Tuesday, 25 May 2021

मस्जिदे अक्सा।

मस्जिद ए अक्सा अथवा बैतुल मुकद्दस इस्लाम की तीसरी सबसे महत्वपूर्ण मस्जिद है, बुखारी शरीफ मे नबी करीम सल्ल. की एक हदीस के अनुसार मस्जिद ए अक्सा मे एक नमाज़ पढ़ने पर 1000 नमाज़ें पढ़ने जितना पुण्य मिलता है ( पहले नम्बर पर काबा शरीफ़ को बताया गया जहाँ एक नमाज़ पढ़ने का सवाब 1,00,000 नमाज़ों जितना, फिर मदीना शरीफ़ स्थित मस्जिद ए नबवी, जहाँ एक नमाज़ का पुण्य 10,000 नमाज़ों जितना, और तीसरे नम्बर पर मस्जिद ए अक्सा है )
ज्ञातव्य हो कि काबा शरीफ को किबला बनाए जाने से पूर्व मुस्लिम कुछ समय तक मस्जिद ए अक्सा की ओर मुंह कर के नमाज़ पढ़ते थे,

एक और हदीस के अनुसार मस्जिद ए अक्सा दुनिया मे बनाई गई इस्लाम की दूसरी मस्जिद है, और इसे इस्लाम की पहली मस्जिद यानि काबा शरीफ़ के बनाए जाने के मात्र 40 वर्ष बाद बनाया गया था ..
फिर इसरा और मेराज की बहुचर्चित घटना मे अल्लाह ने एक ही रात मे नबी सल्ल. को काबा शरीफ़ से बैतुल मुकद्दस की यात्रा कराई थी, इन कारणों से ये मस्जिद मुस्लिमों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है,

यहूदी और ईसाई धर्म ग्रंथों के अनुसार हजरत इब्राहीम अ.स. के बाद कई नबियों ने इस मस्जिद को अपनी इबादतगाह बनाया किन्तु हजरत सुलेमान अ.स. के ज़माने तक यह मस्जिद नष्ट हो चुकी थी और यहूदी धर्म मे कई कुरीतियां बन गईं थीं, हजरत सुलेमान (सोलोमन) ने बैतुल मुकद्दस का पुनर्निर्माण कराया और यहूदी धर्म की कुरीतियों को मिटाया, इसके बाद यहाँ यहूदी साम्राज्य बहुत फला फूला

किन्तु सन् 70 ईस्वी मे रोमनों ने बैतुल मुकद्दस को जलाकर नष्ट कर दिया, और इसे रोमन देवताओं (ज्यूपिटर आदि .) के मन्दिर मे तब्दील कर दिया. 

फिर जब 315 ईस्वी मे रोमन शासक कॉन्सटेण्टाइन ( Constantine ) अपना धर्म परिवर्तन कर के ईसाई बन गया, तो फिर रोमनों ने उस बैतुल मुकद्दस को त्याग दिया जिसे उन्होंने मूर्ति स्थल बना दिया था , और धीरे धीरे इस जगह को यरूशलम के लोगों ने जिनमे यहूदी भी शामिल थे कूडा डालने की जगह बना दिया, उन यहूदियों ने भी बैतुल मुकद्दस को पवित्र स्मारक मानना छोड़ दिया था .

614 ईस्वी मे रोमनों को पारसियों ने पराजित कर दिया, अब यहूदी बिल्कुल आज़ाद थे अपनी मनचाही जगह पर इबादत करने को, पर तब भी यहूदियों ने बैतुल मुकद्दस को इबादत करने के लिए नहीं चुना, हां यरूशलम मे ये भी होता रहा कि अलग अलग साम्राज्यों मे कभी ईसाईयों द्वारा यहूदियों को सताया गया तो कभी यहूदियों द्वारा ईसाईयों को , दोनों ही धर्मों के लोग शांति से जीने के लिए यरोशलम मे उस न्यायप्रिय शासक के आने का इन्तज़ार कर रहे थे जिसकी भविष्यवाणी उनके धर्मग्रंथों मे की गई थी 

