Friday, 15 January 2021

काफ़िर से दोस्ती।

*सवाल* :-
*एक मुसलमान किसी गैर मुस्लिम के साथ भाईचारा कैसे रख सकता है, जबकि क़ुरआन में उसे काफिर यानी गैर मुस्लिम से दोस्ती ना करने का और उससे जिहाद करने का आदेश मिला है?*
                     
                    भाग- 1/2
*जवाब-*:- दोस्तो,जो काफिर ईश्वर भक्त मुसलमानों से नहीं लड़ते, उनके लिए बुरी युक्तियां नहीं करते, परन्तु उनके साथ शांति से रहना चाहते हैं, उन काफिरों (गैर मुस्लिमों) के लिए क़ुरआन का साफ आदेश देखें-

*"जो लोग तुमसे तुम्हारे धर्म के बारे में नहीं लड़ते और न तुम्हें घरों से निकालते, उन लोगों (गैर मुस्लिमों) के साथ सद व्यवहार करने और उनके साथ न्याय से पेश आने से ख़ुदा तुम्हें मना नहीं करता, बेशक ख़ुदा इन्साफ़ करने वालों को दोस्त रखता है।"*
*(सुरः मुमतहीना 60:8)*

दोस्तों, क़ुरआन की यह एक आयत ही आपत्ति करने वालों के जवाब में बहुत है। लेकिन आपत्ति करने वाले कह सकते है कि-

*"क्या पैग़म्बर मुहम्मद (स०) और उनके सहाबा (अनुयायियों) ने इस आयत का पालन किया है?"*

जी हाँ, नबी और उनके अनुयायियों की तो पूरी ज़िंदगी ही ग़ैर मुस्लिमों के साथ भलाई करते बीती है। युद्ध तो उन्होंने सिर्फ अत्याचारियों से किए हैं, और अधिकतर तो उन्हें भी माफ ही किया है।
आइये इसके कुछ चंद नमूने आम आपके सामने रखते हैं।

*"एक दिन नबी ने देखा कि एक गैर मुस्लिम गुलाम आटा पीस रहा है और दर्द से कराह रहा है, आप उसके पास गए तो पता चला कि वो बहुत बीमार है और उसका मालिक उसको छुट्टी नहीं देता। नबी ने उसको आराम से लिटा दिया और सारा आटा स्वयं पीस दिया, और कहा, "जब तुम्हें आटा पीसना हो तो मुझे बुला लिया करो।"*
(सहीह अब्दुल मुफ़रद 1425)

*"एक देहाती ने मस्जिद में पेशाब कर दिया, लोग उसे पीटने के लिए दौड़े, तो नबी ने उनको रोक कर कहा-" इसे छोड़ दो और इसके पेशाब पर पानी डाल दो इसलिए कि तुम सख्ती करने वाले नहीं, आसानी करने वाले बनाकर भेजे गए हो।"*
(सहीह बुखारी, किताबुल वुजू)

*"एक बार नबी के एक अनुयायी किसी बात पर अपने गैर मुस्लिम गुलाम को मार रहे थे, संयोग से नबी ने देखा तो दुखी होकर कहा: "जितना अधिकार तुम्हें इस गुलाम पर है, अल्लाह को तुम पर इससे ज़्यादा अधिकार है।" इतना सुन कर वो डर कर बोले, "ऐ नबी, मैं इस गुलाम को आज़ाद कर देता हूँ, तो नबी ने कहा: "यदि तुम ऐसा ना करते तो नर्क की आग तुमको ज़रूर छूती।"*
(अबू दाऊद, किताबुल अदब)

नबी ने कभी किसी गैर मुस्लिम पर ज़ुल्म नहीं होने दिया, हमेशा न्याय से काम लेते।

*"एक बार एक गैर मुस्लिम का एक मुसलमान से झगड़ा हो गया, तो फैसले के लिए दोनों पक्ष नबी के पास आये, दोनों के बयान सुनकर नबी ने फैसला गैर मुस्लिम के हक़ में दिया।"*

*"पैग़म्बर मुहम्मद (स०) गैर मुस्लिमों के तोहफे भी कुबूल करते थे, और उनको तोहफे भी देते थे। ऐला के हाकिम ने आपको एक सफेद खच्चर तोहफे में दिया, आपने उसे कुबूल किया और उसकी तरफ एक चादर भिजवाई।"*
(सहीह बुखारी, कितबुज़्ज़कात)

