Friday, 15 January 2021

हलाला, बहुपत्नी

*सवाल: हलाला क्या है और क्यों होता है?*

*जवाब:* इस्लाम में हर मसले को बड़ी तफसील से बयान किया गया है। जिस तरह शादी और निकाह करने के इस्लामी कायदे कानून है इसी तरह अगर किसी वजह से मियां बिवी में निभाह ना हो सके और वह शादी के बंधन से निकलना चाहे तो तलाक के लिए भी कुछ नियम और तरीके हैं। 

 बुनियादी तौर पर इस्लाम में निकाह/शादी एक पवित्र रिश्ता है। इसीलिए हदीस में आया है कि अल्लाह ताला के नज़दीक हलाल चीजों में सबसे ज्यादा नापसंदीदा चीज तलाक है। 

फिर भी कभी मियाँ-बीवी में बिगाड़ और रिश्ता टूटने की नोबत आये तो इस बारे में *क़ुरान* लोगों को उन दोनों के बीच सुलाह की कोशिश का हुक्म देता है :-

*_और यदि तुम्हें दोनों के बीच वियोग का डर हो, तो एक मध्यस्त उस (पति) के घराने से तथा एक मध्यस्त उस (पत्नी) के घराने से नियुक्त करो, यदि वे दोनों संधि कराना चाहेंगे, तो अल्लाह उन दोनों के बीच संधि करा देगा। वास्तव में, अल्लाह अति ज्ञानी सर्वसूचित है।_*
             *_(क़ुरान 4:35)_*

तलाक के इस पूरे प्रोसेस को संक्षिप्त में इन 6 पॉइंट में समझते हैं:-

1️⃣ अगर कोशिश करने पर भी सुलाह ना हो सके और फिर भी तलाक चाहें तो उसका सही तरीका यह है कि वह शख्स अपनी बीवी को एक बार तलाक दे दे।

2️⃣ अब इसके बाद 3 माह इद्दत का वक्त है (3 menstural cycles) इस दौरान भी अगर पति-पत्नी में बात बनती है उनका मन बदलता है तो वह फिर रूजू (साथ रहना) कर सकते हैं। इसके लिए उन्हें सिर्फ गवाहों को इत्तेला करना होगा कि हमारा निभाह हो गया है।

3️⃣ लेकिन 3 माह गुज़र जाने पर भी उनका तलाक का इरादा कायम रहा तो अब तलाक हो गई और वह दोनो एक दूसरे के निकाह से निकल गए।

4️⃣ इस के बाद भी अगर भविष्य में वे फ़िर से फिर साथ रहना चाहे तो रह सकते हैं। पर इसके लिए उन्हें दोबारा से निकाह करना होगा और इसमे कोई रोक नहीं।

5️⃣मान लीजिये अगर दोबारा निकाह हुआ और फिर से उनके बीच  तलाक की नोबत होती है तो फिर वही प्रक्रिया है ,पहले सुलाह कि कोशिश फिर ऊपर बताई प्रक्रिया 1- 4

6️⃣ऐसा ही दूसरी बार भी हो सकता है यह दूसरा तलाक होगा। अब अगर उसके बाद फिर निकाह हो गया लेकिन फिर तीसरी बार यही नोबत आगई तो अब तीसरी बार के बाद अब यह प्रक्रिया और नही दोहराई जा सकती। 


एसा इसलिए है क्योंकि शादी, सुलाह की कोशिशें और तलाक कोई मज़ाक और खेल नही है जो जीवन भर दोहराया जाता रहे। इसलिये इस कि हद कायम करना ज़रूरी है ताकि इसकी अहमियत बनी रहे। लिहाज़ा अगर 3 बार यह तलाक की प्रक्रिया हो गई तो अब उस आदमी के लिए वह औरत हराम(वर्जित) हो गई अब वह उस से निकाह नही कर सकता ।

तलाक की यह हद (3 बार)इसलिए भी मुक़र्रर की गई ताकि औरत को ऐसे ज़ालिम से छुटकारा मिल सके जो उसे बार बार निकाह में लेकर तलाक दे रहा हो और उसे कैद में रख उसकी ज़िंदगी बर्बाद कर रहा हो।जैसा इस्लाम आने से पहले किया जाता था क्योंकि तब तलाक की कोई हद मुक़र्रर नहीं थी। 

अब यह तलाक हो जाने के बाद औरत किसी और व्यक्ति से शादी करे और अपना जीवन बसर करे। इस्लाम मे तलाक औरत के लिए *end of life (ज़िंदगी का खात्मा)* नहीं है कि तलाक शुदा औरत अब विधवा जैसी ज़िंदगी गुज़ारने को मजबूर हो। बल्कि इसलाम तो यह हुक्म देता है कि *"तलाकशुदा औरत के निकाह में जल्दी करो"* ताकि वह एक सामान्य जीवन जी सके।

अगर कभी जीवन में फिर उस औरत के दूसरे पति का देहांत हो जाता है या उस पती से स्वभाविक रुप से तलाक हो जाता है। तब वह अपने पहले पति से फिर निकाह कर सकती है क्योंकि अब वह अब अपने पहले शौहर के लिए हराम नही रही।

*इस पूरी तफसील से यह बात समझ में आ गई होगी कि हलाला कोई कानून और procedure नहीं है बल्कि यह एक natural process है।*  

जिस की सम्भवतः कभी नोबत ही ना आए क्योंकि यह ज़रूरी नही के औरत  के दूसरे पति का देहांत हो जाएगा या उस से भी तलाक होगा । *चूंकि वह अब अपने पहले शोहर के लिए हलाल (शादी जाइज़) हो गई इसलिए इस प्रोसेस को हलाला कह दिया जाता है।*
 
इस कि मिसाल यह है कि अगर किसी को ठंड के मौसम में बताया जाए कि फलाँ काम बारिश का मौसम आने पर करना है। अब स्वाभाविक है कि ठंड का मौसम गुजरेगा ,फिर गर्मी का मौसम आएगा फिर 8 माह गुज़रने पर बारिश में यह काम करने का वक्त आएगा।
अब वह व्यक्ति यह करे कि ठंड में ही शॉवर चालू कर के कहने लगे कि बारिश आगई और उक्त काम कर ले। तो ना तो वह काम होगा साथ ही ऐसे व्यक्ति को नासमझ ही कहा जायेगा।

यही बात हलाला के मामले में है यह कोई procedure नही जिसे प्लान कर के किया जा सके।

जैसे अगर कोई आदमी तीन तलाक के बाद अपनी बीवी का जानबूझकर किसी दूसरे आदमी से निकाह करवाता है ताकि बाद में वह उसको तलाक दे दे और यह फिर से निकाह कर ले तो ऐसे लोगों पर *नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने सख्त  लानत(भर्त्सना) की है। ‌ हजरत उमर ने एक बार मीमबर से यह ऐलान किया कि अगर मेरे पास कोई हलाला करने वाला लाया गया तो मैं उसे कोड़े लगाऊंगा। क्योंकि यह हराम काम है और एक तरह का ज़िना( व्यभिचार) है। इसकी इस्लाम में हरगिज़ कोई गुंजाइश नहीं हो सकती।*

