Friday, 23 April 2021

इस्लाम, ईश्वर परिचय।


इस्लाम आ चुका है आपके जीवन में Islam means

एक  भाई Mukesh Sharma जी ने घोषित कर दिया कि इस्लाम हिंदू धर्म की छाया प्रति है।
आज कहना सबके लिए आसान हो गया है। इसीलिए कोई कुछ भी कह सकता है।
अगर कुछ साधारण सी बातों पर भी विचार कर लिया जाए तो उन्हें अपनी ग़लती आसानी से समझ में आ सकती है और अगर वे न समझें तब भी कम से कम दूसरों की समझ में तो आ ही जाएगी।

1. हिंदू धर्म की कोई एक सर्वमान्य परिभाषा आज तक तय नहीं है जबकि इस्लाम की परिभाषा तय है।

2. हिंदू भाई बहनों के लिए कर्तव्य और अकर्तव्य कुछ भी निश्चित नहीं है। एक आदमी अंडा तक नहीं छूता और अघोरी इंसान की लाश खाते हैं जबकि दोनों ही हिंदू हैं।
जबकि एक मुसलमान के लिए भोजन में हलाल हराम निश्चित है।

3. हिंदू मर्द औरत के लिए यह निश्चित नहीं है कि वे अपने शरीर को कितना ढकें ?, एक अपना शरीर ढकता है और दूसरा पूरा नंगा ही घूमता है।
जबकि मुस्लिम मर्द औरत के लिए यह निश्चित है कि वे अपने शरीर का कितना अंग ढकें ?

4. हिंदू के लिए उपासना करना अनिवार्य नहीं है बल्कि ईश्वर के अस्तित्व को नकारने के बाद भी लोग हिंदू कहलाते हैं।
जबकि मुसलमान के लिए इबादत करना अनिवार्य है और ईश्वर का इन्कार करने के बाद उसे वह मुस्लिम नहीं रह जाता।

5. केरल के हिंदू मंदिरों में आज भी देवदासियां रखी जाती हैं और औरतों द्वारा नाच गाना तो ख़ैर देश भर के हिंदू मंदिरों में होता है। इसे ईश्वर का समीप पहुंचने का माध्यम माना जाता है।
जबकि मस्जिदों में औरतों का तो क्या मर्दों का भी नाचना गाना गुनाह और हराम है और इसे ईश्वर से दूर करने वाला माना जाता है।

6. हिंदू धर्म ब्याज लेने से नहीं रोकता जिसकी वजह से आज ग़रीब किसान मज़दूर लाखों की तादाद में मर रहे हैं।
जबकि इस्लाम में ब्याज लेना हराम है।

7. हिंदू धर्म में दान देना अनिवार्य नहीं है। जो देना चाहे, दे और जो न देना चाहे तो वह न दे और कोई चाहे तो दान में विश्वास ही न रखे।
जबकि इस्लाम में धनवान पर अनिवार्य है कि वह हर साल ज़रूरतमंद ग़रीबों को अपने माल में से 2.5 प्रतिशत ज़कात अनिवार्य रूप से दे। इसके अलावा फ़ितरा आदि देने के लिए भी इस्लाम में व्यवस्था की गई है।

8. हिंदू धर्म में ‘ब्राह्मणों को दान‘ देने की ज़बर्दस्त प्रेरणा दी गई है।
जबकि पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने यह व्यवस्था दी है कि हमारी नस्ल में से किसी को भी सदक़ा-ज़कात मत देना। दूसरे ग़रीबों को देना। हमारे लिए सदक़ा-ज़कात लेना हराम है।

9. सनातनी हिंदू हों या आर्य समाजी, दोनों ही मानते हैं कि वेद के अनुसार पति की मौत के बाद विधवा अपना दूसरा विवाह नहीं कर सकती।
जबकि इस्लाम में विधवा को अपना दूसरा विवाह करने का अधिकार है बल्कि इसे अच्छा समझा गया है कि वह दोबारा विवाह कर ले।

10. सनातनी हिंदू हों या आर्य समाजी, दोनों ही यज्ञ करने को बहुत बड़ा पुण्य मानते हैं।
जबकि इस्लाम में यह पाप माना गया है कि आग में खाने पीने की चीज़ें जला दी जाएं। खाने पीने की चीज़ें या तो ख़ुद खाओ या फिर दूसरे ज़रूरतमंदों को दे दो। ऐसा कहा गया है।

11. सनातनी हिंदू और आर्य समाजी, दोनों ही वर्ण व्यवस्था को मानते हैं और वर्णों की ऊंच नीच और छूत छात को भी मानते हैं।
जबकि इस्लाम में न वर्ण व्यवस्था है और न ही छूत छात। इस्लाम सब इंसानों को बराबर मानता है और आजकल हिंदुस्तानी क़ानून भी यही कहता है और हिंदू भाई भी इसी इस्लामी विचार को अपनाने की कोशिश कर रहे हैं।

12. सनातनी हिंदू और आर्य समाजी, दोनों ही वैदिक धर्म की परंपरा का पालन करते हुए चोटी रखते हैं और जनेऊ पहनते हैं।
जबकि इस्लाम में न तो चोटी है और न ही जनेऊ।

13. सनातनी हिंदू और आर्य समाजी, दोनों ही वेद के अनुसार 16 संस्कार को मानते हैं, जिनमें एक विवाह भी है। इस संस्कार के अनुसार पत्नी अपने पति के मरने के बाद भी उसी की पत्नी रहती है और उससे बंधी रहती है। पति तो पत्नी का परित्याग कर सकता है लेकिन पत्नी उसे त्याग नहीं सकती।

जबकि इस्लाम में निकाह एक क़रार है जो पति की मौत से या तलाक़ से टूट जाता है और इसके बाद औरत उस मर्द की पत्नी नहीं रह जाती। वह अपनी मर्ज़ी से अपना विवाह फिर से कर सकती है। इस्लाम में पति तलाक़ दे सकता है तो पत्नी के लिए भी पति से मुक्ति के लिए ख़ुलअ की व्यवस्था की गई है।
अब हो यह रहा है कि सनातनी और आर्य समाजी, दोनों ही ख़ुद वेद की व्यवस्था से हटकर इस्लामी व्यवस्था को फ़ोलो कर रहे हैं। विधवाओं के पुनर्विवाह वे धड़ल्ले से कर रहे हैं। जब मुसलमानों ने अपने निकाह को विवाह की तरह संस्कार नहीं बनाया तो फिर हिंदू भाई अपने संस्कार को इस्लामी निकाह की तरह क़रार क्यों और किस आधार पर बना रहे हैं ?
जिस व्यवस्था पर विश्वास है, उस पर चलने के बजाय वे इस्लामी व्यवस्था का अनुकरण क्यों कर रहे हैं ?

