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कुछ गैर मुस्लिम भाई अपनी अज्ञानता ना समझी के कारण अक्सर तलाक को ले कर मुस्लिम समुदाय और इस्लाम पर निसाना कसते है और तलाक को औरत पर जुल्म बताते है आइये देखते है सही क्या है
तलाक वो अमल है जो जायज तो है लेकिन अल्लाह पाक के यहाँ नापंसदिदा अमल है ।
अल्हमदुलिल्लाह इस्लाम मेँ हर रिशते कि एक अहमियत है । और मिया बीवी के रिशते मेँ
तलाक शादीशुदा ज़िन्दगी का बहुत ही
तकलीफ़देह मोड़ होता हैं, जिसमे शौहर बीवी के बीच निकाह का पाकीज़ा रिश्ता टूट जाता
हैं| इन्फ़िरादी ज़िन्दगी हो या परिवारिक ज़िन्दगी हो, इस्लाम बुनियादी तौर पर
कानून, रज़ामन्दी, इत्तेहादी, भाईचारे और मुहब्बत और रहम का परचम बुलन्द करता हैं|
लड़ाई-झगड़ा, फ़ूट-बिखराव, असामाजिक और
रिश्तो की खराबी को इस्लाम ने बुरा जाना हैं| कानूनी दायरे के तहत इस्लाम ने इत्तेहाद और आपसी रज़ामन्दी को इतनी अहमियत दी हैं
के रिश्तो और रिश्तेदारो के हक मे आप प्यारे नबी ए करीम सल्ललल्लाहू अलैहे वसल्लम का
फ़रमान हैं के रिश्तो को काटने वाला जन्नत मे दाखिल नही होगा|
(बुखारी व मुस्लिम)
इस्लाम मेँ मर्द के लिए अपनी बीवी कि कितनी अहमियत है ~
क़ुरआन की नसीहत : औरतों के साथ किस तरह पेश आना चाहिए ?
क़ुरआन में अल्लाह राबुल आलमीन का फरमान है :
तुम औरतों के साथ हुस्ने सुलूक से ज़िन्दगी गुज़ारो और अगर तुम को उन की ( कोई आदत ) अच्छी न लगे ( तो उस की वजह से सख्ती का बर्ताव न किया करो बल्कि उस पर सब्र करो )
क्योंकि , मुमकिन है तुम किसी चीज़ को ना पसंद करो , मगर अल्लाह तआला ने उस में बहुत ज़ियादा भलाई रख दी हो ।
[ सूर – ए – निसा : 11 ]
आप प्यारे नबी ए करीम सल्ल
लल्लाहु अलैहे वैसल्लम ने फरमाया है की तुम मे से बेहतरिन शख्स वो है जो अपनी बीवी से अच्छा
सलुक करे ।
तो ऊपर लिखी बातोँ से हमेँ पता लग जाता है की इस्लाम मेँ मियाँ बीवी के रिशते की कितनी अहमियत है ।
अगर इन बातोँ पर अमल करके कोई रिशता निभाऐगा तो टुटने के चासँ बहुत ही कम होगेँ
लेकीन अगर ऐसा हो की कोई औरत बदकार आ जाये या कोई मर्द ही बदकार आ जाये या ऐसा
कुछ हो जाये कि उनको लगे कि हम एक दुसरे के लिए नहीँ बने या उनमेँ झगडे हो और लगे की हमेँ
अलग हो जाना चाहिए । तो क्या किया जाए ऐसे में घुट घुट कर जीने से जिंदगी को जहन्नम बनाने से बेहतर है दोनों अलग होकर नए सिरे से अपनी जिंदगी का सुरुवात करे
याद रहे जब समझौता का कोई रास्ता ना बचा हो तब आखरी रास्ता तलाक है
इस्लामिक शरिया का कानुन वो कानुन है जो बेहतर कानुन है । क्योकीँ ये किसी इसानँ का बनाया कानुन नहीँ बल्कि अल्लाह पाक का कानुन है ।
गैर मुस्लिम में तलाक का विधान मौजुद नहीँ था लेकिन अब है ।
अब गैर मुस्लिम ने भी कानुनी तलाक का नियम अपना लिया है लेकिन वो कानुनी तलाक भी बेहतर नहीँ है । ना ही इस्लामिक तलाक जितना सटिक है ।
हम जान चुकेँ है की तलाक अल्लाह के यहाँ जायज है लेकिन नासँपसिदा अमल है । अगर बात करे मर्द और औरत के रिशते के अलग यानी तलाक की तो जो इस्लामिक तलाक है जो नियम शरियत के है वो बेहतर और सबसे बेहतर है । आइये जानते है
इस्लाम मेँ अलग होने के लिए मर्द के पास तलाक
और औरत के पास खुलात का चुनाव है । लेकिन ना तो मर्द के जायज की औरत को बिना वजह तलाक दे और ना औरत के लिए जायज की मर्द से
बिना वजह खुलात माँगे ।
देखिये औरत के लिए ~
हज़रत सौबान रज़ि0 से रिवायत हैं कि नबी ए करीम आप प्यारे नबी ने फरमाया आप सल्ल लल्लाहु अलैहे वसल्लम ने फरमाया जिस औरत ने
अपने पति से बिना वजह तलाक मांगी उस पर जन्नत की खुशबू हराम हैं| (तिर्मिज़ी) हज़रत सौबान रज़ि0 से रिवायत हैं कि नबी ए करीम
आप प्यारे नबी ने फरमाया आप सल्ल लल्लाहु अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया बिना वजह खुलाअ
मांगने वाली औरते धोखेबाज़ हैं| (तिर्मिज़ी)
मर्दो के लिए ~
हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ि0 से रिवायत हैं के नबी ए करीम आप प्यारे नबी ने फरमाया आप सल्ल लल्लाहु अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया
अल्लाह के नज़दीक यह बहुत बड़ा गुनाह हैं कि एक आदमी किसी औरत से निकाह कर ले और फ़िर
जब अपनी ज़रूरत पूरी कर ले तो तलाक दे दे और उसका मेहर भी अदा न करे (हाकिम)
बीवी अगर नाफरमान हो तो भी तलाक मेँ जल्दी ना करो पहले नसीहत करो फिर बिस्तर
अलग करो फिर मार की सजा दो (हल्की मार ) अगर फिर सुधर जायेँ तो फिर कोई बहाना ना
बनाओ अलग होने का देखिये पवित्र कुर आन मेँ ~
जिन औरतो की नाफ़रमानी और बददिमागी का तुम्हे खौफ़ हो इन्हे नसीहत करो और इन्हे अलग
बिस्तरो पर छोड़ दो और अगर जरुरत पड़े तो इन्हे मार की सज़ा दो और फ़िर अगर वो ताबेदारी करे तो इन पर
कोई रास्ता तलाश न करो, बेशक अल्लाह ताला बड़ी बुलन्द और बड़ाई वाला हैं| (सूरह 4. आयत
34)
शौहर अगर बदाख्लाकी करेँ या बीवी को शौहर की बेपरवाही का खौफ हो तो बीवी भी जल्दी खुलात ना ले ~
अगर किसी औरत को अपने शौहर की
बददिमागी और बेपरवाही का खौफ़ हो तो दोनो आपस मे जो सुलह कर ले इस मे किसी पर कोई गुनाह नही| (सूरा 4. आयत 128)
अगर शौहर बीवी की सारी कोशीशे नाकाम हो जाये तो भी तलाक देने मे जल्दबाज़ी न कर एक और रास्ता इस्लाम ने बताया हैं के दोनो के
खानदान से किसी एक समझदार और हकपरस्त को सर जोड़कर सुधार के मामले का रास्ता निकालना चाहिये|
देखीये र्मद और औरत दोनो के लिए अल्लाह का
आदेश
अगर तुम्हे मियां बीवी के दरम्यान आपस की अनबन का खौफ़ हो तो एक फैसला करने वाला मर्दवालो मे से और एक औरत के घरवालो मे से मुकरर्र करो,
अगर ये दोनो सुलह करना चाहेगे तो अल्लाह दोनो मे मिलाप करा देगा, यकीनन अल्लाह ताला पूरे इल्म वाला पूरी खबर वाला हैं|
(सूरा 4, आयत 35)
तलाक के बाद बीवी 3 महीने यानि 3 तीन हैज़ (जिन्हें इद्दत कहा जाता है और अगर वो प्रेग्नेंट है तो बच्चा होने) तक शोहर ही के घर रहेगी और उसका खर्च भी शोहर ही के जुम्मे रहेगा लेकिन उनके बिस्तर अलग रहेंगे, कुरआन ने सूरेह तलाक में हुक्म फ़रमाया है कि इद्दत पूरी होने से पहले ना तो बीवी को ससुराल से निकाला जाए और ना ही वो खुद निकले, इसकी वजह कुरआन ने यह बतलाई है कि इससे उम्मीद है कि इद्दत के दौरान शोहर बीवी में सुलह हो जाए और वो तलाक का फैसला वापस लेने को तैयार हो जाएं.