 मीडिया ने तीन तलाक और हलाले का इस तरह दुष्प्रचार किया है कि उसको देख कर लगता है जैसे हर मुसलमान आदमी अपनी बीवी को तीन तलाक देता है और उसका हलाला करवाता है। हालांकि इसे इस्लाम की खूबी कहिए कि मुसलमानों में तलाक की दर सबसे कम है । अगर तलाक की कहीं जरूरत पड़ती भी है तो उसका भी बहुत बेहतर तरीका इस्लाम में है और औरत के हक की हिफाज़त कर तलाक के ज़रिये ज़ुल्म से निजात का रास्ता देता है, जबकि कई धर्मों में तो तलाक का कोई प्रावधान ही नही है एक बार शादी हो गई तो जीवन भर पति की दासी बनी रहे फिर चाहे पति कुछ भी करे।

 हलाला जैसा इस्लाम में ना कोई कानून है ना कोई प्रावधान। जानबूझकर हलाला करने जैसी गंदी चीज का मुसलमानों से कोई ताल्लुक नही है। फिर भी इसलाम का दुष्प्रचार करने के लिए इस तरह की बातें की जाती हैं।

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*सवाल* - इस्लाम मे मर्द को 1 वक़्त में ऐक से ज़्यादा शादी करने की Permission है, जबकि औरत को क्यों नही है..?


*जवाब* - क़ुरान इस तरह कि कोई Permission नही देता है। और इस तरह कि Permission नहीं होना ही कितना उचित है वह आज उजागर हो चुका है ,जो कि इसलाम की सत्यता का प्रमाण है ।इस्लाम एक Natural Way of Life है और शादी ऐक सभ्य समाज के ताने बाने का नाम है। ना कि हवस को पूरा करने का। क़ुरान ने शादी के बारे में सुर:4 आयत 23,24,25 में Details में जानकारी दी है।

हम सोचे अगर 1 औरत ऐक से ज़्यादा शादी करती है। तो उसके साथ क्या समस्या पैदा हो सकती है..?

*Scientific Problem:-* 1 औरत कई मर्दो से Sex सम्बन्ध बनाति है, तो  दोनों को एड्स की संभावना है, दूसरी गुप्त बिमारियां हो सकती है,  बच्चे का शारीरिक और मानसिक विकास रुक जाता है। बच्चे पागलपन का शिकार हो सकते है। बच्चों में वंशानुगत समस्या भी हो सकती है।

2. एक मर्द औरत के मुकाबले में ज़्यादा polygamous होता है। प्राकृतिक रूप से सामान्य अवस्था मे उसके sexual cycle में कोई ब्रेक नही होता इसलिये वह 1 से ज़्यादा बीवी का बिना किसी समस्या के निर्वाहन कर सकता है।जबकि प्राकृतिक रूप से sexual cycle में मासिक कर्म और गर्भकाल आदि ब्रेक होने के कारण बिना किसी समस्या के 1 से अधिक पति रखन सम्भव नही।

3. विष्व भर में औरतों की संख्या पुरुषों से ज़्यादा होना।

*सामाजिक Problem:-*
1) बच्चों का असली बाप कौन..?
2) बच्चे किस बाप कि वसियत/जायदाद में हिस्से माँगेंगे..?
3) पतियों कि सामाजिक स्थिति/हैसियत कम ज़्यादा होने पर बच्चे अपना बाप किस को बोलेंगे..?
4) ज़ायदाद का बंटवारा कैसे होगा.?
5) जिस्मानी/शारीरिक ज़रूरत (Sex) के लिए किस तरह से सभी पतियो के पास जा सकती है, बीमारी, डिलेवरी, मंथली परेशानी पर कौन सा पति अपने नम्बर का मौका छोड़ेगा..?
6) मर्द प्राकृतिक/फ़ितरी तौर पर अधिक हिंसक होता है, उपरोक्त पॉइंट  की वजह से अत्यधिक झगड़े और हिंसा हो सकती है।
7) पति पत्नि में झगड़े/नोक झोंक होना आम बात है और बच्चे को डाँटने डपटने पर पतियों में आपस मे झगड़े सम्भव है जिसमे हत्या होना भी बड़ी बात नही है।। और भी बहुत कूछ।

अतः उपरोक्त बातों से पता चलता है कि 1 से अधिक पति रखना हर तरीके से नुकसानदेह और विनाशकारी है।




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प्र्शन~इस्लाम एक से अधिक विवाह की अनुमति क्यों देता है?

अकसर यह समझा जाता है की मुस्लिम जब चाहे एक से ज्यादा या चार शादी कर सकते है लेकिन ऐसा नही है

जहाँ तक मै जानता हु  क़ुरआन ही संसार की धार्मिक किताबो में एकमात्र किताब है जो कहती है केवल एक औरत से विवाह करो

और यदि तुम्हें आशंका हो कि तुम अनाथों (अनाथ लड़कियों) के प्रति न्याय न कर सकोगे तो उनमें से, जो तुम्हें पसन्द हों, दो-दो या तीन-तीन या चार-चार से विवाह कर लो। किन्तु यदि तुम्हें आशंका हो कि तुम उनके साथ एक जैसा व्यवहार न कर सकोंगे, तो फिर एक ही पर बस करो, या उस स्त्री (लौंड़ी) पर जो तुम्हारे क़ब्ज़े में आई हो, उसी पर बस करो। इसमें तुम्हारे न्याय से न हटने की अधिक सम्भावना है
(सूरह:4 आयत:3)

दूसरी कोई धार्मिक किताब ऐसी नहीं जो केवल एक औरत से विवाह का निर्देश देती है किसी भी धार्मिक किताब में हम पत्नियों की संख्या पर कोई पाबन्दी नहीं पाते चाहे रामायण,महाभारत गीता,वेद या तलमूद,बाइबिल इन पुस्तकों के अनुसार एक व्यक्ति अपनी इच्छा के अनुसार जितनी चाहे पत्नी रख सकता है बाद में हिन्दू धर्म में साधुओं ने और ईसाई धर्म में पादरियों ने पत्नियों की संख्या सीमित करके सिर्फ एक कर दिए
हिन्दू धार्मिक व्यक्तियों के पास, जैसा कि  धार्मिक पुस्तकों में वर्णन आया है,उनकी अनेक पत्नियाँ थीं राम जी के पिता राजा दशरथ की एक से अधिक पत्नियाँ थीं,  कृष्ण जी की भी अनेक पत्नियाँ थीं
ईसाइयों को भी उनकी इच्छा के अनुसार पत्नियाँ रखने की इजाज़त थी, क्योंकि बाइबिल पत्नियों की संख्या पर कोई सीमा नहीं लगाती। बस कुछ सदी पहले गिरजा ने पत्नियों की सीमा कम करके एक कर दी।
यहूदी धर्म में भी बहु-विवाह की इजाज़त है। तलमूद क़ानून के अनुसार हज़रत इब्राहीम की तीन पत्नियाँ थीं और हज़रत सुलैमान की भी अनेक पत्नियाँ थीं।

