Friday, 23 April 2021

नराशंस, अंतिम ऋषि, कल्कि।


नराशंस और अन्तिम ऋषि
अन्तिम बुद्ध-मैत्रेय
            ‘ऋषि’ को बोद्ध धर्म की भाषा में ‘बुद्ध’ कहा जाता हैं। अन्तिम बुद्ध के विषय में भविष्यवाणी का स्वरूप प्रस्तुत हैं, जिसे गौतम बुद्ध ने अपने मृत्यु काल के समय अपने प्रिय शिष्य नन्दा से बताया था। ‘नन्दा! इस संसार में मैं न तो प्रथम बुद्ध हूं और न तो अन्तिम बुद्ध हूं। इस जगत में सत्य तथा परोपकार की शिक्षा देने के लिए अपने समय पर एक और ‘बुद्ध’ आएगा। वह पवित्र अन्त: करण वाला होगा। उसका हृदय शुद्ध होगा। ज्ञान और बृद्धि से सम्पत्र तथा समस्त लोगों का नायक होगा। जिस प्रकार मैंने जगत को अनश्वर सत्य की शिक्षा प्रदान की हैं, उसी प्रकार वह भी जगत को सत्य की शिक्षा देगा। जगत को वह ऐसा जीवन मार्ग दिखाएगा, जो शुद्ध (अमिश्रित) तथा पूर्ण भी होगा। नन्दा! उसका नाम मैत्रेय होगा।’’ 
    
    ‘बुद्ध’ का अर्थ ‘बुद्धि से युक्त’ होता है। बुद्ध मनुष्य ही होते हैं देवता आदि नहीं।  

                बुद्ध की विशेषताएं
  बुद्ध ऐश्वर्यवान एवं धनवान होता हैं।
  बुद्ध सन्तान से युक्त होता हैं।
बुद्ध स्त्री तथा शासन से युक्त होता हैं।
 बुद्ध अपनी पूर्ण आयु तक जीवित रहता है।

  बुद्ध पद को प्राप्त व्यक्ति का यह सिद्धान्त होता है, कि अपनी सिद्धि के लिए अपना कार्य स्वंय करना चाहिए। बुद्ध केवल धर्म प्रचारक होते हैं। बुद्ध को तथागत भी कहा जाता हैं। जिस समय बुद्ध एकान्त में रहता है, उस समय र्इश्वर उसके साथियों के रूप में देवताओं और राक्षसों को भेजता है।’ प्रत्येक बुद्ध अपने पूर्ववर्ती बुद्ध का स्मरण कराता हैं और अपने अनुयायियों को ‘मार’ से बचने की चेतावनी देता हैं। ‘मार’ का अर्थ बुरार्इ एवं विनाश को फैलाने वाला होता है। जिसे उर्दू भाषा में ‘शैतान’ तथा अंग्रेजी में डेविल कहा जा सकता हैं। बुद्ध के अनुयायी पक्के अनुयायी होते हैं, जिन्हे कोर्इ भी उनके मार्ग से विचलित नही कर सकता। संसार मे एक समय मे केवल एक ही बुद्ध रहता हैं।
    बुद्ध के लिए सबसे आवश्यक इस बात का होना हैं, कि संसार का कोर्इ भी व्यक्ति भी उसका गुरू न हो।
    प्रत्येक बुद्ध के लिए बोधिवृक्ष का होना आवश्यक हैं। हर एक बुद्ध के लिए बोधिवृक्ष के रूप में अलग-अलग वृक्ष निश्चित रह हैं।

बुद्ध मैत्रेय की विशेषताएं

मैत्रेय का अर्थ होता हैं-दया से युक्त।

बुद्ध होने के कारण अन्तिम बुद्ध मैत्रेय में भी बुद्ध में भी बुद्ध की सभी बुद्ध होने के कारण अन्तिम बुद्ध मैत्रेय में भी बुद्ध की सभी विशेषताएं पार्इ जाएगी।

