Friday, 23 April 2021

आर्य समाज, महेंद्रपाल, जौहरी, कार्तिक को जवाब।

कई आयतें हैं जिस पर अक्सर हमारे आर्य बंधुओं और इस्लाम 
विरोधियों द्वारा आरू लगाया जाता है आइये इस पर निस्पक्ष हो कर 
इनको समझा जाए! .....
क़ुरआन का स्पष्ट उसूल है कि "तुम उन से लड़ो जो तुमसे लड़ते हैं 
" मगर साथ ही साथ यह भी बता देता है कि अगर तुम उन 
लोगों से जिन्होंने केवल इस बिना पर तुम पर अत्याचार किये 
,तुम्हें तुम्हारे घरों से निकाला के तुम केवल एक ईश्वर की 
उपासना करते हो तो उन पर  "अत्याचार मत करना क्यों की
 अल्लाह ज़्यादती करने वालों को पसंद नहीं करता 
(सूरः बक़रा, आयत 190, ) 
 यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि यह नियम एक जंगी नियम की हैसियत रखते हैं न कि 
आम शिक्षा की , और धर्म एवं हर देश मैं एपब जंगी नियम होते हैं , यह आम आदेश नहीं इस्लाम की आम शिक्षा तो यह
" सबसे बड़ा गुनाह अल्लाह के साथ शिर्क और किसी किसी 
नफ़्स को हक़ के बगैर क़त्ल करना है " .

 इसी लोए इसी सूरः माइदा मैं अल्लाह ने इरशाद फरमाया 
" जिस ने किसी व्यक्ति को किसी के खून का बदला लेने या 
धरती मै फसाद फ़ैलाने के अलावा किसी और वजह से क़त्ल किया तो 
उसने मानो सारी इंसानियत का ही
 क़त्ल कर दिया " ( सूरः माइदा, 32)  इस तराह की जिन आयतों 
आदेशों पर आपत्ति की जाती है आपत्तिकर्ता उनकी ऐतिहासिक प्रष्ठभूमि
 का यदि अध्य्यन कर ले तो किसी प्रकार की शंका न रहे , और उसे पता 
चल जाए के यह आदेश लड़ने के जंग करने के हैं और नकि आब यहूदियों 
सब ईसाईयों और सब गैरमुस्लिमों के लिए बल्कि यह आदेश उनके लिए हैं 
जो शत्रू रूप धारण कर इस्लाम के मानने वालों पर अत्याचार करते हैं , 
केवल जंगी नियमों को छोड़ कर इस्लाम नस्ल ओ धर्म के भेद के कारण न
 किसी सम्प्रदाय से लड़ने की अनुमति देता है और न किसी की हत्या को ही 
उचित ठहराता है ! 
इसी लिए वह अन्य किसी भी समुदाय , धर्म के मानने वालों से मित्रता करने से 
नहीं रोकता , वो तो केवल रोकता है उन लोगों से जो ज़ालिम हैं और इस्लाम
 दुश्मनों से मिलकर अत्याचार की स्कीमें बनाते हैं , इलिये अल्लाह ने किसी भी 
ईसाई , यहूदी और गैरमुस्लिम से दोस्ती  करने उनके साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार से नहीं रोका  ...
" अल्लाह तो केवल तुम्हें उन्हीं लोगों से दोस्ती करने से रोकता है जिन्होंने दीन 
के मामले मैं तुम से जंग की ,और तुमको तुम्हारे अपने घरों से निकाला और
 तुम्हारे निकालने मैं औरों की मदद की 
 (सूरः मुंम्तहिना, आयत-9) " 

यदि आप को अगर केवल आप के धर्म का  होने की बिना पर झगड़ा करा जाए उनके 
परिवार एवं रिश्तेदारों को सामाजिक बाईकाट कर दिया जाए 
उनके साथियों को ताप्ती दोपहरी मैं नंगे बदन लिटा कर उनके सीनों पर भरी 
पत्थर रखे जाएँ , उनकी रिश्ते की औरतों को क़त्ल कर दिया जाये , यहाँ 
तक कि उनको उनके घर से निकाल दिया जाए तो मैं समझता हूँ कि आप 
मौका मिलते ही ऐसे लोगों को न  छोड़ेंगे ! 
फिर भी देखिये ये कहा जा रहा है कि तुम उन लोगों से लडो जो तुमसे लड़ें, 
और ऐसे ही 
लोगों से मित्रता करने से रोक जा रहा है न कि आम लोगों से ! 
अर्थात यह एक उसूल बताया कि लड़ना , या जंग करना अपनी तरफ से नहीं है बल्कि यदि 
शत्रु हमलावर हों उस स्थिति मैं यह उपरोक्त  हुक्म है ! 
इसी तराह 9:3 मैं दिया गया आदेश भी उन्हीं परिस्थितियों मैं है , 
और इस मैं यह शर्त भी लगा दी गयी है कि अदब वाले कुछ 
खास महीनों ( रजब, ज़ीक़दह, ज़िलहिज्जा, और मुहर्रम, ) के महीनों मैं किसी प्रकार
 की जंग , लड़ाई , वगैरह न की जाए हाँ इसके बाद वह आज़ाद हैं , 
यहाँ इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को भी समझिये के मक्का के मुशरीक़ों ने खान_ए_काबा 
मैं  प्रवेश तक पे रोक लगा दी थी जबकि यह पाक महीने क़रीब क़रीब ही थे ,इसके 
बावजूद मुसलमानों को रोक गया के इन महीनों के गुजरने के बाद वह मुशरीक़ों से 
जंग के लिए आज़ाद हैं वो जहाँ चाहें पकड़ें उनहें मारें , मगर देखिये अल्लाह का 
फरमान और दयालुता इस स्थिति मैं भी क़ुरआन कहता 
" अगर वे (इस्लाम शत्रु मुशरिक) तुमसे दूर हो जाएँ और लड़ाई से रुके रहें और 
तुम्हारी तरफ शांति एवं मित्रता का हाथ बढ़ाएं  तो अल्लाह ने तुम्हारे लिए
 उन पर हाथ उठाने की कोई राह नहीं रखी है " 
अर्थात तुम्हारा फिर बदला लेना ,जंग करना अनुचित एवं पाप है 
(सूरः निसा ,88-91)
एक जगह यूँ फ़रमाया 
" और ऐ नबी सल्ल. अगर ये दुश्मन सुलह और सलामती के लिए तैयार हो जाएँ 
तो तुम भी उसके लिए तैयार हो जाओ, और अल्लाह पर भरोसा रखो निश्चय ही
 वह सब कुछ  सुनने और जानने वाला है ! 
(सूरः अनफाल , 69)" 
इस घटना का स्पष्टीकरण सूरः माइदा मैं  यूँ किया गया 
"और ऐसा न हो कि एक गरोह की दुश्मनी जिसने तुम्हारे लिए इज़्ज़त वाले घर 
(खाना-ए-काबा) का रास्ता बंद कर दिया था ,,,तुम्हें इस बात पर उभर दे 
कि तुम उनपर ज़्यादति कर बैठो ,"(सूरः माइदा, 2)
उपरोक्त आयतों का का यदि सत्य हर्दय और निष्कपट हो कर अ्ध्य्यन किया 
जाए तो समझ आ जायेगा के यह और इस तरह आदेश विशेष परोस्थितियों मै 
और कुछ विशेष लोगों के लियेही हैं हर किसी के लिए धार्मिक आदेश नहीं !
इस्लाम अपनी अनुयायीयों को जहाँ ये शिक्षा देता
" لاَ اِکراہَفیِ الدّین   धर्म के मामले मैं कोई ज़ोर ज़बरदस्ती 
वहीं यहभी मना करता है कि
" और जिन को यह मुशरिक अल्लाह के सिवा पुकारते हैं उनको बुरा न कहो"
(सूरः, अनआम-108) 
इस्लाम धर्म के मामले मैं ज़बरदस्ती करना ,  जंग करना , वगैरह तो दरकिनार दुसरे 
धर्म के देवी देवतओं तक को बुरा भला कहने की मना करता है, 

     ऐतराज़ का जवाब

आइये अब इस पर रौशनी डालता चलूँ के आखिर वह क्या परिस्थितियां थीं 
कि जिनकी वजह से इस तराह के आदेश आये (जैसा के ऊपर वर्रणन किया जा चूका है)
जिससे मामले की संगिनी और हालात का सही सही पता 
वहॉ सके यहाँ मैं कुछ उदहारण पेश कर रहा हूँ 
हज़रत बिलाल जब मुसलमान हुए तो काफिरों ने उन पर ऐसे अत्याचार किये 
कि उन्हें लोहे की जिरह पहना कर सख्त गर्मि मैं धुप मैं नंगे बदन लिटा कर 
भारी पत्थर रख देते और शहर के बदमाश लड़कों को उनके पीछे लगा देते जो उन्हें मक़्क़ा 
की पहाड़ियों मैं घसीटते फिरते 
(सुनन इब्ने माजा, 14)
हज़रात खब्बाब बिन अरत रज़ि के सर और पीठ पर उम्मे अम्मार लोहा गरम
 करके उनके सर और पीठ पर रख देता जिससे वह बुरी तरह जल जाते ! 
 (असदुलग़ाबा) हज़रत सुहेब और अम्मार रज़ि  पर भी ठीक इसी तरह अत्याचार होते !
 हज़रते फकीह रज़ि के पैरों को बांध कर घसीटा जाता और उन्हें गरम गरम रेत पर
 लिटा कर उनका गला घोंटा जाता, !
असदुलगाबा,तज़किर:अबू फ़क़ीह)
हज़रात सुमैय्या हज़रत अम्मार रज़ि की माँ को गरम गरम ज़मीन पे लिटा कर 
बरछा मारा गया जो उनकी नाफ के पार निकल गया जिससे वह शहीद हो गयीं , 
हज़रत अबुज़र गिफारी रज़ि को लोग इतना मारते के मारते मारते उन्हें ज़मीन पे लिटा देते 
(मुस्लिम , मनाकिब फ़ज़ाएल हज़रत अबुज़र गिफ़ारी)
हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने मसऊद रज़ि  जबकाबे मैं क़ुरआन की आयात पढ़ते तो 
काफिरों ने उन्हें इतना मारा के चेहरे पर निशाँन आ गाये , 
(असदुगाबा, तज़किरा अब्दुल्लाह बिन मसूद )
हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ जो नबी सल्ल के दोस्त थे लोगों ने इतना मारा के उन्हें 
विशवास हो चला के वह मर चुके हैं अतः वह एक चटाई मैं लपेट कर उनके घर ले गए ! 
स्वेयं हज़रत मुहम्मद सल्ल. को लोग परेशान किया करते , ताइफ़ के सफ़र मैं 
वहाँ के सरदारों नबी सल्ल. पे पत्थर पड़वाये जिससे आप का इतना खून बहा 
के जूतियां तक खून से भर गयीं , आप जब नमाज़ पढ़ते तो क़ाफ़िर गन्दी उनके
 ऊपर दाल देते एक बार जब काफिरों ने नमाज़ पढ़ते मैं उनके ऊपर ऊँट की आतें 
दाल दीं,जिसे उनकी प्यारी बेटी फ़ातिमा ने हटाया , खुद आपका चाचा अब
 लहब उनके घर मैं पाखाना वगैरह फेंकता यहाँ तक के उनकी हांडी तक मैं वह 
गंदगी फेंक जाता , यह अत्याचार इतना ही न था बल्कि आप सल्ल. और आपके खानदान
 और आपके अनुयायियों का सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया , 
जिसकी वजह से आप आपके साथियों को सूखे पत्ते और
 चमड़े तक उबाल कर खाने पर विवश होना पड़ा!
अभी यह ज़ुल्म और भयानक रूप ले रहा था और
 नबी सल्ल. की ह्त्या की साज़िश रची गयी , जब आप और आपके अनुयायियों
ने हिजरत कर ली और मदीने चले गए तो वहां यहूदियों और ईसाईयों ने 
मक़्क़ा वालों के साथ मिल कर मुसलमानों के विरूद्ध षड्यंत्र रचने शरू 
कर दिए इसके बाद जब हज का महीना आया और मुसलमानों ने चाहा के हज
 करें तो उन्हें रोका गया ! 
ये थे वो हालात जिनके चलते जंग के वो आदेश दिए गए जिनका विरोध हमारे 
कुछ भाई बिना सोचे समझे किया करते हैं ! 
हमारे कुछ भोले भाले , अज्ञानी, एवं चालाक दिमाग़ आर्य बंधू और दीगर लोग ऐतराज़
 कारते हैं कि क़ुरआन मैं क़ाफ़िर , मुशरिक , यहूदी ,ईसाई वगैरह
 अपमान जनक शब्दों (उनकी द्रष्टि मैं) का प्रयोग क्यों किया गया है , 
वैसे तो कई बार मुशरिक , क़ाफ़िर आदि शब्दों के संबंध मैं कई 
बार विस्तृत जानकारी दी जा चुकी है और समझाया जा चूका है कि क़ाफ़िर का 
अर्थ हिन्दू ,वगैरह नहीं है बल्कि के इस्कर विभिन्न अर्थ है जो विभिन्न जगह प्रयुक्त 
हुए हैं फिर भी आपको बता दें कि हर धर्म मैं अपने मानने वालों के
 अतिरिक्त ऐसे प्रमुख शब्दों का प्रयोग किया गया है चूँकि आर्य बंधू मुखातिब हैं 
और वे सभी दया जी की अंधी अक़ीदत मैं फंसे हुए इसलिए उन्हीं की पुस्तक 
, एवं व्याख्यान से इस बात को रखता हूँ , 
स्वामी दयानंद के अनुसार आर्यवर्त के अतिरिक्त सभी देशों के मनुष्य दस्यु , 
असुर एवं राक्षस हैं 
"(ऐ प्रकाशमान अग्नि ) तू आर्यों और दस्युओं मैं भेद कर 
(ऋग्वेद 1:51:17)
" विजानी हार्यान्चो च दस्य वो बहिर्षमते रन्ध्या शासद व्रतान् !
(ऋग्: म:1,सू:51 मं7)
का अर्थ स्वाणी दयानंद यह करते हैं ....
"आर्य नाम धार्मिक विद्धान आप्त पुरुषों का और इनमें विपरीत जनों का 
नाम दस्यु अर्थात डाकू , दुष्ट अधार्मिक और अविद्धमान है "

"मलेच्छ वाचश्चार्य वाच: सर्वेते दस्यव: स्मत| (मनु,10।45)"
"मलेच्छ देशस्तवत: पर: ( मनु, 2।23)"
मनुस्मर्ति के इन वाक्यों का अर्थ बताते हुए दया बाबू लिखते हैं 
" आर्यवर्त देश से भिन्न विदेश हैं वे दस्यु देश हैं और मलेच्छ  देश कहलाते हैं! 
इससे यह सिद्ध होता है कि आर्यवर्त से भिन्न पूर्व देश से लेकर ईशान उत्तर 
वायव्य और पश्चिम देशों मकीन रहने वालों का नाम दस्यु और मलेच्छ था
 असुर है और दक्षिण  तथा आग्नेय दिशाओं मैं आर्यवर्त देश से भिन्न मैं रहने 
वाले मनुष्यों का नाम  राक्षस था "
(सत्यार्थ प्रकाश , समुल्लास -7) 
अर्थात  आर्यवर्त के अतिरिक्त जो भी देश हैं वह डाकू, दुष्ट , पापी, अविद्वांन , 
मलेच्छ, राक्षस , असुर , दस्यु आदि हैं यह है आर्यों के नज़दीक 
 " धर्म की  मानव समता तथा मानव प्रेम की वास्तविकता " 
परंतु समझ मैं ये नहीं आया कि यह विभाजन वैदिक ईश्वर की ओर से है या 
दयाबाबू की ओर से क्यों अर्थ का अनर्थ तो उनकी वास्तविक शैली ही है ! 
रही बात ईसाई और यहूदी की तो ईसाईयों को ईसाई पुकारने और 
यहूदी से यहूदी कहने पर कोई आपत्ति नही है  क्यों कि यह स्वयं ही 
आपने आपको इन्हीं नामों से पुकारते हैं !
 
जो लोग इस्लाम की युद्ध संबंधी आयतों पर ऐतराज़ करते हैं उन्हें शायद मालूम नहीं 
या मालूम होते हुए भी अनजान बनते हैं कि इस प्रकार के आदेश  खुद वेदों मैं भरे पड़े हैं 
देखें ....
" रुद्रो वो ग्रीवा अशरैत् पिशाचा: प्रस्तिवोर्पअिप श्रणातृ यातुधाना:|
वीरुद्र वो विश्वतोवीर्या यमेन समजीगमत् ।।2।।
(अर्थववेद 6-32-2)"
 अर्थात हे मासभक्षक  दुःखनाशक सेनापति ने तुम्हारे गले को तोड़ डाला है  , 
हे पीड़ा दायको ! तुम्हारी पसलियां भी तोड़ें सब ओर से सामर्थ्य वाली 
विविद्ध प्रकार दे प्रकोपित होने वाली शक्ति (परमेश्वर) ने तुमको नियम के साथ
 संयुक्त किया है "

निर्हस्ता: सन्तु शत्रवो अड्रै षां मलप्यामसि ।
अथैषा मिन्द्र वेदांसि शतशो वि भजामहै ।।3।.
(अथर्ववेद , 6-66-3)

एवा त्वां................. वि श्रथय
(अथर्ववेद ,12:5:65-71)
 " हे देवी ,हे अवध्य (नष्ट न होने वाली प्रबल वेड वाणी)
तू इसी प्रकार ब्रह्मचारियों के हानिकारक , अपराध करने वाले , विद्धवानों को सताने वाले , 
अदानशील पुरुष के , सैंकड़ों जोड़ वाले ,तोड़ तोड़ दे, उस वेड विरोधी के लोमों 
को काट डाल  उसकी खाल उतार ले , उसके मांस के टुकड़ों मैं बोटी बोटी कर दे, 
उसकी नसों को ऐंठ दे । उसकी हड्डियां मसल डाल, उसकी मींग निकाल ले।
उसके सब अंगों और जोड़ों को ढीला कर दे !" 

मूढा..... ...........वरंवरम्
(अथर्ववेद(6:67:2)
अर्थात 
"हे घबराये हुए पीड़ा देने वाले शत्रुओ बिना शिर वाले सापों के समान चेष्टा करो 
प्रतापी वीर राजा अग्नि से घबड़ाये हुए उन तुम सबों मैं से अच्छों को चुन कर मार डाले "

"पियारुणां प्रजां जहि"  (अथर्ववेद, 11:2:21)
अर्थात 
हिंसकों की प्रजा को मार डाल 

अव ब्रह्द्धिषों जहि (अथर्ववेद ,20:93:1)
अर्थात 
" वेद द्धेषियों को नष्ट कर दे "

सर्वं ..... करेकदाश्वम्  (अथर्ववेद ,20:74:7)
(हे राजन) प्रत्येक निंदक , कष्ठ देने वाले को पहुँच और मार डाल" 

जितमस्काकम् (अथर्ववेद , 10:5:36)
अर्थात 
जो जीत लिया गया वह सब हमारा है ! 

"छत्रुयतामा...............भोनानि (अथर्ववेद ,4:22:6)
अर्थात 
शत्रु जैसा आचरण करने वालों के भोजन के साधन (छीन कर) यहां ले आ

स्वामी दयानंद के अनुसार 
" ऐ दस्युओं केप्रति सब से अधिक विनाश करने वाली (अग्नि) तुझको पत्थ्या
ने जलाया है  तू हर युद्ध मैं धन सामग्री प्राप्त कर "
(यजुर्वेद '11:34)

"ऐ  इंद्र ! ख़ज़ानों के खजांची ! हमने धन कोषों की इच्छा से तेरा सीधा हाथ थाम
 लिया है, क्यों कि हम तुझको जानते हैं  ऐ वीर ! पशुओं के स्वामी !
हमको भारी दिव्य धन प्रादान कर, विख्यात ऋषियों के साथ हमारे शत्रुओं को 
पराजित कर के हमें भारी प्रकाशमय धन दौलत प्रदान कर ! सच्चे इंद्र ! 
दुर्गों को नष्ट करके दस्युओं दस्युओं का वध करके हमको प्रकाशमान माल धन प्रदान कर
(4_3:47:10 )"
(ऐ प्रकाशमान अग्नि )तू आर्यों और दस्युओं मैं भेद कर जो अधर्मीं हैं उनको दण्ड दे ......। (ऋग्, 1:51:7)
यदि उपरोक्त मन्त्रों के केवल शब्दों पर ही ग़ोर किया जिया तो इसका अर्थ यही 
निकलेगा के  वेदों को न मानने वालों के साथ ये अमानवीय व्यवहार है और
 आर्य एवं आर्यवर्त मैं रहने और आस्था रखने वालों के अलावा सभी लोगों को 
मारने काटने की वेद शिक्षा देते हैं जैसा के वेदों मैं ,दस्यु, असुर ,वेड द्येषियों , 
आदि को मारने के आदेश दिए गए हैं और स्वामी दयानंद के अनुसार
 आर्यवर्त मैं न आने वाले सभी लोग दस्यु , मलेच्छ, राक्षस ,
असुर हैं जो के वजीबुल क़त्ल ठहरे ! 

