जिहाद या फ़साद
वर्तमान में जिहाद के नाम पर लोगों ने इस्लाम को जी भर के बदनाम किया है। इनमें वह मुस्लिम संगठन भी शामिल हैं जो अपने राजनितिक स्वार्थों की प्राप्ति के लिए अपनी सियासी लड़ाई को जिहाद की संज्ञा देते हैं जब कि मुस्लिम विद्वानों, धार्मिक नेताओं एवं इस्लामिक संस्थाआओं ने कभी भी इन राजनितिक गतिविधियों को न तो “जिहाद“ माना है न ही उनका समर्थन किया है,
मुगलों एवं तुर्कों के द्वारा भारत में जो आक्रमण किए गए, इस्लाम का उनसे कोई सम्बन्ध नहीं था। वास्तविकता यह है कि मध्यकालीन युग के राजा, महाराजा अपने साम्राज्य के विस्तार की ख़ातिर इस प्रकार के आक्रमण करते रहते थे।
प्राचीनकाल में यूनान के महाराजा “सिकन्दर” ने पूरे मध्य एशिया एवं भारत पर आक्रमण कर उन पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया था या “अशोक महान” ने अनेक क्षेत्रों पर आक्रमण करके उन्हें अपने अधीन कर लिया था, तो क्या यह कहा जाएगा कि यही उनके धर्म की शिक्षा थी? एक समय में मंगोलिया से उठने वाले मुगलों ने पूरे मध्य एशिया में उत्पात मचाया, उस समय वह मुसलमान नहीं थे। उन्होंने मुस्लिम साम्राज्य की राजधानी “बगदाद“ में खून की नदियाँ बहा दीं। यहाँ तक कि मुगल सम्राट हलाकू ने “बगदाद“ में मनुष्यों की खोपड़ियों से एक बडे़ स्तूप का निर्माण कराया। उनकी इस बर्बरता का शिकार होने वाले तो मुस्लिम थे, तो क्या उनके इस आक्रमण को उनके धर्म से जोड़ दिया जाए?
भारत पर आक्रमण करने वाला प्रथम मुगल शासक तैमूर लंग था परन्तु उस समय संयुक्त रूप से मुगलों ने इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया था। लेकिन उनकी शिक्षा दीक्षा इस्लामिक सिद्धांतों से नहीं बल्कि मंगोली एवं चंगे़जी सिद्धांतों से हुई थी, एवं उनकी कार्यशैली उसी के अनुरूप थी।
जिहाद
“जिहाद“ के बारे में आजकल बहुत भ्रांतियाँ फैली हुई हैं। कुछ अपनों ने और कुछ गैरों ने “जिहाद“ को इस प्रकार प्रस्तुत किया है मानो वह लड़ने झगड़ने, मारने मरने का नाम है जब कि ऐसा नहीं है। “जिहाद“ अरबी भाषा का शब्द है जिसका मूल अर्थ है “प्रयास करना” “जद्दो जहद करना” और “संघर्ष” करना। ख़्याल रहे कि अरबी भाषा में युद्ध करने के लिए “क़िताल” शब्द बोला जाता है न कि जिहाद।
इस्तिलाही मायनों में “जिहाद“ शब्द अलग-अलग स्थान पर अलग मायनों में प्रयोग हुआ है, कहीं अपने नफ़्स (अन्तरात्मा या इन्द्रियों) से संघर्ष करने को “जिहाद“ कहा गया है, कहीं माँ-बाप की सेवा करने को “जिहाद“ कहां गया है, और कहीं ज़ालिम राजा के सामने हक़ बात कहने को “जिहाद“ कहा गया है, परन्तु इस्तिलाह में जिहाद अपने मूल अधिकारों की प्राप्ति के लिए हर सम्भव एवं उचित प्रयास करने को भी कहते हैं। उस में युद्ध की स्थिति केवल इसी प्रकार उत्पन्न हो सकती है जैसे मदीने में मुहम्मद साहब एवं उनके अनुयाइयों के सामने युद्ध करने के अतिरिक्त कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा था,