उनका ये इन्तज़ार सातवीं शताब्दी मे अरब मे हजरत मोहम्मद सल्ल. के आगमन के उपरांत पूरा हुआ और इस्लाम के दूसरे खलीफा हजरत उमर इब्ने ख़त्ताब रज़ि. के ज़माने मे यरूशलम मे इस्लाम आया, हजरत उमर ने मस्जिद ए अक्सा को यहूदियों की इबादतगाह के कुछ हटकर तामीर करवाया . 
यरूशलम मे मुस्लिमों और एक न्यायप्रिय मुस्लिम शासक के आने से ईसाई और यहूदियों दोनों समुदायों ने बड़ी राहत महसूस की,

ग्यारहवीं शताब्दी मे फिलिस्तीन पर यूरोपीय ईसाईयों ने हमला किया, उन्होंने यहूदियों और मुस्लिमों पर बड़े अत्याचार किए, उन यूरोपीय ईसाईयों ने यहूदियों को उनके मन्दिरों मे जला डाला और मुस्लिमों को मस्जिद ए अक्सा मे जलाकर मारा. बल्कि इन यूरोपीय ईसाईयों ने अरबी ईसाईयों को भी सताने से परहेज़ नही किया , फिलीस्तीन के यहूदी अपनी जान बचाकर स्पेन भाग गए ताकि स्पेन के मुस्लिम शासन का संरक्षण उन्हें मिल जाए ,
सन् 1189 ईस्वी मे इस्लामी फौज के सरदार, हज़रत सलाहुद्दीन अयूबी ने यरूशलम से जालिम यूरोपीय ईसाईयों को निकाल बाहर किया , और यरूशलम मे वापस इस्लामी कानून लागू किया . 
इस इस्लामी शासन मे ईसाई, यहूदी और मुस्लिम सभी बड़ी शांति और मेल मोहब्बत से रहते थे.... सौहार्द की ये स्थिति 19 वीं सदी तक कायम रही जब तक फिलीस्तीन मुस्लिम आटोमन साम्राज्य के अधीन था
1896 में आई थियोडोर हर्ल्ज़ की क़िताब द जेविश स्टेट , जिसमें यहूदी राज्य के गठन की कल्पना की गई थी। हर्ल्ज़ एक यहूदी पत्रकार और लेखक था और वो चाहता था कि यहूदी का अपना राष्ट्र हो... इस किताब से प्रेरणा लेकर एक मकसद के तहत 1897 के पहले ही कुछ यहूदी इस इलाक़े में पहुँचना शुरू हो गए थे. 1903 तक वहाँ 25,000 यहूदी इकट्ठा हो गए थे जिनमें से ज़्यादातर पूर्वी यूरोप से आए थे. उस समय वह इलाक़ा आटोमन साम्राज्य का हिस्सा था और क़रीब पाँच लाख अरबों के साथ यहूदी भी रहने लगे. 1904 और 1914 के बीच और 40 हज़ार अप्रवासी वहाँ पहुँच गए. 1917 पहले विश्व युद्ध के दौरान इस इलाक़े पर तुर्की के आटोमन साम्राज्य का शासन था. इस इलाक़े से तुर्की का नियंत्रण उस समय ख़त्म हुआ जब ब्रिटेन ने आटोमन साम्राज्य को ख़त्म कर दिया. 

अब फिलीस्तीन पर अंग्रेज़ी शासन हो गया और यहूदी यहां यूरोप से आ आकर बसते रहे, जब 15 मई 1948 को ब्रिटेन ने फिलीस्तीन को स्वतंत्र कर देने की घोषणा की तो उसी दिन अनेक सशस्त्र यहूदी आतंकवादियों ने असंख्य निर्दोष फलिस्तीनियों की हत्या कर के यरूशलम पर और फिलिस्तीन के अनेक हिस्सों पर कब्ज़ा कर के ,इस लूटे हुए क्षेत्र को इजरायल नाम दिया ..... तब से लेकर आज तक यरूशलम और फिलीस्तीनी इलाकों पर इज़राइली अतिक्रमण  जारी है, जिन इलाकों को 1948 के बंटवारे में यूएन ने फिलिस्तीन के हिस्से में ही रखा था ... 1967 में यरुशलम को अपने कब्ज़े में करने के बाद से ये इज़राइली आतंकी बार बार मस्जिद ए अक्सा को शहीद करने की कोशिशें करते दिखते हैं, ये वही यहूदी हैं जिनके साथ इतिहास के सम्पूर्ण परिदृश्य मे मुस्लिमों ने सदा भला व्यवहार ही किया, पर इन लोगों ने मुसलमानों को क्या फल दिया ये दुनिया देख रही है..!!