 ये आयत में अल्लाह उन सभी आम इंसानो से अच्छा अच्छा सुलूक अच्छा व्यहवहार रखने की बात करता हे 

चाहे फिर वो किसी भी धर्म मत के मानने वाला हो निचे की आयत में देखें 

अल्लाह तुम्हें इससे नहीं रोकता कि तुम उन लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करो और उनके साथ न्याय करो, जिन्होंने तुमसे धर्म के मामले में युद्ध नहीं किया और न तुम्हें तुम्हारे अपने घरों से निकाला। निस्संदेह अल्लाह न्याय करनेवालों को पसन्द करता है (60:8)

हमें हुक्म हे अल्लाह का की नाइंसाफी नहीं कर सकते यदि कोई दुश्मन ही क्यों ना हो 

ऐ ईमान लेनेवालो! अल्लाह के लिए खूब उठनेवाले, इनसाफ़ की निगरानी करनेवाले बनो और ऐसा न हो कि किसी गिरोह की शत्रुता तुम्हें इस बात पर उभार दे कि तुम इनसाफ़ करना छोड़ दो। इनसाफ़ करो, यही धर्मपरायणता से अधिक निकट है। अल्लाह का डर रखो, निश्चय ही जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह को उसकी ख़बर हैं (5:8)

किसभी गैर मुस्लिम को जबरन मुसलमान बनाना क़ुरआन के मुताबिक़ जाइज़ नहीं

धर्म के विषय में कोई ज़बरदस्ती नहीं। सही बात नासमझी की बात से अलग होकर स्पष्ट हो गई है। तो अब जो कोई बढ़े हुए सरकश को ठुकरा दे और अल्लाह पर ईमान लाए, उसने ऐसा मज़बूत सहारा थाम लिया जो कभी टूटनेवाला नहीं। अल्लाह सब कुछ सुनने, जाननेवाला है (2:256)

यदि तुम्हारा रब चाहता तो धरती में जितने लोग है वे सब के सब ईमान ले आते, फिर क्या तुम लोगों को विवश करोगे कि वे मोमिन हो जाएँ? (10:99)

अब मोहम्मद स अ व की तालिम मुसलमानो के लिए

"My father wrote to 'Ubaidullah bin Abi Bakrah who was a judge: "Do not pass a judgement between two people while you are angry, for indeed I heard the Messenger of Allah (ﷺ) saying: 'The judge should not judge between two people while he is angry.'"

English translation : Vol. 3, Book 13, Hadith 1334

इस्लाम के बारेमे गैर मुस्लिमो के विवरण 

स्वामी लक्ष्मिशंकाराचार्य जी की पुस्‍तक ''इस्लाम आतंक ? या आदर्श'' से भी गलतफहमी दूर की जासकती है

http://siratalmustaqueem.blogspot.com/2010/09/blog-post_15.html

विद्वानों ने मुझसे कहा -" आपने क़ुरआन माजिद की जिन आयतों का हिंदी अनुवाद अपनी किताब में लिया है, वे आयतें अत्याचारी काफ़िर मुशरिक लोगों के लिए उतारी गयीं जो अल्लाह के रसूल ( सल्ल०) से लड़ाई करते और मुल्क में फ़साद करने के लिए दौड़े फिरते थे। सत्य धर्म की रह में रोड़ा डालने वाले ऐसे लोगों के विरुद्ध ही क़ुरआन में जिहाद का फ़रमान है।
उन्होंने मुझसे कहा कि इस्लाम कि सही जानकारी न होने के कारण लोग क़ुरआन मजीद कि पवित्र आयतों का मतलब समझ नहीं पाते। यदि आपने पूरी क़ुरआन मजीद के साथ हज़रात मुहम्मद ( सल्लालाहु अलैहि व सल्लम ) कि जीवनी पढ़ी होती, तो आप भ्रमित न होते ।"
मुस्लिम विद्वानों के सुझाव के अनुसार मैंने सब से पहले पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद कि जीवनी पढ़ी। जीवनी पढ़ने के बाद इसी नज़रिए से जब मन की शुद्धता के साथक़ुरआन मजीद शुरू से अंत तक पढ़ी, तो मुझे क़ुरआन मजीद कि आयतों का सही मतलब और मक़सद समझ आने लगा ।
सत्य सामने आने के बाद मुझे अपनी भूल का अहसास हुआ कि मैं अनजाने में भ्रमित था और इसी कारण ही मैंने अपनी किताब ' इस्लामिक आतंकवाद का इतिहास ' में आतंकवाद को इस्लाम से जोड़ा है जिसका मुझे हार्दिक खेद है ।
मैं अल्लाह से, पैग़म्बर मुहम्मद ( सल्ल०) से और सभी मुस्लिम भाइयों से सार्वजानिक रूप से माफ़ी मांगता हूँ तथा अज्ञानता में लिखे व बोले शब्दों को वापस लेता हूं। सभी जनता से मेरी अपील है कि ' इस्लामिक आतंकवाद का इतिहास ' पुस्तक में जो लिखा है उसे शुन्य समझें 

स्वामी विवेकानंद का इस्लाम के बारे में नज़रिया

मुहम्मद (इन्सानी) बराबरी, इन्सानी भाईचारे और तमाम मुसलमानों के भाईचारे के पैग़म्बर थे। ...जैसे ही कोई व्यक्ति इस्लाम स्वीकार करता है पूरा इस्लाम बिना किसी भेदभाव के उसका खुली बाहों से स्वागत करता है, जबकि कोई दूसरा धर्म ऐसा नहीं करता। ...हमारा अनुभव है कि यदि किसी धर्म के अनुयायियों ने इस (इन्सानी) बराबरी को दिन-प्रतिदिन के जीवन में व्यावहारिक स्तर पर बरता है तो वे इस्लाम और सिर्फ़ इस्लाम के अनुयायी हैं। ...मुहम्मद ने अपने जीवन-आचरण से यह बात सिद्ध कर दी कि मुसलमानों में भरपूर बराबरी और भाईचारा है। यहाँ वर्ण, नस्ल, रंग या लिंग (के भेद) का कोई प्रश्न ही नहीं। ...इसलिए हमारा पक्का विश्वास है कि व्यावहारिक इस्लाम की मदद लिए बिना वेदांती सिद्धांत—चाहे वे कितने ही उत्तम और अद्भुत हों—विशाल मानव-जाति के लिए मूल्यहीन (Valueless) हैं...।’’

                                                               स्वामी विवेकानंद (विश्व-विख्यात धर्मविद्)
‘टीचिंग्स ऑफ विवेकानंद, पृष्ठ-214, 215, 217, 218)


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आर्यसमाजी प्रचारक और अन्य हिन्दू अक्सर मुसलमानों में इस्लाम के प्रति शंकाएँ उत्पन्न करने के लिए उनसे तरह तरह के प्रश्न करते रहते हैं। बहुत से मुसलमान अज्ञानता के कारण उनसे प्रभावित हो जाते हें। उनके इन प्रश्नों में से कुछ प्रश्न अल्लाह के व्यक्तित्व के बारे में होते हैं, जिसमे वे पवित्र कुरआन की कुछ आयात के अर्थों का अनर्थ करते हैं और साधारण मुसलमानों को परेशान करते हैं। वे मुसलमानों से पूछते हैं कि क्या कुरआन में बताया गया है कि अल्लाह के हाथ हैं?, अल्लाह किसी सिंहासन (अर्ष या कुर्सी) पर बैठे हैं? उस सिंहासन को आठ फरिश्ते उठाए हुए हैं? क्या अल्लाह शरीरधारी और साकार है? इन प्रश्नों के बाद वे आर्य प्रचारक वेदों से ईश्वर को निराकार सिद्ध करने लगते हैं और वेद के ईश्वर की बड़ाई करने लगते हैं। साधारण मुसलमान उनके प्रश्नों से शंकाओं में घिर जाता है। इस लेख में मैं यह कोशिश करूंगा कि इन प्रश्नों का सही उत्तर आपको मिल जाए।

इन सब बातों को समझने के लिए एक सिद्धान्त ज़रूर याद रखना चाहिए। कि अल्लाह के गुणों के बारे में जिन शब्दों का प्रयोग हम अपने जीवन में करते हैं, वे शब्द उन गुणों की वास्तविकता को व्यक्त करने वाले नहीं होते हैं, क्योंकि जिन शब्दों का हम अल्लाह के गुणों को बताने के लिए प्रयोग करते हैं, उनही का प्रयोग हम अपने गुणों को बताने के लिए करते हैं, यद्यपि अल्लाह के गुण हमारे तरह के नहीं। उदाहरण के लिए जब हम अपने बारे में ‘देखना‘ शब्द का प्रयोग करते हैं, तो हमारे दिमाग में यह अवधारणा होती है कि हम एक आँख रखते हैं, जिस में दृष्टि की क्षमता है, फिर बाहर से रोशनी की किरणें वस्तुओं से टकराकर हमारी आँखों में उनकी तस्वीरें बनाती हैं जो दृष्टि तंत्रिका (optic nerve) के माध्यम से हमारे दिमाग तक पहुँचती हैं। लेकिन यही शब्द ‘देखना‘ जब हम अल्लाह के लिए बोलते हैं, तो हमारा तात्पर्य यह नहीं होता कि अल्लाह को भी देखने के लिए आँखों की या रोशनी की या दृष्टि तंत्रिका की आवश्यकता है। इसी प्रकार ‘सुनना‘ शब्द का हम अल्लाह के लिए प्रयोग करते हैं कि वह हमारी स्तुतियों और प्रार्थनाओं को सुनता है। लेकिन जब एक आर्यसमजी या हिन्दू भी कहता है कि “ईश्वर सब कुछ देखता है और सब कुछ सुनता है’ तो कोई मूर्ख पंडित उस से नहीं पूछता कि क्या ईश्वर की आँखें और कान हैं? मैं भी आर्यों से पूछता हूँ कि जब ऋग्वेद परमेश्वर को विश्वचक्षाः अर्थात  ‘समस्त जगत का दृष्टा परमेश्वर‘ कहता है (देखो मण्डल 10, सूक्त 81, मंत्र 2) तो क्या तुम्हारे ईश्वर की  वास्तव में आँखें (चक्षु) हैं?

इसी के बाद का मंत्र इस प्रकार है

विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात्  |

अर्थात – सब तरफ आखों वाला, सब तरफ मुख वाला, सब तरफ बाहु वाला, सब तरफ पैर वाला (परमेश्वर है) [ऋग्वेद 10/81/3]

अब अगर कोई इनसे पूछे कि क्या तुम्हारे परमेश्वर की आँखें, मुख, बाज़ू और पैर हैं, तो क्या उत्तर देंगे?

अल्लाह के बारे में पवित्र कुरआन में आया है,

 لَيْسَ كَمِثْلِهِ شَيْءٌ ۖ وَهُوَ السَّمِيعُ الْبَصِيرُ

अर्थात – उसके सदृश कोई चीज़ नहीं। वही सबकुछ सुनता, देखता है [सूरह शूरा 42; आयत 11]

आर्यों को इसी वास्तविकता के न समझने के कारण ठोकर लगी है। वे कहते हैं कि जिस प्रकार हम दुनिया में कोई वस्तु बिना साधन के नहीं बना सकते वैसे ही उनका ईश्वर भी बिना साधनों के कुछ नहीं बना सकता। यद्यपि दूसरी और यह भी मानते हैं कि उनका ईश्वर देखता है लेकिन हमारी तरह नहीं। सुनता है, लेकिन हमारी तरह नहीं। इन गुणों में हमारी तरह किसी साधन पर निर्भर नहीं है, फिर समझ में नहीं आता कि कोई वस्तु बनाने में साधनों पर निर्भर क्यों है?

पवित्र कुरआन में आया है,

وَقَالَتِ الْيَهُودُ يَدُ اللَّهِ مَغْلُولَةٌ ۚ غُلَّتْ أَيْدِيهِمْ وَلُعِنُوا بِمَا قَالُوا ۘ بَلْ يَدَاهُ مَبْسُوطَتَانِ يُنْفِقُ كَيْفَ يَشَاءُ

अर्थात – और यहूदी कहते है, “अल्लाह का हाथ बँध गया है।” उन्हीं के हाथ-बँधे है, और फिटकार है उनपर, उस बकवास के कारण जो वे करते है, बल्कि उसके दोनो हाथ तो खुले हुए है। वह जिस तरह चाहता है, ख़र्च करता है। [सूरह माइदह 5; आयत 64]

अब यहाँ शब्द ‘यद‘ يَدَ से कोई शारीरिक हाथ तात्पर्य नहीं है। बल्कि यह एक आलंकारिक विवरण है। यहूदियों ने गरीब मुसलमानों को ताना देकर अल्लाह पर एक अपमानजनक आक्षेप किया कि अल्लाह का हाथ बंधा है अर्थात अल्लाह कंजूस है। मुसलमानों को भौतिक सुख नहीं देता। इस पर उत्तर मिला कि अल्लाह के दोनों हाथ खुले हैं अर्थात अल्लाह तो उदार है। अल्लाह इन गरीब मुसलमानों को आध्यात्मिक और भौतिक सुख, दोनों देगा और तुम देखते रह जाओ गे।

अब ज़रा हम ऋग्वेद के एक प्रसिद्ध सूक्त, मण्डल 10, सूक्त 90, को देखलें जिसको पुरुष सूक्त कहा जाता है। इस सूक्त म




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पंडित महेन्द्रपाल आर्य के प्रश्नों के उत्तर

بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
अल्लाह के नाम से जो बड़ा कृपाशील और अत्यन्त दयावान हैं
प्रिय मित्रो, कुछ समय से इन्टरनेट पर पंडित महेंद्रपाल आर्य के 15 प्रश्नों की अधिक चर्चा थी। आर्य समाज की विचारधारा के लोग इस प्रश्नपत्र को प्रचारित कर रहे हैं, और इस प्रश्नपत्र के उत्तर की मांग कर रहे हैं। जब हमने इन प्रश्नों का अध्यन किया तो पता चला कि अधिकतर प्रश्न स्वामी दयानंद सरस्वती की पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश के समुल्लास 14 और बाबू धर्मपाल आर्य की पुस्तक 'तरके इस्लाम' की ही नक़ल हैं। बाबु धर्मपाल ने भी पंडित जी की तरह इस्लाम को छोड़ कर आर्य समाज को अपनाया था। लेकिन बाद में मुस्लिम विद्वानों के उत्तर से संतुष्ट हो कर उन्हों ने फिर से इस्लाम स्वीकार कर लिया और अपना नाम गाजी महमूद रखा। प्रश्नपत्र के आरम्भ में पंडित महेंद्रपाल ने लिखा है-
इस्लाम जगत के विद्वानों से कतिपय प्रश्न
सही जवाब मिलने पर इस्लाम स्वीकार
हालांकि, सत्यार्थ प्रकाश, समुल्लास 14 का इस्लाम के विद्वानों ने पहले ही विस्तृत उत्तर दे दिया है, और हम भी अपनी वेबसाइट पर नए तथ्यों के साथ उसका उत्तर दे रहे हैं [क्लिक करें]। इस के बावजूद हम पंडित जी के प्रश्नों के उत्तर देने जा रहे हैं ताकि वह यह न कहें कि मुसलमान इनके उत्तर नहीं दे सकते। इसके अतिरिक्त पंडित जी की घोषणा में हमें विरोध दिख रहा है। प्रश्नपत्र के आरम्भ में वह स्पष्ट रूप से कह रहे हैं कि यदि उनके प्रश्नों के सही उत्तर मिलें गे तो वह इस्लाम स्वीकार करें गे। लेकिन प्रश्नपत्र के अंत में वह कहते हैं, "सभी प्रश्नों का सही जवाब मिलने पर इस्लाम को स्वीकार करने को विचार किया जा सकता है."
यदि सही उत्तर मिल जाएँ तो फिर विचार क्या करना है? सीधे स्वीकार ही करलें। मैं आशा करता हूँ कि महेन्द्रपाल जी इस उत्तर से संतुष्ट हो कर इस्लाम स्वीकार करें गे.

प्रश्न 1

उत्तर
जिस आयत पर आपने आक्षेप किया है उसका सही अनुवाद यह है।
"ईमानवालों को चाहिए कि वे ईमानवालों के विरुद्ध काफिरों को अपना संरक्षक मित्र न बनाएँ, और जो ऐसा करेगा, उसका अल्लाह से कोई सम्बन्ध नहीं..." [सूरह आले इमरान, आयत 28]
इस आयत में जो अरबी शब्द "अवलिया" आया है। उसका मूल "वली" है, जिसका अर्थ संरक्षक है, ना कि साधारण मित्र। अंग्रेजी में इसको "ally" कहा जाता है। जिन काफिरों के बारे में यह कहा जा रहा है उनका हाल तो इसी सूरह में अल्लाह ने स्वयं बताया है। सुनिए।
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَتَّخِذُوا بِطَانَةً مِنْ دُونِكُمْ لَا يَأْلُونَكُمْ خَبَالًا وَدُّوا مَا عَنِتُّمْ قَدْ بَدَتِ الْبَغْضَاءُ مِنْ أَفْوَاهِهِمْ وَمَا تُخْفِي صُدُورُهُمْ أَكْبَرُ ۚ قَدْ بَيَّنَّا لَكُمُ الْآيَاتِ ۖ إِنْ كُنْتُمْ تَعْقِلُونَ
"ऐ ईमान लानेवालो! अपनों को छोड़कर दूसरों को अपना अंतरंग मित्र न बनाओ, वे तुम्हें नुक़सान पहुँचाने में कोई कमी नहीं करते। जितनी भी तुम कठिनाई में पड़ो, वही उनको प्रिय है। उनका द्वेष तो उनके मुँह से व्यक्त हो चुका है और जो कुछ उनके सीने छिपाए हुए है, वह तो इससे भी बढ़कर है। यदि तुम बुद्धि से काम लो, तो हमने तुम्हारे लिए निशानियाँ खोलकर बयान कर दी हैं।" [सूरह आले इमरान, आयत 118]
पंडित जी, आप ही कहिए, ऐसे काफिरों से किस प्रकार मित्रता हो सकती है? यह तो एक स्वाभाविक बात है कि जो लोग हमसे हमारे धर्म के कारण द्वेष करें और हमें हर प्रकार से नुकसान पहुंचाना चाहें उन से कोई भी मित्रता नहीं हो सकती | कुरआन में गैर धर्म के भले लोगों से दोस्ती हरगिज़ मना नहीं है। सुनिए, कुरआन तो खुले शब्दों में कहता है।
لَا يَنْهَاكُمُ اللَّهُ عَنِ الَّذِينَ لَمْ يُقَاتِلُوكُمْ فِي الدِّينِ وَلَمْ يُخْرِجُوكُمْ مِنْ دِيَارِكُمْ أَنْ تَبَرُّوهُمْ وَتُقْسِطُوا إِلَيْهِمْ ۚ إِنَّ اللَّهَ يُحِبُّ الْمُقْسِطِينَ ﴿٨﴾ إِنَّمَا يَنْهَاكُمُ اللَّهُ عَنِ الَّذِينَ قَاتَلُوكُمْ فِي الدِّينِ وَأَخْرَجُوكُمْ مِنْ دِيَارِكُمْ وَظَاهَرُوا عَلَىٰ إِخْرَاجِكُمْ أَنْ تَوَلَّوْهُمْ ۚ وَمَنْ يَتَوَلَّهُمْ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الظَّالِمُونَ ﴿٩
"अल्लाह तुम्हें इससे नहीं रोकता कि तुम उन लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करो और उनके साथ न्याय करो, जिन्होंने तुमसे धर्म के मामले में युद्ध नहीं किया और न तुम्हें तुम्हारे अपने घरों से निकाला। निस्संदेह अल्लाह न्याय करनेवालों को पसन्द करता है अल्लाह तो तुम्हें केवल उन लोगों से मित्रता करने से रोकता है जिन्होंने धर्म के मामले में तुमसे युद्ध किया और तुम्हें तुम्हारे अपने घरों से निकाला और तुम्हारे निकाले जाने के सम्बन्ध में सहायता की। जो लोग उनसे मित्रता करें वही ज़ालिम है।" [सूरह मुम्ताहना; 60, आयत 8-9]
और सुनिए
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا كُونُوا قَوَّامِينَ لِلَّهِ شُهَدَاءَ بِالْقِسْطِ ۖ وَلَا يَجْرِمَنَّكُمْ شَنَآنُ قَوْمٍ عَلَىٰ أَلَّا تَعْدِلُوا ۚ اعْدِلُوا هُوَ أَقْرَبُ لِلتَّقْوَىٰ ۖ وَاتَّقُوا اللَّهَ ۚ إِنَّ اللَّهَ خَبِيرٌ بِمَا تَعْمَلُونَ
"ऐ ईमानवालो! अल्लाह के लिए खूब उठनेवाले, इनसाफ़ की निगरानी करनेवाले बनो और ऐसा न हो कि किसी गिरोह की शत्रुता तुम्हें इस बात पर उभार दे कि तुम इनसाफ़ करना छोड़ दो। इनसाफ़ करो, यही धर्मपरायणता से अधिक निकट है। अल्लाह का डर रखो, निश्चय ही जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह को उसकी ख़बर हैं।" [सूरह माइदह 5, आयत 8]
अल्लाह कभी लोगों को नहीं बाँटते। सब अल्लाह के बन्दे हैं। लोग अपनी मूर्खता और हठ से बट जाते हैं। जो लोग सत्य को स्वीकार नहीं करते वह स्वयं अलग हो जाते हैं। इसमें अल्लाह का क्या दोष?
इन आयात से स्पष्ट होता है कि कुरआन सभी गैर मुस्लिमों से मित्रता करने से नहीं रोकता। तो यह है इस्लाम की शिक्षा जो सुलह, अमन और इन्साफ की शिक्षा है।