उसमे भी कई सरते है जैसे युद्ध के दौरान बच्चे बूढे और औरतो पर हमला नहीं करना है हरे पेड़ पौदों को नुकसान नहीं पहुचना है कोई हथियार डाल दे तो उसपे हमला नहीं करना है कोई अगर समझौता करना चाहे तो युद्ध को रोक देना है ।
युद्ध के दौरान भी किसी के साथ ज्यादती और ना इंसाफी ना हो ।
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जिहाद क्या है
जिहाद उन अनेक विषयों में से एक प्रमुख व प्रज्वलंत विषय है जिन्हें इस्लाम के अपने सूत्रों तथा विश्वसनीय माध्यमों से समझने के बजाय इस्लाम-विरक्त, इस्लाम-विरोधी व इस्लाम-दुश्मन सूत्रों व माध्यमों से समझने का प्रयास किया गया। अतः ऐसी अनुचित व असैद्धांतिक प्रक्रिया के परिणामस्वरूप ‘इस्लाम में जिहाद’ की जो कुछ भी, जैसी कुछ भी, जितनी भी ग़लत, त्रुटिपूर्ण तथा भयावह व घृणाजनक तस्वीरें बनीं, उन्हें विशाल, सशक्त व व्यापक मीडिया-तंत्र द्वारा विश्व के लगभग हर व्यक्ति के समक्ष ‘वास्तविक तस्वीरें’ बनाकर पेश किया जाता रहा है। परिणामस्वरूप अज्ञानता, ग़लतफ़हमियों और घृणा व भय की गन्दी ज़मीन पर उपरोक्त आक्षेपों के कटीले व ज़हरीले झाड़-झंकाड़ हर ओर उगे और ‘लहलहाते’ नज़र आ रहे हैं। किसी भी चीज़, या बात को उसकी वास्तविकता के साथ समझने का उचित माध्यम, मीडिया या राजनीतिज्ञों के बयानात नहीं हुआ करते बल्कि स्वयं उसी चीज़ या वस्तु से, मूलरूप से संबंधित विश्वसनीय (Authentic sources) सूत्र होते हैं।
जिहाद का अर्थ
अरबी शब्द ‘जिहाद’ जिन मूल-अक्षरों ‘ज-ह-द’ से बना है उनसे बनने वाले शब्द (जो क़ुरआन में कुल 17 हैं और 19 अध्यायों (सूरा) में 41 बार प्रयुक्त हुए हैं) घोर परिश्रम, संघर्ष, प्रयत्न, प्रयास के अर्थ रखते हैं। जिस ‘जिहाद’ पर आपत्ति जताई जाती है वह जिहाद (प्रयास, प्रयत्न, संघर्ष) के विभिन्न स्तरों तथा चरणों (Phases) में ऐसा अंतिम व अतिशय चरण और शिखर-बिन्दु है जहां ‘‘सशस्त्र संघर्ष’’ अनिवार्य (Inevitable) हो जाता है। ऐसे ‘जिहाद’ (क़िताल अर्थात् ‘युद्ध’) पर क़ुरआन के मुस्लिम विद्वान भाष्यकारों (मुफ़स्सिरीन) ने बहुत विस्तार से लिखा है तथा इस विषय पर विभिन्न भारतीय व विदेशीय भाषाओं में पर्याप्त साहित्य भी उपलब्ध है। उपरोक्त शंकाओं, भ्रांतियों तथा आक्षेपों के तथ्यपरक तथा वास्तविक उत्तर व निवारण के लिए इस साहित्य का अध्ययन—सत्यनिष्ठ अध्ययन—करना चाहिए। यहां संक्षेप में और कम से कम शब्दों में यदि जिहाद की वास्तविकता बयान की जाए तो वह कुछ यूं होगी:
जिहाद की संक्षिप्ततम व्याख्या