    मैत्रेय बोधिवृक्ष के नीचे सभा का आयोजन करेगा।?
बोधिवृक्ष के दो प्रकार हैं- (1) सांसारिक वृक्ष, (2)स्वर्गीय वृक्ष। बोधिवृक्ष के नीचे बुद्ध को ज्ञान प्राप्ति होती हैं।
इस समय हम स्वर्गीय बोधिवृक्ष के विषय में कुछ विवरण प्रस्तुत कर रहे है।

1-    स्वर्गीय बोधिवृक्ष बहुत ही विस्तृत क्षेत्र में हैं।
2-    ज्ञान प्राप्ति के बाद बुद्ध स्थिर दृष्टि से उस बोधिवृक्ष को देखता है।

सामान्य मनुष्यों की अपेक्षा बुद्धों के गर्दन की हड्डी अत्यधिक दृढ़ होती थी, जिससे वे गर्दन मोड़ते समय अपने पूरी शरीर को हाथी की तरह घुमा लेते थे। मैत्रेय में भी उक्त गुण का होना स्वाभाविक हैं।

        अब हम यह सिद्ध करेंगे कि कौन ऐसा व्यक्ति हैं, जिस पर बुद्धों की सभी विशेषताएं पूरी उतरती हैं और जो मैत्रेय की कसौटी पर खरा उतरता हैं।
    
कुरान में मोहम्मद (स अ)साहब के ऐश्वर्यवान और धनवान होने के विषय में यह र्इश्वरीय वाणी हैं कि तुम पहले निर्धन थे, हमने तुमको धनी बना दिया। मोहम्मद साहब ऋषि पद को प्राप्त करने के बहुत पहले धनी हो गए थे। मोहम्मद साहब के पास अनेक घोड़े थे। उनकी सवारी के रूप में प्रसिद्ध उंट ‘अलकसवा’ था, जिस पर सवार होकर मक्का से मदीना गए थे और बीस की संख्या में ऊंटनियां थी, दूध ही मोहम्मद साहब व उनके बाल-बच्चों का प्रमुख आहार था। मोहम्मद साहब के पास 7बकरियां थीं, जो दूध का साधन थी। मोहम्मद साहब दूध की प्राप्ति के लिए भैसे नही रखते थे, इसका कारण यह हैं कि अरब में भैंसे नही होती। उनके सात बागे खजूर की थी जो बाद में धार्मिक कार्यो के लिए मोहम्मद साहब द्वारा दे दी गर्इ थी। मोहम्मद साहब के पास तीन भूमिगत सम्पत्तियां थी, जो कर्इ बीघे के क्षेत्र के थीं। मोहम्मद साहब के अधिकार में कर्इ कुंए भी  थे। इतना स्मरणीय हैं, कि अरब में कुआं का होना बहुत बड़ी सम्पत्ति।
समझी जाती है, क्योकि वहां रेगिस्तानी भू-भाग हैं। मोहम्मद साहब के बारह पत्नियां, चार लड़कियां, और 3 लड़के थें। बुद्ध के अन्तर्गत पत्नी और सन्तान का होना द्वितीय गुण हैं। मोहम्मद साहब के पूर्ववर्ती भारतीय बुद्धों में यह गुण नाममात्र को पाया जाता था, परन्तु मोहम्मद साहब के पास उसका बारह गुना गुण विद्यमान था। उनकी पत्नियां के नाम हम नराशंस के वैदिक भाग में उल्लिखित कर चुके हैं।

मोहम्मद(स अ) साहब ने शासन भी किया। अपने जीवन काल में ही उन्होने बड़े-बड़े राजाओं को पराजित करके उन पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया। अरब के सम्राट होने पर भी उनका भोज्य पदार्थ पूर्ववत था।’

मोहम्मद(स अ) साहब अपनी पूर्ण आयु तक जीवित रहे। अल्पायु में उनका देहावसान नही हुआ और न तो वे किसी के द्वारा मारे गए।

मोहम्मद(स अ) साहब अपना काम स्वयं कर लेते थें। उन्होने अपने जीवन भर धर्म का प्रचार किया। उनके धर्म-प्रचारक स्वरूप की पुष्टि अनेक इतिहासकारो ने भी की हैं। यद्यपि उनके विषय में यह बात तो अत्यधिक प्रसिद्ध हैं ही।