अक्ल की रौशनी ने अगर इस हुक्म पर गोर किया जाए तो मालूम होगा कि इसमें बड़ी अच्छी हिकमत है, हर मआशरे में बीच में आज भड़काने वाले लोग मौजूद होते ही हैं, अगर बीवी तलाक मिलते ही अपनी माँ के घर चली जाए तो ऐसे लोगों को दोनों तरफ कान भरने का मौका मिल जाएगा, इसलिए यह ज़रूरी है कि बीवी इद्दत का वक़्त शोहर ही के घर गुज़ारे.
फिर अगर शोहर बीवी में इद्दत के दौरान सुलह हो जाए तो फिरसे वो दोनों बिना कुछ किये शोहर और बीवी की हेस्यत से रह सकते हैं इसके लिए उन्हें सिर्फ इतना करना होगा कि जिन गवाहों के सामने तलाक दी थी उनको खबर करदें कि हम ने अपना फैसला बदल लिया है, कानून में इसे ही ''रुजू'' करना कहते हैं .(सूरेह बक्राह-229)
इस्लाम मेँ पती पत्नि ( शौहर बीवी के रिशते कि कितनी अहमियत है । ये इसि बात से पता चलता है की इस्लाम मेँ अगर मियाँ बीवी के
बिच झगडा या आपसी तनाव आदी कुछ भी ऐसा हो जाए तो सबसे पहले आपस मेँ बैढकर सुलह का
हुकम है । फिर भी तलाक मेँ जल्दी ना करेँ मर्द औरत कि तरफ से एक एक समझदार लोग जो उनकी सुलह करा सके तिन इद्दत तक यानि तिन महीने का वक़्त है अगर जाने अनजाने में कोई गलती हुई हो जिसके वजह से बात तलाक तक आगई है तो अपने गलतियों में साधार करके रुजू कर लें जाहिर सी बात है जब किसी के दूर होने का अहसास होता है तो उसकी अहमियत और प्यार पूरी सीदत्त से सामने आता है इसी लिए इसी लिए ईश्वर ने तलाक में भी हमें सोचन समझने के लिए वक़्त दिया हुवा है अगर ऐसा नहीँ हो पाता तो आखिरी चुनाव है तलाक
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कुछ लोग मुताअ को लेकर इस्लाम को निशाना बनाते है पोस्ट जरूर पढे :-
मुहम्मद सल्लल्लाहु ने मुताआ को हराम (अवैध ) करार दिया है :-
दलील :-
ईमाम जोहरी कहतें हैं कि हम उमर बिन अजीज की मजलिस मे बैठे थे तभी उस मजलिस मे मुताआ का जिक्र चल गया तो रबीअ बिन सबरा नाम के एक व्यक्ति ने कहा : कि मे अपने पिता के बारें मे गवाही देता हूं कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने अंतिम हज्ज के मौके पर इसको मुताअ को एकदम हराम ( अवैध ) घोषित कर दिया था ।
( सुनन अबु दाऊद भाग 1 हदीस नंबर 2072 )
दूसरा सबूत : =
रबीअ बिन सबरा अपने पिता से रिवायत करतें हैं कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हज्ज के अंतिम अवसर पर महिलाओं से मुताअ करने को हराम ( अवैध ) घोषित कर दिया है ।
(सुनन अबू दाऊद भाग-1 हदीस नंबर 2073)
मुताअ किया है ? :-
मुताह मैरिज एक कांट्रेक्ट मैरिज था जो अरब में इस्लाम पूर्व प्रचलित थी इस विवाह में विवाह एक निश्चित अवधि बाद स्वयंमेव टूट जाएगा ऐसा अनुबंध किया जाता था, जब नबी सल्ल० का अवतरण हुआ, इस्लाम आया, तो धीरे धीरे शराब जुए और मुताहः जैसे अन्यायपूर्ण और खराब रिवाजों को खत्म कर दिया गया,इन रिवाजों को एक झटके में खत्म इसलिये नही किया गया क्योंकि ऐसा करने पर लोग अपनी लत छोड़ नही पाते और बुरे के बुरे रह जाते, तो बजाये इसके इस्लाम ने ये तरीका अपनाया कि लोगों का मस्तिष्क धीरे धीरे भलाई की बातें आत्मसात करता जाए, और फिर जब इन बुरे रिवाजों से उन्हें रोका जाए तो वे आसानी से इन ख़राब बातों को छोड़ दें तो ऐसा विवाह जिसमे विवाह से पहले ही औरत को तलाक देने की बात तय कर दी जाए यानी कॉन्ट्रैक्ट पर शादी की जाए, यही मुताह मैरिज है, और ऐसी शादी इस्लाम मे हराम है, ऐसी शादी के हराम होने का बयान और ऐलान बहुत सी अहादीस मे है, जैसे ,
सही बुखारी Vol.5/59/527, सही मुस्लिम 8/3259, सही मुस्लिम 8/3260, सही मुस्लिम 8/3262, सही मुस्लिम 8/3263, सही मुस्लिम 8/3264, सही मुस्लिम 8/3265 और अनेक अहादीस जिनमें नबी सल्ल० बार बार फरमाते हैं कि मुताह हराम है.!!