वेदों की शिक्षा

ते यं द्विष्मो यश्च नो द्वेष्टि तमेषां जम्भे दध्मः
"हम लोग जिस से अप्रीति करें और जो हम को दुःख दे उसको इन वायुओं की बीडाल के मुख में मूषे के सामान पीड़ा में डालें |" [यजुर्वेद 16:65 दयानन्द भाष्य]
वृश्च प्र वृश्च सं वृश्च दह प्र दह सं दह |
"तू वेद निन्दक को, काट डाल, चीर डाल, फाड़ डाल, जला दे, फूँक दे, भस्म कर दे।" भावार्थ: धर्मात्मा लोग अधर्मियों के नाश में सदा उद्यत रहें [अथर्ववेद काण्ड12: सूक्त 5: मंत्र 62 पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी भाष्य]
वेद निन्दक कोन है? कहीं आपको कोई आर्यसमाजी किसी शब्द जाल में न उलझाए, इस लिए में शास्त्रों के आधार पर ही व्याख्या कर देता हूँ| सुनिए आप के गुरु स्वामी दयानन्द क्या कहते हैं,
“परमेश्वर की बात अवश्य माननीय है| इतने पर भी जो कोई इस को न मानेगा, वह नास्तिक कहावेगा, क्योंकि "नास्तिको वेदनिन्दकः"| वेद का निन्दक और न मानने वाला नास्तिक कहाता है|” [सत्यार्थ प्रकाश, समुल्लास 3, पृष्ट 74, प्रकाशक: श्रीमद दयानन्द सत्यार्थ प्रकाश न्यास, उदयपुर, जुलाई 2010]
इस परिभाषा में वे सारे लोग आते हैं जिन की वेदों में आस्था नहीं है जैसे मुस्लिम, ईसाई, जैनी, बोद्ध आदि। इस से यह स्पष्ट होता है कि वेद अन्य धर्मों के लोगों को नष्ट करने की शिक्षा देता है.
और सुनिए
स्वामी दयानंद सरस्वती सत्यार्थ प्रकाश में ब्रह्मोसमाज और प्रर्थ्नासमाज की आलोचना करते हुए लिखते हैं,
"जिन्होंने अँगरेज़, यवन, अन्त्याजादी से भी खाने पीने का अंतर नहीं रखा। उन्होंने यही समझा कि खाने और जात पात का भेद भाव तोड़ने से हम और हमारा देश सुधर जाएगा लेकिन ऐसी बातों से सुधार कहाँ उल्टा बिगाड़ होता हे।" [सत्यार्थ प्रकाश, समुलास 11, पृष्ट 375 प्रकाशक: श्रीमद दयानन्द सत्यार्थ प्रकाश न्यास, उदयपुर, जुलाई 2010]
यवन का अर्थ मुसलमान और अन्त्यज का अर्थ चंडाल होता है।
पंडित जी, मुसलमान और ईसाई कितने ही सदाचारी हों, स्वामी जी के अनुसार उनके साथ खाना उचित नहीं। यह पक्षपात नहीं तो और क्या है? क्या आप अब भी ऐसे 'आर्य समाज' में रहना पसंद करेंगे?
पंडित जी ने लिखा है कि गैर मुस्लिमों को हैवान कहना चाहिए| हम भला उनको हैवान क्यों कहें? यह तो आपके धर्म और गुरु की शिक्षा है कि आर्यावर्त की सीमाओं के बाहर रहने वाले सारे मनुष्य म्लेच्छ, असुर और राक्षस हैं| सुनिए ज़रा, दयानन्द जी मनुस्मृति के आधार पर क्या कह रहे हैं,
आर्य्यवाचो मलेच्छवाचः सर्वे ते दस्यवः स्मृताः| [मनुस्मृति 10/45]
मलेच्छ देशस्त्वतः परः| [मनुस्मृति 2/23]
“जो अर्य्यावर्त्त देश से भिन्न देश हैं, वे दस्यु और म्लेच्छ देश कहाते हैं| इस से भी यह सिद्ध होता है कि अर्य्यावार्त्त से भिन्न पूर्व देश से लेकर ईशान, उत्तर, वायव और पश्चिम देशों में रहने वालों का नाम दस्यु और म्लेच्छ तथा असुर है| और नैऋत्य, दक्षिण तथा आग्नेय दिशाओं में आर्य्यावर्त्त से भिन्न रहने वाले मनुष्यों का नाम राक्षस है| अब भी देख लो हब्शी लोगों का स्वरुप भयंकर जैसे राक्षसों का वर्णन किया है, वैसा ही दिख पड़ता है।
 [सत्यार्थ प्रकाश, समुलास 8, पृष्ट 225-226 प्रकाशक: श्रीमद दयानन्द सत्यार्थ प्रकाश न्यास, उदयपुर, जुलाई 2010]
जिस ईश्वर ने वेदों में गैर लोगों से ऐसे भयंकर व्यव्हार की शिक्षा दी है और उनको दस्यु, राक्षस, और असुर के ख़िताब दिए हैं, वह ईश्वर पक्षपाती अवश्य है।

[प्रेमवाणी: पंडित महेन्द्रपाल आर्य के प्रश्नों के उत्तर] is good,have a look at it! http://safatalam.blogspot.in/2013/04/blog-post_18.html?m=1



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प्रश्न 2

उत्तर

पंडित जी के दुसरे प्रश्न में भी काफी गलतियाँ हैं|
गलती 1। फरिश्तों ने मिटटी लाने से मना किया। इस का कोई प्रमाण कुरआन से दीजिए।  यदि पंडित के पास इसका प्रमाण नहीं दिखाएँ गे तो पंडित जी झूटे साबित हो जाएँ गे।
गलती 2। यह 'अजाजील' नाम आप कहाँ से ले आए? कुरआन में इब्लीस का वर्णन है। और यह भी आपने गलत कहा है कि वह फ़रिश्ता था। कुरआन तो स्पष्ट कहता हे कि इब्लीस जिन था [देखो सूरह 18: आयत 50]
गलती 3। 'अजाजील ने कहा की अल्लाह आपने तो आपको छोड़ दुसरे को सिजदा करने को मना किया था' यह भी गलत है'। इब्लीस ने ऐसा कभी नहीं कहा। पंडित जी कृपया कुरआन से अपने दावों का प्रमाण भी दिया करें। सजदा यहाँ सम्मान का प्रतीक है न कि इबादत का सजदा। वेदों में भी शब्द नमन (झुकना/सजदा) को ईश्वर के अलावा अन्य के लिए प्रयोग किया गया है। उदाहरण के लिए देखियह ऋग्वेद 10/30/6
एवेद यूने युवतयो नमन्त
"जिस प्रकार युवतियें युवा पुरुष के प्रति नमती हैं.."
लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि यजुर्वेद में चोरों, तस्करों और डाकुओं को भी नमन किया गया है । उदाहरण के लिए देखिए यजुर्वेद अध्याय 16, मंत्र 21
नमो॒ वञ्च॑ते परि॒वञ्च॑ते अर्थात, छल से दूसरों के पदार्थों का हरण करने वाले और सब प्रकार से कपट के साथ व्यवहार करने वाले को प्रणाम
स्तायू॒नां पत॑ये॒ नमो॒ चोरों के अधिपति को प्रणाम
तस्क॑राणां॒ पत॑ये॒ नमो॒ तस्करी/डकैती करने वाले के अधिपति को प्रणाम
आशा है कि पंडित जी वेद की इन शिक्षाओं पर भी टिपण्णी करेंगे ।
गलती 4। यह आप ने ठीक कहा कि अल्लाह ने आदम को सारी वस्तुओं के नाम बताए। लेकिन आपत्ति करने से पहले इसका अर्थ तो समझ लेते। 'वस्तुओं के नाम सिखाना' प्रतीक है ज्ञान का। अर्थात आदम (मानवता) की विशेषता ज्ञान होगा। फरिश्तों ने एक शंका व्यक्त की थी कि क्या मनुष्य पृथ्वी पर बिगाड़ पैदा करे गा? उस शंका को दूर करने के लिए अल्लाह ने आदम को ज्ञान प्रदान किया। यही ज्ञान है जिसके कारण मनुष्य ने क्या क्या कारनामे नहीं किए हैं यहाँ तक कि इंसान चाँद पर भी पहुँच गया है। इस ज्ञान से इंसान ने हर वस्तु को अपने काबू में कर लिया।
हर वस्तु की अपनी विशेषता होती है और अल्लाह ने इंसान को ज्ञान प्राप्त कर तरक्की करने की विशेषता दी है। इसी ज्ञान से वह अल्लाह को भी पहचानता है। इस घटना से अल्लाह ने हमें यह समझाया है कि फ़रिश्ते, जिन और इंसान उतना ही जान सकते हैं जितना अल्लाह ने उन्हें ज्ञान दिया है।
गलती 5। आप कहते हैं कि 'अज़ाजील (इब्लीस) को गुस्सा आना स्वाभाविक था'। यह तो सरासर गलत है। इब्लीस ने आदम के सामने केवल घमंड के कारण सजदा (सम्मान) नहीं किया। कृपया कुरआन को ध्यान से पढ़िए । कुरआन कहता हे
قَالَ يَا إِبْلِيسُ مَا مَنَعَكَ أَنْ تَسْجُدَ لِمَا خَلَقْتُ بِيَدَيَّ ۖ أَسْتَكْبَرْتَ أَمْ كُنْتَ مِنَ الْعَالِينَ
(अल्लाह ने) कहा, "ऐ इबलीस! तूझे किस चीज़ ने उसको सजदा करने से रोका जिसे मैंने अपने दोनों हाथों से बनाया? क्या तूने घमंड किया, या तू कोई ऊँची हस्ती है?"
قَالَ أَنَا خَيْرٌ مِنْهُ ۖ خَلَقْتَنِي مِنْ نَارٍ وَخَلَقْتَهُ مِنْ طِينٍ
उसने कहा, "मैं उससे उत्तम हूँ। तूने मुझे आग से पैदा किया और उसे मिट्टी से पैदा किया।"[सुरह साद 38: आयत 75-76]
तो इससे सिद्ध होता है कि इब्लीस ने केवल घमंड के कारण अल्लाह की आज्ञा को नहीं माना। उसने अपने आप को दुसरे (आदम) से उच्च समझ लिया। इस लिए अल्लाह ने कोई पक्षपात नहीं किया| आपकी समझ का फेर है।
गलती 6। आप कहते हैं कि "अज़ाजील को नाम बताए बिना पुछा जाना कि अगर तुम सत्यवादी हो तो सभी चीज़ों के नाम बताओ"
आपक कृपया यह कुरआन से प्रमाण दीजिए कि इब्लीस (आपका अज़ाजील) को कहाँ पुछा नाम बताओ? नाम तो फरिश्तों से पूछे गए इब्लीस से नहीं। लगता हे आपने कुरआन ठीक से पढ़ा ही नहीं। आपने तो सारी घटना ही उलट पुलट बयान की है।
अब में आपकी कोन कोन सी गलती निकालूँ? इस प्रश्न से यह सारी गलतियाँ निकलने पर तो आपके प्रश्न में कुछ नहीं बचता।


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महेन्द्रपाल आर्या का पोल खोल भाग (2)

इस परिपेक्ष में हम देखेंगे कि क्या वाकई महेन्द्रपाल महबूब अली थे और साथ ही मौलवी या हाफिज़ भी थे या वह केवल दूसरों को भ्रमित करने के लिये महज अफवाह फैला रहे हैं।
 महेन्द्रपाल का आपत्ति जिसमें कुरआन के हवाले हाथ के लिखे हुये हैं।  यकीनन यह महेंन्द्र जी ने स्वयं लिखे होंगे क्योंकि वे अपने दावे के अनुसार मौलवी हैं और अगर किसी और से लिखवाये हैं तो भी महेंद्र जी ने इसे जारी करने से पहले गहराई से पढ़ा तो अवश्य होगा। उनका यह पत्रक इन्टरनेट पर गत कई वर्षों से मौजूद है।
 प्रथम दृष्ट्या उनके पत्रक में स्वयं उनके हाथ की लिखी अरबी इबारत को देख कर नहीं लगता कि यह लेख किसी मौलवी या हाफिज़ का है। अधिक से अधिक उस का स्तर कक्षा 2 या 3 के छात्र का प्रतीत होता है उस में इमले व व्याकरण की बलन्डर त्रूटियां इस कदर हैं कि उन्हें देखकर लगता है कि ऐसा कथित मौलवी अगर मुसलमानों के बीच रहता तो उन्हें गुमराह करने के सिवा कुछ न कर सकता। 

चलिये इसी इबारत पर महेन्द्रपाल के सही या गलत होने का फैसला हो जाये । वह इस प्रकार कि अरबी में लिखी जिस इबारत को जिस का मूल उच्चारण उन्होंने स्वयं अरबी इबारत के ऊपर और अनुवाद नीचे दिया है। और उसे कुरआन की आयत कहा है। वह इस इबारत को कुरआन के तीस पारों मे कहीं दिखा दें तो उनकी सारी बातें सही। वरना उन्हें और उनके भक्तों को यह मान लेना चाहिए कि वह समाज को धोखा दे रहे हैं।
 उन्‍होंने ने उक्त अरबी इबारत का अनुवाद यह किया है - एक इस्लाम ही हक है और सब कुफ्र हैं, सब को बातिल किया। यह अरबी भाषा के ज्ञानी बताएंगे कि क्या यह अनुवाद सही है? इस इबारत का सही अनुवाद यह है-  इस्लाम हक़ है और कुफ्र बातिल है, यह तो अरबी जानने वाला व्यक्ति ही समझ सकता है कि जो अनुवाद महेन्द्रपाल ने उक्त इबारत का किया है ऐसे व्यक्ति को क्या मौलवी तसलीम किया जाए। या मौलवियत के नाम पर दाग? जिस व्यक्ति ने एक या दो दर्जा ही अरबी पढ़ी हो वह अवश्य इस प्रकार का अनुवाद कर सकता है। मेहन्द्रपाल जी जिस प्रकार की अरबी लिखते हैं या अरबी का अनुवाद करते हैं उसे देख कर लगता है कि किसी गैर मुस्लिम ने बोझल मन से इस्लाम पर एतराज करने के लिये अरबी सीखी है मैं कई ऐसे गैर-मुस्लिम भाईयों को जानता हूं जिन्‍हों ने शोकिया या उर्दू अध्यापक की नौकरी पाने के लिये उर्दू सीखी है। परन्तु इस प्रकार कोई भाषा सीखी जाए कि न तो उसे पूरा समय दिया जा सके और न ही पूरे मन से उसे सीखा जाए, ऐसे व्यक्तियों द्वारा सीखी गई कोई भी भाषा पुख्ता नहीं हो सकती। उस व्यक्ति के बारे में आपकी क्या राय है? जो अंग्रेजी शब्द Station  को istashan  लिखे या  Light  को Lait  या High को Hai लिखे। बस यही हाल बल्कि इससे भी अधिक बुरा हाल महेन्द्रपाल का है 


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पंडित महेन्द्रपाल जी या तो आप जानते हुवे भी छिपा रहे है या फिर आप को इस्लाम और क़ुरआन का बिलकुल इल्म नही है आज तक आप ने अपने झूट के सहारे यही तो किया है लोगो को आधी अधूरी आयत बताया है किसी एक आयत को कोड करके गुमराह करने का काम किये है 

बहरहाल मुझे किसी भाई से पता चला की आप ने मेरे पोस्ट का जवाब दिया है 
तो यह लीजिये आप के जवाब का जवाब वैसे तो आप ने मेरा कॉमेंट्स ब्लाक करके रखा है वरना आप को आप के पोस्ट पे ही मैं जवाब देता इंशा अल्लाह ।
पंडित जी इसके बाद वेद एंड मनुस्मृति से मेरा कुछ सवाल होगा आसा करता हु की आप उसका जवाब दें 

सवाल-क्या गैर मुस्लिमो से दोस्ती नही करना चाहिए  ? 

जवाब-
जिस आयत पर आक्षेप किया जाता है उसका सही अनुवाद यह है।

“ईमानवालों को चाहिए कि वे ईमानवालों के विरुद्ध काफिरों को अपना संरक्षक मित्र न बनाएँ, और जो ऐसा करेगा, उसका अल्लाह से कोई सम्बन्ध नहीं…” [सूरह आले इमरान, आयत 28]

इस आयत में जो अरबी शब्द “अवलिया” आया है। उसका मूल “वली” है, जिसका अर्थ संरक्षक है, ना कि साधारण मित्र। अंग्रेजी में इसको “ally” कहा जाता है। जिन काफिरों के बारे में यह कहा जा रहा है उनका हाल तो इसी सूरह में अल्लाह ने स्वयं बताया है। सुनिए।

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَتَّخِذُوا بِطَانَةً مِنْ دُونِكُمْ لَا يَأْلُونَكُمْ خَبَالًا وَدُّوا مَا عَنِتُّمْ قَدْ بَدَتِ الْبَغْضَاءُ مِنْ أَفْوَاهِهِمْ وَمَا تُخْفِي صُدُورُهُمْ أَكْبَرُ ۚ قَدْ بَيَّنَّا لَكُمُ الْآيَاتِ ۖ إِنْ كُنْتُمْ تَعْقِلُونَ

“ऐ ईमान लानेवालो! अपनों को छोड़कर दूसरों को अपना अंतरंग मित्र न बनाओ, वे तुम्हें नुक़सान पहुँचाने में कोई कमी नहीं करते। जितनी भी तुम कठिनाई में पड़ो, वही उनको प्रिय है। उनका द्वेष तो उनके मुँह से व्यक्त हो चुका है और जो कुछ उनके सीने छिपाए हुए है, वह तो इससे भी बढ़कर है। यदि तुम बुद्धि से काम लो, तो हमने तुम्हारे लिए निशानियाँ खोलकर बयान कर दी हैं।” [सूरह आले इमरान, आयत 118]

आप ही कहिए, ऐसे काफिरों से किस प्रकार मित्रता हो सकती है? यह तो एक स्वाभाविक बात है कि जो लोग हमसे हमारे धर्म के कारण द्वेष करें और हमें हर प्रकार से नुकसान पहुंचाना चाहें उन से कोई भी मित्रता नहीं हो सकती | कुरआन में गैर धर्म के भले लोगों से दोस्ती हरगिज़ मना नहीं है। सुनिए, कुरआन तो खुले शब्दों में कहता है।

لَا يَنْهَاكُمُ اللَّهُ عَنِ الَّذِينَ لَمْ يُقَاتِلُوكُمْ فِي الدِّينِ وَلَمْ يُخْرِجُوكُمْ مِنْ دِيَارِكُمْ أَنْ تَبَرُّوهُمْ وَتُقْسِطُوا إِلَيْهِمْ ۚ إِنَّ اللَّهَ يُحِبُّ الْمُقْسِطِينَ ﴿٨﴾ إِنَّمَا يَنْهَاكُمُ اللَّهُ عَنِ الَّذِينَ قَاتَلُوكُمْ فِي الدِّينِ وَأَخْرَجُوكُمْ مِنْ دِيَارِكُمْ وَظَاهَرُوا عَلَىٰ إِخْرَاجِكُمْ أَنْ تَوَلَّوْهُمْ ۚ وَمَنْ يَتَوَلَّهُمْ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الظَّالِمُونَ ﴿٩

“अल्लाह तुम्हें इससे नहीं रोकता कि तुम उन लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करो और उनके साथ न्याय करो, जिन्होंने तुमसे धर्म के मामले में युद्ध नहीं किया और न तुम्हें तुम्हारे अपने घरों से निकाला। निस्संदेह अल्लाह न्याय करनेवालों को पसन्द करता है अल्लाह तो तुम्हें केवल उन लोगों से मित्रता करने से रोकता है जिन्होंने धर्म के मामले में तुमसे युद्ध किया और तुम्हें तुम्हारे अपने घरों से निकाला और तुम्हारे निकाले जाने के सम्बन्ध में सहायता की। जो लोग उनसे मित्रता करें वही ज़ालिम है।”

[सूरह मुम्ताहना; 60, आयत 8-9]

और सुनिए

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا كُونُوا قَوَّامِينَ لِلَّهِ شُهَدَاءَ بِالْقِسْطِ ۖ وَلَا يَجْرِمَنَّكُمْ شَنَآنُ قَوْمٍ عَلَىٰ أَلَّا تَعْدِلُوا ۚ اعْدِلُوا هُوَ أَقْرَبُ لِلتَّقْوَىٰ ۖ وَاتَّقُوا اللَّهَ ۚ إِنَّ اللَّهَ خَبِيرٌ بِمَا تَعْمَلُونَ

“ऐ ईमानवालो! अल्लाह के लिए खूब उठनेवाले, इनसाफ़ की निगरानी करनेवाले बनो और ऐसा न हो कि किसी गिरोह की शत्रुता तुम्हें इस बात पर उभार दे कि तुम इनसाफ़ करना छोड़ दो। इनसाफ़ करो, यही धर्मपरायणता से अधिक निकट है। अल्लाह का डर रखो, निश्चय ही जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह को उसकी ख़बर हैं।” [सूरह माइदह 5, आयत 8]

अल्लाह कभी लोगों को नहीं बाँटते। सब अल्लाह के बन्दे हैं। लोग अपनी मूर्खता और हठ से बट जाते हैं। जो लोग सत्य को स्वीकार नहीं करते वह स्वयं अलग हो जाते हैं। इसमें अल्लाह का क्या दोष?