जिस समय मोहम्मद (स अ)साहब एकान्त में रहते थे, उस समय कभी-कभी देवता और राक्षस भी उनके पास आ जाया करते थे।

मोहम्मद (स अ)साहब ने भी अपने पूर्ववर्ती ऋषियों का समर्थन किया, इस बात के लिए आप पूरा कुरआन देख सकते हैं। उदाहरण रूप में कुरआन में दूसरी सूर: में उल्लेख हैं कि ऐ आस्तिकों! (मुसलमानों) तुम कहो कि हम र्इश्वर पर पूर्ण आस्था रखते हैं और जो पुस्तक हम पर अवतीर्ण हुर्इ, उस पर और जो-जो कुछ इब्राहीम, इस्माइल, इस्हाक और याकूब पर उनकी सन्तान (के ऋषियों) पर और जो कुछ मूसा और र्इसा को दी गर्इ, उन पर भी और जो कुछ अनेक ऋषियों को, उनके  पालक (र्इश्वर) की ओर से उपलब्ध हुर्इ उन पर भी हम आस्था रखते हैं और उन ऋषियों मे किसी प्रकार का अन्तर नही मानते और हम उसी एक र्इश्वर के मानने वाले हैं।’

मोहम्मद (स अ)साहब ने अपने अनुयायियों को शैतान से बचने की चेतावनी बार-बार दी थी। कुरआन में शैतान से बचने के लिए यह कहा गया हैं, कि जो शैतान को अपना मित्र बनाएगा, उसे वह भटका देगा और नारकीय कष्टों का मार्ग प्रदर्शित करेंगा।

मोहम्मद (स अ) साहब के अनुयायी कभी भी मोहम्मद (स अ)साहब के बताए हुए मार्ग से विचलित न होते हुए उनकी पक्की शिष्यता अथवा मैत्री में आबद्ध रहते है। मोहम्मद साहब का संग उनके अनुयायियों ने आमरण नही छोड़ा, भले ही उन्हे कष्टों का सामना करना पड़ा हों।

संसार में जिस समय मोहम्मद (स अ)साहब बुद्ध थें, उस समय किसी भी देश में कोर्इ अन्य बुद्ध नही था। मोहम्मद (स अ)साहब के बुद्ध होने के समय सम्पूर्ण संसार की सामाजिक और धार्मिक स्थिति, बहुत ही खराब थी, इस बात की पुष्टि ‘कल्कि अवतार और मोहम्मद साहब’ शोध पुस्तक में देख सकते हैं। 

मोहम्मद (स अ ) का कोर्इ भी गुरू संसार का व्यक्ति नही था। मोहम्मद (स अ)साहब पढ़े-लिखे भी नही थी, इसीलिए उन्हे ‘उम्मी’ भी कहा जाता हैं। र्इश्वर द्वारा मोहम्मद
 (स अ) साहब के अन्त:करण में उतारी गर्इ आयतों की संहिता कुरआन हैं। प्रत्येक बुद्ध के लिए बोधिवृक्ष का होना आवश्यक हैं। किसी बुद्ध के लिए बोधिकृत के रूप में अश्वत्थ (पीपल), किसी के लिए न्यग्रोध (बरगद) तथा किसी बुद्ध के लिए उदुम्बर (गूलर) प्रयुक्त हुआ हैं। बुद्ध मैत्रेय के लिए जिस बोधिवृक्ष का होना बताया गया हैं, वह हैं-कड़ी और भारयुक्त काष्ठ वाला वृक्ष।’

मोहम्मद (स अ) साहब के लिए बोधिवृक्ष के रूप में हुदैबिया स्थान में एक कड़ी और भारयुक्त काष्ठवाला वृक्ष था, जिसके नीचे मोहम्मद (स अ) साहब ने सभा भी की थी।

‘मैत्रेय का अर्थ होता हैं-दया से युक्त । 16 अक्टूबर सन 1930 लीडर पृ0 7 कालम 3 में एक बौद्ध  ने ‘मैत्रेय’ का अर्थ ‘दया’ किया हैं। मोहम्मद साहब दया से युक्त थे। इसी कारण से मुहम्मद (स अ) साहब को ‘रहमतुल्लिल्लोमीन’ कहा जाता हैं। जिसका अर्थ हैं-समस्त संसार के लिए दया से युक्त। बुद्धों के अन्तर्गत पार्इ जाने वाली सभी विशेषताएं मोहम्मद (स अ) साहब मे भी विद्यमान थी।