और मुताह मैरिज के हराम होने की वजह पवित्र कुरान की आयत 4:24 मे अल्लाह का ये हुक्म है कि ''शादी (मर्द और औरत, दोनों की पाक दामनी यानी यौन शुचिता) पाक दामनी की हिफाज़त करने के लिए करो, न कि नाजायज ढंग से जिस्मानी ताल्लुकात बनाने के लिए ''
यह एक जमाना ए जाहिलीयत मे के निकाह था कि लोग कुछ समय के निकाह कर लेते थे फिर अलग हो जाते थे जब इस्लाम पावर मे या इस्लामी हुकूमत कायम नहीँ हुई थी तो यह गलत प्रथा चलती रही ,
लेकिन जब इस्लामी हुकूमत आई तो मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फतेह मक्का के अवसर पर इस गलत प्रथा को हमेशा-हमेशा लिए हराम ( अवैध ) घोषित कर दिया ।
(देखें :- किताबुल निकाह सुनन अबू दाऊद भाग - 1, पेज नंबर 481 )
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मुहम्मद सल्लल्लाहु ने मुताआ को हराम (अवैध ) करार दिया है
दलील
ईमाम जोहरी कहतें हैं कि हम उमर बिन अजीज की मजलिस मे बैठे थे तभी उस मजलिस मे मुताआ का जिक्र चल गया तो रबीअ बिन सबरा नाम के एक व्यक्ति ने कहा : कि मे अपने पिता के बारें मे गवाही देता हूं कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने अंतिम हज्ज के मौके पर इसको मुताअ को एकदम हराम ( अवैध ) घोषित कर दिया था ।
( सुनन अबु दाऊद भाग 1 हदीस नंबर 2072 )
दूसरा सबूत
रबीअ बिन सबरा अपने पिता से रिवायत करतें हैं कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हज्ज के अंतिम अवसर पर महिलाओं से मुताअ करने को हराम ( अवैध ) घोषित कर दिया है ।
(सुनन अबू दाऊद भाग-1 हदीस नंबर 2073)
मुताअ किया है ?
मुताह मैरिज एक कांट्रेक्ट मैरिज था जो अरब में इस्लाम पूर्व प्रचलित थी इस विवाह में विवाह एक निश्चित अवधि बाद स्वयंमेव टूट जाएगा ऐसा अनुबंध किया जाता था, जब नबी सल्ल० का अवतरण हुआ, इस्लाम आया, तो धीरे धीरे शराब जुए और मुताहः जैसे अन्यायपूर्ण और खराब रिवाजों को खत्म कर दिया गया,इन रिवाजों को एक झटके में खत्म इसलिये नही किया गया क्योंकि ऐसा करने पर लोग अपनी लत छोड़ नही पाते और बुरे के बुरे रह जाते, तो बजाये इसके इस्लाम ने ये तरीका अपनाया कि लोगों का मस्तिष्क धीरे धीरे भलाई की बातें आत्मसात करता जाए, और फिर जब इन बुरे रिवाजों से उन्हें रोका जाए तो वे आसानी से इन ख़राब बातों को छोड़ दें तो ऐसा विवाह जिसमे विवाह से पहले ही औरत को तलाक देने की बात तय कर दी जाए यानी कॉन्ट्रैक्ट पर शादी की जाए, यही मुताह मैरिज है, और ऐसी शादी इस्लाम मे हराम है, ऐसी शादी के हराम होने का बयान और ऐलान बहुत सी अहादीस मे है, जैसे ,
सही बुखारी Vol.5/59/527, सही मुस्लिम 8/3259, सही मुस्लिम 8/3260, सही मुस्लिम 8/3262, सही मुस्लिम 8/3263, सही मुस्लिम 8/3264, सही मुस्लिम 8/3265 और अनेक अहादीस जिनमें नबी सल्ल० बार बार फरमाते हैं कि मुताह हराम है.!!
और मुताह मैरिज के हराम होने की वजह पवित्र कुरान की आयत 4:24 मे अल्लाह का ये हुक्म है कि ''शादी (मर्द और औरत, दोनों की पाक दामनी यानी यौन शुचिता) पाक दामनी की हिफाज़त करने के लिए करो, न कि नाजायज ढंग से जिस्मानी ताल्लुकात बनाने के लिए ''
यह एक जमाना ए जाहिलीयत मे के निकाह था कि लोग कुछ समय के निकाह कर लेते थे फिर अलग हो जाते थे जब इस्लाम पावर मे या इस्लामी हुकूमत कायम नहीँ हुई थी तो यह गलत प्रथा चलती रही ,
लेकिन जब इस्लामी हुकूमत आई तो मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फतेह मक्का के अवसर पर इस गलत प्रथा को हमेशा-हमेशा लिए हराम ( अवैध ) घोषित कर दिया ।
(देखें :- किताबुल निकाह सुनन अबू दाऊद भाग - 1, पेज नंबर 481 )
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हलाला इस्लाम में हराम है
इब्ने मसऊद रजि0 से रिवायत है कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया कि हलाला करने वाले जिस के लिए हलाला किया गया दोनो पर धिक्कार है ।
(सहीह तिरमिजी हदीस नंबर 894 )
हजरत उकबा बिन आमिर रजि0 से रिवायत है कि मुहम्मद सल्लल्लाहु ने फरमाया कि " किया तुम्हें उधार के सांड की खबर न दू ? सहाबाओ (साथी ) ने कहा कि कियों नहीं अल्लाह के रसूल! मुहम्मद सल्लल्लाहु ने कहा कि "वह हलाला करने वाला है । अल्लाह ने हलाला करने वाले और जिस के लिए हलाला किया जाए दोनो पर लानत फरमाई है ।
(हसन इब्ने माजा हदीस नंबर 1572 )
हजरत उमर फारूक रजि0 ने फरमाया कि मेरे पास हलाला करने वाले और जिस के लिए हलाला किया जाए दोनो लाए गए तो दोनो को कत्ल (हत्या ) कर दूंगा ।
(इब्ने अबी शीबा 4/294 )
हजरत उमर फारूक रजि0 से हलाले के बारें में मालूम किया आप ने फरमाया कि "दोनो बदकार है "
( इब्ने अबी शीबा 4/294 )
हजरत उमर फारूक रजि0 फरमाते है कि रिसालत मे लोग हलाले को व्याभिचार मानते थे ।
(हाकिम 2/199 , तबरानी औसत कमा फिल मजमा 4/267)
بِسْمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيْمِ
حدیث نمبر: 1120 حَدَّثَنَا مَحْمُودُ بْنُ غَيْلَانَ، حَدَّثَنَا أَبُو أَحْمَدَ الزُّبَيْرِيُّ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، عَنْ أَبِي قَيْسٍ، عَنْ هُزَيْلِ بْنِ شُرَحْبِيلَ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ مَسْعُودٍ، قَالَ: لَعَنَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ الْمُحِلَّ وَالْمُحَلَّلَ لَهُ . قَالَ أَبُو عِيسَى: هَذَا حَدِيثٌ حَسَنٌ صَحِيحٌ، وَأَبُو قَيْسٍ الْأَوْدِيُّ اسْمُهُ: عَبْدُ الرَّحْمَنِ بْنُ ثَرْوَانَ، وَقَدْ رُوِيَ هَذَا الْحَدِيثُ عَنِ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ مِنْ غَيْرِ وَجْهٍ، وَالْعَمَلُ عَلَى هَذَا الْحَدِيثِ عِنْدَ أَهْلِ الْعِلْمِ مِنْ أَصْحَابِ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، مِنْهُمْ عُمَرُ بْنُ الْخَطَّابِ، وَعُثْمَانُ بْنُ عَفَّانَ، وَعَبْدُ اللَّهِ بْنُ عَمْرٍو وَغَيْرُهُمْ، وَهُوَ قَوْلُ: الْفُقَهَاءِ مِنَ التَّابِعِينَ، وَبِهِ يَقُولُ: سُفْيَانُ الثَّوْرِيُّ، وَابْنُ الْمُبَارَكِ، وَالشَّافِعِيُّ، وَأَحْمَدُ، وَإِسْحَاق، قَالَ: وسَمِعْت الْجَارُودَ بْنَ مُعَاذٍ يَذْكُرُ، عَنْ وَكِيعٍ، أَنَّهُ قَالَ بِهَذَا، وقَالَ: يَنْبَغِي أَنْ يُرْمَى بِهَذَا الْبَابِ مِنْ قَوْلِ أَصْحَابِ الرَّأْيِ، قَالَ جَارُودُ: قَالَ وَكِيعٌ: وَقَالَ سُفْيَانُ: إِذَا تَزَوَّجَ الرَّجُلُ الْمَرْأَةَ لِيُحَلِّلَهَا ثُمَّ بَدَا لَهُ أَنْ يُمْسِكَهَا فَلَا يَحِلُّ لَهُ أَنْ يُمْسِكَهَا حَتَّى يَتَزَوَّجَهَا بِنِكَاحٍ جَدِيدٍ.