14. विवाह को संस्कार मानने का नतीजा यह हुआ कि विधवा औरतों को हज़ारों साल तक बड़ी बेरहमी से जलाया जाता रहा। यहां तक कि इस देश में मुसलमान और ईसाई आए और उनके प्रभाव और हस्तक्षेप से हिंदुओं की चेतना जागी कि सती प्रथा के नाम पर विधवा को जलाना धर्म नहीं बल्कि अधर्म है और तब उन्होंने अपने धर्म को उनकी छाया प्रति बना लिया और लगातार बनाते जा रहे हैं।

15. विवाह की तरह ही गर्भाधान भी एक हिंदू संस्कार है। जब किसी पति को गर्भाधान करना होता है या अपनी पत्नि से किसी अन्य पुरूष का नियोग करवाना होता है तो वह 4 पंडितों को बुलवाता है और वे चारों पंडित पूरे दिन बैठकर वेदमंत्र पढ़ते हैं। उसके घर में खाते पीते हैं। उसके घर में यज्ञ करते हैं। उस यज्ञ से बचे हुए घी को मलकर औरत नहाती है और फिर पूरी बस्ती में घूम घूम कर बड़े बूढ़ों को बताती है कि आज उसके साथ क्या होने वाला है ?
बड़े बूढ़े अपनी अनुमति और आशीर्वाद देते हैं, तब जाकर पति महाशय या कोई अन्य पुरूष उस औरत के साथ वेद के अनुसार सहवास करता है।
जबकि इस्लाम में गर्भाधान संस्कार ही नहीं है और पत्नि को किसी ग़ैर मर्द के साथ सोने के लिए बाध्य करना बहुत बड़ा जुर्म और गुनाह है।
मुसलमान पति पत्नी जब चाहे सहवास कर सकते हैं। शोर पुकार मचाकर लोगों को इसकी इत्तिला देना इस्लाम में असभ्यता और पाप है।
आजकल हिंदू भाई भी इसी रीति से अपनी पत्नियों को गर्भवती कर रहे हैं क्योंकि यही रीति नेचुरल और आसान है।
धर्म सदा ही नेचुरल और आसान होता है।
मुश्किल में डालने वाली चीज़ें ख़ुद ही फ़ेल हो जाती हैं। लोग उनका पालन करना चाहें तो भी नहीं कर पाते। शायद ही आजकल कोई गर्भाधान संस्कार करता हो। इस्लामी रीति से पैदा होने के बावजूद इस्लाम पर नुक्ताचीनी करना केवल अहसानफ़रामोशी है। जिसका कारण अज्ञानता है।

16. सनातनी हिंदू और आर्य समाजी, दोनों के नज़्दीक धर्म यह है कि पत्नि से संभोग तब किया जाए जबकि उससे संतान पैदा करने की इच्छा हो। इसके बिना संभोग करने वाला वासनाजीवी और पतित-पापी माना जाता है।
जबकि इस्लाम में इस तरह की कोई पाबंदी नहीं है। इस्लामी व्यवस्था यही है कि पति पत्नी जब चाहें तब आनंद मनाएं। उन्हें आनंदित देखकर ईश्वर प्रसन्न होता है। आजकल हिंदू भाई भी इसी इस्लामी व्यवस्था पर चल रहे हैं।

17. शंकराचार्य जी के अनुसार हरेक वर्ण और लिंग के लिए वेद को पढ़ने और पढ़ाने की आज़ादी नहीं है।
जबकि क़ुरआन सबके लिए है। किसी भी रंगो-नस्ल के नर नारी इसे जब चाहें तब पढ़ सकते हैं।

18.  आर्यसमाजी और सनातनी महिलाओं को मासिक धर्म में शास्तों के अनुसार अपवित्र समझते थे,,,  इस्‍लाम की शिक्षाओं से प्रेरित होकर उन्‍हें अब उतना अपवित्र नहीं मानते,  बल्कि आगे बढकर उनके साथ स्‍कूल आफिस आदि में साथ खाना पीना हाथ मिलाने में कोई बुराई नहीं समझते
 इस्‍लामकि व्‍यवस्‍था में आदम की ब‍ेटियों को इन दिनों सेक्‍स की तकलीफ से बचाने के साथ ही नमाज एवं रोजे में छूट भी मिली है,,, हमें मार्ग दर्शन के लिए  उनके साथ उठने बैठने चुमने की हदीसें मौजूद हैं

19. इसी के साथ हिंदू धर्म अर्थात वैदिक धर्म में चार आश्रम भी पाए जाते हैं।
ब्रह्मचर्य आश्रम, गृहस्थ आश्रम, वानप्रस्थ आश्रम, सन्यास आश्रम
अति संक्षेप में 8वें वर्ष बच्चे का उपनयन संस्कार करके उसे वेद पढ़ने के लिए गुरूकुल भेज दिया जाए और बच्चा 25 वर्ष तक वीर्य की रक्षा करे। इसे ब्रह्मचर्य आश्रम कहते हैं। लेकिन हमारे शहर का संस्कृत महाविद्यालय ख़ाली पड़ा है। शहर के हिंदू उसमें अपने बच्चों को पढ़ने के लिए भेजते ही नहीं जबकि शहर के कॉन्वेंट स्कूल हिंदू बच्चों से भरे हुए हैं। जहां सह शिक्षा होती है और जहां वीर्य रक्षा संभव ही नहीं है, जहां वेद पढ़ाए ही नहीं जाते,
जहां धर्म नष्ट होता है, हिंदू भाई अपने बच्चों को वहां क्यों भेजते हैं ?
ख़ैर हमारा कहना यह है कि आजकल हिंदू भाई ब्रह्मचर्य आश्रम का पालन नहीं करते और न ही वे 50 वर्ष का होने पर वानप्रस्थ आश्रम का पालन करते हुए जंगल जाते हैं और सन्यास आश्रम भी नष्ट हो चुका है।
आज हिंदू धर्म के चारों आश्रम नष्ट हो चुके हैं और हिंदू भाई अब अपने घरों में आश्रम विहीन वैसे ही रहते हैं जैसे कि मुसलमान रहते हैं क्योंकि इस्लाम में तो ये चारों आश्रम होते ही नहीं।