मोहम्मद (स अ) साहब ने भी स्वयं मे एक वृक्ष को देखा था, जो र्इश्वर के सिंहासन के दाहिनी और विद्यमान था, जो इतने बड़े क्षेत्र में था, जिसे एक घुड़सवार लगभग सौ वषोर्ं में भी उसकी छाया को पार नही कर सकता था।
मोहम्मद (स अ) साहब ने भी स्वर्ग मे वृक्ष को आंख बिना गिराए हुए देखे थे। मैत्रेय के विषय में जो यह कहा गया हैं कि किसी भी तरफ मुड़ते समय वह अपने शरीर को पूरा घुमा लेगा। यही मुहम्मद (स अ) साहब के भी विषय मे थी, कि वह बातचीत करने में किसी मित्र की ओर देखते समय अपने शरीर को पूरा घुमा लेते थे।
इस प्रकार यह सिद्ध होता हैं, कि बौद्ध ग्रन्थों में जिस मैत्रेय के होने की भविष्यवाणी की गर्इ हैं, वह अन्तिम ऋषि नबी मोहम्मद (स अ) ही हैं।


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विश्व भर में बहुत सारे पैगम्बर ऋषि, मुनि आये इन में से कुछ भारत में आए। जिन्होंने यहाँ की भाषा में ईश्वर का संदेश दिया परन्तु यह सारी सृष्टि उसी एक सर्वशक्तिमान ईश्वर के द्वारा ही रची गई है जो सारे संसार का मालिक है। अतः उसका मेसेंजर कभी भारत में आये, तो कभी अन्य देशों में, कभी संस्कृत भाषा में अपना संदेश दिया, तो कभी विश्व की अन्य भाषाओं में, क्योंकि सारी धरती उसी की है, एवं विश्व की सारी भाषाएं भी उसी की बनाई हुई हंै। अतः ऋषियों, मुनियों एवं अवतारों व पैग़म्बरों की उसी श्रृंखला में अंतिम ईशदूत  के रूप में मुहम्मद सा0 ने अरब की पृथ्वी पर जन्म लिया, एवं अरबी भाषा में उपदेश दिए। पवित्र “क़ु़रआन” से पहले जितने भी ईश्वरीय धर्म ग्रन्थ आए, उन सभी में बडे़ ही स्पष्ट शब्दों में अंतिम ईशदूत हज़रत मुहम्मद सा0 सल्ल0 की निशानियाँ बताई गई थीं एवं मुहम्मद सा0 सल्ल0 की अंतिम ईश्वरीय दूत के रूप में प्रकट होने की भविष्यवाणी की गई थी। इसी पर प्रकाश डालते हुए संस्कृत के जाने माने विद्वान “डा0 वेद प्रकाश उपाध्याय” अपनी पुस्तक में लिखते है-
”वेदों में बाइबिल में तथा बौद्ध ग्रन्थों में अंतिम ऋषि के रूप में जिसके आने की घोषणा की गई थी वह मुहम्मद साहब ही सिद्ध होते हंै। अतः मेरे अन्तः करण ने मुझे यह प्रेरणा दी कि सत्य को खोलना आवश्यक है। भले ही वह कुछ लोगों को बुरा लगने वाला हो।“
‘‘नराषंस और अंतिम ऋशि’’ पृश्ठ 4
लेखक डा0 वेद प्रकाश उपाध्याय
प्रकाशितः- जु़महुर बुक डिपो, देवबन्द (यू.पी.)
उक्त विषय में डा0 वेद प्रकाश उपाध्याय (जो भारत के दो विश्वविद्यालयों “चण्डीगढ़” एवं “इलाहाबाद” में संस्कृत विभाग के अध्यक्ष रहे हंै।) की दो महत्वपूर्ण पुस्तिकाएँ ‘‘नराशंस और अंतिम ऋषि’’ व “कल्कि अवतार और मुहम्मद साहब” हमारा मार्ग दर्शन करती है।
प्रथम पुस्तिका ‘‘नराशंस और अंतिम ऋषि’’ में वेदों ”बाइबिल” एंव बौद्ध ग्रन्थों में “मुहम्मद साहब” के संबंध में की गई भविष्यवाणियों पर विस्तार से चर्चा की गई है। जब कि दूसरी पुस्तक ”कल्कि अवतार और मुहम्मद साहब“ केवल पुराणों पर आधारित है ।
इन दोनों पुस्तकों में ”डा0 उपाध्याय” ने बहुत ही स्पष्ट रूप से वेदों एवं पुराणों में की गई ”अंतिम ऋषि“ “कल्कि अवतार” के रूप में मुहम्मद साहब सल्ल0 के संबंध से भविष्यवाणियों का वर्णन किया है यहाँ पर उदाहरणार्थ उनकी दोनों पुस्तिकाओं में से एक-एक अंश प्रस्तुत है -डा0 वेद प्रकाश ने अपने इस कथन को सिद्ध करने के लिए जिसमें उन्होंने कहा है कि “वेदों” में, “बाइबिल“ में तथा “बौद्ध“ ग्रन्थों में “अन्तिम ऋषि“ के रूप में जिसके आने की घोषणा की गई थी, वह मुहम्मद साहब ही थे। पवित्र वेदों से अनेक मन्त्र प्रस्तुत किए हैं। उनमें से दो निम्नलिखित हैं -

