2020/05/27/banu-quraiza/

1️⃣3️⃣  राजद्रोह के मामले में अंतरराष्ट्रीय कानून  

    ये बात स्पष्ट हो जाती है कि ये मामला नस्ली पक्षपात का नहीं बल्कि विश्वासघात और राजद्रोह का था।    

    रोजद्रोह के बारे में विभिन्न देशों में विभिन्न प्रकार की सजायें हर काल में मौजूद रही है।    

    ये बात नहीं भूलनी चाहिए हमारे भारत के संविधान के साथ अन्य देशों के संविधान में भी राज्य के खिलाफ कार्यवाही करने पर कानून मौजूद है।    

  भारतीय दंड संहिता की धारा 124 A के अनुसार,  

  “बोले या लिखे गए शब्दों या संकेतों द्वारा या दृश्य प्रस्तुति द्वारा, जो कोई भी भारत में विधि द्वारा स्थापित सरकार के प्रति घृणा या अवमान पैदा करेगा या पैदा करने का प्रयत्न करेगा, असंतोष (Disaffection) उत्पन्न करेगा या करने का प्रयत्न करेगा, उसे आजीवन कारावास या तीन वर्ष तक की कैद और ज़ुर्माना अथवा सभी से दंडित किया जाएगा।”  

    ब्रिटेन में 2010-2011 तक राजद्रोह का कानून मौजूद था, जिसके अनुसार    

  ब्रिटेन के सम्राट, उसके वंशजो, मौजूदा सरकार, के खिलाफ नफरत और द्वेष फैलाने वाला राजद्रोह का आरोपी ठहरता है।  

    नीदरलैंड की दंडसंहिता के अनुच्छेद 111-113 के अनुसार    

  सम्राट और उसके जीवनसाथी और सन्तान पर अभद्र टिप्पणी करने पर कारावास की सजा का प्रावधान है।  

    नॉर्वे देश की दंडसंहिता के अध्याय 9 खण्ड 98 के अनुसार   

  नॉर्वे की कानून (व्यवस्था) में विदेशी ताकतों की मदद से भय के प्रसार या सशस्त्र विद्रोह करने वाले को 21 साल कारावास की सजा दी जाएगी।  

  सम्राट या किसी किसी राजनायक की हत्या करने या हत्या का प्रयास करने या इसमें मदद करने वाले को 21 साल की सजा का प्रावधान है। (खण्ड 100)  

    नॉर्वे के संविधान के अनुच्छेद 5 के अनुसार:    

  सम्राट की पदवी/शख्सियत पवित्र है। जिसकी निंदा नहीं की जाएगी या न ही आरोप लगाने की अनुमति है।  

 🛑🛑  सारांश   🛑🛑

उपर्युक्त विवरण का सारांश निम्न बिंदुओं से समझा जा सकता है:

◆ अल्लाह के रसूल ﷺ के मदीना में आते ही यहूदियों ने खुली दुश्मनी का ऐलान कर दिया था। उम्मुल मोमिनीन हज़रत सफिया बिन्ते हुई बिन अखतब का बयान और अब्दुल्लाह बिन सलाम (रज़ि.) का इस्लाम लाने की घटना इसका स्पष्ट प्रमाण है।

◆ इस दुश्मनी के बावजूद भी अल्लाह के रसूल ﷺ ने मदीने में अमन-चैन और सुख-शांति बनी रहे इसलिए यहूदियों से शांति समझौता(Peace Treaty) कर लिया था, जिसे समझौते को वर्तमान इतिहासकार भी मानते हैं।

◆ यहूदियों को मालूम था कि यही रसूल ﷺ हमारे भी रसूल हैं फिर भी उन्होंने झूठ बोला और हठधर्मी पर अड़े रहे।

◆ यहूदियों की मुसलमानों को लड़वाने, उन्हें नुकसान पहुचाने और किसी भी तरह नामों निशान मिटा देने की साजिशें हमेशा जारी रहती थी, जिसका एक नमूना बूढ़े यहूदी की साजिश को देख सकते हैं।

◆ बनू-क़ुरैज़ा और बनू-नज़ीर दोनों ने मिल कर अल्लाह के रसूल ﷺ से किया समझौता तोड़ा और आपके विरुद्ध लड़ाई की, जिसमे बनू- नज़ीर जिलावतन हुए और बनू-क़ुरैज़ा के साथ फिर शांति-समझौता(Peace Treaty) किया गया।

◆ बनू-नज़ीर के सरदार ने जब जंग-ए-अहज़ाब (जंग-ए-खंदक) के लिए मदीना पर 10,000 सैनिकों की सेना, मदीने को नेस्तो नाबूद करने के लिए ला खड़ी की तो इसमे बनू-क़ुरैज़ा ने भी उसका साथ दिया, शांति-समझौता (Peace Treaty) तोड़ दिया और जंग की और यहाँ तक कि मदीना के दुश्मनों को खाना भी पहुँचाया।

◆ जब बनू-क़ुरैज़ा के इस विश्वासघात का पता लगाने के लिए आप ﷺ ने कुछ सहाबा को बनू-क़ुरैज़ा के पास भेजा तो बनू-क़ुरैज़ा ने बड़ी ढिठाई और दुष्टता दिखाई। उन्होंने एलानिया गालियां बकी, दुश्मनी की बातें की और अल्लाह के रसूल ﷺ की तौहीन की। कहने लगे, अल्लाह का रसूल कौन ? हमारे और मुहम्मद ﷺ के बीच न क़ौल है न करार।

◆ बनू क़ुरैज़ा के इस विश्वासघात की वजह से मुसलमानों को जंग-ए-अहज़ाब (जंग-ए-खंदक) में बहुत-सी मुसीबतों का सामना करना पड़ा।

◆ बनू-क़ुरैज़ा के किले का घेराव करने पर, बनू- क़ुरैज़ा ने हथियार डाल दिये।

◆ बनू-क़ुरैज़ा ने साद बिन मुआज़ (रज़ि.) को अपना मध्यस्थ(जज) खुद चुना।

◆ साद बिन मुआज़ (रज़ि.) ने बनू-क़ुरैज़ा का फैसला उनकी किताब से किया जिस पर सब राज़ी थे। यहूदी और मुसलमान दोनों।

इस सारे विवरण के बाद स्पष्ठ हो जाता है कि देशद्रोह और राजद्रोह के संदर्भ में जो दंड दिया जाता है यह घटना उसी तरह की एक घटना है। जब कोई राज्य के लोगों को मरवाने पर तुला हो तो उनका दंड इस दंड के इतर और कुछ नही हो सकता है। इसे यहूद धर्म से दुश्मनी, नरसंहार, बर्बरता का नाम देना बुद्धिहीन और विवेकहीन लोगों की निशानी है जिन्हें मानव इतिहास और विश्व समाज की कम जानकारी है अथवा उन्होंने सब जानकर भी इस्लाम से द्वेष में अपनी आंखें बंद कर रखी है।

आशा है कि यह उत्तर इस प्रश्न के लिए संतुष्ट करने वाला होगा।

धन्यवाद



No comments:

Post a Comment

मस्जिदे अक्सा।

मस्जिद ए अक्सा अथवा बैतुल मुकद्दस इस्लाम की तीसरी सबसे महत्वपूर्ण मस्जिद है, बुखारी शरीफ मे नबी करीम सल्ल. की एक हदीस के अनुसार मस्जिद ए अक्...