अन्याय, अत्याचार व शोषण करने वाली शक्तियां, रक्तपात, नरसंहार करने व तबाही, बरबादी फैलाने वाली शक्तियां, कमज़ोरों पर जु़ल्म ढाने वाली, उन्हें उनकी बस्तियों, आबादियों, घरों से निकाल देने या निकलने पर विवश कर देने वाली शक्तियां, ये सारे कुकृत्य ‘सशस्त्र’ होकर करें तो मुस्लिम समुदाय और मुस्लिम शासन का कर्तव्य है कि सशस्त्र होकर जु़ल्म का मुक़ाबिला किया जाए, अपनी रक्षा (Defense) की जाए, ज़ालिम की अत्याचार-शक्ति-सामर्थ्य को कमज़ोर करके, तोड़कर अत्याचार व शोषण का उन्मूलन किया जाए। सत्य व ईशपरायणता तथा न्याय व शान्ति के दुश्मनों को पस्त किया जाए। न्याय व शान्ति की स्थापना की जाए। उस सत्य मार्ग, अर्थात् शाश्वत ईश्वरीय मार्ग को प्रशस्त किया जाए जिस पर चलकर मानव-समाज और मानवजाति इहलौकिक व पारलौकिक सुख-समृद्धि-सफलता से आलंगित होना सहज, सरल व संभव पा सके। इस सशस्त्र संघर्ष में स्वयं अत्याचार व अन्याय करने से पूरी तरह रुका जाए। ईश्वरीय आदेशों, नियमों, शिक्षाओं और सीमाओं का पालन किया जाए...।
यह इस्लामी जिहाद की संक्षिप्ततम व्याख्या है। ऐसा ‘जिहाद’ किन्हीं भी (अलग-अलग) नामों से मानवजाति के दीर्घ इतिहास में हमेशा से होता आया है। सारे इन्सानों ने सशस्त्र जु़ल्म व अत्याचार के सामने घुटने टेक दिए हों, ऐसा मानव इतिहास में कभी नहीं हुआ है, क्योंकि ऐसा होना उस मूल प्रकृति के प्रतिकूल है जिस पर मनुष्य की संरचना हुई है। अलबत्ता इस्लाम ने इतिहास में पहली बार यह श्रेय प्राप्त किया है कि उसने जिहाद के नियम और आदेश नैतिक व वैधानिक (क़ानूनी), दोनों स्तरों पर पूरी तरह से निश्चित (Codified) कर दिए हैं, और इस बात को यक़ीनी व अवश्यंभावी बनाया है कि ज़ल्म के प्रतिरोध में ख़ुद जु़ल्म हरगिज़ न होने पाए। प्रतिशोध-भावना ऐसी प्रबल हरगिज़ न होने पाए कि न्याय, दयाशीलता और इन्सानियत का दामन हाथ से छूट जाए (क़ुरआन, 5:8)।
जिहाद—आतंक?
जहां तक जिहाद के आतंकवाद होने का प्रश्न है, इस्लाम के पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) तथा उनके अनुयायी, सत्य-धर्म के आह्नान के साथ ही मक्कावासी विधर्मियों के क्रू$र आतंकवाद से, 13 वर्ष तक जूझते; तथा स्वामी लक्ष्मीशंकराचार्य के अनुसार (पुस्तक ‘इस्लाम आतंक या आदर्श’-2008), 23 वर्षों तक आतंकवाद के विरुद्ध लड़ते रहे। (यहां तक कि नगर ‘मक्का’ और निकटवर्ती क्षेत्रों से जु़ल्म व आतंक का सफ़ाया हो गया)।
इस्लाम में ‘जिहाद’ दरअस्ल आतंक को ख़त्म करने, आतंकवाद को पस्त व परास्त करने का एक ‘ईश्वरीय-मार्गदर्शित’ प्रक्रम है। इस प्रक्रम में अत्याचारी शक्तियां यदि आतंकित होती हैं अतः जिहाद को आतंकवाद की संज्ञा देती हैं तो यह बात समझ में आती है। वरना स्वयं जिहाद का आतंकवाद कहा जाना घोर मिथक है। किसी पाश्चात्य विद्वान-विचारक के ये शब्द, वस्तुस्थिति को उसके वस्तुनिष्ठ रूप में पेश करते हैं