1. इंदजना उपश्रुत नराशंस स्तविष्यते ........... - अथर्ववेद संहिता 20/127/1
2.उष्ट्रा यस्य प्रवाहणो  ............ - अथर्ववेद 20/127/2
उक्त मंत्रों पर टिप्पणी करते हुए “नराशंस का काल निर्धारण” के अन्तर्गत् डा0 वेद प्रकाश ने लिखा है-
1. ब्रह्म वाक्य में कहा गया है कि ”हे लोगों सुनो नराशंस की प्रशंसा की जाएगी। उपर्युक्त वाक्य “अथर्ववेद“ का है, और “अथर्ववेद“, “ऋग्वेद“, “यजुर्वेद“ तथा “सामवेद“ से बहुत बाद का है। अतः “अथर्ववेद“ के काल के बाद तो नराशंस की उत्पत्ति का होना निश्चित हुआ।
2. नराशंस के वाहन के रूप में ऊँट का प्रयोग उल्लिखित है।
अतः नराशंस की उत्पत्ति का होना उस समय निश्चित हुआ जब ऊँटों का सवारी के रूप में प्रयोग हो।
नराशंस या अन्तिम ऋषि (पेज 7)
यह बताने की आवश्यकता नही कि मुहम्मद साहब जिस क्षेत्र में प्रकट हुए वहां सवारी के रूप में ऊँट का प्रयोग होता था। एवं मुहम्मद साहब भी ऊँट की सवारी करते थे। मक्के से मदीने की “हिजरत” नामक यात्रा उन्होंने ऊँट पर की थी, “फ़तह मक्का” के समय भी वह ऊँट पर सवार थे। इस के अतिरिक्त करीब-करीब सभी प्रमुख यात्राएं आपने ऊँट के द्वारा की हैं।
खेद का विषय है कि आज के आधुनिक युग में भी जो लोग “नराशंस” के ऊँट पर बैठकर आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं वह कौन सी दुनिया में रहते हैं।
नराशंस शब्द का अनुवाद अगर अरबी भाषा में किया जाए तो वह केवल “मुहम्मद” शब्द से ही किया जा सकता है अर्थात् जिसकी प्रशंसा की जाए। स्वयं यह बहुत बड़ा प्रमाण है कि वेदांे के नराशंस ”मुहम्मद साहब“ ही थे।