एक रिपोर्ट के मुताबिक मुस्लिम से ज्यादा हिन्दू भाई अधिक पत्नियाँ रखते हैं
सन् 1975 ई॰ में प्रकाशित ‘इस्लाम में औरत का स्थान कमेटी’ की रिपोर्ट में पृष्ठ संख्या 66, 67 में बताया गया है कि 1951 ई॰ और 1961 ई॰ के मध्य हिन्दु भाइयो में बहु-विवाह 5.06 प्रतिशत था जबकि मुस्लिमो में  4.31 प्रतिशत था। भारतीय क़ानून में सिर्फ मुस्लिमो को ही एक से अधिक पत्नी रखने की अनुमति है और बाकियो  के लिए एक से अधिक पत्नी रखना भारत में गै़र क़ानूनी है। इसके बावजूद हिन्दू भाइयो में मुस्लिमो से ज्यादा बहुविवाह पाई जाती है

पहले हिन्दु भाइयो पर भी इसकी कोई पाबंदी नहीं थी। कई पत्नियाँ रखने की उन्हें अनुमति थी। ऐसा सन् 1954 ई॰ में हुआ जब हिन्दू विवाह क़ानून लागू किया गया जिसके तहद हिन्दु भाइयो को बहु-विवाह की अनुमति नहीं रही और इसको ग़ैर-क़ानूनी क़रार दिया गया। जहाँ तक मेरी नॉलेज हाउ यह भारतीय क़ानून है जो हिन्दु धर्म पर एक से अधिक पत्नी रखने पर पाबंदी लगाता है, न कि धार्मिक ग्रंथ।

अब आइए इसकी चर्चा करते हैं कि इस्लाम एक पुरुष को बहु-विवाह की अनुमति क्यों देता है?

कु़रआन सीमित बहु-विवाह की अनुमति देता है
क़ुरआन ही एकमात्र धार्मिक किताब है जो निर्देश देता है कि ‘केवल एक (औरत) से विवाह करो।

अपनी पसंद की औरत से विवाह करो दो, तीन या चार, लेकिन अगर तुम्हें यह भय हो कि तुम उनके प्रति समान न्याय नहीं कर सकते तो तुम केवल एक (औरत) से ही विवाह करो
(क़ुरआन, सूरह:4 आयत:3)

क़ुरआन के अवतरित होने से पूर्व बहु-विवाह की कोई सीमा नहीं थी। बहुत से लोग बड़ी संख्या में पत्नियाँ रखते थे और कुछ के पास तो सैकड़ों पत्नियाँ होती थीं। इस्लाम ने अधिक से अधिक चार पत्नियों की सीमा निर्धारित कर दी। इस्लाम किसी व्यक्ति को दो, तीन अथवा चार औरतों से इस शर्त पर विवाह करने की इजाज़त देता है, जब वह उनमें बराबर का इंसाफ़ करने में समर्थ हो।
सूरह निसा , आयत 129 में कहा गया हैः
तुम स्त्रियों (पत्नियों) के मध्य न्याय करने में कदापि समर्थ न होगे अतः ऐसा भी न करो कि किसी से पूरी तरह फिर जाओ.
(कु़रआन, सूरह:4 आयत:129)

क़ुरआन में तो हुक़्म है ही कि अगर सब बीवियों के साथ इंसाफ़ पर क़ायम रह पे  श्योर न हो तो उसे एक से ज़्यादा शादी करनी ही नहीं चाहिये
और अगर हदीस पे ध्यान दिया जाये तो
अहादीस में ये तालीम मिलती है कि अगर मर्द के दूसरी निकाह से पहली बीवी को तकलीफ़ हो तो दूसरे निकाह से मर्द को रुक जाना चाहिये, बुख़ारी शरीफ़ में दो जगह एक सी हदीसें रिवायत की गई हैं, कि हज़रत अली रज़ि० के दूसरे निकाह के लिये बनु हिशाम बिन अल मुगीरा ने अपनी बेटी के लिये अली रज़ि० का रिश्ता मांगा पर नबी सल्ल० ने ये कहते हुए इस निकाह की इजाज़त देने से इनकार कर दिये कि जो बात मेरी बेटी (फ़ातिमा रज़ि०) को तकलीफ़ दे, वो बात मुझे तकलीफ़ देगी (बुख़ारी, किताब-62, हदीस-157),
दूसरी हदीस में अबु जहल की बेटी से हज़रत अली रज़ि० के निकाह की बात छिड़ने पर हज़रत फ़ात्मा रज़ि० इस बात की शिकायत नबी सल्ल० करती हैं और नबी सल्ल० ये फ़रमा कर उस निकाह की इजाज़त नहीं देते कि फ़ातिमा रज़ि० जिस बात से नफ़रत करती हैं, मैं भी उससे नफ़रत करता हूँ" (बुख़ारी, क़िताब-57, हदीस-76)

इन हदीसो को देखकर नतीजा ये निकलता है कि मर्द को दूसरी शादी करने से पहले अपनी पहली बीवी की इज़ाज़त जरुरी है पहली बीवी के राज़ी होने के बाद ही कोई क़दम उठाना चाहिए बहुत मुमकिन है कि अगर उसका दूसरी शादी करने का कारण जायज़ हो तो उसकी बीवी राज़ी हो जायेगी और अगर बीवी राज़ी न हो तो फिर मर्द को  दूसरी शादी करने से रुक जाना चाहिए क्योंकि अल्लाह ने तुम्हें पहले इस औरत के साथ इंसाफ़ और मोहब्बत का सुलूक करने का हुक्म दे दिया है