इन आयात से स्पष्ट होता है कि कुरआन सभी गैर मुस्लिमों से मित्रता करने से नहीं रोकता। तो यह है इस्लाम की शिक्षा जो सुलह, अमन और इन्साफ की शिक्षा है।

पंडित महेन्द्रपाल आर्या जी अब आप से मेरा कुछ सवाल है i hope की आप इसका जवाब दें 

पंडित महेन्द्रपाल जी इसे आप क्या कहेंगे ।  वैदिक ईश्वर की ऐसी पक्षपात को क्यों छुपाते है आप ।
सच्च बोलने की हिमत नही है या फिर झूट बोलने का आदत बना लिया है आप ने ।
दिखिए 
वेदों की शिक्षा

ते यं द्विष्मो यश्च नो द्वेष्टि तमेषां जम्भे दध्मः
"हम लोग जिस से अप्रीति करें और जो हम को दुःख दे उसको इन वायुओं की बीडाल के मुख में मूषे के सामान पीड़ा में डालें |" [यजुर्वेद 16:65 दयानन्द भाष्य]
वृश्च प्र वृश्च सं वृश्च दह प्र दह सं दह |
"तू वेद निन्दक को, काट डाल, चीर डाल, फाड़ डाल, जला दे, फूँक दे, भस्म कर दे।" भावार्थ: धर्मात्मा लोग अधर्मियों के नाश में सदा उद्यत रहें [अथर्ववेद काण्ड12: सूक्त 5: मंत्र 62 पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी भाष्य]
वेद निन्दक कोन है? कहीं आपको कोई आर्यसमाजी किसी शब्द जाल में न उलझाए, इस लिए में शास्त्रों के आधार पर ही व्याख्या कर देता हूँ| सुनिए आप के गुरु स्वामी दयानन्द क्या कहते हैं,
“परमेश्वर की बात अवश्य माननीय है| इतने पर भी जो कोई इस को न मानेगा, वह नास्तिक कहावेगा, क्योंकि "नास्तिको वेदनिन्दकः"| वेद का निन्दक और न मानने वाला नास्तिक कहाता है|” [सत्यार्थ प्रकाश, समुल्लास 3, पृष्ट 74, प्रकाशक: श्रीमद दयानन्द सत्यार्थ प्रकाश न्यास, उदयपुर, जुलाई 2010]
इस परिभाषा में वे सारे लोग आते हैं जिन की वेदों में आस्था नहीं है जैसे मुस्लिम, ईसाई, जैनी, बोद्ध आदि। इस से यह स्पष्ट होता है कि वेद अन्य धर्मों के लोगों को नष्ट करने की शिक्षा देता है.
और सुनिए
स्वामी दयानंद सरस्वती सत्यार्थ प्रकाश में ब्रह्मोसमाज और प्रर्थ्नासमाज की आलोचना करते हुए लिखते हैं,
"जिन्होंने अँगरेज़, यवन, अन्त्याजादी से भी खाने पीने का अंतर नहीं रखा। उन्होंने यही समझा कि खाने और जात पात का भेद भाव तोड़ने से हम और हमारा देश सुधर जाएगा लेकिन ऐसी बातों से सुधार कहाँ उल्टा बिगाड़ होता हे।" [सत्यार्थ प्रकाश, समुलास 11, पृष्ट 375 प्रकाशक: श्रीमद दयानन्द सत्यार्थ प्रकाश न्यास, उदयपुर, जुलाई 2010]
यवन का अर्थ मुसलमान और अन्त्यज का अर्थ चंडाल होता है।

 [मनुस्मृति 10/45]
मलेच्छ देशस्त्वतः परः| [मनुस्मृति 2/23]
“जो अर्य्यावर्त्त देश से भिन्न देश हैं, वे दस्यु और म्लेच्छ देश कहाते हैं| इस से भी यह सिद्ध होता है कि अर्य्यावार्त्त से भिन्न पूर्व देश से लेकर ईशान, उत्तर, वायव और पश्चिम देशों में रहने वालों का नाम दस्यु और म्लेच्छ तथा असुर है| और नैऋत्य, दक्षिण तथा आग्नेय दिशाओं में आर्य्यावर्त्त से भिन्न रहने वाले मनुष्यों का नाम राक्षस है| अब भी देख लो हब्शी लोगों का स्वरुप भयंकर जैसे राक्षसों का वर्णन किया है, वैसा ही दिख पड़ता है|” [सत्यार्थ प्रकाश, समुलास 8, पृष्ट 225-226 प्रकाशक: श्रीमद दयानन्द सत्यार्थ प्रकाश न्यास, उदयपुर, जुलाई 2010]
जिस ईश्वर ने वेदों में गैर लोगों से ऐसे भयंकर व्यव्हार की शिक्षा दी है और उनको दस्यु, राक्षस, और असुर के ख़िताब दिए हैं, वह ईश्वर पक्षपाती अवश्य है।


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#पँडित_महेन्द्रपाल_आर्य_जी_को_जवाब 

वैसे इन्हें आता जाता कुछ सिर्फ नफरत फ़ैलाने और लोगो को गुमराह करने का कार्य करते है । 

#जिहाद_क्या_और_क्यों 

आज के समय में जहां हर तरफ नफ़रत परोसने वालों कि ओर से इस्लाम की छवि को ख़राब करने का माहौल आम है, वहीं आज इस्लाम से संबंधित एक नया मुद्दा लोगों के और ख़ास तौर पर गैर-मुस्लिमों के सोच-विचार का केंद्र बना हुआ है, इस मुद्दे का नाम जिहाद है। और इसको हम इस दुनिया का नियम कह लें या कुछ और कि अगर समय रहते सच्ची बात लोगों तक ना पहुंचाई जाए, तो लोग अक्सर झूठ को ही सच मान बैठते हैं, लेख का उद्देश्य लोगों को कम से कम लफ़्ज़ों में इसी ख़ास मुद्दे की हक़ीक़त से रूबरू कराना है।

जिहाद क्या है? जिहाद शब्द अरबी माद्दा ज’ह’द (ج ح د) से बना है जिसका अर्थ आम तौर पर होता है: जी तोड़ कोशिश करना अथवा संघर्ष करना! या हम आम ज़बान में बोलें तो जिद्दो जहद करना। इस्लाम में अपनी नफ़्स यानी ख़ुद अपने अंदर पैदा हुई बुराईयों के ख़िलाफ़ जिहाद को भी जिहाद-ए-कबीरा अर्थात बड़ी जिहाद कहा गया है, एक हदीस देखें:

रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया: सब से बेहतरीन जिहाद अपनी नफ्स (स्वयं) के ख़िलाफ़ जिहाद है। सही इब्न हिब्बान: 4862

इस अपनी नफ्स के विरुद्ध जिहाद में कौन सी तलवारें या बंदूकें इस्तेमाल हो सकती हैं, सोचें ज़रा!

क़ुरआन ने क़ुरआन के ज्ञान के माध्यम से किए गए जिहाद को सबसे बड़ा जिहाद कहा है, और इसको करने का बाक़ायदा हुक्म दिया है, क़ुरआन की आयत देखें:

 
فَلَا  تُطِعِ الۡکٰفِرِیۡنَ وَ جَاہِدۡہُمۡ بِہٖ جِہَادًا کَبِیۡرًا

अतः इनकार करने वालों की बात न मानना और इस (क़ुरआन) के द्वारा उन से जिहाद करो, बड़ा जिहाद!
क़ुरआन (सूरह25:आयत52)

किसी छात्र का उसकी परीक्षा की तैयारी में लगे रहना भी उसका जिहाद है, किसी मनुष्य का अपने जीवनयापन के लिए प्रयास करना भी जिहाद है, अपने परिवार को हराम और ग़लत कामों से बच कर खाना खिलाने के लिए मेहनत से कमाई करना भी जिहाद है,

जंग करने को जिहाद नहीं कहते हैं, उसके लिए एक खास लफ्ज़ है, उसको अरबी में क़िताल (युद्ध) कहा जाता है, यह आख़िरी दर्जे में जिहाद का एक ख़ास प्रकार है, जिहाद कभी कभी कुछ ख़ास मौकों पर क़िताल का रूप ले लेती है।

उसकी विशेष रूप से तीन शर्तें हैं, वो सब मैं हवालों के साथ आपके सामने रखता हूं, देखें:

1- कभी कभी शांति के प्रयास में सत्य की राह में लगे रहने वाले लोगों को बलपूर्वक रोका जाता है, और उनके विरुद्ध ज़ालिम लोग हथियार उठाते हैं, और उन शांतिप्रिय लोगों पर ज़ुल्म करते हैं, तो उस ज़ुल्म के विरूद्ध उन शांतिप्रिय लोगों को अपनी जान के बचाव में और शांति की पुनर्स्थापना के लिए हथियार भी उठाना पड़ जाता है, तब जिहाद क़िताल का रूप ले लेता है। क़ुरआन में देखें:

وَ قَاتِلُوۡا فِیۡ سَبِیۡلِ اللّٰہِ الَّذِیۡنَ یُقَاتِلُوۡنَکُمۡ وَ لَا تَعۡتَدُوۡا ؕ اِنَّ اللّٰہَ  لَا یُحِبُّ الۡمُعۡتَدِیۡنَ

और अल्लाह की राह में उन लोगों से लड़ो जो लड़ते हैं तुमसे, और ज़्यादती न करो; अल्लाह ज़्यादती करने वालों को पसंद नहीं करता।
क़ुरआन (सूरह2:आयत190)

اُذِنَ لِلَّذِیۡنَ یُقٰتَلُوۡنَ بِاَنَّہُمۡ ظُلِمُوۡا ؕ وَ اِنَّ اللّٰہَ عَلٰی نَصۡرِہِمۡ لَقَدِیۡرُ°
الَّذِیۡنَ اُخۡرِجُوۡا مِنۡ دِیَارِہِمۡ  بِغَیۡرِ حَقٍّ اِلَّاۤ اَنۡ یَّقُوۡلُوۡا رَبُّنَا اللّٰہُ

अनुमति दी गई उन लोगों को जिन के विरुद्ध युद्ध किया जा रहा है, क्योंकि उन पर ज़ुल्म किया गया, और निश्चय ही अल्लाह उन की सहायता की पूरी सामर्थ्य रखता है।”
“ये वे लोग हैं जो अपने घरों से नाहक़ निकाले गए, केवल इसलिए कि वे कहते हैं कि “हमारा रब अल्लाह है।
क़ुरआन (सूरह 22:आयत 39-40)

2– कहीं मासूमों पर ज़ुल्म हो रहा हो, तो ज़ालिमों अर्थात् अन्यायी लोगों के विरूद्ध किया जाने वाला जिहाद क़िताल का रूप ले लेता है। क़ुरआन में है:

وَ مَا لَکُمۡ لَا تُقَاتِلُوۡنَ فِیۡ سَبِیۡلِ اللّٰہِ وَ الۡمُسۡتَضۡعَفِیۡنَ مِنَ الرِّجَالِ وَ النِّسَآءِ وَ الۡوِلۡدَانِ الَّذِیۡنَ یَقُوۡلُوۡنَ رَبَّنَاۤ اَخۡرِجۡنَا مِنۡ ہٰذِہِ الۡقَرۡیَۃِ الظَّالِمِ اَہۡلُہَا ۚ وَ اجۡعَلۡ لَّنَا مِنۡ لَّدُنۡکَ وَلِیًّا  ۚ ۙ وَّ اجۡعَلۡ لَّنَا مِنۡ لَّدُنۡکَ نَصِیۡرًا

“और तुम को क्या हो गया है कि तुम लड़ते नहीं अल्लाह की राह में और उन कमज़ोर मर्दों और औरतों और बच्चों के लिए जो कहते हैं कि ऐ हमारे रब! हमको उस बस्ती से निकालिए जिसके रहने वाले ज़ालिम हैं, और हमारे लिए अपने पास से कोई हिमायती पैदा कीजिए और हमारे लिए अपने पास से कोई मददगार ख़ड़ा कर दीजिए।”
क़ुरआन (सूरह 4:आयत 75)

3- तीसरी शर्त तब की होती है, जबकि कोई इस्लामिक स्टेट कायम हो, आज तो कोई नहीं है, मुस्लिम मुल्क बहुत हैं पर सही इस्लामिक कोई नहीं, तो यदि इस्लामिक स्टेट की किसी स्टेट के साथ कुछ संधियां हों, और दूसरी तरफ से उन संधियों को तोड़ दिया जाए, तो फिर क़िताल अथवा युद्ध किया जाता है, परन्तु जिन्होंने संधि नहीं तोड़ी उनके विषय में क़ुरआन कहता है:

اِلَّا الَّذِیۡنَ عٰہَدۡتُّمۡ  مِّنَ الۡمُشۡرِکِیۡنَ ثُمَّ لَمۡ یَنۡقُصُوۡکُمۡ شَیۡئًا وَّ لَمۡ یُظَاہِرُوۡا عَلَیۡکُمۡ اَحَدًا فَاَتِمُّوۡۤا اِلَیۡہِمۡ عَہۡدَہُمۡ اِلٰی مُدَّتِہِمۡ ؕ اِنَّ اللّٰہَ یُحِبُّ  الۡمُتَّقِیۡنَ

“मगर जिन मुशरिकों से तुम ने मुआहिदा किया था फिर उन्होंने तुम्हारे साथ कोई कमी नहीं की और न तुम्हारे ख़िलाफ़ किसी की मदद की तो उनका मुआहिदा उनकी मुद्दत तक पूरा करो, बेशक अल्लाह परहेज़गारों को पसंद करता है।”
क़ुरआन (सूरह9:आयत 4)

पर क़ुरआन एक और बात कहता है, जो इससे आगे की है, ये बताने की ज़रूरत नहीं है मेरे विचार में कि युद्ध के दौरान संधि की ओर कौन झुकता है, वही झुकता है जो कमज़ोर होता है, अगर सामने वाला संधि की ओर झुके तो क़ुरआन क्या कहता है, ज़रा देखें:

وَ اِنۡ جَنَحُوۡا لِلسَّلۡمِ فَاجۡنَحۡ لَہَا وَ تَوَکَّلۡ عَلَی اللّٰہِ ؕ اِنَّہٗ ہُوَ السَّمِیۡعُ الۡعَلِیۡمُ

और अगर वह सुलह की तरफ़ झुकें तो आप भी उसके लिए झुक जाइए और अल्लाह पर भरोसा रखिए, बेशक वह सुनने वाला, जानने वाला है
क़ुरआन (सूरह 8:आयत 61)

और अगर फिर भी उनका धोखा देने का प्लान हो तो क़ुरआन वो मिसाली बात करता है, जो आज के समय का बड़े से बड़ा शांतिप्रिय राष्ट्र भी नहीं कर सकता, न कोई करता है:

وَ اِنۡ یُّرِیۡدُوۡۤا اَنۡ یَّخۡدَعُوۡکَ فَاِنَّ حَسۡبَکَ اللّٰہُ ؕ ہُوَ  الَّذِیۡۤ اَیَّدَکَ بِنَصۡرِہٖ وَ بِالۡمُؤۡمِنِیۡنَ
और अगर वे आपको धोखा देना चाहेंगे तो अल्लाह आपके लिए काफ़ी है, वही है जिसने अपनी मदद से और मोमिनीन के ज़रिए आपको क़ुव्वत दी।
क़ुरआन (सूरह 8:आयत 62)

लेकिन ये सारी आख़िरी स्टेज होती हैं, आम तौर पर अल्लाह (ईश्वर) क़ुरआन में कहता है कि तुम बुराई का जवाब भी भलाई से दो, तो वो जो तुम्हारा दुश्मन है वो तुम्हारा दोस्त बन जाएगा, क़ुरआन में देखें:

وَ لَا تَسۡتَوِی الۡحَسَنَۃُ  وَ لَا السَّیِّئَۃُ ؕ اِدۡفَعۡ  بِالَّتِیۡ ہِیَ اَحۡسَنُ فَاِذَا الَّذِیۡ بَیۡنَکَ وَ بَیۡنَہٗ  عَدَاوَۃٌ کَاَنَّہٗ وَلِیٌّ حَمِیۡمٌ
भलाई और बुराई समान नहीं हैं। तुम (बुरे आचरण की बुराई को) अच्छे से अच्छे आचरण के द्वारा दूर करो। फिर क्या देखोगे कि वही व्यक्ति तुम्हारे और जिस के बीच वैर पड़ा हुआ था, जैसे वह कोई घनिष्ठ मित्र है।
क़ुरआन (सूरह 41:आयत 34)

अब भलाई करने के बाद भी वो अपने अन्याय और शैतानियत पर अड़ा रहे, तो फिर अल्लाह ने कुछ और भी इजाज़त दी है इंतेहा-ए-सब्र (height of patience) के बाद! फिर ये नहीं कहा कि कायरों की तरह दब कर ज़ुल्म को सहते रहो, फिर ये कहा है, कि अपनी आत्मरक्षा शांति की आस्थापन के जुल्म के खिलाफ ज़ालिम से लडो उन ज़ालिमों के विरुद्ध अल्लाह तुम्हारे लिए काफी हो जाएगा,

वेद गीता में भी जिहाद 

स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि।
धर्म्याद्धि युद्धाच्छे योऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते॥
“तथा अपने धर्म को देखकर भी तू शोक करने के योग्य नहीं है अर्थात् तुझे भय नहीं करना चाहिये; क्योंकि क्षत्रिय के लिये धर्मयुक्त्त युद्ध से बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी कर्तव्य नहीं है” 
गीता (2:31)

यदृच्छ्या चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम्।
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीद्य्यशम्॥
“हे पार्थ! अपने-आप प्राप्त हुए और खुले हुए स्वर्ग के द्वार रूप इस प्रकार के युद्ध को भाग्यवान् क्षत्रिय लोग ही पाते हैं”
गीता (2:32)

हतो वाप्राप्स्यसिस्वर्गजित्वावाभोक्ष्यसे महीम् ।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चय:॥
“या तो तू युद्ध में मारा जाकर स्वर्ग को प्राप्त होगा अथवा संग्राम में जीतकर पृथ्वी का राज्य भोगेगा। इस कारण हे अर्जुन! तू युद्ध के लिए निश्चित करके खड़ा हो जा”
गीता (2:37)

इसी तरह का आदेश ऋग्वेद में भी वर्णित है कि संग्राम में जीतने पर जो भी धन प्राप्त होता है वो विजयी का ही होता है इसे भी देखिये;
 
"जो सभापति सब शूरवीरों का अपने समान सत्कार करता है वो शत्रुओं को जीत कर सबके लिए सुख दे सकता है, संग्राम में अपने पदार्थ औरों के लिए और औरों के अपने लिए करने चाहिए.। (ऋग्वेद-1:132:2)

"सेना पुरुषों को जो सेनापति आदि परूषों के शत्रु हैं वह अपने भी शत्रु जानने चाहिए शत्रुओं से परस्पर फूट को न प्राप्त हुए धार्मिक जन उन शत्रुओं को विदीर्ण कर प्रजा जनों कि रक्षा करें । (ऋग्वेद-1:132:6)  

मुझे बहुत आश्चर्य होता है कि कैसे इस्लाम के आलोचक, कुरआन की उन आयतों पर उंगली उठाते है, जिसमें अन्यायी दुश्मन के खिलाफ लड़ने के लिए आदेश दिए गए हैं । ऐसे छुद्र विचारों की उत्पत्ति तो उस समय ही संभव होती है जब कोई आलोचक स्वयं अपनी ही धार्मिक पुस्तकों जैसे भगवत गीता, महाभारत और वेदों को पढ़ते ही नहीं, या पढ़ते भी हैं तो ढंग से उस पर चिंतन नहीं करते

यहीं मैं अपनी बात को एक आयत के साथ विराम देता हूं:
مَنۡ قَتَلَ نَفۡسًۢا بِغَیۡرِ نَفۡسٍ اَوۡ فَسَادٍ فِی الۡاَرۡضِ فَکَاَنَّمَا قَتَلَ النَّاسَ جَمِیۡعًا ؕ وَ مَنۡ  اَحۡیَاہَا فَکَاَنَّمَاۤ اَحۡیَا النَّاسَ جَمِیۡعًا
जो शख़्स किसी को क़त्ल करे बग़ैर इसके कि उसने किसी को क़त्ल किया हो या ज़मीन में फ़साद बरपा किया हो तो गोया उसने सारे इंसानों को क़त्ल कर डाला, और जिसने एक शख़्स को बचाया तो गोया उसने सारे इंसानों को बचा लिया,
क़ुरआन (सूरह5:आयत 32)

ये आयत उनके लिए है जो कहते फिरते हैं कि इस्लाम ऐसे ही मासूमों को मारने काटने की शिक्षा देता है, अगर ये बात कहने वाले लोग थोड़ी भी अक़ल रखते हैं, तो ज़रूर इस आयत और अपनी ग़लत सोच पर ग़ौर करेंगे, और इन सब को जानने के बाद भी जो लोग इस्लाम की छवि को धूमिल करने का बेकार प्रयास करते हैं, उनसे कहना चाहता हूं कि शर्म आनी चाहिए तुम्हें। याद रखो! मृत्यु के पश्चात तुम्हें उस ईश्वर के समक्ष अपने कर्मों का हिसाब देना है, डर जाओ उस हक़ीक़त से जिस का एक पल का भरोसा नहीं, जिस को दुनिया मृत्यु के नाम से जानती है, और जिस का इंकार बड़े से बड़ा नास्तिक भी नहीं कर सकता।
अल्लाह (ईश्वर) से प्रार्थना (दुआ) है कि हमारी मृत्यु से पूर्व सत्य को पहचानने और उस को अपने जीवन में उतारने के लिए वह ईश्वर हमारा उस परम सत्य की ओर मार्गदर्शन करे, वही सत्य जिस को विभिन्न स्थानों पर विभिन्न भाषाओं में बार बार धर्म के बिगाड़ अथवा हानि के पश्चात लाने वाले कई ईश्दूत (नबि ) आये जिसमे मनु भी थे और अंतिम हज़रत मुहम्मद (स अ)


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सुबोध सागर जौहरी जी का दूसरा स्क्रीनशॉट जिससे उनको लगता है की क़ुरान ईश्वरीय ग्रन्थ नहीं है जो की यह बिलकुल बेतुका और झूट पे अधारिक्त है जिसका जवाब पहले भी बार बार दिया जा चूका है और आज भी बार बार दिया जाता है फिर भी हमारे आर्या बंदु उसी सवाल को घुमाया करते है जो सवाल दयानंद जी किया करते थे जिसका जवाब उन्हें उस वक़्त भी दिया गया था   और आज भी दिया जाता है 

सुबोध जी ने स्क्रीनशॉट दिया था किसी रामशर्मा आर्या के बुक से उस स्क्रीनशॉट को रख रहा हु 
और उस स्क्रीनशॉट का जवाब भी पोस्ट में दे रहा हु।