عبداللہ بن مسعود (رض) کہتے ہیں کہ رسول اللہ (صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم) نے حلالہ کرنے والے اور کرانے والے (دونوں) پر لعنت بھیجی ہے۔ امام ترمذی کہتے ہیں : ١- یہ حدیث حسن صحیح ہے، ٢- یہ حدیث نبی اکرم (صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم) سے کئی اور طرق سے بھی روایت کی گئی ہے، ٣- صحابہ کرام میں سے اہل علم کا اسی حدیث پر عمل ہے۔ جن میں عمر بن خطاب، عثمان بن عفان، عبداللہ بن عمر وغیرہم (رض) بھی شامل ہیں۔ یہی تابعین میں سے فقہاء کا بھی قول ہے اور یہی سفیان ثوری، ابن مبارک، شافعی، احمد اور اسحاق بن راہویہ بھی کہتے ہیں، وکیع نے بھی یہی کہا ہے، ٤- نیز وکیع کہتے ہیں : اصحاب رائے کے قول کو پھینک دینا ہی مناسب ہوگا ١ ؎، ٥- سفیان ثوری کہتے ہیں : آدمی جب عورت سے نکاح اس نیت سے کرے کہ وہ اسے (پہلے شوہر کے لیے) حلال کرے گا پھر اسے اس عورت کو اپنی زوجیت میں رکھ لینا ہی بھلا معلوم ہو تو وہ اسے اپنی زوجیت میں نہیں رکھ سکتا جب تک کہ اس سے نئے نکاح کے ذریعے سے شادی نہ کرے۔ تخریج دارالدعوہ : سنن النسائی/الطلاق ١٣ (٣٤٤٥) ، (في سیاق طویل) ( تحفة الأشراف : ٩٥٩٥) ، مسند احمد (١/٤٤٨، ٤٥٠، ٤٥١، ٤٦٢) ، سنن الدارمی/النکاح ٥٣ (٢٣٠٤) (صحیح) وضاحت : ١ ؎ : اصحاب الرائے سے مراد امام ابوحنیفہ اور ان کے اصحاب ہیں ، ان لوگوں کا کہنا ہے کہ نکاح حلالہ صحیح ہے گو حلال کرنے کی ہی نیت سے ہو۔ ان کی رائے کو چھوڑ دینا اس لیے مناسب ہے کہ ان کا یہ قول حدیث کے مخالف ہے۔ قال الشيخ الألباني : صحيح انظر ما قبله (1119) صحيح وضعيف سنن الترمذي الألباني : حديث نمبر 1120
Muhmud ibn Ghaylan also reported this hadith. He reported from Abu Ahmad, from Sufyan, from Abu Qays, from Huzayl ibn Shurahbil who from Sayyidina Abdullah ibn Mas’ud (RA)that the Prophet (صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم) cursed one who makes lawful (a woman for her first husband and one who gets it done. [Nisai 3413]
[Sunan at Tirmidhi نکاح کا بیان]
بِسْمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيْمِ
أَخْبَرَنَا عَمْرُو بْنُ مَنْصُورٍ قَالَ حَدَّثَنَا أَبُو نُعَيْمٍ عَنْ سُفْيَانَ عَنْ أَبِي قَيْسٍ عَنْ هُزَيْلٍ عَنْ عَبْدِ اللَّهِ قَالَ لَعَنَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّی اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ الْوَاشِمَةَ وَالْمُوتَشِمَةَ وَالْوَاصِلَةَ وَالْمَوْصُولَةَ وَآکِلَ الرِّبَا وَمُوکِلَهُ وَالْمُحَلِّلَ وَالْمُحَلَّلَ لَهُ
عبداللہ بن مسعود رضی الله عنہ کہتے ہیں کہ رسول اللہ (صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم) نے لعنت فرمائی ہے گودنے اور گودانے والی پر اور بالوں کو (بڑا کرنے کے لیے) جوڑنے والی اور جو ڑوانے والی پر اور سود کھانے والے پر اور سود کھلانے والے پر اور حلالہ کرنے پر اور جس کے لیے حلالہ کیا جائے اس پر۔ تخریج دارالدعوہ : سنن الترمذی/النکاح ٢٨ (١١٢٠) مختصراً ، (تحفة الأشراف : ٩٥٩٥) ، مسند احمد (١/٤٤٨، ٤٦٢، سنن الدارمی/النکاح ٥٣ (٢٣٠٤) (صحیح ) قال الشيخ الألباني : صحيح صحيح وضعيف سنن النسائي الألباني : حديث نمبر 3416
It was narrated that Abdullah said: "The Messenger of Allah (صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم) cursed the woman who tattoos and the one tattooed, the woman who fixed hair extensions and the one who had her hair get extended, the consumer of Riba and the one who pays it, and Al-Muhallil and Al-Muhallal Lahu.
[Sunan an Nasai طلاق سے متعلقہ احادیث - حدیث نمبر 1354]
حدیث نمبر: 1935 حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ إِسْمَاعِيل بْنِ الْبَخْتَرِيِّ الْوَاسِطِيُّ، حَدَّثَنَا أَبُو أُسَامَةَ، عَنِ ابْنِ عَوْنٍ، وَمُجالِدٌ، عَنِ الشَّعْبِيِّ، عَنْالْحَارِثِ، عَنْ عَلِيٍّ، قَالَ: لَعَنَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ الْمُحَلِّلَ وَالْمُحَلَّلَ لَهُ.
علی (رض) کہتے ہیں کہ رسول اللہ (صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم) نے حلالہ کرنے والے اور حلالہ کرانے والے پر لعنت کی ہے ١ ؎۔ تخریج دارالدعوہ : سنن ابی داود/النکاح ١٥ (٢٠٧٦، ٢٠٧٧) ، سنن الترمذی/النکاح ٢٧ (١١١٩) ، (تحفة الأشراف : ١٠٠٣٤) ، وقد أخرجہ : مسند احمد (١/٨٣، ٨٧، ١٠٧، ١٢١، ١٥٠، ١٥٨) (صحیح ) وضاحت : ١ ؎: محلل (حلالہ کرنے والا) وہ شخص ہے جو طلاق دینے کی نیت سے مطلقہ ثلاثہ سے نکاح و مباشرت کرے اور محلل لہ (جس کے لیے حلالہ کیا جائے) سے پہلا شوہر مراد ہے جس نے تین طلاقیں دیں، یہ حدیث دلیل ہے کہ حلالہ کی نیت سے نکاح باطل اور حرام ہے کیونکہ لعنت حرام فعل ہی پر کی جاتی ہے، جمہور اس کی حرمت کے قائل ہیں۔
It was narrated that ‘Ali said: “The Messenger of Allah (صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم) cursed the Muhallil and the Muhallal lahu.”