क़ुरआन से मालूम हुआ कि बहु-विवाह कोई आदेश नहीं बल्कि एक अपवाद है। बहुत से लोगों को भ्रम है कि एक मुसलमान पुरुष के लिए एक से अधिक पत्नियाँ रखना अनिवार्य है।
आमतौर से इस्लाम ने किसी काम को करने अथवा न करने की दृष्टि से पाँच भागों में बाँटा है
(1) फ़र्ज़’ (अनिवार्य)
(2) मुस्तहब’ (पसन्दीदा)
(3) मुबाह (जिसकी अनुमति हो)
(4) मकरूह (घृणित, नापसन्दीदा)
(5) ‘हराम’ (निषेध)
बहु-विवाह मुबाह (अनुमति) के अन्तर्गत आता है जिसकी इजाज़त और अनुमति है, आदेश नहीं है। अर्थात् यह नहीं कहा जा सकता कि एक मुस्लिम जिसकी दो, तीन या चार पत्नियाँ हों, वह उस मुस्लिम से अच्छा है जिसकी केवल एक पत्नी हो।

औरतों की औसत आयु पुरुषों से अधिक होती है
प्राकृतिक रूप से औरत एवं पुरुष लगभग एक ही अनुपात में जन्म लेते हैं। बच्चों की अपेक्षा बच्चियों में रोगों से लड़ने की क्षमता अधिक होती है। शिशुओं के इलाज के दौरान लड़कों की मृत्यु ज़्यादा होती है। युद्ध के दौरान स्त्रियों की अपेक्षा पुरुष अधिक मरते हैं। दुर्घटनाओं एवं रोगों में भी यही तथ्य प्रकट होता है। स्त्रियों की औसत आयु पुरुषों से अधिक होती है इसी लिए हम देखते हैं कि विश्व में विधवाओं की संख्या विधुरों से अधिक है।
अगर  पहली पत्नी को बच्चा ना हो रहा हो या अगर आप किसी विधवा किसी बे सहारा को सहारा देना चाहते हो तो भी दूसरी शादी कर सकते है मगर याद रहे हर हाल में पहली बीबी की इज़ाज़त होनी चाहिए

हमारे भारत में पुरुषों की आबादी औरतों से अधिक है जिसका कारण है मादा गर्भपात और कन्या-भ्रूण-हत्या
भारत उन देशों में से एक है जहाँ औरतों की आबादी पुरुषों से कम है। इसका असल कारण यह है कि भारत में कन्या भ्रूण-हत्या की अधिकता है और भारत में प्रतिवर्ष लाखो मादा गर्भपात कराए जाते हैं। यदि इस घृणित कार्य को रोक दिया जाए तो भारत में भी स्त्रियों की संख्या पुरुषों से अधिक होगी।

अमेरिका में स्त्रियों की संख्या पुरुषों से ज़्यादा है।
आप यहाँ देख सकते है
👇👇👇
https://www.statista.com/statistics/737923/us-population-by-gender/

ब्रिटेन, जर्मन,रूस,के इलावा और भी कई देश है जहाँ पर औरतो की जनख्या मर्दों से ज्यादा है
जिनमे से कुछ देशो का नाम आप यहाँ देख सकते है
👇👇👇
https://m.jagranjosh.com/general-knowledge/top-10-countries-with-highest-female-population-1537782920-1

यदि हर व्यक्ति एक औरत से विवाह करता है तब भी अमेरिका,जर्मन, ब्रिटेन,रूस जैसे कई देशो में लाखो औरते अविवाहित रह जाएँगी ।
मान लीजिये यदि इन देशो की अविवाहितों में से एक हमारी बहन हो या आपकी बहन हो तो इस स्थिति में सामान्यत उसके सामने दो विकल्प होंगे। एक तो यह कि वह किसी ऐसे पुरुष से विवाह कर ले जिसकी पहले से पत्नी मौजूद है। अगर वह ऐसा नहीं करती है तो इसकी पूरी आशंका होगी कि वह ग़लत रास्ते पर चली जाए। सभी शरीफ़ लोग पहले विकल्प को प्राथमिकता देना पसंद करेंगे।



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प्रश्न : मुसलमानों को एक से अधिक पत्नी रखने की इजाज़त क्यों है? अर्थात् इस्लाम एक से अधिक विवाह की अनुमति क्यों देता है?

उत्तर: बहु-विवाह की परिभाषा—इसका अर्थ है ऐसी व्यवस्था जिसके अनुसार व्यक्ति की एक से अधिक पत्नी अथवा पति हों। बहु-विवाह दो प्रकार के होते हैं—

1. एक पुरुष द्वारा एक से अधिक पत्नी रखना। (Polygyny)

2. एक स्त्री द्वारा एक से अधिक पति रखना। (Polyandry)

इस्लाम में इस बात की इजाज़त है कि एक पुरुष एक सीमा तक एक से अधिक पत्नी रख सकता है जबकि स्त्री के लिए इसकी इजाज़त नहीं है कि वह एक से अधिक पति रखे।

अब इस प्रश्न पर विचार करते हैं कि इस्लाम में एक आदमी को एक से अधिक पत्नी रखने की इजाज़त क्यों है?


1. पवित्र क़ुरआन ही संसार की धार्मिक पुस्तकों में एकमात्र पुस्तक है जो कहती है ‘‘केवल एक औरत से विवाह करो।’’

संसार में क़ुरआन ही ऐसी एकमात्र धार्मिक पुस्तक है जिसमें यह बात कही गई है कि ‘केवल एक (औरत) से विवाह करो’। दूसरी कोई धार्मिक पुस्तक ऐसी नहीं जो केवल एक औरत से विवाह का निर्देश देती हो। किसी भी धार्मिक पुस्तक में हम पत्नियों की संख्या पर कोई पाबन्दी नहीं पाते चाहे ‘वेद’, ‘रामायण’, ‘महाभारत’, ‘गीता’ हो या ‘तलमूद’ व ‘बाइबिल’। इन पुस्तकों के अनुसार एक व्यक्ति अपनी इच्छा के अनुसार जितनी चाहे पत्नी रख सकता है। बाद में हिन्दू साधुओं और ईसाई पादरियों ने पत्नियों की संख्या सीमित करके केवल एक कर दी।

हम देखते हैं कि बहुत से हिन्दू धार्मिक व्यक्तियों के पास, जैसा कि उनकी धार्मिक पुस्तकों में वर्णन आया है, अनेक पत्नियाँ थीं। राम के पिता राजा दशरथ की एक से अधिक पत्नियाँ थीं, इसी प्रकार कृष्ण जी की भी अनेक पत्नियाँ थीं।

प्राचीन काल में ईसाइयों को उनकी इच्छा के अनुसार पत्नियाँ रखने की इजाज़त थी, क्योंकि बाइबिल पत्नियों की संख्या पर कोई सीमा नहीं लगाती। मात्र कुछ सदी पहले गिरजा ने पत्नियों की सीमा कम करके एक कर दी।