Friday, 30 April 2021

हिन्दू चिता को जलाना।



अपने हिन्दू परिचितों की अर्थी को कान्धा देने और मृतक की अंतिम क्रिया का सामान जुटाने से किसी मुस्लिम को आपत्ति नहीं है... हां कुछ लोग शंका में इसलिये ज़रूर पड़े हुए हैं क्योंकि हदीस मे मुसलमान को मनाही की गई है कि वो किसी व्यक्ति का शरीर आग में जलाए.... 
.... हालांकि बात ये भी है कि इस्लाम की फ़ितरत में बहुत लचक है, और अगर हालात इस तरह बन जाएं कि मुसलमान के अलावा कोई और गैरमुस्लिम की अंतिम क्रिया करने के लिए मौजूद न हो, तिसपर मरने वाला अपने मुसलमान तीमारदारों को ये वसीयत कर गया हो कि मेरी लाश को जलाया ही जाए, तो इन हालात में मुसलमानों के लिए यही सही है कि वो मरने वाले की वसीयत के मुताबिक ही उसकी आख़री रसूमात करें, जैसे कि कश्मीर में होता भी आ रहा है वहां बहुत से बुज़ुर्ग पंडित छूट गए थे जिनकी देखभाल और उनके मरने पर उनकी आखरी रसूमात को अदा करने की ज़िम्मेदारी कश्मीर के मुसलमान निभाते आ रहे हैं...
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..... इधर कोरोना या उसके उसके खौफ़ से मरने वाले हिंदुओं की अंतिम क्रिया करने के लिये कोई हिन्दू मौजूद न हो ऐसा तो नही, लेकिन श्मशानों में भीड़ ज़्यादा होने की वजह से जलाने वालों के फ्री न होने की वजह से शायद मुसलमानों को अपने हिन्दू दोस्तों को जलाना भी खुद ही पड़ रहा है, और एक तरफ तो मुसलमान हदीस के हुक्म से चिंता में हैं, दूसरे भाजपा या कट्टर हिंदूवादी लोगों की ओर से भी उनको आलोचना का निशाना बनाया जा रहा है कि वो हिंदुओं की चिता क्यों जला रहे हैं ??
... ऐसा है तो मैं उम्मीद करता हूँ कि अर्थी को कान्धा देकर मुसलमान उसे शमशान तक ले जाएंगे तो श्मशान में मृतक को मुखाग्नि देने और चिता को पूरी तरह जलाने का काम मृतक के परिजन और डोम राजा कर लेंगे, .... यूँ भी इस बीच भाजपा सदस्य और भी अन्य लोग ये कह चुके हैं कि मुस्लिमों को श्मशान में प्रवेश नही करने देना चाहिए, तो वो लोग श्मशान के अंदर की व्यवस्था को भी खुद सम्हालने का प्रबंध करें, और मुस्लिमों को ऐसी ज़िम्मेदारी से मुक्त करें जो न चाहते हुए भी उन पर पड़ गई है
~ ज़िया इम्तियाज़।

Thursday, 29 April 2021

असहाबे कहफ़ की आयु।

क्या वास्तव में इंसान 309 वर्षों तक सो सकता है?

