अपने हिन्दू परिचितों की अर्थी को कान्धा देने और मृतक की अंतिम क्रिया का सामान जुटाने से किसी मुस्लिम को आपत्ति नहीं है... हां कुछ लोग शंका में इसलिये ज़रूर पड़े हुए हैं क्योंकि हदीस मे मुसलमान को मनाही की गई है कि वो किसी व्यक्ति का शरीर आग में जलाए....
.... हालांकि बात ये भी है कि इस्लाम की फ़ितरत में बहुत लचक है, और अगर हालात इस तरह बन जाएं कि मुसलमान के अलावा कोई और गैरमुस्लिम की अंतिम क्रिया करने के लिए मौजूद न हो, तिसपर मरने वाला अपने मुसलमान तीमारदारों को ये वसीयत कर गया हो कि मेरी लाश को जलाया ही जाए, तो इन हालात में मुसलमानों के लिए यही सही है कि वो मरने वाले की वसीयत के मुताबिक ही उसकी आख़री रसूमात करें, जैसे कि कश्मीर में होता भी आ रहा है वहां बहुत से बुज़ुर्ग पंडित छूट गए थे जिनकी देखभाल और उनके मरने पर उनकी आखरी रसूमात को अदा करने की ज़िम्मेदारी कश्मीर के मुसलमान निभाते आ रहे हैं...
.
..... इधर कोरोना या उसके उसके खौफ़ से मरने वाले हिंदुओं की अंतिम क्रिया करने के लिये कोई हिन्दू मौजूद न हो ऐसा तो नही, लेकिन श्मशानों में भीड़ ज़्यादा होने की वजह से जलाने वालों के फ्री न होने की वजह से शायद मुसलमानों को अपने हिन्दू दोस्तों को जलाना भी खुद ही पड़ रहा है, और एक तरफ तो मुसलमान हदीस के हुक्म से चिंता में हैं, दूसरे भाजपा या कट्टर हिंदूवादी लोगों की ओर से भी उनको आलोचना का निशाना बनाया जा रहा है कि वो हिंदुओं की चिता क्यों जला रहे हैं ??
... ऐसा है तो मैं उम्मीद करता हूँ कि अर्थी को कान्धा देकर मुसलमान उसे शमशान तक ले जाएंगे तो श्मशान में मृतक को मुखाग्नि देने और चिता को पूरी तरह जलाने का काम मृतक के परिजन और डोम राजा कर लेंगे, .... यूँ भी इस बीच भाजपा सदस्य और भी अन्य लोग ये कह चुके हैं कि मुस्लिमों को श्मशान में प्रवेश नही करने देना चाहिए, तो वो लोग श्मशान के अंदर की व्यवस्था को भी खुद सम्हालने का प्रबंध करें, और मुस्लिमों को ऐसी ज़िम्मेदारी से मुक्त करें जो न चाहते हुए भी उन पर पड़ गई है
~ ज़िया इम्तियाज़।
No comments:
Post a Comment