[Sunan Ibn Majah نکاح کا بیان]
بِسْمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيْمِ
حدیث نمبر: 1936 حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ عُثْمَانَ بْنِ صَالِحٍ الْمِصْرِيُّ، حَدَّثَنَا أَبِي، قَالَ: سَمِعْتُ اللَّيْثَ بْنَ سَعْدٍ، يَقُولُ: قَالَ لِي أَبُو مُصْعَبٍ مِشْرَحُ بْنُ هَاعَانَ، قَالَ عُقْبَةُ بْنُ عَامِرٍ، قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: أَلَا أُخْبِرُكُمْ بِالتَّيْسِ الْمُسْتَعَارِ، قَالُوا: بَلَى يَا رَسُولَ اللَّهِ، قَالَ: هُوَ الْمُحَلِّلُ، لَعَنَ اللَّهُ الْمُحَلِّلَ وَالْمُحَلَّلَ لَهُ.
عقبہ بن عامر (رض) کہتے ہیں کہ رسول اللہ (صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم) نے فرمایا : کیا میں تم کو مستعار (مانگے ہوئے) بکرے کے بارے میں نہ بتاؤں ؟ لوگوں نے عرض کیا : اللہ کے رسول ! ضرور بتائیے، آپ (صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم) نے فرمایا : وہ حلالہ کرنے والا ہے، اللہ نے حلالہ کرنے اور کرانے والے دونوں پر لعنت کی ہے ١ ؎۔ تخریج دارالدعوہ : تفرد بہ ابن ماجہ، (تحفة الأشراف : ٩٩٦٨، ومصباح الزجاجة : ٦٩٠) (حسن) (ابو مصعب میں کلام ہے، ملاحظہ ہو : الإرواء : ٦ / ٣٠٩- ٣١٠ ) وضاحت : ١ ؎: شیخ الاسلام ابن تیمیہ نے اس باب میں إقامة الدليل على إبطال التحليل نامی کتاب تصنیف فرمائی ہے، علامہ ابن القیم فرماتے ہیں : نکاح حلالہ کسی ملت میں مباح نہیں ہوا، اور نہ اسے کسی صحابی نے کیا اور نہ اس کا فتوی دیا، افسوس ہے اس زمانہ میں لوگ حلالہ کا نکاح کرتے ہیں، اور وہ عورت جو حلالہ کراتی ہے گویا دو آدمیوں سے زنا کراتی ہے، ایک حلالہ کرنے والے سے، دوسرے پھر اپنے پہلے شوہر سے، اللہ تعالیٰ اس آفت سے پناہ میں رکھے۔ آمین
‘Uqbah bin ‘Amir narrated that the Messenger of Allah (صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم) said: ‘Shall I not tell you of a borrowed billy goat.” They said: “Yes, O Messenger of Allah (صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم) ” He said: “He is MuhalIil. May Allah curse the Muhallil and the Muhallal lahu.” (Hasan)
[Sunan Ibn Majah نکاح کا بیان]
क्या 'हलाला' शरिया कानून का हिस्सा है?
'हलाला' शरिया कानून का हिस्सा नहीं है, बल्कि तलाक़ को इसलिए सख्त बनाया गया है कि पुरुष महिलाओं पर ज्यादतियां करने की नियत से इसका मज़ाक ना बना लें, जब चाहे तलाक़ दिया और फिर जब चाहे दुबारा विवाह कर लिया। इसीलिए तलाक़ के बाद वापिस दुबारा शादी की संभावना लगभग समाप्त हो जाती है। यहाँ यह भी बताता चलूँ कि इस्लाम में तलाक़ को सबसे ज्यादा नापसंदीदा काम माना गया है और केवल विशेष परिस्थितियों के लिए ही इसका प्रावधान है।
एक बार तलाक़ होने के बाद कोई भी महिला अपनी मर्ज़ी से दूसरा विवाह करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र होती है। हाँ अगर किसी तलाकशुदा महिला का अपने पति या उसके पति का उसके साथ तालमेल नहीं बैठता और बदकिस्मती से फिर से तलाक़ की स्थिति आ जाती है। तो ऐसी अवस्था में वह महिला अपनी इच्छा से फिर से पहले पति से शादी कर सकती है। अगर कोई जानबूझकर इस प्रक्रिया को दूबारा शादी के लिए इस्तेमाल करता है तो इस्लामिक कानून के मुताबिक उनके लिए बेहद सख्त सज़ाओं का प्रावधान है।सन्दर्भ के लिए यह लिंक देखा जा सकता हैं.
http://www.islamawareness.net/Talaq/talaq_fatwa0008.htm
निकाह की हर एक सूरत में महिला और पुरुष दोनों की 'मर्ज़ी' आवश्यक है
इस्लामिक विवाह की रीती में किसी भी स्थिति में बिना किसी महिला अथवा पुरुष की मर्ज़ी के शादी हो ही नहीं सकती है। अगर किसी महिला / पुरुष से ज़बरदस्ती 'हाँ' कहलवाई जाती है और हस्ताक्षर करवाए जाते हैं तो इस सूरत में विवाह नहीं होता है। और क्योंकि ऐसी स्थिति में क्योंकि विवाह वैध नहीं होता है इसलिए अलग होने के लिए तलाक़ की आवश्यकता भी नहीं होती है। उपरोक्त संदर्भो से यह साफ़ हो जाता है कि हलाला की इस्लाम में रत्ती भर भी जगह नहीं है।
मैंने एक बार तलाक़ हो जाने पर दुबारा विवाह को लगभग नामुमकिन इसलिए कहा था क्योंकि किसी भी महिला की मर्ज़ी के बिना पहली या दूसरी शादी हो ही नहीं सकती है और कोई भी महिला ऐसी घिनौनी हरकत को जानबूझकर क़ुबूल नहीं करेगी। अगर किसी महिला या पुरुष का इस्लाम धर्म में विश्वास है तब तो वह ऐसा गुनाह बिलकुल भी नहीं करेंगे और अगर विश्वास ही नहीं है तो उन्हें ऐसा करने की आवश्यकता ही नहीं है, वह देश के सामान्य कानून के मुताबिक कोर्ट में शादी कर सकते हैं।
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हलाला इस्लाम में हराम है
इब्ने मसऊद रजि0 से रिवायत है कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया कि हलाला करने वाले जिस के लिए हलाला किया गया दोनो पर धिक्कार है ।
(सहीह तिरमिजी हदीस नंबर 894 )
हजरत उकबा बिन आमिर रजि0 से रिवायत है कि मुहम्मद सल्लल्लाहु ने फरमाया कि " किया तुम्हें उधार के सांड की खबर न दू ? सहाबाओ (साथी ) ने कहा कि कियों नहीं अल्लाह के रसूल! मुहम्मद सल्लल्लाहु ने कहा कि "वह हलाला करने वाला है । अल्लाह ने हलाला करने वाले और जिस के लिए हलाला किया जाए दोनो पर लानत फरमाई है ।
(हसन इब्ने माजा हदीस नंबर 1572 )
हजरत उमर फारूक रजि0 ने फरमाया कि मेरे पास हलाला करने वाले और जिस के लिए हलाला किया जाए दोनो लाए गए तो दोनो को कत्ल (हत्या ) कर दूंगा ।
(इब्ने अबी शीबा 4/294 )
हजरत उमर फारूक रजि0 से हलाले के बारें में मालूम किया आप ने फरमाया कि "दोनो बदकार है "