बिसमिल्लाह शब्द पर, दयानंद जी के मन्तव्य ||सम्पूर्ण मानव समाज में,कुरान को कलामुल्लाह { अल्लाह की कही हुई वाणी } मानते हैं | अन्य ग्रंथो को भी ईश् वाणी माना जाता है, जैसा बाइबल आदि को भी ईश् ग्रन्थ के नाम से इसाई लोग जानते मानते और कहते है | कुछ और लोग हैं जो अन्य ग्रंथो को भी ईश् वाणी के रूप मै मानते हैं इस पर आर्यसमाज के संस्थापाक ऋषि दयानंद जी ने उन सभी ग्रंथो का अवलोकन करने के बाद अनेक युक्ति और प्रमाणों को प्रस्तुत करते हुय अमर ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश मैं प्रमाण दिया है की ईश् वाणी और मानव कृत वाणी मैं क्या भेद है ?ईश् वाणी मानव मात्र के कल्याण के लिए होता है, अर्थात ईश् वाणी मैं पक्षपात तथा किसी के साथ भेद भाव और वैमंस्यता उत्पनना हो यही ईश् वाणी की खूबी है | यह बातें मानव कृत ग्रंथो मै पाया जाना संभव नहीं | जिसका मूल कारण है मानव कृत ग्रन्थ किसी सम्प्रदाय से संपर्क रखता है किन्तु ईश् वाणी किसी भी सम्प्रदाय से कोई लगाव या सम्पर्क नहीं रखता कारण ईशपर पक्षपात का दोष लगेगा |ध्यान रहे मानव कृत ग्रन्थ किसी भी सम्प्रदाय से संपर्क रखता है देखे, जैसा कुरान संपर्क रखता है इस्लाम नामी सम्प्रदाय से | बाइबल संपर्क रखता है ईसाई नामी सम्प्रदाय से ,गुरुग्रंथ सम्पर्क रखता है सिख सम्प्रदाय से | ठीक इसी प्रकार जिन्दावेस्ता संपर्क रखता है यहुदियो से, और त्रिपिटक सम्पर्क रखता हैं बौद्ध नामी सम्प्रदाय से |अर्थात जितनी भी पुस्तको की नाम लिखी गई ये सभी महजबी पुस्तक होने का प्रमाण मिला,सभी पुस्तकें किसी न किसी महजब से संपर्क रखता है | इससे ये सिद्ध हुआ की एक सम्प्रदाय दुसरे सम्प्रदाय को नहीं मानते और ना मानने को तैयार होते | इससे यहबात और स्पष्ट हो गया इन पुस्तकों मैं से एक भी ईश्वरीय ज्ञान का होना अथवा ईश वाणी का होना संभव नहीं | कारण उपर लिखा जा चूका है कि ईश वाणी किसी भी सम्प्रदाय से संपर्क नहीं रखता किन्तु मानवमात्र के कल्याण के लिये जो उपदेश हो उसे ही ईशवाणी कहा जाता है | जो इन सभी सम्प्रोदाय वादी पुस्तकों में यह बातें नही है |ऋषि दयानंद जी ने इसका प्रमाण देते हुए सत्यार्थ प्रकाश के 14 समुल्लास के प्रथम में यह लिखा है | की कुरान का बिसमिल्ला ही गलत है, जहाँ यह शब्द लिखाहै | {बिसमिल्ला हिररहमा,निररहीम}بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ =شروع کرتا ہوں میں الله کے نام سے جو رحم کرنے والا مہربان ہےअर्थ :- शुरू करता हूँ मैं अल्लाह के ना   म से जो रहम करने वाला महरबान है |यह अर्थ जो उर्दू में लिखा है मौलाना थानवी का ऋषि दयानंद जी ने सवाल उठाया, जब यह कलामुल्लाह है, क्या अल्लाह ने ये बात कही हो, फिर तो सवाल लाजिम है ? की एक अल्लाह ने दुसरे अल्लाह के नाम से शुरू किया ? तो अल्लाह किस लिये कहने जायेंगे की शुरू करता हूँ मैं अल्लाह के नाम से |अब इस्लाम जगत के आलिमों का मानना, है की अल्लाह ने कहा मेरे नाम से शुरू करो | अब मेरे नाम से शुरू करों और शुरू करता हूँ मैं अल्लाह के नाम से दोनों में अंतर हो गया |तो सत्य क्या है अल्लाह ने यह बात कही है अथवा नही ? इसका प्रमाण हमें कुरान से ही लेना और खोजना पड़ेगा | पूरी कुरान में यही वाक्य बिसमिल्ला हिररहमा निररहीम 114 बार आया है | 113 सूरा के प्रथम में आया है | और एक सूरा= जिसे नमल के नाम से पुकारा, कहा, जाता है कुरान अनुसार जो सूरा न० 27 है इसके आयत न० 30 में कहा गया है | देखें किस प्रकार है |إِنَّهُ مِن سُلَيْمَانَ وَإِنَّهُ بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ [٢٧:٣٠]सुलेमान की तरफ से है (ये उसका सरनामा) है बिस्मिल्लाहिररहमानिरहीम |وہ سلیمانؑ کی جانب سے ہے اور اللہ رحمٰن و رحیم کے نام سے شروع کیا گیا ہے |وہ سلیمان کی طرف سے ہے اور مضموں یہ ہےکہ شروع الله کا نام لیکر جو بڑا مہربان نہایت رحم والا ہے |
 यह बात स्पष्ट है की शुरू अल्लाह के नाम से यह स्वीकारा है | जब इस्लाम जगत के आलिमों ने स्वीकार किया की बिसमिल्लाह का अर्थ यही है शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से, , यह शब्द कलामुल्लाह है या नही, जब सूरा नमल के आयात 30 में यानि सूरा के बीच में कहा गया, फिर कलामुल्लाह न होने का प्रश्न ही समाप्त हो गया | जैसा हर सूरा के प्रथम है उसे अगर छोड़ कर पढ़ें, किन्तु सूरा नमल के बीच से हटाया जाना कैसे संभव होगा ? इससे बात बिलकुल स्पष्ट है की यह शब्द अल्लाह का होना संभव ही नहीं |दूसरा प्रमाण मेरा यह भी है की कुरान के जो प्रथम सूरा मानते हैं इस्लाम जगत, जिसे फातिहा कहते है | जिसके आयत 7 है यह भी इसी बिसमिल्लाह को जोड़ने पर आयत 7 बनेगा | अगर यह आयात बिसमिल्लाह हिररहमानिर रहीम, को छोड़ दिया जाय तो सूरा फातिहा के कुल आयात 6 होंगे, जो यहाँ भी प्रमाण मिल रहा है की बिसमिल्ला कुरान का ही आयत है जो कलामुल्लाह है | और उसका अर्थ भी यही है, शुरू करता हूँ मैं अल्लाह के नाम से जो रहम करने वाला महरबान है  =سورة فاتهاتون مكي أيتها ٧ =सूरा फातिहा =मक्का में उतरी =इसके 7 आयत हैं 

, यदि आप ऋग्वेद के प्रथम मन्त्र को देख लेते तो यह बेजा आपत्ति नहीं करते। ध्यान से सुनिए-
अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवं रत्वीजम |
होतारं रत्नधातमम ||
"हम लोग उस अग्नि की प्रशंसा करते हैं जो पुरोहित है, यज्ञ का देवता, समस्त तत्वों का पैदा करने वाला, और याजकों को रत्नों से विभूषित करने वाला है"
बताइए, यदि अग्नि से, आपके के अनुसार, ईश्वर ही तात्पर्य है और वेद भी ईश्वर की वाणी है, तो इस वाक्य का बोलने वाला कोन है?
आप असल में ईश्वरीय पुस्तकों कि जुबान/भाषा से अपरिचित हैं। ईश्वरीय किताबों का मुहावरा और कलाम (भाषा) कि शैली कई प्रकार की होती है। कभी तो ईश्वर स्वयं बात कहने के रूप में अपना आदेश स्पष्ट करता है (संस्कृत का उत्तम पुरुष/first person) और कभी गायब से (संस्कृत का प्रथम पुरुष/third person)। कभी कोई ऐसे वाक्य जो दुआ, स्तुति या प्राथना के रूप में बन्दों को सिखाना अपेक्षित हो उसे बन्दे की जुबान से व्यक्त कराया जाता है।
सूरह फातिहा या बिस्मिल्लाह भी इसी प्रकार है। अर्थात यह ऐसे शब्द हैं जो ईश्वर बन्दों को सिखातें हैं। तो कुरआन कलामुल्लाह ही है। आप कलाम कि शैली को न समझने के कारण ऐसी आपत्ति कर रहे हैं। इस प्रश्न का निर्णायक उत्तर मैं पंडित जी के गुरु के घर से ही दिखा देता हूँ ताकि सारी दुनिया इनके दोहरे मापदंड देख लें। स्वामी दयानन्द के शास्त्रार्थ और विभिन व्याख्यानों पर आधारित एक पुस्तक है जिसका नाम है ‘दयानन्द शास्त्रार्थ संग्रह तथा विशेष शंका समाधान’। यह पुस्तक आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट देहली ने प्रकाशित की है। इस पुस्तक केअध्याय 38 में पंडित ब्रिजलाल साहब के स्वामी दयानन्द जी से किए गए प्रश्न मिलते हैं। पंडित ब्रिजलाल के स्वामी जी से किए गए कई प्रश्नों में से एक प्रश्न यह है।
प्रश्न 21: वेद में परमेश्वर की स्तुति है तो क्या उसने अपनी प्रशंसा लिखी?
उत्तर- जैसे माता पिता अपने पुत्र को सिखाते हैं कि माता, पिता और गुरु की सेवा करो, उनका कहना मानो। उसी प्रकार भगवान ने सिखाने के लिए वेद में लिखा। [दयानन्द शास्त्रार्थ संग्रह तथा विशेष शंका समाधान’, आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट देहली, पृष्ट 79, जून 2010 प्रकाशन]
यह देखिए कैसे स्वामी दयानन्द जी स्वयं आप के प्रश्न का उत्तर दे रहे हैं। जब यह लोग वेद पढ़ते हैं तो समाधान की ऐनक लगाते हैं, लेकिन कुरआन पढ़ते समय शंका की ऐनक लगाते हैं। ऐसे हठधर्मी लोगों को इनही उदाहरणों से समझाना पढ़ता है।

क्या वेद ईश्वर् की वाणी है?

आर्य समाज का यह दावा कि वेद ईश्वर् की वाणी है, या एक इल्हामी ग्रन्थ है, पूरी तरह से गलत है। वेदों का अध्यन करने से पता चलता है कि वे ऋषियों द्वारा बनायह गए हैं। इस विषय का पूरा विवरण करना यहाँ संभव नहीं है, लेकिन में कुछ प्रमाण आपके सामने प्रस्तुत करता हूँ-
तैतीरीय ब्रह्मण 2/8/8/5  में लिखा है
ऋषयो मंत्रकृतो मनीषिण:
अर्थात "बुद्धिमान ऋषि मन्त्रों के बनाने वाले हैं."
इसके अतिरिक्त इस बात के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं समय समय पर वेदों के नए नए मंत्र बनते रहे हैं और वे पहले बने संग्रहों (संहिताओं अथवा वेदों) में मिलाये जाते रहे हैं। खुद वेदों में ही इस बात के प्रमाण मिलते हैं-
ऋग्वेद 1/109/2
अथा सोमस्य परयती युवभ्यामिन्द्राग्नी सतोमं जनयामि नव्यम ||
अर्थात "हे इन्द्र और अग्नि, तुम्हारे सोम्प्रदानकाल में पठनीय एक नया स्तोत्र रचता हूँ."
ऋग्वेद 4/16/21
अकारि ते हरिवह बरह्म नव्यं धिया
अर्थात "हे हरि विशिष्ठ इन्द्र, हम तुम्हारे लिए नए स्तोत्र बनाते हैं.
ऋग्वेद 9/9/8
नू नव्यसे नवीयसे सूक्ताय साधया पथः |
परत्नवद रोचया रुचः ||
सोम तुम नए और स्तुत्य सूक्त के लिए शीघ्र ही यज्ञ-पथ से आओ और पहले की तरह दीप्ति का प्रकाश करो।
ऋग्वेद 7/22/9
ये च पूर्व ऋषयो ये च नूत्ना इन्द्र बरह्माणि जनयन्त विप्राः |
अर्थात "हे इन्द्रदेव, प्राचीन एवं नवीन ऋषियों द्वारा रचे गए स्तोत्रों से स्तुत्य होकर आपने जिस प्रकार उनका कल्याण किया, वैसे ही हम स्तोताओं का मित्रवत कल्याण करें."
स्पष्ट है कि इन नए स्तोत्रों व मन्त्रों व सूक्त के रचेता साधारण मानव थे, जिन्होंने पूर्वजों द्वारा रचे मन्त्रों के खो जाने पर या उनके अप्रभावकारी सिद्ध होने पर या उन्हें परिष्कृत करने या अपनी नयी रचना रचने के उद्देश से समय समय पर नए मंत्र रचे।
इसलिए वेद सर्वज्ञ परमात्मा की रचना सिद्ध नहीं होते।

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झूट की दुकान धूर्तबाजि के मकान आर्य समाजी कार्तिक अय्यर जी के दूसरे पोस्ट का जवाब हम यहाँ देंगे ।। स्क्रीनशॉट में आप कार्तिक का झूट देख सकते है 
चलिए पहले हम कार्तिक के झूट का जवाब देते है 
तफ्सीर सूरह निसा 4 
आयत 24. 
और वे औरते भी तुम्हारे लिए हराम है जो किसी दूसरे के निकाह में हों (मुहसनात), अलबत्ता ऐसी औरतों की बात और है जो (युद्ध में) तुम्हारे हाथ आएँ। यह अल्लाह का कानून है जिसका पालन तुम्हारे लिए अनिवार्य कर दिया गया है। इसके इलावा जितनी औरतें है उन्हें अपने मालों दुवारा हासिल करना तुम्हारे लिए हलाल कर दिया गया है , शर्त यह है कि निकाह के धेर में लेकर उन्हें सुरक्षित करो, न कि स्वच्छन्द कामतृप्ति करने लगो। फिर उन औरतों में से जिन्हें तुम काम मे लाए उन्हें उनका तैशुदा महर (विवाह तौफा) दे दो, अलबत्ता महर निश्चित हो जाने के बाद आपस की रजामन्दी से तुम्हारे बीच अगर कोई समझौता हो जाए तो इसमें कोई हर्ज नहीं, अल्लाह सबकुछ जानने वाला तत्त्वदर्शी है। 

यहाँ पर साफ लफ़्ज़ों में लौडियों से निकाह  करने को बताया गया है वह भी उनकी उनकी पाकदामनी की राक्षा करने के नियत से ना की सिर्फ अपनी जरुरत पूरा करने के नियत से ।

 ऐ नबी ! र्इमानवाले पुरूषो से कहो कि अपनी निगाहे नीची रखे और अपने गुप्तांगो (शर्मगाहों) की रक्षा करें। यह उनके लिए अधिक शुद्धता की बात हैं। निस्संदेह, अल्लाह उसकी खबर रखता है जो कुछ वे करते हैं।     (कुरआन, 24:30) 

क़ुरआन में एक जगह और आया है
खबरदार जीना के करीब भी ना जाओ यह खुला बेहयाई है 

आइये सूरह निसा 4 का ही और आयत देखते है 

सूरह निसा 4 
आयत 2.
और अनाथों को उनका माल दे दो और बुरी चीज़ को अच्छी चीज़ से न बदलो, और न उनके माल को अपने माल के साथ मिलाकर खा जाओ। यह बहुत बड़ा गुनाह हैं

3.
और यदि तुम्हें आशंका हो कि तुम अनाथों (अनाथ लड़कियों) के प्रति न्याय न कर सकोगे तो उनमें से, जो तुम्हें पसन्द हों, दो-दो या तीन-तीन या चार-चार से विवाह कर लो। किन्तु यदि तुम्हें आशंका हो कि तुम उनके साथ एक जैसा व्यवहार न कर सकोंगे, तो फिर एक ही पर बस करो, या उस स्त्री (लौंड़ी) पर जो तुम्हारे क़ब्ज़े में आई हो, उसी पर बस करो। इसमें तुम्हारे न्याय से न हटने की अधिक सम्भावना है

4.
और स्त्रियों को उनके मह्रा ख़ुशी से अदा करो। हाँ, यदि वे अपनी ख़ुशी से उसमें से तुम्हारे लिए छोड़ दे तो उसे तुम अच्छा और पाक समझकर खाओ

5.
और अपने माल, जिसे अल्लाह ने तुम्हारे लिए जीवन-यापन का साधन बनाया है, बेसमझ लोगों को न दो। उन्हें उसमें से खिलाते और पहनाते रहो और उनसे भली बात कहो
6
और अनाथों को जाँचते रहो, यहाँ तक कि जब वे विवाह की अवस्था को पहुँच जाएँ, तो फिर यदि तुम देखो कि उनमें सूझ-बूझ आ गई है, तो उनके माल उन्हें सौंप दो, और इस भय से कि कहीं वे बड़े न हो जाएँ तुम उनके माल अनुचित रूप से उड़ाकर और जल्दी करके न खाओ। और जो धनवान हो, उसे तो (इस माल से) से बचना ही चाहिए। हाँ, जो निर्धन हो, वह उचित रीति से कुछ खा सकता है। फिर जब उनके माल उन्हें सौंपने लगो, तो उनकी मौजूदगी में गवाह बना लो। हिसाब लेने के लिए अल्लाह काफ़ी है 

अब आइये देखते है गुलाम औरत हो या मर्द गुलाम के लिए क़ुरआन और नबी पाक का क्या फरमान है 

अपने उतरने के शुरुआत से ही कुरआन ने गुलामों को आज़ाद कराने को एक महान पुण्य का दर्जा दिया है और लोगों से प्रभावी तरीके से इस करने का आग्रह किया है। कुरआन के प्रयोग किये गए शब्दो فَكُّ رَقَبَة (गर्दनें छुड़ाना) से इसकी ज़बरदस्त अपील भाषा का ज्ञान रखने वाला कोई भी व्यक्ति समझ सकता है। इस तरह के भाव कुरआन में जहाँ भी आयें हैं उसके संदर्भ (पसमंज़र) से मालूम होता है की अल्लाह को खुश करने का यह पहला और सबसे बड़ा कदम है।

इसी तरह रसूलअल्लाह (स.व) ने मुसलमानों से इन शब्दों में गुलामों को छुड़ाने का आग्रह किया है: “जो भी एक मुसलमान गुलाम आज़ाद कराता है, उस गुलाम के हर अंग के बदले में अल्लाह आज़ाद कराने वाले का हर अंग नरक से सुरक्षित कर देता है।”

लोगों से आग्रह किया गया कि जब तक वह अपने गुलामों को आज़ाद ना कर दें तब तक वह उनसे भलाई का रवैया रखें। जिस तरह जहालत के दौर में मालिक का गुलामों पर अनियंत्रित (बेरोक) अधिकार था वह खत्म किया गया। उन्हें बताया गया कि गुलाम भी इंसान हैं और इस नाते उनके भी अधिकार है जिनका उल्लंघन करने का हक किसी को नहीं है।

अबू हुरैरा (रज़ि.) सूचित करते हैं कि रसूलअल्लाह (स.व) ने फ़रमाया: “एक गुलाम को खाने और कपड़ों का अधिकार है, और उससे किसी ऐसे काम के लिए नहीं कहना चाहिए जो उसके बस से बाहर हो।”

अबू ज़र अल-गिफ्फारी (रज़ि.) रसूलअल्लाह (स.व) के हवाले से सूचित करते है: “वह तुम्हारे भाई हैं। अल्लाह ने उन्हें तुम्हारा आज्ञाकारी बनाया है। तो जो तुम खाओ वही उन्हें खिलाओ, जो तुम पहनो वैसा ही उन्हें पहनाओ। और उनसे किसी ऐसे काम के लिए ना कहो जो उनके सामर्थ्य (बस) के बाहर हो और अगर कोई ऐसा काम आ जाए तो उसमें उनकी मदद करो।”

इब्न उमर (रज़ि.) रसूलअल्लाह (स.व) के हवाले से सूचित करते है: “जिसने भी एक गुलाम को थप्पड़ मारा या उसकी पिटाई की हो तो उसे उस गुलाम को आज़ाद करके इस पाप का प्रायश्चित करना चाहिए।”

अबू मसूद (रज़ि.) कहते है: “मैं एक बार अपने गुलाम को पीट रहा था और मैंने अपने पीछे से आवाज़ सुनी: ‘अबू मसूद! अल्लाह तुम से अधिक ताकत रखता है।’ मैंने मुड़ कर देखा तो रसूलअल्लाह (स.व) थे। मैंने तुरंत कहा: हे अल्लाह के रसूल! मैं अल्लाह के लिए इसे आज़ाद करता हूँ।’ रसूलअल्लाह (स.व) ने कहा: ‘अगर तुम ऐसा नहीं करते तो आग का दंड पाते।

इब्न उमर (रज़ि.) सूचित करते है कि एक बार एक व्यक्ति ने रसूलअल्लाह (स.व) से पूछा: “हमें कितनी बार अपने सेवकों को माफ कर देना चाहिए ?” [इस पर] रसूलअल्लाह (स.व) चुप रहे। उसने दुबारा पूछा और रसूलअल्लाह (स.व) इस बार भी चुप रहे। तीसरी बारे पूछे जाने पर आप (स.व) ने फरमाया: “एक दिन में सत्तर बार।”

गैर इरादतन हत्या, ज़िहार, और इसी तरह के अन्य मामलों में गुलाम को छुड़ाना प्रायश्चित्त और सदका (दान) बताया गया।

 निर्देश दिया गया कि जो गुलाम पुरुष और गुलाम महिलाएं शादी करने में सक्षम (काबिल) हैं उनकी शादी करा दी जाये ताकि वह नैतिक और सामाजिक दोनों रूप से समाज के बाकी लोगों के बराबर हो सकें।

ज़कात में एक हिस्सा فِي الرِّقَابِ (गर्दनें छुड़ाने) के लिए रखा गया ताकि गुलामी को खत्म करने में सरकारी खजाने से मदद मिल सके।[11]

 व्यभिचारिता (ज़िना) को अपराध करार दिया गया जिसके नतीजे में वह वेश्यालय जो गुलाम औरतों के आधार पर चल रहे थे बंद हो गए, और अगर किसी ने गुप्त रूप से यह कारोबार करने की कोशिश की तो उन्हें उदाहरणात्मक सज़ा(exemplary punishment) दी गयी।
 लोगों को बताया गया की वह सब अल्लाह के गुलाम हैं और عبد गुलाम पुरुष और  أمة गुलाम महिला के स्थान पर فاتي लड़का/आदमी और فتاه  लड़की/औरत शब्द इस्तेमाल करें ताकि मानसिकता में बदलाव आये और पुरानी चली आ रही धारणाएं बदली जा सकें। 