ज़रा सोचिए कि अगर इस्लाम हिंदू धर्म की छाया प्रति होता तो उसमें भी वही सब होता जो कि हिंदू धर्म में हज़ारों साल से चला आ रहा है और उन बातों से आज तक हिंदू जनमानस पूरी तरह मुक्ति न पा सका।

चार आश्रम, 16 संस्कार, विधवा विवाह निषेध, नियोग, वर्ण-व्यवस्था, छूत छात, ब्याज, शूद्र तिरस्कार, देवदासी प्रथा, ईश्वर के मंदिर में नाच गाना, चोटी, जनेऊ और ब्राह्मण को दान आदि जैसी बातें जो कि हिंदू धर्म अर्थात वैदिक धर्म में पाई जाती हैं, उन सबसे इस्लाम आखि़र कैसे बच गया ?
इन बातों के बिना इस्लाम को हिंदू धर्म की छाया प्रति कैसे कहा जा सकता है ?

हक़ीक़त यह है कि इस्लाम किसी अन्य धर्म की छाया प्रति नहीं है बल्कि ख़ुद ही मूल धर्म है और पहले से मौजूद ग्रंथों में धर्म के नाम पर जो भी अच्छी बातें मिलती हैं वे उसके अवषेश और यादगार हैं, जिन्हें देखकर लोग यह पहचान सकते हैं कि इस्लाम सनातन काल है, हमेशा से यही मानव जाति का धर्म है।

ईश्वर के बहुत से नाम हैं। हरेक ज़बान में उसके नाम बहुत से हैं। उसके बहुत से नामों में से एक नाम ‘अल्लाह‘ है। यह नाम क़ुरआन में भी है और बाइबिल में भी और संस्कृत ग्रंथों में भी।ईश्वर का निज नाम यही है लेकिन उसके निज नाम को ही भुला दिया गया। ईष्वर के नाम को ही नहीं बल्कि यह भी भुला दिया गया कि सब एक ही पिता की संतान हैं। सब बराबर हैं। जन्म से कोई नीच और अछूत है ही नहीं। ऐसा तब हुआ जब आदम और नूह (अ.) को भुला दिया गया जिनका नाम संस्कृत ग्रंथों में जगह जगह आया है। इन्हें यहूदी, ईसाई और मुसलमान सभी पहचानते हैं। हिंदू भाई इन्हें ऋषि कहते हैं और मुसलमान इन्हें नबी कहते हैं। इनके अलावा भी हज़ारों ऋषि-नबी आए और हर ज़माने में आए और हर क़ौम में आए। सबने लोगों को यही बताया कि जिसने तुम्हें पैदा किया है तुम्हारा भला बुरा बस उसी एक के हाथ में है, तुम सब उसी की आज्ञा का पालन करो। ऋषियों और नबियों ने मानव जाति को हरेक काल में एक ही धर्म की शिक्षा दी। । वे सिखाते रहे और लोग भूलते रहे। आखि़रकार पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इस दुनिया में आए और फिर उसी भूले हुए धर्म को याद दिलाया और ऐसे याद दिलाया कि अब किसी के लिए भूलना मुमकिन ही न रहा।

जब दबंग लोगों ने कमज़ोरों का शोषण करने के लिए धर्म में बहुत सी अन्यायपूर्ण बातें निकाल लीं, तब ईश्वर ने क़ुरआन के रूप में अपनी वाणी का अवतरण पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के अन्तःकरण पर किया और पैग़म्बर साहब ने धर्म को उसके वास्तविक रूप में स्थापित कर दिया। जिसे देखकर लोगों ने ऊंच नीच, छूतछात और सती प्रथा जैसी रूढ़ियों को छोड़ दिया। बहुतों ने इस्लाम कहकर इस्लाम का पालन करना आरंभ कर दिया और उनसे भी ज़्यादा वे लोग हैं जिन्होंने इस्लाम के रीति रिवाज तो अपना लिए लेकिन इस्लाम का नाम लिए बग़ैर। इन्होंने इस्लामी उसूलों को अपनाने का एक और तरीक़ा निकाला। इन्होंने यह किया कि इस्लामी उसूलों को इन्होंने अपने ग्रंथों में ढूंढना शुरू किया जो कि मिलने ही थे। अब इन्होंने उन्हें मानना शुरू कर दिया और दिल को समझाया कि हम तो अपने ही धर्म पर चल रहे हैं।
ये लोग हिंदू धर्म के प्रवक्ता बनकर घूमते हैं। ऐसे लोगों को आप आराम से पहचान सकते हैं। ये वे लोग हैं जिनके सिरों पर आपको न तो चोटी नज़र आएगी और न ही इनके बदन पर जनेऊ और धोती। न तो ये बचपन में ये गुरूकुल गए थे और न ही 50 वर्ष का होने पर ये जंगल जाते हैं। हरेक जाति के आदमी से ये हाथ मिलाते हैं। फिर भी ये ख़ुद को वैदिक धर्म का पालनकर्ता बताते हैं।
ख़ुद मुसलमान की छाया प्रति बनने की कोशिश कर रहे हैं और कोई इनकी चालाकी को न भांप ले, इसके लिए ये एक इल्ज़ाम इस्लाम पर ही लगा देते हैं कि ‘इस्लाम तो हिंदू धर्म की छायाप्रति है‘
ये लोग समय के साथ अपने संस्कार और अपने सिद्धांत बदलने लगातार बदलते जा रहे हैं और वह समय अब क़रीब ही है जब ये लोग इस्लाम को मानेंगे और तब उसे इस्लाम कहकर ही मानेंगे।
तब तक ये लोग यह भी जान चुके होंगे कि ईश्वर का धर्म सदा से एक ही रहा है। ‘
एक ईश्वर की आज्ञा का पालन करना‘ ही मनुष्य का सनातन धर्म है। अरबी में इसी को दिने कयूम इस्लाम कहते हैं। इस्लाम का अर्थ है ‘ईश्वर का आज्ञापालन।‘
इसके अलावा मनुष्य का धर्म कुछ और हो भी कैसे सकता है ?
वर्ण व्यवस्था जा चुकी है और इस्लाम आ चुका है।