( इब्ने अबी शीबा 4/294 )
हजरत उमर फारूक रजि0 फरमाते है कि रिसालत मे लोग हलाले को व्याभिचार मानते थे ।
(हाकिम 2/199 , तबरानी औसत कमा फिल मजमा 4/267)
بِسْمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيْمِ
حدیث نمبر: 1120 حَدَّثَنَا مَحْمُودُ بْنُ غَيْلَانَ، حَدَّثَنَا أَبُو أَحْمَدَ الزُّبَيْرِيُّ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، عَنْ أَبِي قَيْسٍ، عَنْ هُزَيْلِ بْنِ شُرَحْبِيلَ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ مَسْعُودٍ، قَالَ: لَعَنَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ الْمُحِلَّ وَالْمُحَلَّلَ لَهُ . قَالَ أَبُو عِيسَى: هَذَا حَدِيثٌ حَسَنٌ صَحِيحٌ، وَأَبُو قَيْسٍ الْأَوْدِيُّ اسْمُهُ: عَبْدُ الرَّحْمَنِ بْنُ ثَرْوَانَ، وَقَدْ رُوِيَ هَذَا الْحَدِيثُ عَنِ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ مِنْ غَيْرِ وَجْهٍ، وَالْعَمَلُ عَلَى هَذَا الْحَدِيثِ عِنْدَ أَهْلِ الْعِلْمِ مِنْ أَصْحَابِ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، مِنْهُمْ عُمَرُ بْنُ الْخَطَّابِ، وَعُثْمَانُ بْنُ عَفَّانَ، وَعَبْدُ اللَّهِ بْنُ عَمْرٍو وَغَيْرُهُمْ، وَهُوَ قَوْلُ: الْفُقَهَاءِ مِنَ التَّابِعِينَ، وَبِهِ يَقُولُ: سُفْيَانُ الثَّوْرِيُّ، وَابْنُ الْمُبَارَكِ، وَالشَّافِعِيُّ، وَأَحْمَدُ، وَإِسْحَاق، قَالَ: وسَمِعْت الْجَارُودَ بْنَ مُعَاذٍ يَذْكُرُ، عَنْ وَكِيعٍ، أَنَّهُ قَالَ بِهَذَا، وقَالَ: يَنْبَغِي أَنْ يُرْمَى بِهَذَا الْبَابِ مِنْ قَوْلِ أَصْحَابِ الرَّأْيِ، قَالَ جَارُودُ: قَالَ وَكِيعٌ: وَقَالَ سُفْيَانُ: إِذَا تَزَوَّجَ الرَّجُلُ الْمَرْأَةَ لِيُحَلِّلَهَا ثُمَّ بَدَا لَهُ أَنْ يُمْسِكَهَا فَلَا يَحِلُّ لَهُ أَنْ يُمْسِكَهَا حَتَّى يَتَزَوَّجَهَا بِنِكَاحٍ جَدِيدٍ.
عبداللہ بن مسعود (رض) کہتے ہیں کہ رسول اللہ (صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم) نے حلالہ کرنے والے اور کرانے والے (دونوں) پر لعنت بھیجی ہے۔ امام ترمذی کہتے ہیں : ١- یہ حدیث حسن صحیح ہے، ٢- یہ حدیث نبی اکرم (صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم) سے کئی اور طرق سے بھی روایت کی گئی ہے، ٣- صحابہ کرام میں سے اہل علم کا اسی حدیث پر عمل ہے۔ جن میں عمر بن خطاب، عثمان بن عفان، عبداللہ بن عمر وغیرہم (رض) بھی شامل ہیں۔ یہی تابعین میں سے فقہاء کا بھی قول ہے اور یہی سفیان ثوری، ابن مبارک، شافعی، احمد اور اسحاق بن راہویہ بھی کہتے ہیں، وکیع نے بھی یہی کہا ہے، ٤- نیز وکیع کہتے ہیں : اصحاب رائے کے قول کو پھینک دینا ہی مناسب ہوگا ١ ؎، ٥- سفیان ثوری کہتے ہیں : آدمی جب عورت سے نکاح اس نیت سے کرے کہ وہ اسے (پہلے شوہر کے لیے) حلال کرے گا پھر اسے اس عورت کو اپنی زوجیت میں رکھ لینا ہی بھلا معلوم ہو تو وہ اسے اپنی زوجیت میں نہیں رکھ سکتا جب تک کہ اس سے نئے نکاح کے ذریعے سے شادی نہ کرے۔ تخریج دارالدعوہ : سنن النسائی/الطلاق ١٣ (٣٤٤٥) ، (في سیاق طویل) ( تحفة الأشراف : ٩٥٩٥) ، مسند احمد (١/٤٤٨، ٤٥٠، ٤٥١، ٤٦٢) ، سنن الدارمی/النکاح ٥٣ (٢٣٠٤) (صحیح) وضاحت : ١ ؎ : اصحاب الرائے سے مراد امام ابوحنیفہ اور ان کے اصحاب ہیں ، ان لوگوں کا کہنا ہے کہ نکاح حلالہ صحیح ہے گو حلال کرنے کی ہی نیت سے ہو۔ ان کی رائے کو چھوڑ دینا اس لیے مناسب ہے کہ ان کا یہ قول حدیث کے مخالف ہے۔ قال الشيخ الألباني : صحيح انظر ما قبله (1119) صحيح وضعيف سنن الترمذي الألباني : حديث نمبر 1120
Muhmud ibn Ghaylan also reported this hadith. He reported from Abu Ahmad, from Sufyan, from Abu Qays, from Huzayl ibn Shurahbil who from Sayyidina Abdullah ibn Mas’ud (RA)that the Prophet (صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم) cursed one who makes lawful (a woman for her first husband and one who gets it done. [Nisai 3413]
[Sunan at Tirmidhi نکاح کا بیان]
بِسْمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيْمِ
أَخْبَرَنَا عَمْرُو بْنُ مَنْصُورٍ قَالَ حَدَّثَنَا أَبُو نُعَيْمٍ عَنْ سُفْيَانَ عَنْ أَبِي قَيْسٍ عَنْ هُزَيْلٍ عَنْ عَبْدِ اللَّهِ قَالَ لَعَنَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّی اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ الْوَاشِمَةَ وَالْمُوتَشِمَةَ وَالْوَاصِلَةَ وَالْمَوْصُولَةَ وَآکِلَ الرِّبَا وَمُوکِلَهُ وَالْمُحَلِّلَ وَالْمُحَلَّلَ لَهُ
عبداللہ بن مسعود رضی الله عنہ کہتے ہیں کہ رسول اللہ (صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم) نے لعنت فرمائی ہے گودنے اور گودانے والی پر اور بالوں کو (بڑا کرنے کے لیے) جوڑنے والی اور جو ڑوانے والی پر اور سود کھانے والے پر اور سود کھلانے والے پر اور حلالہ کرنے پر اور جس کے لیے حلالہ کیا جائے اس پر۔ تخریج دارالدعوہ : سنن الترمذی/النکاح ٢٨ (١١٢٠) مختصراً ، (تحفة الأشراف : ٩٥٩٥) ، مسند احمد (١/٤٤٨، ٤٦٢، سنن الدارمی/النکاح ٥٣ (٢٣٠٤) (صحیح ) قال الشيخ الألباني : صحيح صحيح وضعيف سنن النسائي الألباني : حديث نمبر 3416
It was narrated that Abdullah said: "The Messenger of Allah (صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم) cursed the woman who tattoos and the one tattooed, the woman who fixed hair extensions and the one who had her hair get extended, the consumer of Riba and the one who pays it, and Al-Muhallil and Al-Muhallal Lahu.