*"ईसाइयों का एक प्रतिनिधि मंडल मदीना आया तो नबी ने उनकी खूब मेहमानदारी की और उनको मस्जिद में ठहराया, और साथ ही मस्जिद में उन्हें उनके अपने तरीके पर इबादत करने की अनुमति भी दी।"*
(सहीह मुस्लिम, किताबुल अदब)
(अलबिदाया वन्निहाया, भाग-3, पेज नंबर 105)

नबी का आदेश था कि *"वो मुस्लिम नहीं हो सकता जो खुद पेट भर कर खाये और उसका पड़ोसी (मुस्लिम या गैर मुस्लिम) भूखा रहे।"*
(सहीह अदबुल मुफ़रद 82)


इस्लामिक देशों में रहने वाले गैर मुस्लिमों को इस्लाम की परिभाषा में "ज़िम्मी" कहा जाता है, और मुसलमानों को नबी का साफ आदेश है-

*"जिसने किसी ज़िम्मी (ग़ैर मुस्लिम) पर अत्याचार किया, उसका हक़ मारा, उसकी ताक़त से ज़्यादा उस पर बोझ डाला या उसकी इच्छा के बिना उसकी कोई चीज़ ले ली तो मैं क़यामत के दिन उसकी और से दावा करूँगा।"*
(अबू दाऊद, बैहक़ी भाग-5, पेज नंबर 205)

*"एक मुसलमान ने एक ज़िम्मी (गैर मुस्लिम) को क़त्ल कर दिया, तो हज़रत उमर ने अपने एक गवर्नर को आदेश दिया कि उस मुसलमान को उस ज़िम्मी के करीबी रिश्तेदार के सामने ले जाओ फिर चाहे तो वो उसे माफ करदे या जान से मार दे और उस रिश्तेदार ने उस मुसलमान की गर्दन काट दी।"*

दोस्तों, ये था न्याय और पैग़म्बर मुहम्मद की मृत्युपरान्त आपके सहाबा भी ज़िम्मी (गैर मुस्लिमों) की इज़्ज़त, आबरू, माल, दौलत, और धार्मिक स्वतंत्रता का बड़ा ध्यान रखते थे-
*"हज़रत उमर (रज़ि०) विभिन्न क्षेत्रों से आने वाले प्रतिनिधि मंडल से पूछा करते थे, कि किसी मुसलमान की वजह से किसी ज़िम्मी (गैर मुस्लिम) को कष्ट तो नहीं दिया जा रहा।"*
(तारीखे तबरी, भाग-4, पेज 218)



भाग - 2 आगे ज़ारी......



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कुछ गैर मुस्लिम भाई और मुस्लिम भाई को अपने अज्ञानता स्वरुप लगता है की गैर मुस्लिम भाइयो से दोस्ती करना इस्लाम में माना है ये लोग अक्सर एक आयद को कोड करके लोगो को बरगलाने की कोसिस करते है 

सवाल-क्या गैर मुस्लिमो से दोस्ती हराम हे ?

जवाब-
जिस आयत पर आक्षेप किया जाता है उसका सही अनुवाद यह है।

“ईमानवालों को चाहिए कि वे ईमानवालों के विरुद्ध काफिरों को अपना संरक्षक मित्र न बनाएँ, और जो ऐसा करेगा, उसका अल्लाह से कोई सम्बन्ध नहीं…” [सूरह आले इमरान, आयत 28]

इस आयत में जो अरबी शब्द “अवलिया” आया है। उसका मूल “वली” है, जिसका अर्थ संरक्षक है, ना कि साधारण मित्र। अंग्रेजी में इसको “ally” कहा जाता है। जिन काफिरों के बारे में यह कहा जा रहा है उनका हाल तो इसी सूरह में अल्लाह ने स्वयं बताया है। सुनिए।

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَتَّخِذُوا بِطَانَةً مِنْ دُونِكُمْ لَا يَأْلُونَكُمْ خَبَالًا وَدُّوا مَا عَنِتُّمْ قَدْ بَدَتِ الْبَغْضَاءُ مِنْ أَفْوَاهِهِمْ وَمَا تُخْفِي صُدُورُهُمْ أَكْبَرُ ۚ قَدْ بَيَّنَّا لَكُمُ الْآيَاتِ ۖ إِنْ كُنْتُمْ تَعْقِلُونَ

