Friday, 23 April 2021

अल्लाह की हिदायत।

प्रश्न, अल्लाह जब हमारे दिलो पर मोहर लगा कर हमें हिदायत नही देते है तो इसमें हमारा क्या दोश. 

उत्तर, अल्लाह का दिलो मे मोहर लगा देने का अर्थ ?
अल्लाह केवल उनही के दिल पर मोहर लगाते है जो जान बूझकर सच को झुठला देते है और उसे स्वीकार नहीं करते। अल्लाह उनही के दिल पर मोहर लगाते है जो जानबूझकर सच को जान लेने के बाद, हठधर्मी की बुनियाद पर दूसरे चरण की हिदायत का इंकार कर देते है । अतः आप जब भी कुरआन मे देखेंगे दिल मे मोहर लगने का वर्णन वहाँ आपको सरकशकों का ज़िक्र मिलेगा। देखें कुरआन 2:7, 4:168 और 16:106-109
क़ुरआन मे आता है, अल्लाह ने उनके दिलों पर और कानों पर (अपने कानून के मुताबिक) मुहर लगा दी है और उनकी आँखों पर परदा पड़ा है, और उनके लिए बड़ा आज़ाब है । [कुरआन: 2:7

यानी अपने इस क़ानून के मुताबिक़ जो क़ुरआन में जगह जगह बयान हुआ है और जिस के हिसाब से जब कोई शख़्स हक़ के मुक़ाबले में सरकशी इख़तियार करता और जानते बूझते इसे मानने से इनकार कर देता है तो अल्लाह तआला की तरफ़ से उसे मोहलत दी जाती है । फिर उस मोहलत से वो अगर फ़ायदा उठाने के लिए तैय्यार नहीं होता तो इस के दिल-ओ-दिमाग़ पर मोहर कर दी जाती है और इस तरह वो ईसी दुनिया में ख़ुदा के अज़ाब की लपेट में आ जाता है। इस मोहर के नतीजे में आदमी का रवैया इस क़दर बिगड़ जाता है और इस के सोचने समझने की सलाहीयत इस क़दर प्रभावित हो जाती है कि सिर्फ़ वही बातें उसे अच्छी लगती हैं जिन से इस के बिगड़े हुए रवैये को पोषण मिले । उस की सारी दिलचस्पी सिर्फ़ बदी के कामों से रह जाती है। नेकी की बात माक़ूल से माक़ूल तरीके में भी कही जाये तो इस से उस को वहशत होती है । वो कभी दिल की आमादगी और इस के हज़ूर के साथ उसे सुनने के लिए तैय्यार नहीं होता। इस क़ानून के स्पष्टीकरण के लिए देखिए : सूरा-ए-निसा (४) आयत ५५ , अल आराफ़ (७ ) आयात १००- १०२, अन नहल (१६) आयात १०६-१०८ और अस सफ़(६१) आयत ५. इस से ये हक़ीक़त वाज़िह होती है कि आदमी के अंदर ईमान-ओ-हिदायत की दावत इस के दिल-ओ-दिमाग़ और उस की आँखों और कानों ही के रास्ते से दाख़िल होती है। वो अगर अनफ़स-ओ-आफ़ाक़ (अंदरूनी और बाहरी दुनिया) की निशानीयों पर अंतर्दृष्टि की निगाह डाले, उन पर ग़ौर करे ,ख़ुदा के कलाम और दावत हक़ के मानने वालो की बातें ध्यान से सुने तो उस को हिदायत मिलती है ;और उन्हें देखने ,सुनने और समझने से इनकार कर दे तो गुमराही और ज़लालत की भूल भलियां इस का मुक़द्दर ठहरती हैं ,ईमान-ओ-हिदायत की राह फिर इस के लिए हरगिज़ नहीं खुल सकती”।

[तफ़सीर अल बयान]

बिलकुल यही बात का बयान कुरआन मे दूसरी जगह कुछ इस तरह मिलता है: 
उनमें से अधिकतर लोगों पर बात सत्यापित हो चुकी है। अतः वे ईमान नहीं लाएँगे। हमने उनकी गर्दनों में तौक़ डाल दिए है जो उनकी ठोड़ियों से लगे है। अतः उनके सिर ऊपर को उचके हुए है। हमने एक दीवार उनके आगे बना दी है और एक दीवार उनके पीछे फिर ऊपर से उनको ढाँक दिया है तो वह कुछ देख नहीं सकते । उनके लिए बराबर है तुम उन्हे सचेत करो या न करो, वे ईमान नहीं लाएँगे । [कुरआन: 36: 9-10
“तौक” से मुराद उनकी अपनी हठधर्मी है जो उनके लिए सत्य को स्वीकार करने मे रोक बन रही है। “ठोड़ियों से लगे है” और “ऊपर को उचके हुए” से मुराद वह गर्दन कि अकड़ है जो अहंकार और दंभ का परिणाम होती है ।

ऐसे लोगो को जिनहोने सच को सच जान लेने के बाद केवल हठधर्मी की बुनियाद पर इंकार कर दिया और सरकशी इख्तियार की ऐसे लोगो को अल्लाह तआला ने जानवरो से भी बदतर बताया है [कुरआन 7:179, 25:44, और 8:22] और ऐसे ही लोगो को अंधा गूंगा और बेहरा कहा है न की हर ग़ैर मुस्लिम को ।