[Sunan an Nasai طلاق سے متعلقہ احادیث - حدیث نمبر 1354]
حدیث نمبر: 1935 حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ إِسْمَاعِيل بْنِ الْبَخْتَرِيِّ الْوَاسِطِيُّ، حَدَّثَنَا أَبُو أُسَامَةَ، عَنِ ابْنِ عَوْنٍ، وَمُجالِدٌ، عَنِ الشَّعْبِيِّ، عَنْالْحَارِثِ، عَنْ عَلِيٍّ، قَالَ: لَعَنَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ الْمُحَلِّلَ وَالْمُحَلَّلَ لَهُ.
علی (رض) کہتے ہیں کہ رسول اللہ (صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم) نے حلالہ کرنے والے اور حلالہ کرانے والے پر لعنت کی ہے ١ ؎۔ تخریج دارالدعوہ : سنن ابی داود/النکاح ١٥ (٢٠٧٦، ٢٠٧٧) ، سنن الترمذی/النکاح ٢٧ (١١١٩) ، (تحفة الأشراف : ١٠٠٣٤) ، وقد أخرجہ : مسند احمد (١/٨٣، ٨٧، ١٠٧، ١٢١، ١٥٠، ١٥٨) (صحیح ) وضاحت : ١ ؎: محلل (حلالہ کرنے والا) وہ شخص ہے جو طلاق دینے کی نیت سے مطلقہ ثلاثہ سے نکاح و مباشرت کرے اور محلل لہ (جس کے لیے حلالہ کیا جائے) سے پہلا شوہر مراد ہے جس نے تین طلاقیں دیں، یہ حدیث دلیل ہے کہ حلالہ کی نیت سے نکاح باطل اور حرام ہے کیونکہ لعنت حرام فعل ہی پر کی جاتی ہے، جمہور اس کی حرمت کے قائل ہیں۔
It was narrated that ‘Ali said: “The Messenger of Allah (صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم) cursed the Muhallil and the Muhallal lahu.”
[Sunan Ibn Majah نکاح کا بیان]
بِسْمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيْمِ
حدیث نمبر: 1936 حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ عُثْمَانَ بْنِ صَالِحٍ الْمِصْرِيُّ، حَدَّثَنَا أَبِي، قَالَ: سَمِعْتُ اللَّيْثَ بْنَ سَعْدٍ، يَقُولُ: قَالَ لِي أَبُو مُصْعَبٍ مِشْرَحُ بْنُ هَاعَانَ، قَالَ عُقْبَةُ بْنُ عَامِرٍ، قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: أَلَا أُخْبِرُكُمْ بِالتَّيْسِ الْمُسْتَعَارِ، قَالُوا: بَلَى يَا رَسُولَ اللَّهِ، قَالَ: هُوَ الْمُحَلِّلُ، لَعَنَ اللَّهُ الْمُحَلِّلَ وَالْمُحَلَّلَ لَهُ.
عقبہ بن عامر (رض) کہتے ہیں کہ رسول اللہ (صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم) نے فرمایا : کیا میں تم کو مستعار (مانگے ہوئے) بکرے کے بارے میں نہ بتاؤں ؟ لوگوں نے عرض کیا : اللہ کے رسول ! ضرور بتائیے، آپ (صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم) نے فرمایا : وہ حلالہ کرنے والا ہے، اللہ نے حلالہ کرنے اور کرانے والے دونوں پر لعنت کی ہے ١ ؎۔ تخریج دارالدعوہ : تفرد بہ ابن ماجہ، (تحفة الأشراف : ٩٩٦٨، ومصباح الزجاجة : ٦٩٠) (حسن) (ابو مصعب میں کلام ہے، ملاحظہ ہو : الإرواء : ٦ / ٣٠٩- ٣١٠ ) وضاحت : ١ ؎: شیخ الاسلام ابن تیمیہ نے اس باب میں إقامة الدليل على إبطال التحليل نامی کتاب تصنیف فرمائی ہے، علامہ ابن القیم فرماتے ہیں : نکاح حلالہ کسی ملت میں مباح نہیں ہوا، اور نہ اسے کسی صحابی نے کیا اور نہ اس کا فتوی دیا، افسوس ہے اس زمانہ میں لوگ حلالہ کا نکاح کرتے ہیں، اور وہ عورت جو حلالہ کراتی ہے گویا دو آدمیوں سے زنا کراتی ہے، ایک حلالہ کرنے والے سے، دوسرے پھر اپنے پہلے شوہر سے، اللہ تعالیٰ اس آفت سے پناہ میں رکھے۔ آمین
‘Uqbah bin ‘Amir narrated that the Messenger of Allah (صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم) said: ‘Shall I not tell you of a borrowed billy goat.” They said: “Yes, O Messenger of Allah (صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم) ” He said: “He is MuhalIil. May Allah curse the Muhallil and the Muhallal lahu.” (Hasan)
[Sunan Ibn Majah نکاح کا بیان]
क्या 'हलाला' शरिया कानून का हिस्सा है?
'हलाला' शरिया कानून का हिस्सा नहीं है, बल्कि तलाक़ को इसलिए सख्त बनाया गया है कि पुरुष महिलाओं पर ज्यादतियां करने की नियत से इसका मज़ाक ना बना लें, जब चाहे तलाक़ दिया और फिर जब चाहे दुबारा विवाह कर लिया। इसीलिए तलाक़ के बाद वापिस दुबारा शादी की संभावना लगभग समाप्त हो जाती है। यहाँ यह भी बताता चलूँ कि इस्लाम में तलाक़ को सबसे ज्यादा नापसंदीदा काम माना गया है और केवल विशेष परिस्थितियों के लिए ही इसका प्रावधान है।
एक बार तलाक़ होने के बाद कोई भी महिला अपनी मर्ज़ी से दूसरा विवाह करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र होती है। हाँ अगर किसी तलाकशुदा महिला का अपने पति या उसके पति का उसके साथ तालमेल नहीं बैठता और बदकिस्मती से फिर से तलाक़ की स्थिति आ जाती है। तो ऐसी अवस्था में वह महिला अपनी इच्छा से फिर से पहले पति से शादी कर सकती है। अगर कोई जानबूझकर इस प्रक्रिया को दूबारा शादी के लिए इस्तेमाल करता है तो इस्लामिक कानून के मुताबिक उनके लिए बेहद सख्त सज़ाओं का प्रावधान है।सन्दर्भ के लिए यह लिंक देखा जा सकता हैं.