असहाबे कहफ़ (कुरान में वर्णित एक घटना) की वैज्ञानिक व्याख्या
हाइबरनेशन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा दुनिया भर में लगभग दो हजार अलग-अलग किस्म के जीव कठोर मौसम, ख़ुराक की कमी और मृत्यु के भय से बचने के लिए लम्बे वक्त के लिये सो जाते हैं । उनके कोशिकाओं के जीन ऐसे भय और खतरों से वाकिफ हो जाते हैं, और हाइबरनेशन नामक एक बहुत लंबी नींद उनपर तारी कर देते हैं। इस प्रक्रिया के दौरान उनके दिल की धड़कन 95 फ़ीसदी तक धीमी हो जाती है, सांस सेकेंडो की बजाय मिनटों की रफ़्तार पर आ जाती है, शरीर का तापमान कम होकर ठंडा हो जाता है, और वो जीव अपने शरीर की पोषण की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए अपने जिस्म की चर्बी और मांसपेशियों पर निर्भर हो जाता है,
अपने जिस्म की चर्बी से पोषण और ऊर्जा प्राप्त करने की इस प्रक्रिया को मेटाबॉलिज़्म या चयापचय कहा जाता है । कुल मिलाकर आप ये कह सकते हैं कि हाइबरनेशन के दौरान एक जानदार के चयापचय की गति बेहद धीमी हो जाती है... हाइबरनेट करने वाले जानवरों में कई क़िस्म के चूहे, चमगादड़, गिलहरियाँ, लँगूर, कुछ पंछियों की नस्लें, साँपों की कई क़िस्में, कई कीड़े और रीछ वगैरह शामिल हैं !
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हाइबरनेशन में जानवर अंदर चर्बी बनाने के लिए भरपूर खाते हैं जिससे हाइबरनेशन में ऊर्जा मिलेगी । हायबर्नेशन में कुछ महीनों रहने के बाद उठने पर जानवर को ज़ोरों की भूख लगने लगटी है, और हाइबरनेशन से उठने के बाद सबसे पहला काम वे जानवर शिकार को ढूंढने का करते हैं ।
सामान्यतः हाइबरनेशन सर्दियों से बचने के लिए किया जाता है और इस मौसम में शिकार भी कम हो जाता है इसलिए जानवर ज़िंदा रहने के लिए लम्बी नींद में सो जाते हैं । अब तक का सबसे लंबा हाइबरनेशन उस चमगादड़ का है जो लगभग 344 दिन तक बिना खाए या पिये सोया रहा था ।
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विज्ञान ये भी साबित करता है कि टेलोमेरेस (Telomeres), जो डीएनए के टुकड़े हैं और सेल के गुणसूत्र के किनारों पर हैं, कोशिकाओं के प्रत्येक विभाजन के वक्त इन में कमी आती है और प्रयोगशाला में उनकी संख्याओं की जांच करके जानवर की बाक़ी उम्र का अनुमान लगाया जा सकता है लेकिन हाइबर्नेशन के दौरान वे बेहद धीमी गति से घटते हुए देखे गए हैं । सरल शब्दों  कह सकते हैं कि हाइबर्नेशन के दौरान जानवरों की उम्र बढ़ना लगभग बंद हो जाती है ।
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एक हॉलीवुड फिल्म जिसका नाम पैसेंजर है । फिल्मी कहानी की थीम यह है कि 5000 लोगों और 258 अंतरिक्ष यान के मज़दूरों का समूह एक नए ग्रह होमस्टेड-2 पर जा रहा है, क्योंकि ये नया ग्रह पृथ्वी से 120 प्रकाशवर्ष दूर है तो इंसान के लिए अपनी सामान्य आयु में वहां पहुँच पाना मुश्किल है, क्योंकि सामान्य आयु में वह मुश्किल से सत्तर या अस्सी वर्ष की उम्र जी सकता है ... इसके लिये वैज्ञानिकों ने ऐसे ट्यूब बनाए हैं जिसमें हर किसी को हाइबरनेट किया जाता है ताकि उसकी उम्र बढ़ने की रफ़्तार बेहद मद्धिम हो सके, और 120 साल बीत जाएं और वे एक नए ग्रह पर नई जिंदगी जीने के लिये उतर जाएं। लेकिन उनमें से एक आदमी किसी ख़राबी के कारण जाग जाता है और उसेब पता चलता है कि नए ग्रह पर पहुंचने के लिए अभी तो अस्सी साल और बाक़ी हैं,
तो यहाँ से फिर से हाइबरनेट होने के लिए उसके संघर्ष पर फिल्म शुरू होती है