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कुफ़्र, काफ़िर का अर्थ
इस्लाम में ‘कुफ़्र’ और ‘काफ़िर’ कुछ विशेष पारिभाषिक शब्दों में से दो शब्द हैं। इसका एक विशेष अर्थ है, लेकिन दुख की बात यह है कि विभिन्न पारिभाषिक शब्दों की तरह इस शब्द को भी ग़लत अर्थ देकर ऐसा प्रभाव पैदा करने की कोशिश की जा रही है, जो इसके अस्ल (मूल) अर्थ से बहुत दूर है। शब्द ‘काफ़िर’ के बारे में इस तरह बताया जाता है जैसे इसमें ग़ैर-मुस्लिम भाइयों के लिए नफ़रत, तिरस्कार और अपमान का पहलू है। यह शब्द जैसे एक अपमान बोधक शब्द है। इस्लाम काफ़िर कहकर ग़ैर-मुस्लिम भाइयों को मूल मानव-अधिकारों से वंचित कर देता है और जीवित रहने का अधिकार भी देना नहीं चाहता। यह बात सच्चाई के बिल्कुल विपरीत है।
क़ुरआन में काफ़िर, कुफ़्र और शिर्क के शब्द बहुत-सी जगहों पर प्रयुक्त हुए हैं। कुफ़्र के अर्थ अवसर के अनुरूप विभिन्न होते हैं। जैसे इन्कार, अवज्ञा, कृतघ्नता, निरादर और नाक़द्री, सच्चाई को छिपाना और अधर्म आदि। कुफ़्र करने वाले को अरबी भाषा में ‘काफ़िर’ कहते हैं।
‘काफ़िर’ शब्द व्याकरण की दृष्टि से गुणवाचक संज्ञा है, यह अपमानबोधक शब्द नहीं है। यह शब्द उन लोगों के लिए भी प्रयुक्त हुआ है जिनके सामने ईश्वरीय धर्म इस्लाम की शिक्षाएं पेश की गईं और उन्होंने किसी भी कारण से उनको ग़लत समझा और उनका इन्कार कर दिया। कुफ़्र का शब्द उन लोगों के लिए भी प्रयुक्त हुआ है, जो अपने को इस्लाम का अनुयायी और मुसलमान कहते थे, परन्तु इस्लाम के प्रति निष्ठावान न थे। उदाहरणार्थ ईशदूत हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) का कथन है:
‘‘जिस (मुसलमान) ने जान-बूझकर नमाज़ छोड़ दी उसने कुफ़्र किया।’’ (हदीस)
कु़रआन मजीद में कहा गया है—
‘‘जो लोग अल्लाह के भेजे हुए निर्देशों के अनुसार फ़ैसला न करें वे काफ़िर (अधर्मी) हैं।’’ (क़ुरआन, 5:44)
उपर्युक्त शिक्षाओं में संबोधन साफ़ तौर पर उन लोगों से है, जो इस्लाम के अनुयायी होने का दावा करते थे और अपने को मुसलमान कहते थे, परन्तु वे इस्लाम के प्रति निष्ठावान न थे।
कु़रआन में एक जगह है—
‘‘जिसने ताग़ूत (काल्पनिक देवों) का कुफ़्र (इन्कार) किया और अल्लाह को मान लिया उसने एक ऐसा मज़बूत सहारा थाम लिया जो कभी टूटने वाला नहीं।’’
(क़ुरआन, 2:256)
क़ुरआन की इस आयत में शब्द ‘कुफ़्र’ इन्कार के अर्थ में है और मुसलमानों से ताग़ूत (काल्पनिक देवों) का इन्कार कराना अपेक्षित है।
‘कुफ़्र’ अरबी भाषा का शब्द है। इसक शाब्दिक अर्थ किसी चीज़ को छिपाना या ढांकना है। इसी तरह ‘कुफ़्र’ कृतघ्नता या नाशुक्री के अर्थ में भी आता है। अर्थात् कोई व्यक्ति किसी की कृतघ्नता या एहसानफ़रामोशी करता है, तो जैसे वह अपने उपकार करने वाले के उपकार को छिपा देता है और उस पर परदा डाल देता है। इसी तरह ‘कुफ़्र’ का एक अर्थ यह भी है कि दुनिया को पैदा करने वाले ने अपने ईशदूतों को भेजकर अपने बन्दों के लिए सत्यमार्ग पर चलने का जो आदेश दिया है उस आदेश को मानने से इन्कार करना।