यहाँ फिर इस बात को दोहराना उचित होगा कि सारी भाषाएं ईश्वर की हैं, एवं सारा संसार ईश्वर का है, वह जिस क्षेत्र में चाहे, और जिस भाषा में चाहे अपनी वाणी एवं अपने संदेश का अवतरण कर सकता है। साथ ही यह बात भी विचारणीय है कि यह तो ईश्वर का बड़ा अन्याय होगा, कि वह संसार के केवल एक विशेष क्षेत्र “भारत” में ही अवतार लेता रहे एवं संसार के एक विशेष भाग में एवं विशेष भाषा में ही उपदेश देता रहे और दूसरे क्षेत्रों एवं भाषाओं को अपने अवतारों एवं उपदेशों से वंचित रखे। ईश्वर के नौ अवतार भारत में हुऐ एक भारत से बाहर हो गया हम उसको इसलिए स्वीकार न करें कि वह भारत में प्रकट नहीं हुआ यह तो बड़ा अन्याय है।
उपरोक्त प्रथम मंत्र में कहा गया है -
  ”हे लोगों सुनो नराशंस की प्रशंसा की जाएगी”।
यह मंत्र अपने में कितना सत्य है रात, दिन में पाँच बार अज़ान होती है जिसमें “मुहम्मद साहब” की नाम सहित प्रशंसा की जाती है, पाँच समय ही नमाजे़ पढ़ी जाती हैं। नमाज़ में भी नाम सहित मुहम्मद साहब की प्रशंसा (दरूद) पढ़ी जाती है। यह बात भी उल्लेखनीय है कि अज़ान एवं नमाज़ की समय सारणी इस प्रकार की है कि विश्व भर में हर क्षण हर समय कहीं न कहीं अज़ान, या नमाज़ हो रही होती है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि रात या दिन का एक क्षण भी ऐसा नहीं गुज़रता जिसमें मुहम्मद साहब (नराशंस) की प्रशंसा न की जा रही हो।
Michael Hart एक अमरिकी विद्वान है, इन्होंने अस्सी की दहाई में The 100 नाम से एक पुस्तक लिखी, जिसमें दुनिया की उन सौ महानविभूतियों का वर्णन है जिन्होंने पूरी दुनिया को अपने अस्तित्व से प्रभावित किया। लेखक ने इस पुस्तक में नम्बर एक पर ‘‘हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल0‘‘ को रखा है। दूसरे नम्बर पर ‘‘आइज़क-न्यूटन‘‘ और तीसरे नम्बर पर ‘‘हज़रत ईसा मसीह‘‘ को स्थान दिया है। यह बात ध्यान देने योग्य है कि लेखक पेशे से एक वैज्ञानिक हैं और धर्म से ईसाई। वह अगर पक्षपात से काम लेते तो ‘‘ईसा मसीह‘‘ को प्राथमिकता देते या ‘‘न्यूटन‘‘ को, परन्तु उन्होंने निष्पक्षता से काम लेते हुए ‘‘मुहम्मद साहब सल्ल0‘‘ को पहला स्थान दिया। दूसरे स्थान पर “आइज़क-न्यूटन” और तीसरे नम्बर पर “ईसा मसीह” को रखा है। इससे बड़ी कौन सी प्रंशसा होगी कि मुख़ालिफ़ भी सराहने पर मज़बूर हो जाए।
“डा0 वेद प्रकाश उपाध्याय” ने अपनी दूसरी पुस्तिका ‘‘कल्कि अवतार और मुहम्मद सा0’’ में बडे़ स्पष्ट रूप से इस बात को सिद्ध किया है कि कल्कि अवतार जो “भागवत पुराण” के अनुसार 24 अवतारों के प्रकरण में कल्कि सबसे अन्तिम अवतार हैं। ”मुहम्मद साहब” ही थे जो सन् 570 ईसवी में अरब देश में पैदा हुए।
डा0 वेद प्रकाश के अनुसार “पुराणों” में भी बड़े ही स्पष्ट शब्दों में कल्कि अवतार के सम्बन्ध से भविष्यवाणी उनकी निशानियों सहित की गयी है। पुराणों में कल्कि अवतार की जो निशानियां बताई गयी हैं, उनमें कुछ इस प्रकार हैं -