आइये अब देखते है आर्य समाज में किस्से विवाह करना चाहिए और किससे नहीं 

चतुर्थ समुल्लास
किन किन लड़कियो के साथ विवाह नहीं करना चाहिए 

नोद्वहेत्कपिलां कन्यां ना{ध्किाग्ीं न रोगिणीम्दृ
नालोमिकां नातिलोमां न वाचाटान्न पिग्लाम्भ ||३|| मनु।।
न पीले वर्ण वाली, न अधिकंगी अर्थात् पुरुष से लम्बी चौड़ी अधिक बलवाली, न रोगयुक्ता, न लोमरहित, न बहुत लोमवाली, न बकवाद करनेहारी और
भूरे नेत्रावाली ||३||
नक्र्षवृक्षनदीनाम्नीं नान्त्यपर्वतनामिकाम्दृ
न पक्ष्यहिप्रेष्यनाम्नीं न च भीषणनामिकाम्भ् ||४|| मनु।।                            न ऋक्ष अर्थात् अश्विनी, भरणी, रोहिणीदेई, रेवतीबाई, चित्तारी आदि नक्षत्रा
नाम वाली; तुलसिया, गेंदा, गुलाब, चम्पा, चमेली आदि वृक्ष नामवाली; गंगा, जमुना
आदि नदी नामवाली; चाण्डाली आदि अन्त्य नामवाली; विन्ध्या, हिमालया, पार्वती
आदि पर्वत नामवाली; कोकिला, मैना आदि पक्षी नामवाली; नागी, भुजंगा आदि
सर्प नामवाली; माधोदासी, मीरादासी आदि प्रेष्य नामवाली और भीमकुअरि,
चण्डिका, काली आदि भीषण नामवाली कन्या के साथ विवाह न करना चाहिये
क्योंकि ये नाम कुत्सित और अन्य पदार्थों के भी हैं ||४||

अब इसमें इन बिचारी इस नाम वाली और भूरे नेत्र एंड पिले वर्ण वाली लड़कियो का क्या दोश है नाम तो इनके माँ बाप का रखा हुवा है और भूरे नेत्र पीला वर्ण तो ईश्वर का बनाया हुवा है स्वामी जी यह सब नाम रखने के लिए माना किये होते तो बात कुछ हद तक समझ में आती लेकिन उन्होंने तो इन नाम वाली लड़कियो से सादी करनेे से ही माना कर दिए है 
अब आप लोग खुद सोचे अगर स्वामी दयानन्द जी के इस शिदान्त पे लोग चलने लगेंगे तो कितना बड़ा समस्या आ सकता है लाखो लडकिया कुवारी रह जाएँगी 
फिर यह लडकिया कहा जाएँगी 
इसका बिचार आप लोग खुद करें 
जब की इसमें से एक नाम इनके देवी का भी है पार्वती ।।

अब देखे किसके साथ विवाह करना चाहिए

अव्यगग्ीं सौम्यनाम्नीं हंसवारणगामिनीम्दृ
तनुलोमवेफशदशनां मृद्वग्ीमुद्वहेत्स्त्रिायम्भ्||५|| मनु।।
जिस के सरल सूधे अंग हो विरुद्ध न हों, जिस का नाम सुन्दर अर्थात्
यशोदा, सुखदा आदि हो, हंस और हथिनी के तुल्य जिस की चाल हो, सूक्ष्म लोम
केश और दांत युक्त और जिस के सब अंग कोमल हों वैसी स्त्री के साथ विवाह
करना चाहिये ||५||

खुद गंगो तेली हो लेकिन लड़की हंस हथनी जैसी चाल और कोमल अंग वाली होनी चाहिए ।
आर्य भाइ शादी से पहले लड़की को चला कर देखते होंगे हंस हथनी जैसी चाल है की नहीं कोमल बदन है की नहीं अगर ऐसा नहीं हुवा तो फिर दूसरा घर देखो 

यहाँ देखे शूद्र पैदाईसी गुलाम 
चतुर्थ समुल्लास
एकमेव हि शूद्रस्य प्रभुः कर्म समादिशत्।
एतेषामेव वर्णानां शुश्रूषामनसूयया।। मनु०।।

शूद्र को योग्य है निन्दा, ईर्ष्या, अभिमान आदि दोषों को छोड़ के ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों की सेवा यथावत् करना और उसी से अपना जीवन-यापन करना यही एक शूद्र का कर्म गुण है।।१।।

दयानन्द जी ने बिचारे शुद्रो को पैदाईसी सेवक गुलाम बना दिए है  शुद्रो का कर्म  ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्यों का सेवा करना ही बता दिए है । 
इसपे आप लोग खुद बिचार करे क्या यह सब बाते इंसानियत के खिलाफ नहीं है ।

नियोग मे नियम देखीये "नियोग अपने से उतम वर्णस्थ
पुरुष के साथ होना चाहिए

इसका तात्पर्य यह है कि वीर्य उतम वर्ण का चाहिये अपने से नीचे के वर्ण का नहीँ ( सत्यार्थ प्रकाश , सम्मुल्लास 4 ) 

अर्थात कोई आर्य कमजोर है तो
कोई भी हठ्ठा कठ्ठा आदमी आर्यो की औरतोँ से सबधँ बना सकता है शर्त ये है कि बच्चा पैदा हो । चाहे सबधँ बनाने वाला आर्य समाजी हो
या ना हो ।

आर्यो के इतीहासीक
ग्रथोँ से पता भी लगता है कुतीँ जी ने कुवारीँ ही ऋषीयोँ से सबधँ बना के नियोग कर के पाडवँ पैदा किये । वो पाडवँ भी कहाँ कम थे उन्होनेँ
एक की पत्नी को र्दौपदी को पाचोँ मेँ बदल लिया । 

यहाँ देखे आर्य समाज में किस तरह शिक्षा मेँ आजादी है
 स्त्रियोँ की पाठशाला मे पाचँ वर्ष का लडका और लडकोँ की पाठशाला मेँ पाचँ वर्ष की लडकी भी ना जाने पाये ( सत्यार्थ प्रकाश , तृतीय समुल्लास पेज 40)

अब बालिग होने पर ऐसा नियम हो तो समझ मेँ भी आता है लेकिन पाचँ वर्ष की आयु मेँ लडकियो
को लडको की पाठशाला मे जाने से कौन सा खतरा ।
अब आगे स्वामी दयानंद जी किया फरमाते है

कि पाचवें अथवा आठवें वर्ष से आगे अपने लड़को,और लड़कियों को घर मे न रख सके पाठशाला मे भेज देवे.जो न भेजे वो दण्डनीय हो

( सत्यार्थप्रकाश,तृतीयसमुल्लास,पेज,41)

जब लडके और लडकी बालिग हो जाए तो आर्यो को
ऐसी आजादी चाहिए विद्यालय मेँ  जब वे अथार्त लडका लडकी समक्ष हो तब अध्यापको व कन्या के माता पिता आदि भद्र पुरुषो के सामने उन दोनो की आपस मे बात चित .
शास्त्रार्थ करना और जो कुछ गुप्त व्यवहार पुछे तो सभा मे लिख के एक दुसरे के हाथ मे देकर
प्रशनोतर कर लेवेँ ( सत्यार्थ प्रकाश , चतुर्थ समुल्लास पेज 103)

स्वामी जी का फरमान है कि आर्य बालिग लडके लडकियाँ क्लास मेँ शास्त्रार्थ करे और साथ
साथ गुप्त व्यवहार कि बातेँ भी माता पिता अध्यापकोँ और सभा के सामने लिख लिख कर एक दुसरे के हाथ मे पर्ची देकर जानते रहे । मतलब
आर्यो को ऐसी आजादी चाहिए जिस स्कुल मेँ विषय (Subject) की बातो के साथ गुप्त व्यवहार की बातेँ भी एक दुसरे से हो पर्ची से
वो भी सबके सामने ।


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देखो भाइयो यह है झूट का दुकान और धूर्तबाज़ी का मकान आर्य समाजी कार्तिक अय्यर 

पहले हम कार्तिक के पोस्ट का जवाब देंगे ।

Surah 4 
Aayat 34.
पति पत्नियों संरक्षक और निगराँ है, क्योंकि अल्लाह ने उनमें से कुछ को कुछ के मुक़ाबले में आगे रहा है, और इसलिए भी कि पतियों ने अपने माल ख़र्च किए है, तो नेक पत्ऩियाँ तो आज्ञापालन करनेवाली होती है और गुप्त बातों की रक्षा करती है, क्योंकि अल्लाह ने उनकी रक्षा की है। और जो पत्नियों ऐसी हो जिनकी सरकशी का तुम्हें भय हो, उन्हें समझाओ और बिस्तरों में उन्हें अकेली छोड़ दो और (अति आवश्यक हो तो) उन्हें मारो भी। फिर यदि वे तुम्हारी बात मानने लगे, तो उनके विरुद्ध कोई रास्ता न ढूढ़ो। अल्लाह सबसे उच्च, सबसे बड़ा है

35.
और यदि तुम्हें पति-पत्नी के बीच बिगाड़ का भय हो, तो एक फ़ैसला करनेवाला पुरुष के लोगों में से और एक फ़ैसला करनेवाला स्त्री के लोगों में से नियुक्त करो, यदि वे दोनों सुधार करना चाहेंगे, तो अल्लाह उनके बीच अनुकूलता पैदा कर देगा। निस्संदेह, अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, ख़बर रखनेवाला है

36.
अल्लाह की बन्दगी करो और उसके साथ किसी को साझी न बनाओ और अच्छा व्यवहार करो माँ-बाप के साथ, नातेदारों, अनाथों और मुहताजों के साथ, नातेदार पड़ोसियों के साथ और अपरिचित पड़ोसियों के साथ और साथ रहनेवाले व्यक्ति के साथ और मुसाफ़िर के साथ और उनके साथ भी जो तुम्हारे क़ब्ज़े में हों। अल्लाह ऐसे व्यक्ति को पसन्द नहीं करता, जो इतराता और डींगें मारता हो ##

आप लोग खुद देखे कार्तिक की झूट और मक्कारी को सूरह 4 आयत 34 में खुले लज्जो में लिखा है की अगर तुम्हारी पत्नी की सरकशी भय हो यानि बदचलन भी हो तो पहले समझाओ फिर बिस्तर से अलग करदो फिर अगर जरुरत पड़े तो मारो । इसके साथ साथ बाकि की आयतो में देखिये कितनी अच्छी अच्छी सीक्षा दिया हुवा है क़ुरआन पाक ने हम इंसानो को 

खैर जिनके महापुरुस किसी धोबी के कहने पर अपनी पत्नी का अग्निपरीक्षा लिए हो फिर भी दिल ना माना तो गर्भवती पत्नी को बनवास के लिए भेज दिए हो 
वह लोग इस्लाम को भी अपने जैसा बनाना चाहते है क्यों की यही ऐसे लोगो के दिमाग में है ।

कार्तिक के दूसरे झूट का  जवाब स्क्रीनशॉट में है 

सूरह 38 आयत 41 तफ्सीर इब्ने कासीर 
जिसमे साफ साफ लिखा है ।
हज़रत अय्यूब (अ स) किसी बात पे बीमारी की हालत में गुस्से में अपनी पत्नी को लकड़ी से 100 लकड़ी मारने की कसम खा लिए थे फिर जब वह ठीक हुवे तो उन्हें अपनी कसम का याद आया लेकिन अपनी पत्नी को मार नहीं सकते थे उन्हें दया लग रहा था लेकिन दूसरे तरफ कसम भी था ।
इसलिए अल्लाह रबुलइज़्ज़त ने सपने में उनको दिखाया की 100 तिनके वाला एक झाड़ू लो और उससे अपनी पत्नी को हल्का सा मार दो इससे कसम भी पूरा हो जायेगा और आप की पत्नी को चोट दर्द भी मह्सुस नहीं होगा । अल्लाह हु अकबर 

लेकिन इस बात को वह लोग क्या जानेगे जिनके गुरु ने आज्ञा दिया हो की अगर तुम्हारी पत्नी अप्रिय हो तो दूसरी किसी औरत के साथ नियोग कुकर्म कर लो ।

चलिए अब देखते है इस्लाम में हर रूप में औरत का क्या मर्तबा है ।

इस्लाम मेँ बेटियोँ का महत्व ~ बेटियों " के लिए आप प्यारे नबी मुहम्मद सल्लललहु अलैहिवसलम् ने फरमाया है । आपने फ़रमाया के एक औरत के
लिए बड़े सौभाग्य की बात है की उसकी पहली संतान लड़की हो, जिन लोगों को कुछ बेटियाँ मिलें वह उन्हें लाड प्यार दुलार से परवरिश करें
और यहाँ तक की उनके अच्छे क़बीले में विवाह कर दें तो वो बेटियाँ अपने माँ बाप के लिये जहन्नुम से आड़ बन जाएँगी, अल्लाह हु अकबर
और आप अक्सर रोते हुए कहा करते थे की लोगों जो भी चीज़ें या तोहफ़ा घर ले आओ तो पहले लड़की
को दो बाद में लड़के को, लोगों तुम बेटियों को बुरा मत समझो क्योंकि मैं भी कुछ चंद बेटियों का बाप हूँ, बेटियाँ तो जन्नत की फूल हैं खुदा
का अनमोल तोहफ़ा और माँ बाप के लिए रहमत हैं, जो उन्हें दुःख देगा वो मुझे दुःख देगा, जब कोई लड़की पैदा होती है तो ख़ुदा ख़ुद कहता है " ए लड़की तू ज़मीन पर उतर मैं तेरे
बाप की मदद करूँगा "

अब बहन का महत्व देखीये इस्लाम मेँ ~

बहन की फजीलत ~ हजरत अली फरमाते है भाइ कि वजह से किसी कि बहन 3 तीन से ज्यादा नाराज रहे तो अल्लाह कि लानत होती है ।

इस्लाम बुनियादी तौर पर
कानून, रज़ामन्दी, इत्तेहादी, भाईचारे और मुहब्बत और रहम का परचम बुलन्द करता हैं|
लड़ाई-झगड़ा, फ़ूट-बिखराव, असामाजिक और रिश्तो की खराबी को इस्लाम ने बुरा जाना हैं| ये सब बातेँ गुनाह है इस्लाम मेँ कानूनी
दायरे के तहत इस्लाम ने इत्तेहाद
और आपसी रज़ामन्दी को इतनी अहमियत दी हैं

, इस्लाम मेँ हर एक रिशते का अपना महत्व है । रिश्तो और रिश्तेदारो के हक मे नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहीवसल्लम् का फ़रमान हैं के
रिश्तो को काटने वाला जन्नत मे दाखिल नही होगा|
(बुखारी व मुस्लिम)

पत्नी का महत्व इस्लाम मेँ ~

मिया बिवी के रिश्ते मे मर्दो को ताकीद के साथ बताई वो ये के - तुममे सबसे
बेहतर वो हैं जो अपनी बीवी के हक मे बेहतर हैं|
(तिर्मिज़ी)

इस्लाम मेँ मर्दानगी क्या है सबसे बहतरीन मर्द वो है जो अपनी बिवी के साथ बेहतरीन सलुक करे ।

अब माँ के रुप मे नारी का महतव इस्लाम मेँ ~

अकेला ऐसा धरम जिसने फरमाया माँ के कदमोँ के निचे जन्नत है । शिक्षा के रुप मे सतानँ की पहली शिक्षक माँ ही होती है । इस्लाम ने फरमाया सतानँ का पहला मदरसा माँ कि गोद
है ।

अब देखते है आर्य समाज में औरत का अस्तिथि 

आर्यो मे बेटियोँ का महत्व ~ वेदकाल से ही आर्यो मे बेटियोँ के लिए हलकट वृर्ती पक्षपात दिखता है । आर्यो को वेदकाल से ही बेटियाँ पसदँ नहीँ ना ही बेटियोँ की कोइ इच्छा ।

ऐसा कैसे हो सकता आर्यो के कई कुलोँ मेँ बेटियाँ पैदा ही ना हो । जबकि बेटा बेटी एक समान सख्याँ मेँ पैदा होते है । आइये वेदकाल से शरुवात
करते है । राजा दशरथ के चार पुत्र पर पुत्री कोइ भी नहीँ ।

मिथिला के राजा जनक सीता के मूल पिता नहीं थे। क्योंकि खेत में हल जोतते वक्त सीता जी उन्हें एक बक्से में बंद मिली थीं। ये हाल था
वेदकाल मेँ बेटियोँ का अगर किसी को बेटी हो जाती थी तो ये हाल होता था । 

स्वामी जी ने भी स्विकार किया है कि सिता हल चलाते वक्त खेत मेँ मिली थी । 

अब महाभारत मे देखिये
पाडँवो के पुत्र 5 पर पुत्री कोइ भी नहीँ ।
कौरव 100 पुत्र है पर पुत्री कोइ भी नहीँ ।
बल्कि अनार्य वित्रवा के पुत्र रावण भी है तो पुत्री सुप्ररन्खा पर आर्यो मेँ पुत्री हरगिस नहीँ ।

आर्य समाज के अमर ग्रन्थँ सत्यार्थ प्रकाश मेँ भी सिर्फ पुत्र , बालक , लडके कि कामना की गइ है । पुत्री या बालिका या लडकी कि नहीँ ।

देखीये ~ उसी विवाहिता स्त्री के "लडके" उसी विवाहित पति के दायभागी होते है । और विधवा स्त्री के "लडके" विर्यदाता के न
"पुत्र" कहलते , न उसका गोत्र होता और उसका स्वत्व उन "लडकोँ" पर रहता , किन्तु वे मूतपति के "पुत्र" बजते , उसी के गो रहता और
उसी के पदार्थो के दायभागी होकर उसी घर मेँ रहते है । ( सत्यार्थ प्रकाश , चतुर्थसमुल्लास )

यहाँ एक बार भी पुत्री या लडकी की कामना नहीँ कि गयी ।

बहन का महत्व आर्यो मेँ ~ आर्य  खुद तो बहन पसँद ही नहीँ करते और दुसरोँ कि बहनोँ पर अत्याचार करते है । आर्य लक्षमन जी ने
भी सुर्पनखा कि नाक काट दी थी ।

आर्यो मे पत्नी का महत्व ~ आर्यो भला पत्नी का महत्व क्या समझेगेँ जो गभवर्ती पत्नी को घर से निकाल दे । जो पत्नी को जुए मे बेच दे ।
जो पत्नी के गर्भवती होने पर किसी दुसरी स्त्री से नियोग (कुकरम) कर लेँ । जो अप्रिय पत्नी होने पे दूसरी औरत के साथ नियोग कुकर्म करले 

जो 11 11 वाले मिशन पर पत्नी को भेज दे वो भला पत्नी का महत्व क्या समझेगेँ ।

आर्यो मेँ माँ का महतव ~ आर्य जो वचन अच्छा लगे वो वचन अपनी माँ का मानते है जो नहीँ लगता उसे नहीँ मानते । जैसे द्रोपदी के विषय मेँ उनकी माँ कुतीँ ने अदँर से ही कह दिया कि जो भी लाये हो पाचोँ भाई आपस मे बाटँ लो ।

लेकिन द्रोपदी इस वचन से नाखुश थी पर माँ का वचन है कहकर सबने उस से विवाह किया तब माँ का वचन कहाँ गया था की बेटा जुआ मत खेलना । तब वचन कहाँ गया था जब द्रोपदी
को जुए मेँ दाव पर लगाने से माँ ने बहुत रोका पर नहीँ माना माँ का वचन । 


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प्रमोद कुमार जी से मेरा चन्द सवाल 


(1)प्र्शन वेद कब कैसे और किसके द्वारा  धरती पर आया   फिर वेद ज्ञान मनुष्य तक कैसे पंहुचा उस वक़्त मानव भाषा क्या थी 
2 वेद अगर ईश्वरीय ग्रन्थ है तो आप वेद में ईश्वरवाद तौहीद दिखाए और वेद निंदक,म्लेच्छ,दस्यु का अर्थ भी बताये 

3 क्या ईश्वर इतना निर्दयी जालिम हो सकता है जो दुसरो के लिए ऐसी आज्ञा दें ईस कदर का पक्षपात करें 
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वृश्च प्र वृश्च सं वृश्च दह प्र दह सं दह |
"तू वेद निन्दक को, काट डाल, चीर डाल, फाड़ डाल, जला दे, फूँक दे, भस्म कर दे।" भावार्थ: धर्मात्मा लोग अधर्मियों के नाश में सदा उद्यत रहें [अथर्ववेद काण्ड12: सूक्त 5: मंत्र 62 पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी भाष्य]

जो आर्यावर्त देश से भीन देश वाले है वह दस्यु और म्लेच्छ है 
मनुस्मृति 10 /45 मनुसमृति 2/23
  
"ऐ दुश्मनों के मारने वाले जंग के नियमों में माहिर निडर, साहसी, प्रिय, प्रतापी और जवां मर्द तू सब प्रजा को प्रसन्न रख । परमेश्वर के आदेश पर चलो और घ्रणित शुत्र को ( हे महाराज इतनी नाराजी ) पराजित करने के लिए लड़ाई का कार्य पूरा करो । तुमने पहले मैदानों में शत्रुओं की सेना को पछाड़ा है । तुमने इन्द्रियों को पराजित और धरती को विजयी किया है । तुम शक्तिशाली बाजू वाले हो । अपनी बाजू की ताकत से दुशनों को समाप्त करो ताकि तुम्हारे बाजू का जोर और ईश्वर की दया व कृपा से हमारी विजय हो ।
(अथर्ववेद कांड 6 , अनुवादक वरग 95 मन्त्र 3



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इनके नागपुरी और विलुप्त समाजी ज्ञान के हिसाब से इनका मानना है की सब्द मकर का अर्थ मक्कार होता है जब के या बिलकुल बेतुका है गलत है
 ये महासय सायद पोंगा पण्डित महेन्द्रपाल जी के चेले है जिन्हें आरबीक और हिंदी दोनों का अर्थ सेम नज़र आता है 
इनके गुरु तो अपने पेज और id पे ब्लाक कर रखें है 
लेकिन मैं आशा करता हु पोस्ट में कुछ इनसे भी सवाल किया गया हुवा है खुद जवाब दे या अपने गुरु पोंगा जी से पूछ कर बताएं ##

किसी वाक्य का अर्थ उसके प्रसंग के अनुसार करना चाहिए. कुरान ३:५४ के प्रसंग में शब्द 'मकर' का अर्थ है 'योजना' या 'तदबीर'. इसी कारण कुरान के सारे अनुवादकों ने (गैर मुस्लिम अनुवादकों ने भी) इसके यही अर्थ किये हैं. अंग्रेजी अनुवादकों ने भी इसके अर्थ 'plan' या 'plot' के किये हैं. आयत का अर्थ यह हुआ की यहूदियों ने हज़रत ईसा को कष्ट पहुँचाने की खुफिया योजना बनायीं और अल्लाह ने उनको बचाने की योजना बनायीं और निसंदेह अल्लाह की योजना सब पर भारी है.