यहूदी धर्म में भी बहु-विवाह की इजाज़त है। तलमूद क़ानून के अनुसार इब्राहीम की तीन पत्नियाँ थीं और सुलैमान की सैकड़ों पत्नियाँ थीं। बहु-विवाह का रिवाज चलता रहा और उस समय बंद हुआ जब रब्बी गर्शोम बिन यहूदा (960 ई॰-1030 ई॰) ने इसके खि़लाफ़ हुक्म जारी किया। मुसलमान देशों में रहने वाले यहूदियों के पुर्तगाल समुदाय में यह रिवाज 1950 ई॰ तक प्रचलित रहा और अन्ततः इसराईल के चीफ़ रब्बी ने एक से अधिक पत्नी रखने पर पाबंदी लगा दी।


2. मुसलमानों की अपेक्षा हिन्दू अधिक पत्नियाँ रखते हैं

सन् 1975 ई॰ में प्रकाशित ‘इस्लाम में औरत का स्थान कमेटी’ की रिपोर्ट में पृष्ठ संख्या 66, 67 में बताया गया है कि 1951 ई॰ और 1961 ई॰ के मध्य हिन्दुओं में बहु-विवाह 5.06 प्रतिशत था जबकि मुसलमानों में केवल 4.31 प्रतिशत था। भारतीय क़ानून में केवल मुसलमानों को ही एक से अधिक पत्नी रखने की अनुमति है और गै़र-मुस्लिमों के लिए एक से अधिक पत्नी रखना भारत में गै़र क़ानूनी है। इसके बावजूद हिन्दुओं के पास मुसलमानों की तुलना में अधिक पत्नियाँ होती हैं। भूतकाल में हिन्दुओं पर भी इसकी कोई पाबंदी नहीं थी। कई पत्नियाँ रखने की उन्हें अनुमति थी। ऐसा सन् 1954 ई॰ में हुआ जब हिन्दू विवाह क़ानून लागू किया गया जिसके अंतर्गत हिन्दुओं को बहु-विवाह की अनुमति नहीं रही और इसको ग़ैर-क़ानूनी क़रार दिया गया। यह भारतीय क़ानून है जो हिन्दुओं पर एक से अधिक पत्नी रखने पर पाबंदी लगाता है, न कि हिन्दू धार्मिक ग्रंथ।

अब आइए इसकी चर्चा करते हैं कि इस्लाम एक पुरुष को बहु-विवाह की अनुमति क्यों देता है?


3. पवित्र कु़रआन सीमित बहु-विवाह की अनुमति देता है

जैसा कि पहले बयान किया जा चुका है कि पवित्र क़ुरआन ही एकमात्र धार्मिक पुस्तक है जो निर्देश देती है कि ‘केवल एक (औरत) से विवाह करो’’। क़ुरआन में है—

‘‘अपनी पसंद की औरत से विवाह करो दो, तीन अथवा चार, परन्तु यदि तुम्हें भय हो कि तुम उनके मध्य समान न्याय नहीं कर सकते तो तुम केवल एक (औरत) से विवाह करो।’’ (क़ुरआन, 4:3)

क़ुरआन के अवतरित होने से पूर्व बहु-विवाह की कोई सीमा नहीं थी। बहुत से लोग बड़ी संख्या में पत्नियाँ रखते थे और कुछ के पास तो सैकड़ों पत्नियाँ होती थीं। इस्लाम ने अधिक से अधिक चार पत्नियों की सीमा निर्धारित कर दी। इस्लाम किसी व्यक्ति को दो, तीन अथवा चार औरतों से इस शर्त पर विवाह करने की इजाज़त देता है, जब वह उनमें बराबर का इंसाफ़ करने में समर्थ हो।

क़ुरआन के इसी अध्याय अर्थात् सूरा निसा अध्याय 4, आयत 129 में कहा गया हैः 

‘‘तुम स्त्रियों (पत्नियों) के मध्य न्याय करने में कदापि समर्थ न होगे अतः ऐसा भी न करो कि किसी से पूरी तरह फिर जाओ...।’’ (कु़रआन, 4:129)

क़ुरआन से मालूम हुआ कि बहु-विवाह कोई आदेश नहीं बल्कि एक अपवाद है। बहुत से लोगों को भ्रम है कि एक मुसलमान पुरुष के लिए एक से अधिक पत्नियाँ रखना अनिवार्य है।

आमतौर से इस्लाम ने किसी काम को करने अथवा न करने की दृष्टि से पाँच भागों में बाँटा है—

(i) ‘फ़र्ज़’ अर्थात् अनिवार्य।

(ii) ‘मुस्तहब’ अर्थात् पसन्दीदा।

(iii) ‘मुबाह’ अर्थात् जिसकी अनुमति हो।

(iv) ‘मकरूह’ अर्थात् घृणित, नापसन्दीदा।

(v) ‘हराम’ अर्थात निषेध।

बहु-विवाह मुबाह के अन्तर्गत आता है जिसकी इजाज़त और अनुमति है, आदेश नहीं है। अर्थात् यह नहीं कहा जा सकता कि एक मुसलमान जिसकी दो, तीन अथवा चार पत्नियाँ हों, वह उस मुसलमान से अच्छा है जिसकी केवल एक पत्नी हो।


4. औरतों की औसत आयु पुरुषों से अधिक होती है

प्राकृतिक रूप से औरत एवं पुरुष लगभग एक ही अनुपात में जन्म लेते हैं। बच्चों की अपेक्षा बच्चियों में रोगों से लड़ने की क्षमता अधिक होती है। शिशुओं के इलाज के दौरान लड़कों की मृत्यु ज़्यादा होती है। युद्ध के दौरान स्त्रियों की अपेक्षा पुरुष अधिक मरते हैं। दुर्घटनाओं एवं रोगों में भी यही तथ्य प्रकट होता है। स्त्रियों की औसत आयु पुरुषों से अधिक होती है इसी लिए हम देखते हैं कि विश्व में विधवाओं की संख्या विधुरों से अधिक है।


5. भारत में पुरुषों की आबादी औरतों से अधिक है जिसका कारण है मादा गर्भपात और कन्या-भ्रूण-हत्या

भारत उन देशों में से एक है जहाँ औरतों की आबादी पुरुषों से कम है। इसका असल कारण यह है कि भारत में कन्या भ्रूण-हत्या की अधिकता है और भारत में प्रतिवर्ष दस लाख मादा गर्भपात कराए जाते हैं। यदि इस घृणित कार्य को रोक दिया जाए तो भारत में भी स्त्रियों की संख्या पुरुषों से अधिक होगी।