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ईश्वर और उसका मार्गदर्शन
 
आज लोग ईश्वर का नाम अवश्य लेते हैं, उसकी पूजा भी करते हैं, परन्तु बड़े खेद की बात है कि उसे पहचानते बहुत कम लोग हैं।
ईश्वर कौन है?
ईश्वर समस्त सृष्टि का अकेला स्रष्टा, पालनहार और शासक है। उसी ने पृथ्वी, आकाश, चन्द्रमा, सूर्य, सितारे और पृथ्वी पर रहने वाले सारे इंसानों एवं प्रत्येक जीव-जन्तुओं को पैदा किया। न उसे खाने-पीने और सोने की आवश्यकता पड़ती है, न उसके पास वंश है और न ही उसका कोई साझी।
क़ुरआन ईश्वर का इस प्रकार परिचय कराता है— 
‘‘कहो वह अल्लाह है, यकता है, अल्लाह सब से निस्पृह है और सब उसके मुहताज हैं, न उसकी कोई संतान है और न वह किसी की संतान है और कोई उसका समकक्ष नहीं है।’’ (क़ुरआन, 112:1-4)
इस सूरः में ईश्वर के पांच मूल गुण बताए गए हैं—
(1) ईश्वर केवल एक है, (2) उसको किसी की आवश्यकता नहीं पड़ती, (3) उसकी कोई संतान नहीं, (4) उसके माता-पिता नहीं एवं (5) उसका कोई साझीदार नहीं।
अथर्ववेद (13-4-20) में है—
‘‘तमिदं निगतं सहः स एष एक एकवृदेक एव’’
किन्तु वह सदा एक अद्वितीय ही है। उससे भिन्न दूसरा कोई भी नहीं। ...वह अपने काम में किसी की सहायता नहीं लेता, क्योंकि वह सर्वशक्तिमान है।
(स्वामी दयानन्द सरस्वती, दयानन्द ग्रंथमाला, पृ॰-338)
और हिन्दू वेदांत का ब्रह्मसूत्र यह है—
एकम् ब्रह्म द्वितीय नास्तेः नहे ना नास्ते किंचन।
ईश्वर एक ही है दूसरा नहीं है, नहीं है, तनिक भी नहीं है।
क्या ईश्वर अवतार लेता है?
बड़े दुख की बात है कि जिस ईश्वर की कल्पना हमारे हृदय में स्थित है, अवतार की आस्था ने उसकी महिमा को खंडित कर दिया। आप स्वयं सोचें कि जब ईश्वर का कोई साझीदार नहीं और न उसे किसी चीज़ की ज़रूरत पड़ती है, तो उसे मानव रूप धारण करने की क्या आवश्यकता पड़ी? श्रीमद भागवत गीता (7/24) में कहा गया है—
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ।।
बुद्धिहीन पुरुष मेरे अनुत्तम अविनाशी परम भाव को न जानते हुए मन-इन्द्रियों से परे मुझ सच्चिदानन्द परमात्मा को मनुष्य की भांति जन्मकर व्यक्ति भाव को प्राप्त हुआ मानते हैं। (गीता-तत्व विवेचनी टीका, पृष्ठ-360)
और यजुर्वेद 32/3 में इस प्रकार है—
न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महदयश।
‘जिस प्रभु का बड़ा प्रसिद्ध यश है उसकी कोई प्रतिमा नहीं’। धार्मिक पक्षपात से अलग होकर आप स्वयं सोचें कि क्या ऐसे महान ईश्वर के संबंध में यह कल्पना की जा सकती है कि वह जब इन्सानों के मार्गदर्शन का संकल्प करे, तो स्वयं ही अपने बनाए हुए किसी इन्सान का वीर्य बन जाए, अपने ही बनाए हुए किसी महिला के गर्भाशय की अंधेरी कोठरी में प्रवेश होकर 9 महीना तक वहां क़ैद रहे और उत्पत्ति के विभिन्न चरणों से गुज़रता रहे, ख़ून और गोश्त में मिलकर पलता-बढ़ता रहे फिर जन्म ले और बाल्यावस्था से किशोरवस्था को पहुंचे। सच बताइए क्या इससे उसके ईश्वरत्व में बट्टा न लगेगा?
ईश्वर मनुष्य नहीं हो सकता, क्योंकि ईश्वर एवं मनुष्य के गुण भिन्न-भिन्न हैं। यद्यपि ईश्वर को हम सर्वशक्तिमान मानकर चलते हैं, परन्तु इसका अर्थ यह तो नहीं कि ईश्वर ईश्वरत्व से बदलकर मनुष्यत्व में परिणीत हो जाए।
प्रश्न यह उठता है कि जब ईश्वर अवतार नहीं लेता, तो उसने मानव का मार्गदर्शन कैसे किया?
इसका उत्तर जानने के लिए यदि आप अवतार का सही अर्थ समझ लें, तो आपको स्वयं पता चल जाएगा कि ईश्वर ने मानव का मार्गदर्शन कैसे किया। अवतार का अर्थ—
श्री राम शर्मा जी कल्किपुराण के पृष्ठ 278 पर अवतार की परिभाषा करते हैं—
‘‘समाज की गिरी हुई दशा में उन्नति की ओर ले जाने वाला महामानव नेता।’’
अर्थात् मानव में से महान नेता जिनको ईश्वर मानव मार्गदर्शन के लिए चुनता है।
डॉ॰ एम॰ ए॰ श्रीवास्तव लिखते हैं—
‘‘अवतार का अर्थ यह कदापि नहीं है कि ईश्वर स्वयं धरती पर सशरीर आता है, बल्कि सच्चाई यह है कि वह अपने पैग़म्बर और अवतार भेजता है।’’
(हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) और भारतीय धर्मग्रंथ, पृष्ठ 5)
ज्ञात यह हुआ कि ईश्वर की ओर से ईश-ज्ञान लाने वाला मनुष्य ही होता है, जिसे संस्कृत में अवतार, अंग्रेज़ी में प्राफेट और अरबी में रसूल (ईश-दूत) कहते हैं।
ईश्वर ने मानव-मार्गदर्शन के लिए हर देश और हर युग में अनुमानतः 1,24,000 ईशदूतों को भेजा। क़ुरआन उन्हें रसूल या नबी कहता है। वह मनुष्य ही होते थे, उनमें ईश्वरीय गुण कदापि नहीं होता था, उनके पास ईश्वर का संदेश आकाशीय दूतों के माध्यम से आता था तथा उनको प्रमाण के रूप में चमत्कारियां भी दी जाती थीं।
लेकिन जब इन्सानों ने उनमें असाधारण गुण देखकर उन पर श्रद्धा भरी नज़र डाली, तो किसी समूह ने उन्हें भगवान बना लिया, किसी ने अवतार का सिद्धांत बना लिया, जबकि किसी ने उन्हें ईश्वर का पुत्र समझ लिया, हालांकि उन्होंने उसी के खंडन और विरोध में अपना पूरा जीवन बिताया था।
इस प्रकार हर युग में संदेष्टता आते रहे और लोग अपने स्वार्थ के लिए उनकी शिक्षाओं में परिवर्तन करते रहे, यहां तक कि जब सातवीं शताब्दी ईसवी में सामाजिक, भौतिक और सांस्कृतिक उन्नति ने सारी दुनिया को एक इकाई बना दिया, तो ईश्वर ने हर देश में अलग-अलग संदेष्टा भेजने के क्रम को बन्द करते हुए अरब में महामान्य हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) को भेजा और उन पर ईश्वरीय संविधान के रूप में क़ुरआन का अवतरण किया, यह ग्रंथ चैदह सौ शताब्दी पूर्व अवतरित हुआ था, लेकिन आज तक पूर्ण रूप में सुरक्षित है। एक ईसाई विद्वान सर विलियम म्यूर कहते हैं—
‘‘संसार में क़ुरआन के अतिरिक्त कोई ऐसा ग्रंथ नहीं पाया जाता, जिसका अक्षर एवं शैली बारह शताब्दी गुज़रने के बावजूद पूर्ण रूप में सुरक्षित हो।’’
(लाइफ़ ऑफ़ मुहम्मद)