अरबी में यह शब्द कोई बुरा अर्थ नहीं रखता लेकिन हिंदी में बड़े घृणित अर्थों में बोला जाता हे जिसके कारण आपने आपत्ति की है.

वेद का धोकेबाज़ ईश्वर

अपने शायद वेदों का अध्यन नहीं किया है. ऋग्वेद में अनेक जगह इन्द्र को मायी (धोकेबाज़) कहा गया हे. उदाहरण के तोर पर देखिये ऋग्वेद १:११:७

मायाभिरिन्द्र मायिनं तवं शुष्णमवातिरः |
विदुष टे तस्य मेधिरास्तेषां शरवांस्युत तिर ||

"हे इन्द्रदेव ! अपनी माया द्वारा आपने 'शुषण' को पराजित किया. जो बुद्धिमान आपकी इस माया को जानते हैं, उन्हें यश और बल देकर वृद्धि प्रदान करें."

इस मंत्र का भावार्थ स्वामी दयानंद जी इस प्रकार करते हैं.

"बुद्धिमान मनुष्यों को ईश्वर आगया देता है कि- साम, दाम, दंड और भेद की युक्ति से दुष्ट और शत्रु जनों क़ी निवृत्ति करके चक्रवर्ति राज्य क़ी यथावत उन्नति करनी चाहिए"

जग रतुरि जी , साम, दाम, दंड और भेद को तो आप जानते ही होंगे.

साम : बहलाना फुसलाना
दाम : धन देकर चुप कराना
दंड : यदि बहलाने फुसलाने से न माने तो ताड़ना करना
भेद : फूट डालना

इसके अतिरिक्त ऋग्वेद ४:१६:९ में दयानादं जी नें भी अपने भाष्य में 'मायावान' का अनुवाद मक्कार किया है. पंडित जयदेव शर्मा (आर्य समाजी) ने अपने ऋग्वेद भाष्य में 'मायावान' का अनुवाद कुटिल मायावी किया है. तो सिद्ध हो गया कि वैदिक ईश्वर मायी अर्थात धोकेबाज़ है.

जग रतुरि जी ,आपके शब्दों में कहना चाहूँगा "जो ईश्वर इंसान के साथ धोका करता है या इंसानों को धोके का उपदेश करता है, वह ईश्वर कोई अच्छा ईश्वर नहीं हो सकता."


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सवाल-अल्लाह ने शैतान को क्यों बनाया ..?

आर्य समाजी बन्दुओ  के बेकार का सवाल का सीधा जवाब 
शैतान को क्यों पैदा किया?
असल बात यह है कि शैतान किसी की गुमराही के लिए कोई तर्क या कारण नहीं है बल्कि वह केवल एक बुरे सलाकार की तरह बुरे विचारों और कामों को सुझाव देनेवाला और लुभाने वाला है अतएव उसका यह बयान पूरे का पूरा कुरआन में मौजूद है तनिक ध्यान से सुनिए।जैसी दुनिया में और बहुत-सी बुरी संगतें होती हैं ऐसे ही शैतान भी एक बुरा साथी है इससे अधिक कुछ नहीं। इस बुरी संगत के प्रभाव से बचने के लिए ईश्वर ने एक इलाज बताया है बडा ही शक्तिशाली जो हकीकत में बडा प्रभावी है वह है अल्लाह का जिक्र (गुण-गाण करना) अतएव कुरआनमें इसका भी उल्लेख है--अर्थात ईश्वर के भले बन्दों पर शैतान का कोई दाव नहीं चल सकता। जो लोग अल्लाह के जिक्र में समय गुजारते हैं। और बुरे कामों से बचते हैं शैतान उनका कुछ नहीं बिगाड सकता। हां जो लोग बेहुदा बकवास और बुरी संगत में समय नष्ट करते हैं उन्हीं पर शैतान अपना जोर चला पाता है। अत- शैतान का उदाहरण बिल्कुल विष का सा समझो। जैसा कि ईश्वर ने विष पैदा करके उसका इलाज भी बता दिया है। ऐसा ही शैतान पैदा करके उसका प्रभाव बताकर इलाज (तौबा और रसूल का अनुसरण) बता दिया है। शैतान की विस्तार से बहस की जानकारी के लिए तफसीर सन्नाई भाग1 हाशिया खतमुल्लाह में देखें।हां याद आया कि दुनिया में इस समय करोडों मुसलमान, करोडों ईसाई, बौद्ध, यहूदी आदि कौमें ईश्वर के ज्ञान (वेद) को नहीं मानते बल्कि उसे मूर्ति का स्रोत जानते हैं तो परमेश्वर कैसा विवश है कि इनको सीधा नहीं कर सकता। उसके तेज में कोई फर्क तो है। आखिर किस-किस से बिगाडे और किस किस को पकडे?स्वामी जी! ''जीव आत्मा अपनी इच्छा की मालिक है'' (देखो सत्यार्थ प्रकाश, अध्याय7, नम्बर 48) धार्मिक मामलों में ईश्वर ने छूट दी हुई है जिसका जीचाहे आज्ञा पालक हो जो चाहे न हो,सुनो! कुरआन मजीद बताता है-- ''जो चाहे ईमान लाए और जो चाहे काफिर बने। (सूरह कहफ - 29) और आर्य पिसचो में आपसे पूछता हु की ,, किस आयत से मालूम हुआ कि खुदा को पता नहीं। यदि शैतान के पैदा करने से खुदा बे इल्म साबित होता है तो परमेश्वर ने जैनियों को क्यों पैदा किया? जो आपके कथनानुसार मूर्ति पूजा को आरंभ करने वाले हुए जिनके बारे में सत्यार्थ प्रकाश में आप लिखते हैं- -''मूर्ति-पूजा का जितना झगडा चला है वह सब जैनियों के घर से निकला है और पाखन्डियों की जड़ यही जैन-धर्म है (सत्यार्थ प्रकाश प्रथम, उर्दू एडिशन, पृष्ठ-544, अध्याय 12, नम्बर 119) और सुनिए-- ईश्वर ने सुलतान महमूद( गजनवी औरगाजी महमूद धर्मपाल) को क्यों पैदा किया जिसने आर्यवरत की काया पलट दी और बताइए ईश्वर ने पुरानों के लेखकों को क्यों पैदा किया जिन्होंने (आपके कथनानुसार) सारे पुराण गप्पों से भरकर आर्यवरत को गुमराह कर दिया।और सुनिए..... ईश्वर ने मुसलमान क्यूं बनाए कि वेदिक धर्म का सारा ताना-बाना ही बिखर कर रह गया।


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Suryansh Pandey जी के बिस्मिल्ला पर एतराज़ का जवाब 

इसलाम  में कोई भी काम शुरू करते समय "बिस्मिल्ला-हिर्रहमा-निर्रहीम"
पढते हैं, इसका हिन्दी अनुवाद है "शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से"

सवाल ~ कोई भी ईश्वर अपनी ही किताब अपने ही नाम से कैसे शुरू कर सकता है?
अल्लाह के नाम पर अल्लाह क़ुरआन क्यों लिखेगा? अल्लाह अपने ही नाम पर क़ुरआन क्यों लिखना आरम्भ करेगा?
 क्या कोई ईश्वर अपने ही नाम की ख्याति करेगा , अपने नाम का विज्ञापन तो मानव लोगो की प्रकृति है।।पहली आयत है "शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से" (2:1)
अल्लाह अपने ही नाम से कैसे शुरू कर सकता है?? इसका मतलब अल्लाह का भी कोई अल्लाह है?? या इस आयत को किसी मानव ने लिखी है जो अल्लाह को संबोधित कर रहा है??आख़िर आप ही कहते हो क़ुरआन अल्लाह की वाणी है, जो अल्लाह ने खुद उतारी है धरती पर? अगर ऐसा है तो अल्लाह खुद की वाणी खुद को सम्बोधन कैसे करेगा रे भेया?

जवाब~अब सुनिए  ईश्वरी ग्रन्थ  हर तरह के लोगों की रहनुमाई के लिए होती है इसी वजह से इसकी गुफ्तगू के अंदाज़ भी भिन्न-भिन्न होते हैं, कभी तो अल्लाह (परमेश्वर)लोगों को सिखाता है कि तुम्हें क्या और कैसे करना है, कभी मिसाल देकर समझाता है तो कभी पुराने लोगों की हालत बताकर हमें हमारे कर्मों का एहसास दिलाता है। तो बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम भी पहले प्रकार की है यानि अल्लाह (परमेश्वर)हमें सिखा रहा है कि मैंने ही तुम्हें पैदा किया, मैंने ही तुम्हें तुम्हारी ज़रूरत की चीजें भी दीं तो तुम्हें चाहिए कि तुम हर काम मेरे ही नाम से करो न कि किसी और के नाम से।  

और दयानंद जी ने सत्यार्थ प्रकाश में ये खूब कहा कि, "क्या गुनाहों से भी पहले बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम कहेगा

अरे महोदय यही तो हम समझाना चाहते हैं आपको कि अगर कोई बंदा 
अच्छा काम बिस्मिल्लाह से शुरू करे तो बरकत होती है और हराम काम से पहले बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम पढ़ना कुफ्र है। अगर किसी ने कोई गुनाह करने से पहले बिस्मिल्लाह पढ़ने की कोशिश की तो वो फौरन अल्लाह (परमेश्वर) का नाम याद आते ही उस गुनाह से रुक जाएगा

अब भी अगर आपके समझ में न आये तो फिर आपके दयानंद जी ने सत्यार्थ प्रकाश की भूमिका में क्या खूब लिखा, "बहुत से हठी-दुराग्रही मनुष्य होते हैं जोकि वक्ता के अभिप्राय से विरुद्ध कल्पना किया करते हैं, विशेषकर मत-वाले लोग, क्योंकि मत के आग्रह से उनकी बुद्धि अन्धकार में फंस के नष्ट हो जाती है।" 

एक और जगह चतुर्दश समुल्लास में अपनी सच्चाई बता गए आपके गुरु जी.लिखते हैं,
जो दूसरे मत को कि जिसमें हज़ारों करोड़ो मनुष्य हों, झूठा बतलावे और अपने को सच्चा, उस से परे झूठा दूसरा मत कौन हो सकता है।" 

अब दयानंदि भाइयो अपने गुरु की बात को सामने रख कर अपने गिरेबान में झांको कि आप मुट्ठीभर आटे में नमक के बराबर दयानंदी बंदु किस तरह उस इस्लाम पर कीचड उछाल रहे हो जिसके अनुयायियों के सामने आप की औक़ात ऐसी है जैसे एक समंदर के सामने क़तरा

बड़ा अफसोस होता है इन दयानंदी भक्तों को देख कर, ये हमेशा अपनी अक्ल न जाने कहाँ रख आते हैं कि हमेशा बिगैर सोचे समझे बिच बिच का आयत कोड करके बिना हाथ पैर का एतराज करना शुरू कर देते हैं 
इनके गुरु दयानंद जी का भी यही हाल था जिन्होंने भांग की नसे में सत्यार्थ प्रकाश लिखे थे जिसमे  हर धर्म और धर्म ग्रंथो का बुराई है चाहे इस्लाम हो ईसाई धर्म हो या हिन्दू धर्म सब धर्मो की अलोचना और कुछ बगैर हाथ पैर की बातो के इलावा कुछ नही है 
दयानंद जी कुरआन पे भी अलोचना किये है जब की दयानंद जी को कुरआन और तफ्सीर भाष्य का भी फर्क मालूम ना था जिसका जवाब हक़ प्रकाश में काफी पहले दे दिया गया हुवा था
 और हमेशा से मुस्लिम जवाब देते हुवे आ रहे है 
फिर भी दयानंद जी के चेले उन्ही सवालो को घुमाते रहते है हमेशा मुह की खाते है फिर हाथ पैर झाड़ कर उन्ही सवालो को ले कर इस्लाम से अनजान लोगो को भर्मित करने के लिए आगे निकल जाते है 

और ये भूल जाते हैं कि जो आपत्ति इन्होंने क़ुरआन पर की है वो इनके वेदों पर भी रिटर्न होगी.

अगर  अपने वैदिक मंत्रों को थोड़ी भी समझ से पढ़ लेते तो क़ुरआन पर  एतराज नहीं करते।
 
लीजिए ऋग्वेद से शुरू करते हैं, अगर आप ऋग्वेद के पहले पांच मंत्र ही देख लेते महोदय, जो 'अग्नि' के नाम से शुरू हैं और आपके गुरु दयानंद ने सत्यार्थ प्रकाश के प्रथम समुल्लास के आरंभ में ही लिखा है कि स्वप्रकाश होने के कारण ईश्वर को 'अग्नि' कहते हैं, तो कुरआन पर आपत्ति करने की हिम्मत न करते। 
लीजिए पढ़िए:-

"अग्निमीले पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्। होतारं रत्नधातमम्।"
{ऋग्वेद, 1:1:1}

"अग्नि पूर्वेभिर्ऋषिभिरीडयो नूतनैरुत। स देवाँ एह वक्षति।"
{ऋग्वेद, 1:1:2}

"अग्निना रयिमश्नवत् पोषमेव दिवेदिवे। यशसं वीरवत्तमम्।"
{ऋग्वेद, 1:1:3}

"अग्ने यं यज्ञमध्वरं विश्वतः परिभूरसि। स इद्देवेषु गच्छति। "
{ऋग्वेद, 1:1:4}

"अग्निर्होता कविक्रतुः सत्यश्चित्रश्रवस्तमः। देवो देवेभिरा गमत्।"
{ऋग्वेद, 1:1:5}

{वेद ऐसे मंत्रों से भरे पङे हैं लेकिन हमने सिर्फ यहां 5 ही लिखे हैं}
आप का ये कहना है कि वेदों को ईश्वर ने सृष्टि के आदि में प्रकाशित किया, अब आपके ही शब्दों में
"कोई भी ईश्वर अपनी ही किताब{ऋग्वेद}अपने ही नाम {अग्नि} से कैसे शुरू कर सकता है?
अग्नि के नाम पर अग्नि ऋग्वेद क्यों लिखेगा? 
अग्नि अपने ही नाम पर ऋग्वेद क्यों लिखना आरम्भ करेगा?
क्या कोई ईश्वर {अग्नि} अपने ही नाम की ख्याति करेगा , अपने नाम का विज्ञापन तो मानव लोगों की प्रकृति है।।
पहला ही मंत्र है "अग्निमीले पुरोहितं" {ऋग्वेद, 1:1:1}

अग्नि अपने ही नाम से कैसे शुरू कर सकता है?? इसका मतलब वैदिक ईश्वर का भी कोई दूसरा ईश्वर है?? या इस मन्त्र को किसी मानव ने लिखा है जो अग्नि को संबोधित कर रहा है??आख़िर आप ही कहते हो ऋग्वेद ईश्वर की वाणी है, जो ईश्वर ने खुद प्रकाशित की ? अगर ऐसा है तो ईश्वर {अग्नि} खुद की वाणी में खुद को सम्बोधन कैसे करेगा भैया?"

 किसी भी सब्जेक्ट की बड़ी किताब समझने के लिए पहले उसी सब्जेक्ट की छोटी-छोटी बातों को सीखना पढ़ता है, अगर किसी पांचवे क्लास के बच्चे को इंटरमीडिएट की बायोलॉजी, इंग्लिश या फ़िज़िक्स की किताब पकड़ा दी जाए तो वह कैसे समझ पाएगा जब तक उसके रूल्स या ग्रामर न सीखे। 
उस सब्जेक्ट के रूल्स सीखे समझने के नियत से निष्पक्ष हो कर पढे बिना इसके तो वो किताब बकवास ही लगेगी, जबकि बात यहाँ उल्टी है यानि वो ये नहीं समझ पा रहा है कि वो खुद ही जाहिल है किताब बिल्कुल सही है। 

कुछ यही हालत आप दयानंद के भक्तों की भी है जो कुरआन से सम्बन्धित किसी भी सब्जेक्ट का ज्ञान नहीं रखते मगर कहते फिरते हैं कि हा हमने कुरआन पढ़ा है जब की कुरआन का बिच बिच की आयत कोड करके अपनी झूठ के सहारे लोगो को भर्मित करते रहते है


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आक्षेप:१:-आइये अब देखते है आर्य समाज में किस्से विवाह करना चाहिए और किससे नहीं
चतुर्थ समुल्लास
किन किन लड़कियो के साथ विवाह नहीं करना चाहिए
नोद्वहेत्कपिलां कन्यां ना{ध्किाग्ीं न रोगिणीम्दृ
नालोमिकां नातिलोमां न वाचाटान्न पिग्लाम्भ ||३|| मनु।।
न पीले वर्ण वाली, न अधिकंगी अर्थात् पुरुष से लम्बी चौड़ी अधिक बलवाली, न रोगयुक्ता, न लोमरहित, न बहुत लोमवाली, न बकवाद करनेहारी और
भूरे नेत्रावाली ||३||
नक्र्षवृक्षनदीनाम्नीं नान्त्यपर्वतनामिकाम्दृ
न पक्ष्यहिप्रेष्यनाम्नीं न च भीषणनामिकाम्भ् ||४|| मनु।। न ऋक्ष अर्थात् अश्विनी, भरणी, रोहिणीदेई, रेवतीबाई, चित्तारी आदि नक्षत्रा
नाम वाली; तुलसिया, गेंदा, गुलाब, चम्पा, चमेली आदि वृक्ष नामवाली; गंगा, जमुना
आदि नदी नामवाली; चाण्डाली आदि अन्त्य नामवाली; विन्ध्या, हिमालया, पार्वती
आदि पर्वत नामवाली; कोकिला, मैना आदि पक्षी नामवाली; नागी, भुजंगा आदि
सर्प नामवाली; माधोदासी, मीरादासी आदि प्रेष्य नामवाली और भीमकुअरि,
चण्डिका, काली आदि भीषण नामवाली कन्या के साथ विवाह न करना चाहिये
क्योंकि ये नाम कुत्सित और अन्य पदार्थों के भी हैं ||४||
अब इसमें इन बिचारी इस नाम वाली और भूरे नेत्र एंड पिले वर्ण वाली लड़कियो का क्या दोश है नाम तो इनके माँ बाप का रखा हुवा है और भूरे नेत्र पीला वर्ण तो ईश्वर का बनाया हुवा है स्वामी जी यह सब नाम रखने के लिए माना किये होते तो बात कुछ हद तक समझ में आती लेकिन उन्होंने तो इन नाम वाली लड़कियो से सादी करनेे से ही माना कर दिए है

कार्तिक अय्यर उत्तर:- 
आपने सही कहा है कि परमेश्वर ने ही भूरे और पीले नेत्रों वाली कन्यायें बनाई हैं और स्वामीजी भी यही मानते हैं:-
स्वामी दयानंद जी ने यजुर्वेद भाष्य में लिखा है:-
अग्नये पीवानं पृथिव्यै पीठसर्पिणं वायवे चाण्डालम् अन्तरिक्षाय वम्ँ शनर्तिनं दिवे खलतिम्ँ सूर्याय हर्यक्षं नक्षत्रेभ्यः किर्मिरं चन्द्रमसे किलासम् अह्ने शुक्लं पिङ्गाक्षम्ँ रात्र्यै कृष्णं पिङ्गाक्षम्॥ ~यजुर्वेद { ३०/२१}

दयानंद अपने यजुर्वेदभाष्य में इसका अर्थ यह लिखते हैं कि--
“हे परमेश्वर वा राजन् !आप, (हर्यक्षम्)- बन्दर की सी छोटी आँखों वाले शीतप्राय देशी मनुष्यों को,,,,,,, (पिङ्गलम्)- पीली आँखोवाले को उत्पन्न कीजिये,,,,,, (चाण्डालम्)- भंगी को, (खलतिम्)- गंजे को,,,,,, (कृष्णम्)- काले रंगवाले, (पिङ्गाक्षम्))- पीले नेत्रों से युक्त पुरूष को दूर कीजिये”

पाठकगण! ध्यान दें। महर्षि दयानंद स्वाभाविक रूप से उत्पन्न हुये पीले आंख वालों को बुरा नहीं मानते अन्यथा यह नहीं कहते कि इनको उत्पन्न करें। जिनको परमात्मा ने भूरे,पीले नेत्र दिये हैं, उनका कोई दोष नहीं है न स्वामीजी उनमें दोष मानते हैं! हां, आगे इसी भाष्य में लिखा है कि पीले नेत्रोंयुक्त व्यक्ति से दूर करें। नशा करने से या दीर्घरोगी होने से आंखें पीली हो जाती हैं। अर्थात् जिस कन्या में नशाखोरी जैसी आदत हो उससे विवाह न करें। यह बिलकुल उचित है क्योंकि उससे उत्पन्न संतान भी नशाखोर और रोगी होगी।
अतः स्वाभाविक रूप से पीले भूरे नेत्र वालों को महर्षि दयानंद बुरा नहीं मानते।

अनवारुल हसन समीक्षा , 
जब स्वामी जी भूरे नेत्र वाली कन्या को बुरा नहीं मानते थे तो फिर विवाह करने से क्यों माना किये सीधी बात है जिसको आप घुमा रहे है 
दूसरी बात नासा करने से आँख पिले नहीं लाल होते है । हा बीमारी से आँख पिले होते है लेकिन इसमें के यह दरुस्त नहीं होगा की ऐसी लड़कियो से विवाह नहीं किया जाया या ऐसी लडकिया विवाह के हक़दार नहीं ऐसी बीमारियो को दावा इलाज़ से भी सही किया जा सकता है ।
एक बात और क्लियर हो गया की आर्य समाज में लडकिया नसखोर भी होती है ।।