6. पूरे विश्व में स्त्रियों की संख्या पुरुषों से अधिक है

अमेरिका में स्त्रियों की संख्या पुरुषों से अठत्तर लाख ज़्यादा है। केवल न्यूयार्क में ही उनकी संख्या पुरुषों से दस लाख बढ़ी हुई है और जहाँ पुरुषों की एक तिहाई संख्या सोडोमीज (पुरुष मैथुन) है और पूरे अमेरिका राज्य में उनकी कुल संख्या दो करोड़ पचास लाख है। इससे प्रकट होता है कि ये लोग औरतों से विवाह के इच्छुक नहीं हैं। ग्रेट ब्रिटेन में स्त्रियों की आबादी पुरुषों से चालीस लाख ज़्यादा है। जर्मनी में पचास लाख और रूस में नब्बे लाख से आगे है। केवल ख़ुदा ही जानता है कि पूरे विश्व में स्त्रियों की संख्या पुरुषों से कितनी अधिक है।


7. प्रत्येक व्यक्ति को केवल एक पत्नी रखने की सीमा व्यावहारिक नहीं है

यदि हर व्यक्ति एक औरत से विवाह करता है तब भी अमेरिकी राज्य में तीन करोड़ औरतें अविवाहित रह जाएँगी (यह मानते हुए कि इस देश में सोडोमीज की संख्या ढाई करोड़ है)। इसी प्रकार ग्रेट ब्रिटेन में चालीस लाख से अधिक औरतें अविवाहित रह जाएँगी। औरतों की यह संख्या पचास लाख जर्मनी में और नब्बे लाख रूस में होगी, जो पति पाने से वंचित रहेंगी।

यदि मान लिया जाए कि अमेरिका की उन अविवाहितों में से एक हमारी बहन हो या आपकी बहन हो तो इस स्थिति में सामान्यतः उसके सामने केवल दो विकल्प होंगे। एक तो यह कि वह किसी ऐसे पुरुष से विवाह कर ले जिसकी पहले से पत्नी मौजूद है। अगर वह ऐसा नहीं करती है तो इसकी पूरी आशंका होगी कि वह ग़लत रास्ते पर चली जाए। सभी शरीफ़ लोग पहले विकल्प को प्राथमिकता देना पसंद करेंगे।

पश्चिमी समाज में यह रिवाज आम है कि एक व्यक्ति पत्नी तो एक रखता है और साथ-साथ उसके बहुत-सी औरतों से यौन-संबंध होते हैं। जिसके कारण औरत एक असुरक्षित और अपमानित जीवन व्यतीत करती है। वही समाज किसी व्यक्ति को एक से अधिक पत्नी के साथ स्वीकार नहीं कर सकता, जिससे औरत समाज में सम्मान और आदर के साथ एक सुरक्षित जीवन व्यतीत कर सके।

और भी अनेक कारण हैं जिनके चलते इस्लाम सीमित बहु-विवाह की अनुमति देता है। परन्तु मूल कारण यह है कि इस्लाम एक औरत का सम्मान और उसकी इज़्ज़त सुरक्षित रखना चाहता है।######


अगले पोस्ट में इंशा अल्लाह हम पड़ेंगे । 

 यदि एक पुरुष को एक से अधिक पत्नी रखने की इजाज़त है तो इसका क्या कारण है कि इस्लाम औरत को एक से अधिक पति रखने की अनुमति नहीं देता?



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प्रश्न : यदि एक पुरुष को एक से अधिक पत्नी रखने की इजाज़त है तो इसका क्या कारण है कि इस्लाम औरत को एक से अधिक पति रखने की अनुमति नहीं देता?


उत्तर: कुछ लोग, जिनमें मुसलमान भी शामिल हैं, इस बात पर सवाल उठाते हैं कि इस्लाम मर्द को तो कई पत्नी रखने की छूट देता है जबकि यह अधिकार औरत को नहीं देता है।

सबसे पहली बात तो यह है कि इस्लामी समाज न्याय और समानता पर आधारित है। अल्लाह ने स्त्री एवं पुरुष को समान रूप से बनाया है, परंतु भिन्न-भिन्न क्षमताएँ और जि़म्मेदारियाँ रखी हैं। स्त्री एवं पुरुष मानसिक एवं शारीरिक रूप से भिन्न हैं, उनकी भूमिका और जि़म्मेदारियाँ अलग-अलग हैं। स्त्री और पुरुष दोनों इस्लाम में समान (Equal) हैं परंतु एक जैसे (Indentical) नहीं।

क़ुरआन की सूरा निसा अध्याय 4, आयत 22 से 24 में उन स्त्रियों की सूची दी गई है जिनसे विवाह नहीं किया जा सकता। और सूरा निसा अध्याय 4 आयत 24 में वर्णन है कि पहले से विवाहित स्त्रियों से विवाह करना वर्जित है।

निम्नलिखित बातें इस कारण को स्पष्ट करती हैं कि औरतों के लिए एक से अधिक पति रखना क्यों वर्जित है?

1. यदि एक व्यक्ति के पास एक से अधिक पत्नियाँ हों तो ऐसे विवाह से जन्मे बच्चे के माता-पिता का आसानी से पता लगाया जा सकता है। परंतु यदि एक औरत के पास एक से अधिक पति हों तो केवल बच्चे की माँ का पता चलेगा, बाप का नहीं। इस्लाम माँ-बाप की पहचान को बहुत अधिक महत्व देता है। मनोचिकित्सक कहते हैं कि ऐसे बच्चे मानसिक आघात और पागलपन के शिकार हो जाते हैं जो अपने माँ-बाप विशेषकर अपने बाप को नहीं जानते। अकसर उनका बचपन ख़ुशी से ख़ाली होता है। इसी कारण वैश्याओं के बच्चों का बचपन स्वस्थ नहीं होता। यदि ऐसे विवाह से जन्मे बच्चे को किसी स्कूल में प्रवेश दिलाया जाए और उसकी माँ से उस बच्चे के बाप का नाम पूछा जाए तो माँ को दो या उससे अधिक नाम बताने पड़ेंगे। 

2. पुरुषों में प्राकृतिक तौर पर बहु-विवाह की क्षमता औरतों से अधिक होती है।

3. जीव विज्ञान के अनुसार एक से अधिक पत्नी रखने वाले पुरुष के लिए एक पति के रूप में अपने कर्तव्यों का निर्वाह करना आसान होता है जबकि उसी स्थान पर अनेक पति रखने वाली स्त्री के लिए एक पत्नी के रूप में अपने कर्तव्यों का निर्वाह करना संभव नहीं। विशेषकर मासिक धर्म के समय जबकि एक स्त्री तीव्र मानसिक एवं व्यावहारिक परिवर्तन से गुज़रती है।

4. एक से अधिक पति वाली औरत के एक ही समय में कई यौन साझी होंगे जिसके कारण उसके यौन संबंधी रोगों में ग्रस्त होने की अधिक संभावना होगी और यह रोग उसके पति को भी लग सकता है यद्यपि उसके वे सभी पति उस स्त्री के अलावा अन्य किसी स्त्री के साथ वैवाहिक यौन संबंध से मुक्त हों। यह स्थिति कई पत्नियाँ रखने वाले पुरुष के साथ घटित नहीं होती।