“ऐ ईमान लानेवालो! अपनों को छोड़कर दूसरों को अपना अंतरंग मित्र न बनाओ, वे तुम्हें नुक़सान पहुँचाने में कोई कमी नहीं करते। जितनी भी तुम कठिनाई में पड़ो, वही उनको प्रिय है। उनका द्वेष तो उनके मुँह से व्यक्त हो चुका है और जो कुछ उनके सीने छिपाए हुए है, वह तो इससे भी बढ़कर है। यदि तुम बुद्धि से काम लो, तो हमने तुम्हारे लिए निशानियाँ खोलकर बयान कर दी हैं।” [सूरह आले इमरान, आयत 118]

आप ही कहिए, ऐसे काफिरों से किस प्रकार मित्रता हो सकती है? यह तो एक स्वाभाविक बात है कि जो लोग हमसे हमारे धर्म के कारण द्वेष करें और हमें हर प्रकार से नुकसान पहुंचाना चाहें उन से कोई भी मित्रता नहीं हो सकती | कुरआन में गैर धर्म के भले लोगों से दोस्ती हरगिज़ मना नहीं है। सुनिए, कुरआन तो खुले शब्दों में कहता है।

لَا يَنْهَاكُمُ اللَّهُ عَنِ الَّذِينَ لَمْ يُقَاتِلُوكُمْ فِي الدِّينِ وَلَمْ يُخْرِجُوكُمْ مِنْ دِيَارِكُمْ أَنْ تَبَرُّوهُمْ وَتُقْسِطُوا إِلَيْهِمْ ۚ إِنَّ اللَّهَ يُحِبُّ الْمُقْسِطِينَ ﴿٨﴾ إِنَّمَا يَنْهَاكُمُ اللَّهُ عَنِ الَّذِينَ قَاتَلُوكُمْ فِي الدِّينِ وَأَخْرَجُوكُمْ مِنْ دِيَارِكُمْ وَظَاهَرُوا عَلَىٰ إِخْرَاجِكُمْ أَنْ تَوَلَّوْهُمْ ۚ وَمَنْ يَتَوَلَّهُمْ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الظَّالِمُونَ ﴿٩

“अल्लाह तुम्हें इससे नहीं रोकता कि तुम उन लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करो और उनके साथ न्याय करो, जिन्होंने तुमसे धर्म के मामले में युद्ध नहीं किया और न तुम्हें तुम्हारे अपने घरों से निकाला। निस्संदेह अल्लाह न्याय करनेवालों को पसन्द करता है अल्लाह तो तुम्हें केवल उन लोगों से मित्रता करने से रोकता है जिन्होंने धर्म के मामले में तुमसे युद्ध किया और तुम्हें तुम्हारे अपने घरों से निकाला और तुम्हारे निकाले जाने के सम्बन्ध में सहायता की। जो लोग उनसे मित्रता करें वही ज़ालिम है।”

[सूरह मुम्ताहना; 60, आयत 8-9]

और सुनिए

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا كُونُوا قَوَّامِينَ لِلَّهِ شُهَدَاءَ بِالْقِسْطِ ۖ وَلَا يَجْرِمَنَّكُمْ شَنَآنُ قَوْمٍ عَلَىٰ أَلَّا تَعْدِلُوا ۚ اعْدِلُوا هُوَ أَقْرَبُ لِلتَّقْوَىٰ ۖ وَاتَّقُوا اللَّهَ ۚ إِنَّ اللَّهَ خَبِيرٌ بِمَا تَعْمَلُونَ

“ऐ ईमानवालो! अल्लाह के लिए खूब उठनेवाले, इनसाफ़ की निगरानी करनेवाले बनो और ऐसा न हो कि किसी गिरोह की शत्रुता तुम्हें इस बात पर उभार दे कि तुम इनसाफ़ करना छोड़ दो। इनसाफ़ करो, यही धर्मपरायणता से अधिक निकट है। अल्लाह का डर रखो, निश्चय ही जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह को उसकी ख़बर हैं।” [सूरह माइदह 5, आयत 8]

अल्लाह कभी लोगों को नहीं बाँटते। सब अल्लाह के बन्दे हैं। लोग अपनी मूर्खता और हठ से बट जाते हैं। जो लोग सत्य को स्वीकार नहीं करते वह स्वयं अलग हो जाते हैं। इसमें अल्लाह का क्या दोष?

इन आयात से स्पष्ट होता है कि कुरआन सभी गैर मुस्लिमों से मित्रता करने से नहीं रोकता। तो यह है इस्लाम की शिक्षा जो सुलह, अमन और इन्साफ की शिक्षा है।




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