कार्तिक अय्यर उत्तर 
रहा प्रश्न नाम का, तो स्वामीजी ने कहीं नहीं लिखा कि "ऐसे नामवाली कन्या से विवाह करने वाला नरक में जायेगा या उसे पाप लगेगा आदि" । यह कोई पाप नहीं है । ठीक है, मां बाप ने नाम रखा है। परंतु वैदिक रीति से नामकरण संस्कार होता है तो ऐसे नाम ही नहीं रखे जाते।

देखिये वैदिक रीति से कैसे नाम रखे जाते हैं:-
अव्यगग्ीं सौम्यनाम्नीं हंसवारणगामिनीम्दृ
तनुलोमवेफशदशनां मृद्वग्ीमुद्वहेत्स्त्रिायम्भ्||५|| मनु।।
जिस के सरल सूधे अंग हो विरुद्ध न हों, जिस का नाम सुन्दर अर्थात्
यशोदा, सुखदा आदि हो।।५।।

अब कहिये, जब ऐसे नाम रखने की आदेश है, तो अयुक्त नाम कोई क्यों रखेगा?यदि रख भी देगा, तो भी कोई महापाप नहीं है। परंतु यह अन्य कारण से निषेध है। जैसे रोहिणी,आदि नक्षत्रों के नाम है। क्या इंसानोम के नाम नक्षत्रों के आधार पर कोई रख सकता है? क्या आपने कभी अपने बालकों के प्लूटो,अर्थ,नेब्युलार आदि आकाशीय तत्वों के आधार पर रखें हैं? नहीं क्योंकि उनका इससे कोई संबंध नहीं। 

अनवारुल हसन समीक्षा- 
स्वामी जी ऐसी नाम वाली लड़कियो से सादी को पाप नहीं बताये है लेकिन ऐसी नाम वाली लड़कियो से सादी ना करने की बात करके इन लड़कियो को पापी जैसीे सजा का हक़दार जरूर बना दिए है 

कार्तिक अय्यर उत्तर 
तुलसी,चमेली आदि फूलों के नाम है नाकि इंसान के।अतः इनरा रखना व्यर्थ है। क्योंकि नाम ऐसा हो, जिसको लेते ही लेने वाले को कोई शिक्षा मिले। जैसे  यशोदा,सुखदा, लक्ष्मी आदि नाम प्रेरणादायक हैं और मानवों पर चरितार्थ होते हैं।

अनवारुल हसन समीक्षा - 
अगर स्वामी जी ऐसी नाम रखने से माना किये होते तो कोई आपत्ति नहीं होता लेकिन उन्होंने तो सीधा सादी करने से ही माना कर दिये है । अगर आज भी स्वामी जी के सिदांतो पे लोग चलने लगे तो तो इन लड़कियो का क्या होगा ये अपने ख्वाहिस को कैसे पूरा करेंगी ।
कहा जाएँगी सादी के बगैर क्या करेंगी लेकिन कोई स्वामी जी के इस सिदांतो को मानता ही नहीं है और ना ही मानने योग्य है यह बेतुकी बाते ।

कार्तिक अय्यर उत्तर  चंडिका,दुर्गा,हाकिनी,डाकिनी आदि नाम भयंकर हैं अर्थात् कन्यायें आमतौर पर सीधी सरल सौम्य होती हैं। ऐसे कठोर नाम उनके रखना व्यर्थ है। चांडाली आदि नाम भी कुत्सित हैं।  वैसे ही मैना कोकिला आदि का समझ लो। इस तरह हम देखते हैं कि नाम निरर्थक न हो, सार्थक हो न ही अन्य पदार्थों के हों, बल्कि मानवों के अनुकूल हो।  दासी नाम वाली स्त्की की क्या इज्जत रहेगी? ऐसे गुलामी परक नाम स्त्रियों के होना अनुचित है।
वैसे तो शैंकी,टिंकू,बबली,बबलू,अज्जू आदि नाम व्यर्थ हैं ।
अन्यथा हमें बताइये कि आप लोग अपने बालकों के इबलीस,शैतान,मरदूद,आदि नाम, व दुर्गा, सीता,संध्या,लक्ष्मी आदि हिंदू नाम  तथा बॉबी,जॉन,टॉम आदि विदेशी नाम क्यों नहीं रखते?

अनवारुल हसन समीक्षा, 
अगर स्वामी जी इन सब नामो को रखने से माना किये होते तो कोई आपत्ति नहीं होता लेकिन उन्होंने तो इन सब नाम वाली लड़कियो से सादी करने को सीधा माना कर दिए है जिस के कारण अगर कोई भूल से इस तरह का नाम रख भी लिया तो स्वामी जी के सीदान्त अनुसार उस लड़की को कुवारी रहना पड़ जायेगा ।
आप का नाम भी तो कार्तिक है जो एक मौसम का नाम है । लड़को के लिए स्वामी जी कुछ क्यों नहीं बताये की किस नाम वाले लड़के से सादी नहीं करना चाहिए 
रही बात हमारा तो आज तक आप ने सुना है की किसी का नाम इब्लीस शैतान या मरदूद नाम हो और बाकि का नाम जो आप गिना रहे हो अगर भूल से कोई रख भी लिया तो हम उसका नाम बदल सकते है अगर ना भी बदला फिर भी इस्लाम में ऐसे नाम वालो से सादी करने का कोई मानहाई नहीं है 

आक्षेप: २:- अब आप लोग खुद सोचे अगर स्वामी दयानन्द जी के इस शिदान्त पे लोग चलने लगेंगे तो कितना बड़ा समस्या आ सकता है लाखो लडकिया कुवारी रह जाएँगी 
फिर यह लडकिया कहा जाएँगी 
इसका बिचार आप लोग खुद करें 
जब की इसमें से एक नाम इनके देवी का भी है पार्वती ।।

कार्तिक अय्यर उत्तर:- 
हम कह चुके हैं कि वैदिक धर्म का सिद्धांत प्रेरणादायक और सार्थक नामकरण करने में है। यदि किसी के मां बाप ने उसके ऐसे ही नाम रखे हो तो भी विवाह हुआ ही करते हैं। यह कोई महापाप नहीं है न ही दंडनीय अपराध है। देखिये, किसी का नाम तुलसी,गंगा आदि रखते हैं तो लोग मानने लगते हैं कि ये देवियां थीं। जैसे भीष्म की माता गंगा को पौराणिकों ने जीती जागती नदी रूपा देवी मान लिया और शंखचूड़ की पत्नी तुलसी को भी कृष्ण की अर्धांगिनी मान लिया। इस तरह का कनफ्यूजन न हो, इसलिये भी मना किया है।

अनवारुल हसन समीक्ष, 
हम भी कह चुके है स्वामी जी के सिदांतो पे कोई चलता ही नहीं अगर चलने लगे तो काफी प्रॉब्लम्स आ सकती है । ये बिचारी लडकिया कहा जाएँगी 

कार्तिक अय्यर उत्तर 
महोदय, आपकी प्रतिज्ञा है कि स्वामीजी की रीति से लाखों लड़कियां कुंवारी रह जायेंगी। आपको डंके की चोट पर चैलेंज करते हैं कि किसी भी लड़की के उपर्युक्त नाम रखने पर उसे आजीवन कुंवारी रहना पड़ा हो, ऐसा कोई ऐतिहासिक या आधुनिक उदाहरण प्रस्तुत करें। आप कभी न कर सकेंगे क्योंकि ये कोई पाप नहीं है। केवल सार्थकता की दृष्टि से नाम रखे गये हैं। आपका कहना सर्वथा गलत है कि ऐसे नाम वाली लड़कियों के विवाह नहीं होते। देखिये, रेवती बलराम की पत्नी थीं। रोहिणी नंद की पत्नी थी। पार्वती शिवजी की भार्या थीं और गंगा शांतनु की। इससो सिद्ध है कि ऐसे नाम रखने पर भी कोई कन्या अविवाहित न रही , अपितु उनको भी योग्य वर मिले। स्वामीदयानंद का ये खुद का नहीं, अपितु आदि काल में बनाया मनु का सिद्धांत है। मनु से लेकर रामचंद्र और उनसे लेकर युधिष्ठिर तक आर्यव्यवस्था भारत में थी। उसमें तक ऐसे नाम वाली लड़कियों के विवाह हो गये, तब आजकल में ऐसे विवाह हो जाये, इसमें कोई अचरज नहीं।

अनवारुल हसन समीक्षा,
 महोदय मै बार बार बोलते हुवे आया हु अगर इन सिदांतो पे कोई चले तो प्रॉब्लम्स आ सकता है जब कोई चलता ही नहीं तो प्रॉब्लम्स क्यों आएगा ।
क्या नन्द जी बलराम जी शिवा जी शांतनु जी को मनुसमृति का ज्ञान नहीं क्या इन्हें मनु जी के सिदांतो का ज्ञान नहीं था इससे दो बाते साबित होती है या तो मनु जी का सिदांत गलत था या फिर आप के यह महापुरुष लोग गलत थे 

कार्तिक अय्यर प्रश्न 
अन्यथा हमें बताइये कि आप किसी मुसलमान लड़की का नाम पिशाचिनी,डाकिनी,दुर्गा,अंबा,भैरवी,लक्ष्मी आदि रखें, तो उनका निकाह होता है वा नहीं? 

अनवारुल हसन उत्तर 
, क्या आप ने कभी देखा या सुना है मुस्लिम में लड़कियो का ऐसा नाम हो 
और अगर किसी ने रख भी लिया तो नाम बदले भी जा सकते है सादी से मानहाई नहीं है ।
दूसरी बात दुर्गा अंम्बा भैरवी लक्षमी तो आप के देवियो का नाम था तो फिर क्या उनका नाम गलत था ।।

कार्तिक अय्यर उतार 
रही बात पार्वती की तो महोदय, उनका असली नाम उमादेवी था। आप महाभारत, पुराण आदि में देख सकते हैं। वो पर्वतराज की बेटी होने से पार्वती कहाई। वैसे जो पहाड़ के पास न रहती हो, उसको पार्वती कहना व्यर्थ है। यहां भी आप यह न दिखा सके महादेव ने पार्वती नाम होने से उमा से विवाह नहीं किया। क्या ऐसा था? यदि नहीं तो पार्वती का उदाहरण हमारे पक्ष की पुष्टि करता है, वो ये कि ऐसे नाम रखना कोई पाप नहीं है न ऐसे नाम रखने से कोई कुंवारी रह जाती है।

अनवारुल हसन समीक्षा- 
अभी तो आप ऊपर पार्वती जी का नाम गिना रहे थे लेकिन यहाँ पर फिर u tarn ले लिए आप लोग हर बार अपने ही बातो से क्यों फिर जाते है जरुरत के हिसाब से जब जैसी बाते फिट होती है आप लोग उसी को क्यों अपनाते है । वजह यह है की आप के यहाँ कोई सिदान्त नहीं है जरुरत के हिसाब से अपना लो या छोड़ दो अब आप खुद बताये यहाँ पर मनु जी एंड द्यानंन्द जी गल्त है या फिर शिव जी ।।। 
 
कार्तिक अय्यर प्रश्न 
महोदय, आप विवाह की बात करते हैं अरे, इस्लाम में तो विवाह संस्कार होता ही नहीं। वो तो केवल एक कांट्रेक्ट है,यानी व्यारारिक समझौका जबकि वैदिक धर्म प्रजाव़्वस्था एवं सुखद गृहस्थाश्रम के लिये विवाह मानता है। देखिये:-

अनवारुल हसन उत्तर - 
यह भी आप का अज्ञानता है एक तरफ तो आप मुत्ता यानि कॉन्ट्रेक्ट जो इस्लाम में हराम है उसे भी इस्लाम से जोड़ते है और यहाँ निकाह को भी मुत्ता जैसे ही कॉन्ट्रेक्ट मैरेज का एक्जाम्पल दे रहे है । कॉन्ट्रेक्ट नाम क्यों दिया गया है निचे आप को बताता हु ।
हा सही कहा आप ने जैसे बैल गाय को बच्चा के लिए गाभिन करता है तुम भी वैसे ही अपनी औरत को गाभिन करो 
अपनी औरतो को 11 11 वाले मिसन पर भेज दो वैदिक धर्म में यह गृहस्थाश्रम के लिए विवाह है ना । क्या औरत सिर्फ बच्चा पैदा करने के लिए ही बनाई गई है जब बच्चा का जरुरत पड़े यूज़ कर लो  क्या उनका अपना कोई मनोकामना अपनी कोई दिली ख्वाहिश नहीं है 

कार्तिक अय्यर प्रश्न 
NIKAH (A.), marriage (properly: sexual intercourse, but already in the Kur’an used exclusively for the contract). Here we deal with marriage as a legal institution; for marriage customs see ‘URS. [...]” (J S Schacht)
M. Th Houtsma, E.J. Brill's First Encyclopaedia of Islam 1913-1936, p. 912

It’s name, ‘aqd al-nikah, literally means the contract of coitus, see Schacht (1932b: 912)
Ziba Mir-Hosseini, Marriage on trial: Islamic family law in Iran and Morocco, I.B.Tauris, 2001, p. 20

NIKAH
Literally the act of sexual intercourse, nikah is the term by which marriage is referred to in the Qur'an. Islamic law defines nikah as a civil contract whose main function is to render sexual relations between a man and woman licit. 
Cyril Glasse, The New Encyclopedia of Islam: Third Edition, Altamira, 2001

 A Dictionary of Andalusi Arabic[edit]
{NKH}: VA yankah nakah nikah nakih mankuh k to have sexual intercourse || nantakah antakaht to be possessed sexually || nastankah istinkah k to solicit for sex || (‘uqdat an)nikah IQ nikah AL nicah GL nikahun marriage, wedlock | nikahun muharramun incest | MT ‘aqd nikah marriage contract || VA mankahah prostitute || mankuhah + at sexually possessed (of a woman) || IQ manakih wedded women.
Federico Corriente, A Dictionary of Andalusi Arabic, BRILL, 1997, p. 539
Sharia – The Islamic Law[edit]
In Islam, marriage is a civil contract which legalizes sexual intercourse and pregnancy.
Corinna Standke, Sharia – The Islamic Law, GRIN Verlag, 2008Sexual ethics and Islam: feminist reflections on the Qur’an, hadith, and jurisprudence[edit]
Nikah, the term used by jurists for the marriage contract, literally refers to sexual intercourse, so closely is marriage linked to sex.
Kecia Ali, Sexual ethics and Islam: feminist reflections on the Qur’an, hadith, and jurisprudence, Oneworld, 2006
The Nigerian Legal System: Public Law[edit]
Marriage under Islamic law in Nigeria is known by its Arabic name, Nikah or joining together, the same meaning as sexual intercourse…
Charles Mwalimu, The Nigerian Legal System: Public Law, Peter Lang, 2005, p. 542
Under the Maliki code applicable in Nigeria the word Nikah signifies “the contract of marriage for the legislation of sexual intercourse…
Charles Mwalimu, The Nigerian Legal System: Public Law, Peter Lang, 2005, p. 673

इससे सिद्ध है कि इस्लाम का निकाह में और विवाह में ज़मीन आसमान का अंतर है । इस्लामी निकाह केवल और केवल एक कांट्रैक्ट है, जिसके तहत मर्द और औरत आपसी सहमति से सेक्स संबंध बनाने के लिये करते हैं। पति मेहर देता है पत्नी के शरीर को उससे खरीद लेता है।
मेहर भी केवल सेक्स संबंध बनाने के लिये दिया गया पैसा है:-

अनवारुल हसन उत्तर- 
यह बात वह लोग क्या समझेंगे  जिन्हें यह आज्ञा मिला हुवा है की अपनी औरतो को उस तरह बच्चा पैदा करने के लिए गाभिन करो जैसे बैल गाय को गाभिन करता है  अपनी औरतो को भोग का वास्तु समझ कर 11 11 वाले मिसन पर भेज दो ऐसे लोग अपना कुकर्म इस्लाम पर डाल कर मुस्लिम मसाज को भी अपने जैसा बनाना चाहते है  
 बिलकुल सही कहा आप ने वैदिक विवाह और निकाह में बहुत अंतर है 
निकाह को कांट्रेक् इस लिए बताया गया है की निकाह में औरत मर्द दोनों में फ्रीडम है अगर मर्द पागल जुवारी सराबी या अयास हो तो औरत उससे खुला ले सकती है 
अगर औरत गलत यानि बदचलन हो या और भी कोई बड़ा खामिया हो तो मर्द पहले उसे समझाये फिर बिस्तर से अलग कर दे जरुरत पड़े तो मारे भी यानि हर तरह के कोसिसो के बाद भी नहीं मानती है तो तलाक दे सकता है तलाक में भी दोनों को सुधरने का मौका दिया गया हुवा है 

वैदिक धर्म के जैसा नहीं अगर 
पत्नी अप्रिय बोलने वाली
हो तो उस पुरूष को चाहिए कि किसी अन्य स्त्री से नियोग कर ले ( सत्यार्थ प्रकाश , समुल्लास 4 )
अगर किसी आर्य की पत्नि किसी आर्य को अप्रिय बोल दे तो आर्य नियम ये है की सूलह समझाना तो गया तेल लेने बल्कि वो आर्य अपनी
पत्नी को छोडकर किसी दुसरी औरत से सबधँ बना ले । 

औरत अगर गलत हो तो उसे आज़ाद नहीं करना है चाहे जलाकर ही क्यों ना मारदो या खुद घुट घुट के मरो ।
मर्द अगर अय्यास हो जुवारी सराबी हो चाहे जितना भी बुरा हो रहना उसी के साथ है चाहे जिंदगी नर्क ही क्यों ना बनजाये और तो और बिद्वा होने के बाद भी दूसरी सादी के द्वारा फिर से जिंदगी सवारने की इजाजत नहीं है हा 11 11 वाले मिसन पर जरूर जा सकती है ।
यह तो समझदार लोगो ने अदालत से बिधवा विवाह और तलाक का कानून बनवाये जिससे सब का भला हो

रही बात मेहर और सम्बन्ध का तो मेहर मर्द के तरफ से औरत के लिए एक गिफ्ट है

देखीये इसानँ के अदरँ बहुत
सी फितरी खवाहिशेँ है । इन्हीँ मेँ से एक शहवानी ख्वाहिश (यौन इच्छा) है । जो औरत और मर्द के दर्मियान है । शरीअत तमाम इंसानी जज्बात की हदबँदी करती हैं 
शरीअते इलाही के मुताबिक औरते और मर्द के दर्मियान सिर्फ वही तअल्लुक सही है जो निकाह की सुरत मेँ एक संजीदा समाजी समझौते की हैसियत से कायम हो । निकाह के बैगर ये सबधँ हराम है
। और निकाह मेँ हक मैहर वाजिब है 

 देखिये क़ुरआन और नबी पाक का फरमान 

तुम औरतों के साथ हुस्ने सुलूक से ज़िन्दगी गुज़ारो और अगर तुम को उन की ( कोई आदत ) अच्छी न लगे ( तो उस की वजह से सख्ती का बर्ताव न किया करो बल्कि उस पर सब्र करो )

क्योंकि , मुमकिन है तुम किसी चीज़ को ना पसंद करो , मगर अल्लाह तआला ने उस में बहुत ज़ियादा भलाई रख दी हो ।

[ सूर – ए – निसा : 11 ]

इस्लाम मेँ मर्द के लिए अपनी बीवी कि कितनी अहमियत है

आप प्यारे नबी ए करीम सल्ल
लल्लाहु अलैहे वैसल्लम ने फरमाया है की तुम मे से बेहतरिन शख्स वो है जो अपनी बीवी से अच्छा
सलुक करे ।

 ऐ नबी ! र्इमानवाले पुरूषो से कहो कि अपनी निगाहे नीची रखे और अपने गुप्तांगो (शर्मगाहों) की रक्षा करें। यह उनके लिए अधिक शुद्धता की बात हैं। निस्संदेह, अल्लाह उसकी खबर रखता है जो कुछ वे करते हैं।     (कुरआन, 24:30) 

क़ुरआन में एक जगह और आया है 

खबरदार जिना के करीब भी ना जाना यह एक खुला बेहयाई है 


◆◆◆◆◆◆◆

प्रमोद कुमार जी से मेरा चन्द सवाल 

(1)प्र्शन वेद कब कैसे और किसके द्वारा  धरती पर आया   फिर वेद ज्ञान मनुष्य तक कैसे पंहुचा उस वक़्त मानव भाषा क्या थी 
2 वेद अगर ईश्वरीय ग्रन्थ है तो आप वेद में ईश्वरवाद तौहीद दिखाए और वेद निंदक,म्लेच्छ,दस्यु का अर्थ भी बताये 

3 क्या ईश्वर इतना निर्दयी जालिम हो सकता है जो दुसरो के लिए ऐसी आज्ञा दें ईस कदर का पक्षपात करें 
👇👇👇👇
वृश्च प्र वृश्च सं वृश्च दह प्र दह सं दह |
"तू वेद निन्दक को, काट डाल, चीर डाल, फाड़ डाल, जला दे, फूँक दे, भस्म कर दे।" भावार्थ: धर्मात्मा लोग अधर्मियों के नाश में सदा उद्यत रहें [अथर्ववेद काण्ड12: सूक्त 5: मंत्र 62 पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी भाष्य]

जो आर्यावर्त देश से भीन देश वाले है वह दस्यु और म्लेच्छ है 
मनुस्मृति 10 /45 मनुसमृति 2/23
  
"ऐ दुश्मनों के मारने वाले जंग के नियमों में माहिर निडर, साहसी, प्रिय, प्रतापी और जवां मर्द तू सब प्रजा को प्रसन्न रख । परमेश्वर के आदेश पर चलो और घ्रणित शुत्र को ( हे महाराज इतनी नाराजी ) पराजित करने के लिए लड़ाई का कार्य पूरा करो । तुमने पहले मैदानों में शत्रुओं की सेना को पछाड़ा है । तुमने इन्द्रियों को पराजित और धरती को विजयी किया है । तुम शक्तिशाली बाजू वाले हो । अपनी बाजू की ताकत से दुशनों को समाप्त करो ताकि तुम्हारे बाजू का जोर और ईश्वर की दया व कृपा से हमारी विजय हो ।
(अथर्ववेद कांड 6 , अनुवादक वरग 95 मन्त्र 3



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