क़ुरआन मे आता है," निश्चय ही हमने बहुत-से जिन्नों और मनुष्यों को जहन्नम ही के लिए फैला रखा है। उनके पास दिल है जिनसे वे समझते नहीं, उनके पास आँखें है जिनसे वे देखते नहीं; उनके पास कान है जिनसे वे सुनते नहीं। वे पशुओं की तरह है, बल्कि वे उनसे भी अधिक पथभ्रष्ट है। वही लोग है जो ग़फ़लत में पड़े हुए है।" [कुरआन 7:179] मौलाना अमीन अहसन इसलाही इस आयत कि व्याख्या में लिखते है, "अब ये बताया कि कौन लोग हैं जो हिदायत से महरूम (जिसे न मिला हो) रहते हैं और आखिरकार वो जहन्नुम के ईंधन बनते हैं। फ़रमाया कि ये जिन्नों और इंसानों में से वो लोग हैं जिन को ख़ुदा ने दिल तो दिए हैं लेकिन वो उन से समझने का काम नहीं लेते, उन को आँखें तो बख़्शी लेकिन वो उन से देखने का काम नहीं लेते, उन को कान तो इनायत फ़रमाए लेकिन वो उन से सुनने का काम नहीं लेते। ज़ाहिर है कि ये समझना, देखना और सुनना अपने वास्तविक भाव के लिहाज़ से है। यानी उन्हों ने अपनी सारी सलाहीयतें बस अपनी ख़ाहिशात की ताबेदारी में लगा रखी हैं। उन से हट कर किसी चीज़ को सुनने समझने और उस को इख़तियार करने का उन के अंदर हौसला नहीं पाया जाता। फ़रमाया कि ये लोग चौपायो के समान बल्कि उन से भी ज़्यादा मूर्ख हैं। चौपायो के समान इस वजह से कि जिस तरह चौपायो की तलब-ओ-जुस्तजू बस अपने पेट और तन के आवश्यकताओ ही तक सीमित होती है इसी तरह उन की कोशिशें भी अपनी भौतिक ज़रूरीयात-ओ-ख़ाहिशात ही तक सीमित है और चौपायो से ज़्यादा बेअक़ल इस वजह से हैं कि चौपाए बहरहाल अपनी जिबिल्लत की तमाम सलाहीयतों से फ़ायदा उठाते हैं, इस में वो कोई कसर नहीं उठा रखते लेकिन इंसान की फ़ित्रत के अंदर क़ुदरत ने जो आला सलाहीयतें रखी हैं उन से ना सिर्फ़ ये कि वो वास्तविक फ़ायदा नहीं उठाता बल्कि कई बार इस से ऐसी हरकतें होती हैं जो एक बैल या गधे से कभी नहीं होतीं। मसलन इंसान इंसान हो कर इतना बेअक़ल और कज फ़हम बन जाता है कि दरख़्तों, पत्थरों और जानवरों की उपासना शुरू कर देता है लेकिन एक गधा या बैल ऐसी बे अकली कभी नहीं कर सकता। फ़रमाया कि यही लोग हैं जो असली और वास्तविक बेख़बर हैं इस लिए कि ये बेख़बरी चौपायो में भी नहीं है। इस से वाज़िह हुआ कि ये जो फ़रमाया है कि हम ने जहन्नुम के लिए पैदा किया। तो इस का मतलब ये नहीं है कि उन को उन की माओं के पेट से जहन्नुम के लिए पैदा किया। माओं के पेट से तो अल्लाह ताला ने दिल, दिमाग़, समा (सुनना), बसर (देखना) की सलाहीयतों के साथ पैदा किया है लेकिन कानून ये बना दिया है कि जो इन सलाहीयतों से सही फ़ायदा उठाएंगे 

अल्लाह किसे हिदायत नही देते है 
 खुदा झूठे ना शुक्र को हिदायत (मार्ग) नही देता"। 39, 3 
और खुदा ऐसे हठधर्मी करने वालो को हिदायत नही करता"। 3, 86 
जो ईमान नही लाते अल्लाह की निशानियों पर अल्लाह उन्हें हिदायत नही देता"। 16, 104 
 अल्लाह नाफ़रमान लोगो को हिदायत नही देता"। 63, 6 
खुदा जालिम लोगो की हिदायत नही करता"। 9, 19 
और वह उन्हें उनके ही सरकसी में बहकते छोड़ देता है"। 7, 186 
खुदा की शान नही की किसी को उसके बाद गुमराह करे, जबकि उसने उन्हें हिदायत दे दी, जबतक उनपर वाजेह न कर दे जिससे वह परहेज़ करे, बेसक अल्लाह हर शय को जानता है"। 9, 115

मगर जिन लोगो ने इसके बाद तौबा कर ली और अपनी खराबी की इस्लाह कर ली तो बेसक अल्लाह बख्शने वाला रहम करने वाला मेहरबान है"। 3, 89 

No comments:

Post a Comment

मस्जिदे अक्सा।

मस्जिद ए अक्सा अथवा बैतुल मुकद्दस इस्लाम की तीसरी सबसे महत्वपूर्ण मस्जिद है, बुखारी शरीफ मे नबी करीम सल्ल. की एक हदीस के अनुसार मस्जिद ए अक्...