http://www.islamawareness.net/Talaq/talaq_fatwa0008.htm
निकाह की हर एक सूरत में महिला और पुरुष दोनों की 'मर्ज़ी' आवश्यक है
इस्लामिक विवाह की रीती में किसी भी स्थिति में बिना किसी महिला अथवा पुरुष की मर्ज़ी के शादी हो ही नहीं सकती है। अगर किसी महिला / पुरुष से ज़बरदस्ती 'हाँ' कहलवाई जाती है और हस्ताक्षर करवाए जाते हैं तो इस सूरत में विवाह नहीं होता है। और क्योंकि ऐसी स्थिति में क्योंकि विवाह वैध नहीं होता है इसलिए अलग होने के लिए तलाक़ की आवश्यकता भी नहीं होती है। उपरोक्त संदर्भो से यह साफ़ हो जाता है कि हलाला की इस्लाम में रत्ती भर भी जगह नहीं है।
मैंने एक बार तलाक़ हो जाने पर दुबारा विवाह को लगभग नामुमकिन इसलिए कहा था क्योंकि किसी भी महिला की मर्ज़ी के बिना पहली या दूसरी शादी हो ही नहीं सकती है और कोई भी महिला ऐसी घिनौनी हरकत को जानबूझकर क़ुबूल नहीं करेगी। अगर किसी महिला या पुरुष का इस्लाम धर्म में विश्वास है तब तो वह ऐसा गुनाह बिलकुल भी नहीं करेंगे और अगर विश्वास ही नहीं है तो उन्हें ऐसा करने की आवश्यकता ही नहीं है, वह देश के सामान्य कानून के मुताबिक कोर्ट में शादी कर सकते हैं।
आगे की पोस्ट में हम इन्हें नियोग विधि भी सिखाएंगे जिसपे स्वामी दयानंद जी खूब जोर दिए हुवे है
वह भी एक से नही दो से नही 11 11 के साथ जैसे औरत औरत ना हो कर नास्ते की प्लेट हो
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फिल्म मीडिया मे तलाक और हलाला की रस्म की तस्वीर देखिए ज़रा
"मर्द ने अपनी मर्दानगी के नशे मे चूर होकर बेचारी औरत को तलाक के तीन पत्थर मार दिए, और ज़िन्दगी भर के लिए बांधा गया शादी का बंधन एक झटके मे टूट गया .... रोती कलपती मजबूर औरत माएके आ बैठी, और अपने नसीब पर रो रो कर आंखे सुजाती रही .... फिर एक दिन उसके शौहर को अपनी बीवी पर प्यार आया, और शौहर अपनी मिल्कियत यानी अपनी बीवी के जिस्म को अपने से पहले किसी गैर मर्द को सौंपने पर 'मजबूर' हो गया ताकि वो दूसरा आदमी उसकी तलाकशुदा से शादी कर के उसके साथ रात गुजारे और फिर उसे तलाक दे दे ताकि हलाला की रस्म पूरी हो सके ॥"
हमारे देश मे सिनेमा और टीवी के जरिए मुस्लिमों मे तलाक के विधान का बहुत ही गलत रूप, और हलाला की रीति का बेहद अश्लील रूप से वर्णन किया गया है, इन विधानो को स्त्री पर अत्याचार दिखाया गया है,
वास्तविकता ये है कि हलाला का क़ानून तलाक़ देने से मर्दों को रोकने के लिए बनाया गया है, हलाला का क़ानून पुरुषों के लिए एक चेतावनी है कि अगर उन्होंने अपनी पत्नी को तलाक दे दिया तो दोबारा उनकी आपस में शादी असम्भव हो जाएगी ... इसलिए वो बिना किसी ठोस वजह अपनी पत्नी को तलाक़ देने की बात भी अपने दिमाग में न लाएं...
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अव्वल तो एक बैठक मे तलाक को इस्लाम मे पाप माना गया है.. बल्कि कुरान 2:228-229 मे अल्लाह के आदेशानुसार तलाक तीन महीने की अवधि मे किसी भी पल लौटा लेने की पूरी सम्भावना के बावजूद पति पत्नी मे मेल न होने के बाद ही पूर्ण हो सकेगा , इतनी अवधि मे पति द्वारा तलाक के फैसले को प्रभावित करने का अवसर पत्नी के भी पास रहेगा, यानी तलाक एकतरफा और अन्यायपूर्ण न रहेगा ।
इसके बाद भी यदि पूर्ण (तीन बार) तलाक़ दे दिया गया, तो फिर पति पत्नी एकदूसरे के लिए हराम हो जाएंगे और दोबारा उनके विवाह के संयोग को दुर्लभतम बना दिया गया है..!!!
...ये विधान इसलिए ताकि पति पत्नी खूब ध्यान रखें कि अगर सचमुच उन दोनों का साथ जीवन बिताना मुश्किल हो तभी तलाक का फैसला लिया जाए ... वरना तीन महीनों मे पति पत्नी आपस मे बैठकर खूब राय मशविरा कर लें , बहुत मुमकिन है कि विवाह टूटने की नौबत न आए
हलाला के बारे मे ये समझ लिया गया है कि खास हलाला को पूरा करने के मकसद के लिए एक तलाकशुदा औरत की शादी किसी ऐसे आदमी से करवाई जा सकती है जो उससे हमबिस्तरी कर के उसे तलाक देने को राज़ी हो.... जबकि ये तो खुली हरामकारी होगी कि हलाला की आड़ लेकर अनजान मर्द औरत एक रात के शौहर बीवी बनें ....
ऐसी शादी जिसमे किसी औरत के साथ निकाह होने से पहले ही उस औरत को तलाक देने की बात तय कर दी जाए यानी कॉन्ट्रैक्ट पर शादी [ MUTA MARRIAGE ] की जाए ऐसी शादी इस्लाम मे हराम है, ऐसी शादी के हराम होने का बयान और ऐलान बहुत सी अहादीस मे है, जैसे .... सही बुखारी Vol.5/59/527, सही मुस्लिम 8/3259, सही मुस्लिम 8/3260, सही मुस्लिम 8/3262, सही मुस्लिम 8/3263, सही मुस्लिम 8/3264, सही मुस्लिम 8/3265 और अनेक अहादीस .
और कॉन्ट्रैक्ट मैरिज के हराम होने की वजह पवित्र कुरान की आयत 4:24 मे अल्लाह का ये हुक्म है कि ''शादी (मर्द और औरत, दोनों की पाक दामनी यानी यौन शुचिता) पाक दामनी की हिफाज़त करने के लिए करो, न कि नाजायज ढंग से जिस्मानी ताल्लुकात बनाने के लिए ''
हलाला के लिए प्लानिंग कर के किसी औरत से शादी करने वाला व्यक्ति भी न उस औरत के सतीत्व की सुरक्षा करेगा न अपनी, बल्कि उसके दिल मे तो उस औरत के साथ रात गुज़ार कर उससे अलग हो जाने का खयाल ही होगा......
हलाला का अस्ल ये है, कि हलाला को प्लान बिल्कुल नहीं किया जा सकता, बल्कि जब एक बार मर्द अपनी बीवी को पूरी तरह तलाक दे चुका , तो फिर दोबारा से उसी औरत से शादी करना उस आदमी के इख्तियार मे नही रह जाता, वो किसी भी मर्द को इस बात के लिए हायर नहीं कर सकता कि वो उसकी तलाकशुदा से शादी कर के उसे तलाक दे दे, क्योंकि ये हराम है, .
बल्कि अब उसी औरत से दोबारा उसकी शादी बस एक अपवाद की स्थिति में हो सकती है कि उसकी तलाकशुदा बीवी अपना नया घर बसाने के लिए ( हलाला के लिए नहीं ) नई शादी करे , और फिर कभी उसके दूसरे शौहर से भी खुद ही अलगाव हो जाए, या उसके नए शौहर का इंतकाल हो जाए, तब उस हाल में पहला शौहर उसको वापस निकाह का पैग़ाम भेज सकता है, इस खुद ब खुद पैदा हुई सिचुएशन के अलावा कोई सूरत नही है कि तीन तलाक़ों के बाद, उन्ही औरत मर्द की वापस शादी हो सके ....॥
यानी, आप समझ सकते हैं कि अल्लाह के बताए क़ानून के मुताबिक़ हलाला एक लगभग नामुमकिन सिचुएशन है ... इसलिए किसी भी मुस्लिम को ये ख़ास ख्याल रखना ज़रूरी है कि वो तलाक जैसी संगीन बात का फैसला खूब सोच विचार कर ले, तलाक को कभी एक खेल की तरह न खेले, और अगर खूब सोचविचार कर तलाक़ दे चुका, तो फिर उसी बीवी से वापस निकाह का ख्वाब न देखे !!
Zia Imtiyaz
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