पवित्र क़ुरआन में ‘कुफ़्र’ शब्द का प्रयोग कई दूसरे अर्थों में भी हुआ है और ईमान तथा इस्लाम के मुक़ाबले में एक पारिभाषिक शब्द के रूप में भी। जैसे, किसान खेती के दौरान बीज को ज़मीन के अन्दर छिपा देता है, इसलिए किसान को भी काफ़िर (छिपाने वाला) कहा गया है। कुछ जगहों में कृतज्ञता (शुक्र) की तुलना में अकृतज्ञता (नाशुक्री) के अर्थ में भी प्रयोग हुआ है, इसलिए पैदा करने वाले के उपकारों के उत्तर में कृतघ्नता का रवैया (सुलूक) ‘कुफ़्र’ है और ऐसा करने वाला व्यक्ति ‘काफ़िर’ कहलाता है।
कु़रआन में एक दूसरी जगह है—
‘‘जान लो कि यह सांसारिक जीवन मात्र एक खेल और तमाशा है और एक साज-सज्जा और तुम्हारा आपस में एक-दूसरे पर गर्व करना और धन और संतान में एक-दूसरे से बढ़ा हुआ ज़ाहिर करना। इसकी मिसाल ऐसी है कि बारिश हुई तो उससे पैदा होने वाली खेती से कुफ़्फ़ार (किसान) ख़ुश हो गए। फिर वही खेती पक जाती है और तुम देखते हो कि वह पीली हो जाती है। फिर वह भुस बनकर रह जाती है।’’ (क़ुरआन, 57:20)
क़ुरआन की इस आयत में शब्द कुफ़्फ़ार(काफ़िरों) किसान के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।
क़ुरआन में एक जगह परमेश्वर कहता है—‘‘तुम मुझे याद रखो, मैं तुम्हें याद रखूंगा और मेरा आभार प्रकट करते रहो और मेरे प्रति कुफ़्र (अकृतज्ञता) न दिखलाओ।’’ (क़ुरआन, 2:152)
क़ुरआन की इस आयत में ‘कुफ़्र’ शब्द ‘अकृतज्ञता’ के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।
क़ुरआन में जहां कहीं भी ईश्वर और उसकी शिक्षाओं और उसके आदेशों का इन्कार करने वालों के लिए ‘काफ़िर’ शब्द प्रयुक्त हुआ है तो उसका उद्देश्य गाली, घृणा और निरादर नहीं है, बल्कि उनके इन्कार करने के कारण वास्तविकता प्रकट करने के लिए ऐसा कहा गया है। ‘काफ़िर’ शब्द हिन्दू का पर्यायवाची भी नहीं है जैसा कि दुष्प्रचार किया जाता है। ‘काफ़िर’ शब्द का लगभग पर्यायवाची शब्द ‘नास्तिक’ है।
पवित्र क़ुरआन में अधिकतर कुफ़्र शब्द का प्रयोग ईमान के मुक़ाबले में इन्कार के अर्थ में हुआ है। धर्म पर विश्वास न रखने वाले लोगों के लिए हर धर्म ने विशेष शब्दावली का प्रयोग किया है। उदाहरण के लिए, जो व्यक्ति हिन्दू परिवार में पैदा हुआ है, लेकिन धर्म में विश्वास नहीं रखता है, उसे ‘नास्तिक’ कहते हैं।
इसी तरह हर धर्म में उस धर्म की मौलिक धारणाओं एवं शिक्षाओं को मानने वालों और न मानने वालों के लिए अलग-अलग विशेष शब्द प्रयुक्त किए जाते हैं। जैसे हिन्दू धर्म में उन लोगों के लिए नास्तिक, अनार्य, असभ्य, दस्यु और मलिच्छ शब्द प्रयुक्त हुए हैं जो हिन्दू धर्म के अनुयायी न हों।