पश्चिम के कुछ मनोवैज्ञानिकों ने, लगभग 40 वर्ष बीते, अपने अध्ययन और सर्वेक्षण का यह परिणाम प्रकाशित कराया था कि ‘पुरुष जन्मजात बहुपत्नीत्ववादी होता है (Man is born-polygynous)’। यह बात आम आदमी (पुरुष) भी स्वयं, अपने स्वभाव व प्रवृत्ति तथा भावनाओं पर थोड़ा-सा ध्यान देकर समझ सकता है। व्यावहारिक स्तर पर, बहुत सारे व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक और आर्थिक कारक (Causes) ऐसे होते हैं जो पुरुष को ‘एक ही पत्नी’ तक सीमित रखते हैं। इन कारकों से अधिक प्रवावक कारक उत्पन्न हो जाने पर, एक पुरुष बहुपत्नी रखता है वरना सामान्यतः एक ही के साथ निर्वाह करता है। स्त्रियां, अपनी प्रकृति में बहुपतिवादी (Born polyanderous) कभी नहीं होतीं (सिवाय कुछ बहुत ही कम ऐसी स्त्रियों के जिनकी प्रकृति विकृत हो जाती है।) इस पूरी अवस्था का अवलोकन और तजुरबा हर समय, हर समाज में आसानी से किया जा सकता है।

उक्त कारण ऐसे हैं जिनको आसानी से समझा जा सकता है। इनके अलावा अन्य बहुत से कारण हो सकते हैं तभी तो असीमित तत्वदर्शी ख़ुदा ने स्त्रियों के लिए एक से अधिक पति रखने को वर्जित कर दिया।



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क्या बहुपत्नीत्व-नारी-जाति पर अत्याचार है 


उत्तर~ ईश्वरीय धर्म मानव-इतिहासके विभिन्न चरणों में, विभिन्न भू-भागों की विभिन्न जातियों व क़ौमों के हाथों बार-बार विकरित व प्रदूषित होते-होते तथा बार-बार ईशदूतों के आगमन द्वारा सुधार प्रक्रिया जारी किए जाते-जाते, 1400 वर्ष पूर्व जब ‘इस्लाम’ के रूप में आया उस समय बहुपत्नीत्व (Polygyny) विभिन्न रूपों में विश्व को लगभग हर समाज, संस्कृति में प्रचलित था। उदाहरणतः स्वयं हिन्दू समाज की अत्यंत महत्वपूर्ण, महान आदर्णीय धार्मिक विभूतियों तथा महापुरुषों की कई-कई (सैकड़ों से हज़ारों तक) पत्नियों व रानियों का उल्लेख धर्म ग्रंथों में मौजूद था। अरब समाज में भी—जिसमें ईशग्रंथ क़ुरआन के अवतरण के साथ इस्लाम का पुनर्गमन हुआ—पत्नियों की अधिकतम संख्या निर्धारित व नियंत्रित न थी। इस्लाम ने ‘‘अधिकतम चार’’ की संख्या निर्धारित कर दी। इस प्रकार इस्लाम ने ‘बहुपत्नीत्व’ का प्रचलन आरंभ नहीं किया बल्कि ‘अधिकतम सीमा’ का निर्धारण व नियंत्रण किया।


बहुपत्नीत्व की इजाज़त


इस्लाम ने यह इजाज़त दी कि व्यक्तिगत, सामाजिक तथा नैतिक स्तर पर यदि ऐसी परिस्थिति का सामना हो कि बहुपत्नी-विवाह, पुरुष, स्त्री, परिवार तथा समाज के लिए लाभप्रद हो तो पुरुष परिस्थिति-अनुसार दो, तीन या अधिक से अधिक चार पत्नियां रख सकता है। यह इजाज़त इस शर्त के साथ (Conditional) है कि सभी पत्नियों के बीच पूर्ण न्याय व बराबरी का मामला किया जाए। अगर ऐसा न होने की आशंका हो या पुरुष में इसका सामर्थ्य न हो, तो शरीअत का आदेश है कि ‘बस एक ही’ पत्नी के साथ दाम्पत्य जीवन बिताया जाए।


मुस्लिम समाज में 1400 वर्षों से आज तक हर देश में—हमारे देश भारत में भी—इसी बात पर अमल होता रहा है। अगली पंक्तियों में यह देखने का प्रयास किया जा रहा है कि यद्यपि सामान्य परिस्थितियों में, मुस्लिम समाज सहित किसी भी समाज में बहुपत्नीत्व वस्तुतः प्रचलित नहीं है तो फिर वे कौन-सी विशेष (असामान्य) परिस्थितियां हैं जिनमें बहुपत्नीत्व की ज़रूरत पड़ जाती है? इसके फ़ायदे क्या हैं तथा इसे निषिद्ध कर देने की हानियां क्या हैं? इसे निषिद्ध और ग़ैर-क़ानूनी घोषित कर देने तथा इसका रास्ता बन्द कर देने से पुरुष, स्त्री, संतान, परिवार, समाज और व्यवस्था पर क्या-क्या कुप्रभाव पड़ते हैं?

विभिन्न परिस्थितियां

परिस्थिति—1: पत्नी किसी कारणवश संतानोत्पत्ति की क्षमता नहीं रखती। वह बांझ हो सकती है या उसे कोई विशेष रोग हो सकता है। पति, पिता बनने और अपनी नस्ल आगे बढ़ाने की कामना का दमन करने में स्वयं को असमर्थ पाता है।


परिस्थिति—2: पत्नी किसी ऐसे यौन-रोग (Veneral Desease) से ग्रस्त हो जाए कि चिकित्सा-विशेषज्ञों द्वारा पति को उससे संभोग करने की मनाही कर दी जाए। पति स्वयं पर नियंत्रण रखने में असमर्थ है।

परिस्थिति—3: किसी विधवा स्त्री का कोई सहारा न हो। उसे मानसिक, भावनात्मक, पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, नैतिक (चारित्रिक) तथा यौनवृत्ति (Sexual) स्तर पर अशांति, असुरक्षा, अपमान, उत्पीड़न व शोषण और असंतुष्टि आदि से जूझना पड़ रहा हो, या इसकी प्रबल आशंका हो। कोई भी कुंवारा व्यक्ति उससे विवाह करने को तैयार न हो (जो कि एक अकाट्य सामाजिक तथ्य है)। और मायके/ससुराल में उस विधवा का कोई सहारा न हो।


परिस्थिति—4: किसी विधवा के छोटे-छोटे बच्चे हों। इन मासूमों के ‘अनाथपन’ और अपने ‘विधवापन’ का दोहरा बोझ उठाना एक अबला के लिए कठिन, असह्य या अभिशाप बन जाए। न मायका, न ससुराल, न रिश्तेदार न समाज, कोई भी उसकी सहायता के लिए आगे न आ रहा हो।


