Friday, 23 April 2021

सनातनी ग्रंथो में आतंक व हिंसा।

श्री यति नरसिंहानंद सरस्वती 

【भारतीय धर्म  ग्रंथों मार काट की शिक्षा।  】

निरंतर मुसलमानो , क़ुरआन और नबी सलल्लाहुअलैहिवस की जात को निशाना बनाया जा रहा है और सत्ता के संरक्ष्ण में अशोभनीय भाषा का निरंतर प्रयोग किया जा रहा है आपने क़ुरआन को गुंडों की किताब , जिहादियों की किताब मारकाट की किताब कहा है।  
उच्च शिक्षा ग्रहण करने बाद भी आपको इतना ज्ञान नहीं है कि जब कोई बात सामने आती है तो ये देखा जाता है कि वह किस परिपेक्ष्य में कही गयी है । 
क़ुरआन में जो आयात मार क़ाट से संबंधित हैं वह प्रशासनिक आदेश एवं युद्ध संबन्धित हैं अतः क़ुरआन तो  यह शिक्षा देता है कि यदि किसी व्यक्ति ने किसी एक कि जान बचाई तो उसने समस्त मानव जाति की जान बचाने का कार्य किया । 
बेहतर होता कि आप स्वच्छ हृदय से क़ुरआन का अध्यन करते । 

【क्या ये भी गुंडों वाली किताबें हैं ?】
स्वामी जी अब आप बताइए कि आपके इन धर्म ग्रंथों में जो मार काट खून खराबे की शिक्षा दी गयी है ये कौन से गुण्डई की शिक्षा है
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स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि।
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते॥

अर्थात "अपने धर्म को देखकर भी तू भय करने योग्य नहीं है  तुझे भय नहीं करना चाहिए क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी कर्तव्य नहीं है"    (भगवतगीता अध्याय 2 शलोक 31)

यदृच्छया चोपपन्नां स्वर्गद्वारमपावृतम्‌।
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्‌॥

हे पार्थ! अपने-आप प्राप्त हुए और खुले हुए स्वर्ग के द्वार रूप इस प्रकार के युद्ध को भाग्यवान क्षत्रिय लोग ही पाते हैं
(भगवतगीता अध्याय 2 शलोक 32)

अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं सङ्‍ग्रामं न करिष्यसि।
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि॥

"किन्तु यदि तू इस धर्मयुक्त युद्ध को नहीं करेगा तो स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त होगा" 
(भगवतगीता अध्याय 2 शलोक 33) 

【वेदनिन्दकों को मारने की शिक्षा 】

अथर्ववेद 12/5/62 का उदहारण देते हुए कहता है कि ,” तू वेदनिंदक को काट डाल, चीर डाल,फाड़ दे, जला दे, फूंक दे, भस्म कर दे।”

अथर्ववेद 12/5/68 कहता है कि 

“वेद विरोधी के लोगों को काट डाल, उसके मांस के टुकड़ों की बोटी बोटी कर दे, उसके नसों को ऐंठ दे, उसकी हड्डियां मिसल कर, उसकी मिंग निकाल दे, उसके सब अंगों को, जोड़ों को ढीला कर दे।”

(धार्मिक ग्रंथों मैं नीच जाति के नाम पर शूद्रों पर अत्याचार)
 
1. ब्राह्मण को कठोर वचन कहने वाले शूद्र को शारीरिक दंड देना चाहिए(मनुस्मृति,२-७८,)

2. यदि कोई शूद्र द्धिज(ब्राह्मण,क्षत्रिय,वेश्य) को गली दे तो राजा उसके मूंह मैं दस उँगल की गरम सलाखें उसके मूंह मैं घुसेड़ दे और अगर ब्राह्मण के सामने पाद दे तो उसका लिंग एवं चूतड़ कटवा दे।
 (मनुस्मृति,2,270-282)

3. शील रहित ब्राह्मण पूजनीय होता है।
 (परासर स्मृति,192)

4. परन्तु शुद्र ब्रह्नमा के चरणों से पैदा हुआ है इसलिए हरहाल मैं नीच है। 

5. शूद्र पुराने वस्त्र पहने और अपनी ही स्त्री से प्रेम करे और पराइ स्त्री से परहेज़ कर और यदि वासना तृप्ति हेतु अगर कोई ब्राह्मण शूद्र की पत्नी से संम्भोग करे तो उसे कोई पाप नही लगता
 (बोद्ध्ययन स्मृति एवं  मनु स्मृति 3-12)  

6. ब्राह्मण की झूठन ही शूद्र को कुत्ते की तरह ज़मीन गिरा कर और पत्तल को चटवाने के लिए देना चाहिए। (मनु,3-246,याज्ञवाल्क्य-103)

7.धर्म ग्रंथों मैं शूद्रो को हर प्रकार की शिक्षा  दिक्षा मना है यदि कोई धर्मोपदेश भी दे वेह नरक का अधिकारी होगा 
(मनु,4-48)

7.ऐसा इसलिए है क्यों कि 
"एक्मॆवयु शूद्रस्य: प्रभु: कर्म समादिशत्।
एतेषामेव वर्णाना शुस्रुशामंसूय्या।।

अर्थात "प्रभु ने शूद्र के लिए केवल एक ही कर्म निश्चित किया है कि वेह तीनों वर्णों अर्थात ब्राह्मण क्षत्रिय एवं वेश्य की सेवा करे।"

9.यदि शूद्र का स्वामी उसे दास कर्म से मुक्त भी कर देता है तो उसे दास ही समझा जायेगा।  (मनु,8-444)

तो स्वामी जी इन के।आधार पर बताइये कि आप को ये धर्म ग्रंथ कौनसी गुंडागर्दी की शिक्षा देते हैं ।।
श्री यति नरसिंहानंद सरस्वती  जिनके घर शीशे के होतव हैं वो दूसरों के घरों में पत्थर नहीं मारा करते । 

#अहसन #फ़िरोज़ाबादी





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