इस्लाम कब से?
आज अधिकांश लोगों में यह भ्रम प्रचलित है कि इस्लाम के संस्थापक हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) हैं। यद्यपि सत्य यह है कि हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) कोई नया धर्म लेकर नहीं, बल्कि उसी धर्म के अन्तिम संदेष्टा थे, जो धर्म ईश्वर ने समस्त मानवजाति के लिए चुना था। हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) इस्लाम के संस्थापक नहीं, बल्कि उसके अंतिम संदेष्टा हैं। यही वह धर्म है जिसकी शिक्षा मनुष्य को दी गई थी। सबसे पहले मानव आदम हैं जिनकी रचना ईश्वर ने बिना माता-पिता के की थी और उनके बाद उनकी पत्नी हव्वा को उत्पन्न किया था। इन्हीं दोनों पति-पत्नी से मनुष्य के उत्पत्ति का आरंभ हुआ, जिनको कुछ लोग मनु और सतरोपा कहते हैं, तो कुछ लोग ऐडम और ईव। जिनका विस्तारपूर्वक उल्लेख पवित्र क़ुरआन (2/30-38) तथा भविष्य पुराण प्रतिसर्ग पर्व (खंड 1 अध्याय 4) और बाइबल (उत्पत्ति 2/6-25) और दूसरे अनेक ग्रंथों में किया गया है। ईश्वर ने हर युग में प्रत्येक समुदाय को उनकी अपनी ही भाषा में शिक्षा प्रदान किया, (सूरः इब्राहीम, 14:4)। उसी शिक्षा के अनुसार जीवन-यापन का नाम इस्लाम था, जिसका नाम प्रत्येक संदेष्टा अपनी-अपनी भाषा में रखते थे जैसे संस्कृत में नाम था ‘सर्व समर्पण धर्म’ जिसका अरबी भाषा में अर्थ होता है ‘‘इस्लाम धर्म’’।
ज्ञात यह हुआ कि मानव का धर्म आरंभ से एक ही रहा है, परन्तु लोगों ने अपने-अपने गुरुओं के नाम से अलग-अलग धर्म बना लिया और विभिन्न धर्मों में विभाजित हो गए।
आज हमारी सबसे बड़ी आवश्यकता यही है कि हम अपने वास्तविक ईश्वर की ओर पलटें, जिसका संबंध किसी विशेष देश, जाति या वंश से नहीं, बल्कि वह सम्पूर्ण संसार का स्रष्टा, अन्नदाता और पालनकर्ता है। ईश्वर ही ने हम सबको पैदा किया, वही हमारा पालन-पोषण कर रहा है, तो स्वाभाविक तौर पर हमें केवल उसी की पूजा करनी चाहिए, इसी तथ्य का समर्थन प्रत्येक धार्मिक ग्रंथों ने भी किया है। इस्लाम भी यही आदेश देता है कि मात्र एक ईश्वर की पूजा की जाए, इस्लाम की दृष्टि में स्वयं मुहम्मद (सल्ल॰) की पूजा करना अथवा आध्यात्मिक चिंतन के बहाने किसी चित्र का सहारा लेना महापाप है।

 सुनो अपने ईश्वर की—
‘‘लोगो! एक मिसाल दी जाती है, ध्यान से सुनो! जिन पूज्यों को तुम अल्लाह को छोड़कर पुकारते हो वे सब मिलकर एक मक्खी भी पैदा करना चाहें तो नहीं कर सकते। बल्कि यदि मक्खी उनसे कोई चीज़ छीन ले जाए तो वे उसे छुड़ा भी नहीं सकते। मदद चाहने वाले भी कमज़ोर और जिनसे मदद चाही जाती है वह भी कमज़ोर, इन लोगों ने अल्लाह की क़द्र ही नहीं पहचानी जैसा कि उसके पहचानने का हक़ है।’’ (क़ुरआन, 22:73-74)


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प्रश्न - यह तो सभी सत्य मानेंगे कि  इसलाम अरब से आया।।
अरब से आया तो वो मूल नस्ल।।
वाकी जो आज हैं वो कहा से, और कैसे आये।।