परिस्थिति—5: किसी बड़े युद्ध, या महायुद्ध में पुरुष इतनी बड़ी संख्या में मारे जाएं कि अविवाहित या विधवा स्त्रियों की संख्या, जीवित/कुं$वारे पुरुषों से बहुत अधिक हो जाए।


परिस्थिति—6: पुरुष में यौन-शक्ति व कामवासना इतनी अधिक हो कि वह आत्म-संयम व आत्म-नियंत्रण में असमर्थ हो जाए; एक पत्नी से वह संतुष्ट न हो पा रहा हो तथा यह असंतुष्टि इतनी प्रबल हो जाए कि धार्मिक संवेदनशीलता, नैतिकता या सामाजिक परम्परा तथा सर्वमान्य आचारसंहिता पर भारी पड़ जाए।

देखना चाहिए कि उपरोक्त परिस्थितियों में ‘ग़ैर-इस्लाम’ (Non-Islam) और ‘इस्लाम’ के पास क्या-क्या विकल्प (Alternative) हैं। यह भी देखना चाहिए कि हर तत्संबंधित विकल्प स्त्री के प्रति अत्याचार व अभिशाप है या वरदान व सम्मान। साथ ही यह बात भी कि स्वयं पति, दाम्पत्य जीवन, परिवार और सामाजिक व्यवस्था के लिए कौन-सा विकल्प हानिकारक है और कौन-सा विकल्प लाभदायक।


ग़ैर-इस्लामी (Non-Islamic/Anti-Islamic) विकल्प

उपरोक्त परिस्थितियों में ग़ैर-इस्लामी विकल्प (एकपत्नीत्व, Monogyny) के प्रभाव व परिणाम निम्नलिखित हैं:

1. पति, पत्नी से, परिवार से, और क़ानून-व्यवस्था से छिपा कर दूसरा विवाह कर ले। दूसरे शब्दों में, वह सब को धोखा देता रहे, दूसरी पत्नी पर अपने समय और धन के ख़र्च को छिपाने के लिए पहली पत्नी तथा अन्य परिवारजनों से हमेशा झूठ बोलता रहे। इतने सारे बखेड़े पालने की क्षमता न हो तो बेचारी, बेक़सूर पहली पत्नी से ‘छुटकारा’ पाने का कोई अनैतिक या अपराधपूर्ण रास्ता इख़्तियार कर ले।

2. किसी स्थाई रोग-वश पत्नी से संभोग न किया जा सकता हो तो चोरी-छिपे पराई स्त्रियों से अनैतिक संबंध स्थापित किया जाता है। ऐसी स्त्रियों की संख्या कितनी भी हो सकती है। अनाचार व व्यभिचार की इस परिधि की कोई सीमा नहीं। कितनी स्त्रियों का शील भ्रष्ट होता है, कोई चिंता नहीं। कितने यौन-दुराचार होते हैं, ससहमति यौनाचार (Consensual sex) के तर्क पर क़ानून व प्रशासन की ओर से कोई पकड़ नहीं। मौजूद पत्नी का कितना अधिकार-हनन होता है, कोई फ़िक्र नहीं। पुरुष, पत्नी तो ‘एक’ ही रखे और रखैलें (Concubines) कई रखे, कोई हर्ज नहीं। नगर-नगर वैश्यालय खुले हुए हों जहां नारी-शील खरीदा-बेचा जा रहा हो, ठीक है। पति जहां चाहे मुंह मारे, समाज में जितनी चाहे गन्दगी फैलाए, जितनी भी युवतियों व नारियों के शील के साथ खिलवाड़ करे, सब ठीक है लेकिन वैध व जायज़ रूप में दूसरी पत्नी घर ले आए तो ‘नारी पर अत्याचार’ का दोषी व आरोपी ठहरे। या पहली (बेक़सूर) पत्नी से ‘किसी और’ विधि से, पहले छुटकारा पा ले, तभी दूसरा विवाह करे। यह छुटकारा तलाक़ द्वारा भी हो सकता है; और अदालती तलाक़ के लंबे बखेड़े में उलझना मुश्किल हो तो हत्या करके या हत्या कराके भी या रसोई में आग लग (लगा) कर भी।

3. पहले ‘सती’ का विकल्प था। अब क़ानून ने विधवा को इस ‘विकल्प’ से ‘वंचित’ कर दिया है लेकिन क़ानून विधवा को कोई बेहतर प्रभावकारी, ठोस विकल्प प्रदान करने से असमर्थ है अतः उसने यह काम परिवार तथा समाज के लिए छोड़ दिया है। मायके के परिवार में सामान्यतया विधवा (बेटी, बहन) की वापसी का परम्परा नहीं है। अगर व वापस गई भी तो चूड़ियां तोड़ कर, मांग सूनी करके, श्रृंगार से वंचित रहकर, सफ़ेद साड़ी पहनकर, अभागिन, अबला बनकर, ननदों व भावजों के ताने-कोसने सहकर, बेबसी, लाचारी की अवस्था में भाई-भावज की सेविका, दासी बनकर रहने के लिए। समाज न तो उसे दूसरा विवाह करने की अनुमति देता न किसी पुरुष को अनुमति देता है कि वह विवाहित रहते हुए उस दुखियारी को पत्नी बनाकर उसकी सारी समस्याओं का समाधान कर दे (और क़ानून भी उसे इसकी इजाज़त नहीं देता)। इसलिए समाज या तो उस विधवा को धक्के खाने और नाना प्रकार को शोषण व उत्पीड़न-अपमान झेलने के लिए छोड़ देगा; या कुछ दया आ ही गई तो किसी विधवाश्रम में डाल आएगा। यह अलग बात है कि कुछ विधवाश्रम बेचारी विधवाओं का सुनियोजित देहव्यापार भी करते हों।

4. लगभग वही विकल्प जो परिस्थिति 3 में व्यक्त किए गए। ज़्यादा से ज़्यादा, अनाथों को अनाथालयों के सुपुर्द कर देने का प्रावधान, जहां यदि नैतिकता या ईशपरायणता के गुण प्रबल व सक्रिय न हों तो अनाथों पर अत्याचार और उनका बहुआयामी शोषण। विधवा मां अलग, उसके कलेजे के टुकड़े अलग।

5. �‘परिस्थिति-5’ के अंतर्गत, इतिहास साक्षी है कि स्त्रियां और विधवाएं जन-सम्पत्ति (Public Property) बन जाने पर विवश हुईं। नारी-जाति के इस जघन्य यौन-शोषण के अतिरिक्त समाज और व्यवस्था के सामने कोई विकल्प न रहा।

6. ही विकल्प, जो 2 में उल्लिखित है।




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