1. कल्कि का प्रधान पुरोहित के यहां जन्म लेना।
2. पुरोहित का नाम विष्णु युश होना।
3. माता का नाम सुमति होना।
4. कल्कि का पैदा होने के बाद पहाड़ों पर चला जाना।
5. एवं वहाँ परशुराम जी से ज्ञान प्राप्त करना।
6. कल्कि अवतार का शुक्ल पक्ष की बारहवीं तिथि को माधव मास में जन्म    लेना।
7. कल्कि अवतार का ऐसे समय में होना जब युद्धों में अश्व एवं खड्ग
  का प्रयोग होगा।
उक्त सारी निशानियाँ ‘‘भागवद् गीता‘‘ ‘‘कल्कि पुराण‘‘ एवं ‘‘भागवत पुराण‘‘ पर आधारित हैं। विस्तार से जानने के लिए देखें ‘‘डा0 वेद प्रकाश‘‘ उपाघ्याय की पुस्तिका -
‘‘कल्कि अवतार और मुहम्मद स.’’
प्रकाशित: जु़महुर बुक डिपो देवबन्द यू0पी0।
अब इस पर ध्यान दीजिए कि मुहम्मद साहब के पिता का नाम “अब्दुल्लाह” था। “विष्णुयुश” एवं “अब्दुल्लाह” का अर्थ एक है, आपकी माताजी का नाम “आमिना” था। “आमिना” एवं “सुमति” का अर्थ एक होता है आपका जन्म महीने की बारहवीं तिथि को हुआ। आप ज्ञान प्राप्ति से पहले मक्के से उत्तर की ओर स्थित पहाड़ पर ‘‘हिरा‘‘ नामक गुफा में बैठकर कई-कई दिन तक ध्यानलीन रहते थे। वहीं पर एक दिन “देवदूत” जिबरील नामक फ़रिश्ता प्रकट हुआ एंव आपको ज्ञान की प्राप्ति हुई।
“कल्कि अवतार का अश्व एवं खड्ग प्रयोग के समय में होना।”
इस पर विचार व्यक्त करते हुए “डा0 वेद प्रकाश“ लिखते हैं -
”दूसरी बात ध्यान देने की यह है कि अन्तिम अवतार उस समय होगा जब कि युद्धांे में तलवार का प्रयोग किया जाता हो। यह तलवारों एवं घोडों का युग नहीं है। .......... जबकि आज से चैदह सौ वर्ष पूर्व घोडांे तथा तलवारों का प्रयोग होता था।“
-कल्कि अवतार और मुहम्मद सा0 पृष्ठ 22-23