उत्तर - इस्लाम के सम्बन्ध में आम तौर पर यह कहा जाता है कि यह धर्म सातवी शताब्दी ईसवी में मुहम्मद साहिब का लाया हुआ धर्म है। हालांकि इस्लाम मुहम्मद सल्ल० का लाया हुआ धर्म नहीं और न ही वह इस्लाम के संस्थापक हैं। अधिकांश लोग इसी तथ्य को न समझ सके जिसके कारण यह कहने लगे कि इस्लाम मुहम्मद सल्ल0 का लाया हुआ धर्म है अथवा एक नया धर्म है। हालांकि हर मुसलमान यह जानता मानता तथा इस बात पर आस्था रखता है कि मुहम्मद सल्ल0 इस्लाम के संस्थापक नहीं बल्कि उसको अन्तम स्वरूप देने वाले हैं। ऐसा ही जैसे किसी एक देश में भारत का राजदूत भेजा जाता है तो राजदूत को अपने आदेश का पालन कराने का अधिकार उस समय तक रहता है जब तक अपने पद पर आसीन रहे। जब दो साल की अवधि गुज़रने के बाद दूसरा राजदूत आ जाए तो पहला राजदूत अपना आदेश नहीं चला सकता क्योंकि उसकी कार्य-अवधि समाप्त हो चुकी, ऐसा ही ईश्वर ने मानव को पैदा किया तो जिस प्रकार कोई कम्पनी जब कोई सामान तैयार करती हैं तो उसके प्रयोग का नियम भी बताती है उसी प्रकार ईश्वर ने मानव को संसार में बसाया तो अपने बसाने के उद्देश्य से अवगत करने के लिए हर युग में मानव ही में से कुछ पवित्र लोगों का चयन किया ताकि वह मानव मार्गदर्शन कर सकें

इस्लाम के अनुसार ईश्वर ने यह संसार बनाया और इंसान को आप ने उत्तराधिकारी की हैसियत से यहाँ बसाया। उसके लिए जिंदगी बसर करने के सारे साधन दिए। उसे बुद्धि दी कि वह इन साधनों से किस प्रकार लाभान्वित हो। उसको इरादे और अमल की आजादी दी। इसके अलावा उसके मार्गदर्शन के लिए दो श्रृंखलाएँ जारी कीं- (1) अलकिताब (सभी आसमानी किताबें) (2) अर्रसूल (वे सारे पैगम्बर जो समय-समय पर धरती पर आए)।

पहले नबी (ईशदूत) इस धरती पर हजरत आदम (अ.स.) आए।निचे लिंक खोल कर देखे 
https://hi.m.wikipedia.org/wiki/सर्वप्रथम_पितृवंशी_पुरुष
https://hi.m.wikipedia.org/wiki/सर्वप्रथम_पितृवंशी_पुरुष

 उनको सरानदीप (श्रीलंका) में उतारा गया। वहाँ से चलकर भारत होते हुए वे अरब पहुँचे। इस प्रकार भारत वह पवित्र धरती है, जिसे सबसे पहले नबी के कदमों ने रौनक बख्शी। हजरत आदम (अ.स.) से लेकर आखरी नबी हजरत मोहम्मद स.अ. तक सबका पैगाम और मिशन एक ही था।

उसका नाम इस्लाम अर्थात ईश्वर के समक्ष अपने आपको नतमस्तक कर देना। इस तरह देखें तो इस्लाम-भारत का मूल धर्म है, जो सदा से चला आ रहा है- सनातन धर्म का अर्थ भी यही है। यह ईश्वर और बंदे को मिलाने वाला एक सीधा रास्ता-शाश्वत धर्म है। इस प्रकार ईश्वर समय-समय पर इंसानों के मार्गदर्शन के लिए अपने पवित्र बंदों का नबी और रसूल बनाकर भेजता रहा। ये पवित्र हस्तियाँ हर देश में और हर जाति में आईं। इन सबका पैगाम एक ही था।
कुरआन बताता है कि तुम्हारा प्रभु अत्यंत दयावान और कृपाशील है। यह उनकी दया और कृपा ही है कि उसने तुम्हारे जीवन में मार्गदर्शन के लिए अपने पैगम्बर और ईशदूत भेजे। जिंदगी की राहों में तुम्हें अँधेरे में भटकने के लिए नहीं छोड़ दिया। इंसान ने अपनी जीवन यात्रा ईश्वरीय ज्ञान के प्रकाश में शुरू की थी, अँधेरे में नहीं।


 प्रश्न -संस्कृति और ज्ञान तो जीवन के आरम्भ के पूर्व भी था जो प्रकृति जन्य था और प्रकृति मान्य।। तव ज्ञान देना धर्मों  को या उस ईश्वर को ज्ञान देने की जरूरत 2000 साल पहेले ही क्यों हुई।।क्या उस से पूर्व ज्ञान की आवश्यकता नहीं थी। 

उत्तर- महोदय देखे इस विसय में क़ुरआन क्या कहता है 
अल्लाह ईश्वर क़ुरान में फरमाते है 
पहले वाले किताबो में कोई कमी ना थी लेकिन कुच्छ बेईमान लोगो ने अपने फायदे के लिए उसमे मिलावट कर दिए फिर अल्लाह ने उन सारे बुराइयो को काट छाट कर क़ुरान को नाज़िल किया 
Surah 5
48.
और हमने तुम्हारी ओर यह किताब हक़ के साथ उतारी है, जो उस किताब की पुष्टि करती है जो उसके पहले से मौजूद है और उसकी संरक्षक ह

उसने (अल्लाह) ने तुम्हारे लिए दीन का वही तरीका मुकर्रर किया है जिसका हुक्म उसने नूह को दिया था और जिसे (ऐ मुहम्मद स.अ.व) अब तुम्हारी तरफ  हमने वही के जरिए से भेजा है और जिसकी हिदायत हम इब्राहीम और मूसा और ईसा को दे चुके हैं, इस ताकीद के साथ ही कायम करो इस दीन को और इसमें विभाजित न हो जाओ। सूरह 42 आयत 13                                            
वह किताब यही हैं, (क़ुरान)जिसमें कोई सन्देह नहीं, मार्गदर्शन हैं डर रखनेवालों के लिए, । सूरह 2 आयत 2 