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अब कुरान के सूरह कहफ के इन कुछ वाक्यों पर विचार करें:
.. फिर हमने उस गुफा में कई वर्षो के लिए उनके कानों पर परदा डाल दिया (11)
और तुम सूर्य को उसके उदित होते समय देखते तो दिखाई देता कि वह उनकी गुफा से दाहिनी ओर को बचकर निकल जाता है और जब अस्त होता है तो उनकी बाई ओर से कतराकर निकल जाता है। और वे है कि उस (गुफा) के एक विस्तृत स्थान में हैं। यह अल्लाह की निशानियों में से है। जिसे अल्लाह मार्ग दिखाए, वही मार्ग पानेवाला है और जिसे वह भटकता छोड़ दे उसका तुम कोई सहायक मार्गदर्शक कदापि न पाओगे (17)
और तुम समझते कि वे जाग रहे है, हालाँकि वे सोए हुए होते। हम उन्हें दाएँ और बाएँ फेरते और उनका कुत्ता ड्योढ़ी पर अपनी दोनों भुजाएँ फैलाए हुए होता। यदि तुम उन्हें कहीं झाँककर देखते तो उनके पास से उलटे पाँव भाग खड़े होते और तुममें उसका भय समा जाता (18)
और इसी तरह हमने उन्हें उठा खड़ा किया कि वे आपस में पूछताछ करें। उनमें एक कहनेवाले ने कहा, "तुम कितना ठहरे रहे?" वे बोले, "हम यही कोई एक दिन या एक दिन से भी कम ठहरें होंगे।" उन्होंने कहा, "जितना तुम यहाँ ठहरे हो उसे तुम्हारा रब ही भली-भाँति जानता है। अब अपने में से किसी को यह चाँदी का सिक्का देकर नगर की ओर भेजो। फिर वह देख ले कि उसमें सबसे अच्छा खाना किस जगह मिलता है। तो उसमें से वह तुम्हारे लिए कुछ खाने को ले आए और चाहिए की वह नरमी और होशियारी से काम ले और किसी को तुम्हारी ख़बर न होने दे (19)
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विज्ञान कहता है कि हाइबरनेशन के दौरान जानदारों के शरीर के कई अंग काम करना बंद कर देते हैं ।
बाहर का तापमान कितना भी हो, दुनिया में अधिकतर गुफाओं का तापमान साल भर एक सा रहता है । असहाबे कहफ का पहला कदम एक गुफा में जाना था । उसके बाद कुरआन ने कहा कि अल्लाह उन लोगों के कानों पर नींद का पर्दा डाल दिया, यहां वास्तव में हमारे अंदर के कान के हिस्से की बात हो सकती है कि हमारे कान किसी तेज आवाज़ की वजह से मस्तिष्क को संकेत भेजते हैं और मस्तिष्क हमें जगा देता है लेकिन असहाबे कहफ़ के मामले में वह कान का हिस्सा पूरी तरह से निष्क्रिय हो गया था
फिर अगर सूर्य की रोशनी गुफा में गिरती तो गुफा का तापमान बढ़ जाता, जिससे असहाब की नींद टूट सकती थी... दूसरे, त्वचा पर सूर्य की किरणों के पड़ने से शरीर में फ्री रेडिकल अणुओं की वृद्धि होती है जिससे मनुष्य की आयु बढ़ने लगती है । लेकिन कुरान कहता है कि सूर्योदय और सूर्यास्त के समय, सूरज गुफा के सामने नहीं आता था, ये बात कहानी को एक दिलचस्प अवस्था में ले जाती है । (मतलब गुफा हर समय ठंडी थी)
... विज्ञान का मानना है कि अगर सोता हुआ व्यक्ति लंबे समय तक अपना करवट नहीं बदलता है, तो उसे ब्लड सर्कुलेशन रुकने पर शरीर पर बड़े बड़े ज़ख्मों के होने की बीमारी हो सकती है जिसे प्रेशर अल्सर कहा जाता है लेकिन कुरान कहता है कि असहाबे कहफ़ को नियमित रूप से करवटें बदलाई जाती रहीं (इसलिए वह इस बीमारी से सुरक्षित रहे)