कुफ़्र का एक अर्थ है सच्चाई पर परदा डालना। सारी नेमतें (कृपादान) अल्लाह, ईश्वर की दी हुई हैं। इस सच्चाई पर परदा डालकर इन नेमतों का सम्बन्ध दूसरों से जोड़ना, अल्लाह को छोड़कर दूसरों का आभारी बनना कुफ़्र का तरीक़ा है।
‘काफ़िर’ शब्द वास्तव में ईश्वरीय सत्य धर्म को न मानने वालों और मानने वालों के बीच अन्तर को स्पष्ट करने के लिए है, न कि गाली देने या निरादर करने के लिए।
अब यह बात स्पष्ट हो जाती है कि शब्द ‘काफ़िर’ में तिरस्कार और अपमान का कोई पहलू नहीं है। इस्लाम सैद्धांतिक रूप से सत्य धर्म (दीने-हक़) को मानने और न मानने वालों के बीच अन्तर स्पष्ट करता है, ताकि इस्लामी आदेशों को लागू करने के मामले में दोनों के साथ अलग-अलग बर्ताव किया जा सके। इस्लाम को मानने वालों को इसका पाबन्द (नियमबद्ध) बनाया जा सके और न मानने वालों को इसकी पाबन्दी (नियमबद्धता) से अलग रखा जाए। इस्लाम की मूल शिक्षाओं को न मानने वाले व्यक्ति को काफ़िर कहकर इस्लाम ने वास्तव में उसकी पोज़ीशन स्पष्ट कर दी है, लेकिन इससे इस्लामी राज्य या समाज में उसके मौलिक अधिकारों पर कोई आंच नहीं आती और दुनिया के मामलों में उसके साथ कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता।
ईश्वर ने इन्सान को सबसे सुन्दर रूप-रंग में पैदा किया है। ज़िन्दगी गुज़ारने के लिए हर प्रकार की सुविधाएं प्रदान कीं और सारी ज़रूरतें पूरी कीं। इन सारी नेमतों (कृपादानों) की मांग है कि लोग अल्लाह पर ईमान लाएं, जिसने उनको ये नेमतें दी हैं। इसी तरह अल्लाह के सभी पैग़म्बर (ईशदूत), विशेष रूप से आख़िरी ईशदूत हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) पर भी ईमान लाएं और मरने के बाद परलोक की हमेशा-हमेशा रहने वाली ज़िन्दगी और वहां सभी इन्सानों के अच्छे-बुरे कर्मों के बारे में पूछताछ तथा हिसाब-किताब पर ईमान लाएं। विशुद्ध रूप से अल्लाह की इबादत (उपासना) और बन्दगी करें तथा उसके आदेशों का पालन करें, जो लोग अल्लाह की नेमतों (कृपादानों) से लाभ उठाते हैं, लेकिन उस पर ईमान नहीं लाते, या उसकी ख़ुदाई (ईश्वरत्व) में दूसरों को साझी ठहराते हैं, वही लोग अकृतज्ञ और नाशुक्रे हैं और कुफ़्र (इन्कार) का रवैया अपनाते हैं।
अल्लाह के आदेशों को मालूम करने का साधन अल्लाह के आख़िरी ईशदूत हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) पर अवतरित पवित्र क़ुरआन का अध्ययन करना है। पवित्रा क़ुरआन की शिक्षाओं का व्यावहारिक आदर्श ईशदूत हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) की जीवनी में मिलता है। ये दोनों चीज़ें सुरक्षित और विशुद्ध रूप में आज भी मौजूद हैं, जो इसकी सत्यता का प्रमाण है।
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