सुहुफ़-ए-ऊला“
अरबी भाषा के दो शब्दों सुहुफ़+ऊला से मिलकर बना है, “सुहुफ़” बहुवचन है सहीफे का, और “सहीफ़े” का मूल अर्थ है, ग्रंथ “ऊला” शब्द अव्वल का स्त्रीवाचक है, जिसका मूल अर्थ है “पहले” या “आदि”। अरबी व्याकरण के अनुसार निर्जीव बहुवचन का विशेषण “स्त्री वाचक” होता है। अतः “सुहुफ-ए-ऊला” का मूल अर्थ हुआ “आदि ग्रंथ”। यही अर्थ “जुबुर-ए-अव्वलीन” का है। यह अद्भुत संयोग है कि हिन्दू धर्म पुस्तकों (वेदों) को ”आदि ग्रंथ“ कहा जाता है। इससे पता चलता है कि क़ुरआन में जिसे “सुहुफ-ए-ऊला” या “ज़ुबुर-ए-अव्वलीन” कहा गया है वह सायद भारतीय धर्म ग्रन्थों (वेदों) का ही वर्णन है, जो संख्या में चार हैं। इसी कारण कु़रआन मंे भी उनके लिए सार्वजनिक बहुवचन शब्द का प्रयोग है। इसके अतिरिक्त वेद एवं क़ुरआन की शिक्षाओं में जो समानता पाई जाती है उससे भी इस दावे की पुष्टि होती है।
विस्तार से जानने के लिए देखें - सैयद अब्दुल्ला तारिक़ की पुस्तक:
‘‘कुरआन और वेद् कितने दूर कितने पास‘‘ प्रकाशित :- रोशनी पब्लिकेशन हाऊस, बाज़ार नसरूल्लाह ख़ां - रामपुर (नवाबान)

क़ुरआन में है- “ईश्वर ने तुम्हारे लिए वही धर्म स्थापित किया है जो “नूह“ को दिया था, “इब्राहिम“ को “मूसा“ और “ईसा“ को दिया था।“ सूरह शूरा आयत 13
मुहम्मद साहब सल्ल0 ने भी कहा है कि - ”मैं कोई नया धर्म लेकर नही आया। अपितु वह ही धर्म लाया हूँ, जो आदम लाए थे, नूह लाए थे इब्राहीम लाए थे एवं मूसा व ईसा मसीह लाये थे“। - हदीस
मुहम्मद साहब की इस हदीस में पाँच ईशदूतों, अथवा यह कहें कि पाँच अवतारों का वर्णन है, इनमें प्रथम के दो ऐसे, है जिनका संबंध भारत की धरती से बताया गया है।

ऐसे ही कु़रआन में अनेक स्थानों पर इस्लाम धर्म को “दीन-ए-क़य्यिम” कहा गया है। दीन का मूल अर्थ होता है धर्म एवं “क़य्यिम” का मूल अर्थ है जो सदैव से क़ायम हो, अतीत से चला आ रहा हो, एवं कभी उस की श्रृंखला टूटी न हो, संस्कृत में इसी के लिए “सनातन” के शब्द का प्रयोग होता है। गोया केवल भाषा का अन्तर है, ख़्याल रहे की ईश्वर के लिए सारी भाषाएं समान हैं क्योकि सब उसी के द्वारा बनाई गई हैं।




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इस्लाम की शुरुआत कब से हुई

 प्रायः यह पूछा जाता है कि इस्लाम से 
पहले कौन सा धर्म था ? अगर इस्लाम ही सच्चा धर्म है तो क्या 
उससे पहले के 
व्यक्ति की मुक्ति नहीं 
होगी ?... 
यह अक्सर प्रश्न नॉन-मुस्लिम भाई पूछते 
रहते हैं. 
वैसे इसका एक मुख्य कारण है : 
क्यूं कि वे समझते हैं कि इस्लाम 
 मुहम्मद सल्ल० द्वारा बनाया गया मात्र 
1400 साल 
पुराना धर्म है. 
यह प्रश्न भी इसी ग़लतफ़हमी के चलते ही 
लोगों के ज़ेहन में 
रचा बसा है कि, 
इस्लाम धर्म केवल 1400 साल पहले से है , 
और मुहम्मद सल्ल० उसके संस्थापक हैं 
जब कि मुहम्मद सल्ल० 
 इस्लाम के संस्थापक नहीं बल्कि 
 अंतिम प्रवर्तक यानि आखिरी रसूल थे, 
और स्पष्ट है कि जिसका कोई अंतिम हो 
उसका कोई पहला भी होगा. 
 तो वह पहला कौन है ? कुरआन में कई जगह 
इसका ज़िक्र है 
कि , 
आदम अलैह० ही वह प्रथम है. 
वही प्रथम प्रवर्तक यानि ईश्वर के प्रथम 
दूत भी थे , 
 जिन्होंने अपनी संतानों को ईश्वरीय 
सन्देश पहुँचाया और 
ईश्वरीय शिक्षा दी, 
और जो कुछ भी उन्होंने बताया, 
 वही उस वक़्त का इस्लाम था या 
यूँ कहें कि उन्हीं से इस्लाम धर्म का 
आरम्भ हुआ. 
यहाँ यह प्रश्न उठता है कि वह आज के 
मुसलमान की तरह 
नमाज़, रोज़ा करते अथवा ज़कात आदि देते 
थे? 
इसका स्पष्ट उत्तर है कि यह ज़रूरी नहीं 
कि , 
उन्हें भी हूबहू ऐसा ही करने का आदेश हो 
क्यूं कि मात्र रोज़ा नमाज़ आदि का नाम 
ही इस्लाम नहीं है , 
 बल्कि ईश्वरीय आदेशों के पालन का ही 
इस्लाम है. 
अतः मुहम्मद सल्ल० से पहले 
जितने भी नबी अथवा रसूल अथवा सन्देश 
वाहक आये और 
जिनकी संख्या हदीसों में 1 लाख 24 हज़ार 
बताई गयी है, 
जो कुरआन के अनुसार अलग क्षेत्रों में 
अलग अलग भाषाओँ 
में उपदेश लेकर आये. 
उन्होंने अपने अपने समय में , 
जो कुछ भी पेश किया वही उस समय का 
इस्लाम था. 
यहाँ यह पुष्टि भी बेहद ज़रूरी है कि , 
कुरआन हमें यह बताता है कि दुनियां के, 
 हर क्षेत्र में और राष्ट्र में ईश्वर ने अपना 
पैग़ाम पहुँचाने के 
लिए और सत्य मार्ग बतला ने के लिए 
मार्गदर्शक भेजे हैं. 
वह अपने लोगों को जो पैग़ाम देते थे वही 
उस समय 
का इस्लाम था.