पुराणों में कल्कि अवतार का स्थान शम्भल ग्राम बताया गया है अतः कुछ लोग इस भ्रम में है कि कल्कि अवतार “भारत“ के “सम्भल“ शहर में प्रकट होंगे।
परन्तु डा0 वेद प्रकाश उपाध्याय के अनुसार शम्भल ”संज्ञा“ नहीं ”विशेषण“ के रूप में प्रयोग है। उन्होने इस के तीन अर्थ लिखे हैं जो तीनों ही स्वयं उन्हीं के शब्दों में भारत के सम्भल शहर पर किसी भी प्रकार फ़िट नहीं होते जबकि मुहम्मद साहब के जन्मस्थान अरब के “मक्का नगर” पर वह तीनों अर्थ शत-प्रतिशत फिट बैठते हैं। इन बातांे से बड़े ही स्पष्ट रूप से यह सिद्ध होता है कि कल्कि अवतार मुहम्मद साहब ही थे, जो अंतिम युग के अंतिम अवतार हैं।
उक्त प्रकार की भविष्यवाणी पर टिप्पणी करते हुए कुछ लोग ऐसा कह देते हैं कि यह बातें धर्म ग्रन्थों में बाद की बढ़ाई हुई हो सकती हंै, परंतु ऐसा मान लिया जाए तो फिर उक्त धर्म ग्रन्थों की अन्य शिक्षाओं की ही क्या विश्वसनीयता रह जाती है? अतः “वेद” और “पुराणों“ में आस्था रखने वालों के लिए दो में से एक विकल्प को स्वीकार करने के अतिरिक्त कोई अन्य रास्ता नहीं है कि या तो वह अपने ही धर्म ग्रन्थों की वास्तविकता पर प्रश्न चिन्ह लगाएं या “मुहम्मद साहब“ को “ईशदूत“ के रूप में स्वीकार करें, क्यांेकि उक्त धर्मग्रन्थों में अन्तिम ऋषि के होने का जो समय (ऊँटों, घोड़ों, तलवार एवं खड़ग के प्रयोग का समय) बताया गया है वह वर्तमान युग के चलते सम्भव नहीं है।
प्रायः देखने में आता है कि बहुत से धर्म में विश्वास रखने वाले लोग उक्त निशानियों को पढ़कर यह जान और समझ लेते हैं कि अन्तिम युग के अन्तिम ईशदूत “मुहम्मद साहब“ ही थे, परन्तु उन्हें कुछ दुनियावी स्वार्थ ऐसा मानने से रोके रखते हैं।
धर्म गुरूओं के सामने तो वह प्रश्न है जो स्वयं एक हिन्दू लेखक ने निम्न शब्दों में प्रकट किया है।
“धर्माधिकारियों ने कभी भी उन विचारों को पनपने, फलने नही दिया जिनसे उनकी रोज़ी रोटी पर आँच आती हो यहाँ तक की बाद में अर्थ को बदल कर अर्थ का अनर्थ भी कर दिया सरिता मुक्ता, प्रिंट 2, पृष्ठ 34/1
और जहाँ तक आम जनता की बात है वह वही कहती है जिसका “कु़रआन“ में निम्न प्रकार वर्णन है।
“और जब उनसे कहा जाता है कि उसे मानों जो ईश्वर ने उतारा है, तो वह कहते हैं कि हम तो उसे मानेंगे जिस पर हमने अपने बाप-दादा को पाया है, चाहे शैतान भड़की आग की ओर ही क्यों न बुलाए।“ सूरह लुकमान आयत नं 20
हम अपने निजी जीवन में झांक कर देखें, हमने कितनी ऐसी परम्पराओं को छोड़ दिया है, जिन पर हमने अपने बाप-दादा का पाया था, हमने उन जैसी वेश-भूषा छोड़ी, उन जैसा खान-पान छोड़ा, परन्तु धर्म जो मरणोपरान्त के जीवन काल से बहस करता है, उसके संबंध से हम क्यों फिक्र मन्द नहीं होते।
एक वर्ग ऐसा भी है जो देश भक्ति का दावा करता है वह केवल उसी चीज को मानना चाहता है जो अपने देश में उपजी हो। भारत से बाहर की किसी भी वस्तु को वह विदेशी समझ कर उससे दूर रहना चाहता है। अजीब बात यह है कि यह वर्ग एक ओर तो स्वयं को एक कोने में समेटकर रखना चाहता है, दूसरी ओर भारत को संसार के अग्रणी मार्ग दर्शक (विश्व गुरू) के बतोर भी देखना चाहता है। एक समय में यह दोनों बातें कैसे हो सकती हैं। ऐसे लोगों से सर इक़बाल के लहजे में यह कहना उचित होगा -

चीन व अरब हमारा, हिन्दोस्तां हमारा
हिन्दी हैं हम वतन है सारा जहाँ हमारा

इस वर्ग को यह भी सोचना चाहिए कि वह आवागमन में विश्वास रखते है, अगर अगले जन्म में किसी अन्य देश या अन्य धर्म में पैदा हो गए तो उनकी देश-भक्ति का क्या होगा? या ईश्वर से उन्होंने इस बात की गारन्टी ली है कि वह हर जन्म व हर योनि में केवल भारत में और केवल हिन्दू धर्म में ही जन्म लेंगे।
इस्लाम इस विषय में यह सिद्धान्त पेश करता है कि जो जहां पैदा हुआ और मरा है मानो उसकी मिट्टी वहीं की थी अतः वह कल कयामत में वहीं से दोबारा जीवित करके उठाया जायेगा

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मस्जिदे अक्सा।

मस्जिद ए अक्सा अथवा बैतुल मुकद्दस इस्लाम की तीसरी सबसे महत्वपूर्ण मस्जिद है, बुखारी शरीफ मे नबी करीम सल्ल. की एक हदीस के अनुसार मस्जिद ए अक्...