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 सूरह  9/आयत 5 ज़िक़्र किया जाता है उसको पूरा बता देते हैं. यह सूरः तब नाज़िल हुई जब मुसलमानों और मक्का के मुशरिकों(बहुदेवावादियों) के बीच हुई संधी को मक्का के मुशरिकों ने तोड दिया और मुसलमानों पर आक्रमण का प्रपंच रचनें लगे... तब अल्लाह ने यह सूरः नाज़िल की और उन मुशरिको को, जिन्हों ने संधी तोड़ी थी, को 4 महीने का समय दिया. अगर इन चार महीनों में यह सीधे रास्ते पर नहीं आते हैं तो इन से जंग करो और जंग के समय में, जंग में (डरो नहीं), जहाँ पाओ इन का क़त्ल करो.... ज़ाहिर सी बात है कोई भी दुश्मन से अपनी आत्म रक्षा के लिये यही निर्णय लेगा व ऐसा आदेश पारित करेगा...यह एक साधाहरण सी मानवीय प्रवर्ती है... . प्रश्न उठता है कि आरोप लगानें वालों को इसके आगे वाली आयत(5) नहीं दिखती, क्यू? क्यूंकि भ्रम और अराजकता फैलानें वलों को सिर्फ ऐसी ही चीज़ें दिखती हैं, जिसको वोह गलत ढंग से पेश कर के लोगों में बैर पैदा कर सकें. -- आगे की आयत में अल्लाह कहता है, (9/6) में "जो लोग तुम्हारे संरक्षण में आते हैं (शान्ति चाहते है) उनको अपनी सुरक्षा में एक ऐसी सुरक्षित जगह पर ले जा कर पहुँचा दो, जहां पर वोह अल्लाह का पैगाम (शान्ति का पैगाम) सुन लें, अर्थात सुरक्षित हो, क्यूंकि यह वोह लोग हैं जो ग्यान नहीं रखते. – इन लोंगों को आयत नंबर 4 और 7 भी नहीं दिखती... 9/4 में अल्लाह कहता है "जिन मुशरिकों से तुम्हारी संधी है और उन्होने तुम्हारे विरुद्ध दूसरों का साथ दिया है, तो उनके साथ सन्धि, संधी के समय तक पूरी करो." 9/7 में अल्लाह कहता है "जिन लोगों ने तुम्हारे साथ "खाना-ए-क़ाबा" के पास सन्धि की थी और अगर वोह इस को क़ायम रखना चाहे तो तुम भी सन्धि को क़ायम रखो. --- . सूरः तौबा में 129 आयतें हैं, लेकिन शैतानी प्रवित्ति के लोगों को सिर्फ आयत नंबर "5" दिखती हैं, क्यूंकि इस आयत को बिना संदर्भ के उधृत कर के लोगों में गलत बात फैलाई जा सकती हैं. 

यहाँ देखें 

जिन लोगों ने तुमसे दीन के बारे में जंग नहीं की और न तुम को तुम्हारे घरों से निकला,उन के साथ भलाई और इंसाफ का सुलूक करने से ख़ुदा तुम को मना नहीं करता । ख़ुदा तो इंसाफ करने वालों को दोस्त रखता है ।
-कुरआन, सूरा 60 , आयत-8

ख़ुदा उन्हीं लोगों के साथ तुम को दोस्ती करने से मना करता है , जिन्होंने तुम से दीन के बारे में लड़ाई की और तुम को तुम्हारे घरों से निकला और तुम्हारे निकलने में औरों की मदद की , तो जो  लोग ऐसों से दोस्ती करेंगे , वही ज़ालिम हैं ।
-क़ुरआन , सूरा 60 , आयत- 9

इस्लाम के दुश्मन के साथ भी ज्यादती करना मना है देखिये:

और जो लोग तुमसे लड़ते हैं, तुम भी ख़ुदा की राह में उनसे लड़ो , मगर ज्यादती न करना की ख़ुदा ज्यादती करने वालों को दोस्त नहीं रखता ।
-क़ुरआन , सूरा 2 , आयत-190

इस्लाम द्वारा, देश में हिंसा ( फ़साद ) करने की इजाज़त नहीं है । देखिये अल्लाह का यह आदेश: 

लोगों को उन की चीज़ें कम न दिया करो और मुल्क में फ़साद न करते फिरो।
-क़ुरआन , सूरा 26 , आयत-183 

इस्लाम में किसी को जोर ज़बरदस्ती से मुस्लमान बनाने की सख्त मनाही है । क़ुरआन माजिद में अल्लाह के ये आदेश :

और अगर तुम्हारा परवरदिगार ( यानि अल्लाह ) चाहता, तो जितने लोग ज़मीं पर हैं, सब के सब इमा ले आते । तो क्या तुम लोगों पर ज़बरदस्ती करना चाहते हो की वे मोमिन ( यानि मुस्लमान ) हो जाएं ।
-क़ुरआन, सूरा 10 , आयत-99 

दिने इस्लाम में ज़बरदस्ती नहीं है ।
-क़ुरआन , सूरा 2 , आयात-256 

अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया :
 
इस्लामी हुकूमत में किसी ऐसे गैर मुस्लिम नागरिक पर जिसकी जान-माल, इज्जत आबरु की हिफाजत का मुसलमानों ने समझोता किया है, जो व्यक्ति जुल्म करेगा, या उसका हक मारेगा या उस पर उसकी ताकत से अधिक बोझ डालेगा या गैर मुस्लिम नागरिकों की कोई चीज उसकी रजामंदी के बगैर ले लेगा तो मैं अल्लाह की अदालत में दायर होने वाले मुकदमे में उस गैर-मुस्लिम नागरिक की ओर से वकील बनूंगा
 
(सुनन अबु दाऊद : 3052)

अब देखिये वेद क्या कहता है और मनुस्मृति की क्या आज्ञा है 

ते यं द्विष्मो यश्च नो द्वेष्टि तमेषां जम्भे दध्मः
"हम लोग जिस से अप्रीति करें और जो हम को दुःख दे उसको इन वायुओं की बीडाल के मुख में मूषे के सामान पीड़ा में डालें |" [यजुर्वेद 16:65 दयानन्द भाष्य]

वृश्च प्र वृश्च सं वृश्च दह प्र दह सं दह |
"तू वेद निन्दक को, काट डाल, चीर डाल, फाड़ डाल, जला दे, फूँक दे, भस्म कर दे।" भावार्थ: धर्मात्मा लोग अधर्मियों के नाश में सदा उद्यत रहें [अथर्ववेद काण्ड12: सूक्त 5: मंत्र 62 पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी भाष्य]



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