साइंस कहती है कि बहुत लंबे समय तक आँखों को बंद  करके रखना हानिकारक होता है, इसकी वजह से आंखों की ऑप्टिक नर्व को नुकसान पहुँचता है और आदमी अंधा हो सकता है, जबकि लम्बे समय तक आंखें खुली रखने पर भी आंखों का कॉर्निया खराब होने का खतरा पैदा होता है । कोमा के अधिकांश मरीज अगर लौटते हैं तो आंखों की बीमारियों से ग्रस्त होते हैं । अब तो ज़ाहिर है कि इतनी देर तक सोने के लिए नियमित रूप से आँखें फड़कती रहनी जरूरी है ताकि वे नज़रें बर्बाद होने से बच सकें । कुरान कहता है कि तुम उन्हें देखते तो सोचते कि वे जाग रहे हैं (मतलब वे पलक झपक रहे थे) जबकि वे सो रहे थे, और तुम उनसे आतंकित होकर भाग खड़े होते ... जाहिर है अगर आप किसी ऐसे शख़्स को देखते जो कुछ सुनता नही लेकिन आंखें झपक रहा है, ये देखकर आपको डर ही लगेगा, और आप वहां से भागने में ही भलाई समझेंगे,
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आश्चर्य है कि विज्ञान कहता है कि हाइब्रेशन में एक जीवित प्राणी अपने शरीर की ऊर्जा का एक बड़ा हिस्सा इस्तेमाल करता है और जैसे ही वह हाइबरनेशन से बाहर आता है वह तेज भूख की वजह से शिकार करना शुरू कर देता है, कुरान कहता है कि जैसे ही असहाबे कहफ़ नींद से उठते हैं उनमें से एक शख्स दूसरे से कहता है कि "बाज़ार जाकर सबसे अच्छा खाना ले आओ" ।
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इन सभी बिंदुओं से साबित होता है कि कहफ के लोगों ने ह्यूमन हिबर्नेशन की टेक्नोलॉजी हासिल कर ली थी जो दी पैसेंजर मूवी में दिखाई गई थी । अब यह कैसे संभव है ..?? क्या उन्होंने अपने शरीर में किसी भी फल या जड़ी बूटी या किसी जानवर से, जो गुफा में हाइबरनेट कर रहा था कुछ खास चीज़ हासिल की  ये बात अल्लाह बेहतर जानता है... लेकिन कुरान की इस सूरह के कुछ वाक्यों की जांच करने के लिए मैं नासा और अन्य संस्थानों को आमंत्रित करता हूं जो हाइबरनेशन को इस्तेमाल करने के लिये (अंतरिक्ष में जाने के लिये या रोगियों का इलाज करने के लिए) शोध कर रहे हैं । आइए गौर करें और देखें क्या वजह है कि कहफ के साथी इतने देर तक सोते रहे ।
तीन सौ सोलर ईयर को गूगल में लिखकर ल्युनर ईयर (चन्द्रवर्ष) बना दो तो 309 साल बनेंगे । कुरान कहता है:
′′ और असहाबे कहफ़ 9 बरस ऊपर, तीन सौ साल तक अपनी गुफा में रहे ′′
सुब्हान अल्लाह, क्या आँकड़े और ज्ञान है मेरे रब का । ये कुछ जवान थे बाकी राज्य गुमराह था और राजा क्रूर था जो इन्हें पत्थरों से मार डालना चाहता था लेकिन जब इन युवकों ने अल्लाह पर भरोसा किया तो अल्लाह उनके लिए एक रास्ता खोज लिया । और हमारे लिए इसमें एक सबक छोड़ दिया ।
तुर्की के तरसस शहर में एक गुफा है, जिसे असहाबे कहफ की गुफा माना जाता है । असहाबे कहफ की घटना ईसाई धार्मिक पुस्तकों और रोमन इतिहास में भी सेवन स्लीपर के रूप में मौजूद है । लेकिन कुरान ने जो विज्ञान के अनुसार पूरी तरह से वर्णित किया है वह किसी किताब में नहीं मिलता ।
#سائینس_اصحاب_کہف
#اصحاب_کہف_عظیم_معلومات
द्वारा लिखित: @ azeem latif

AB Razique Khan भाई हाइबरनेशन करने वाले जानदार मेनली बर्फीले क्षेत्रों में होते हैं.... और आप जानते हैं क़ुरआन में असहाबे कहफ़ की गार की जो डायरेक्शन बताई गई है, वो किसी पोलर एरिया के पास की मालूम होती है, यानी ज़मीन का वो हिस्सा जो हमेशा बर्फ़ से ढका रहता है
चंद महीने पहले मैंने इस पर पोस्ट की थी, पढ़ियेगा https://mbasic.facebook.com/photo.php?fbid=4691547940915368&id=100001806268310&set=a.360259397377599&source=56

सिल्वेस्टर स्टालिन की भी मूवी है डेमोलिशन मैन उसमे भी बर्फ में में पैक करके वो काफी सालों आगे वाली दुनिया मे निकलते हैं ।

Friday, 23 April 2021

औरंगज़ेब।

मंदिर-मस्जिद पर औरंगजेब का अनोखा पहलू
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निःसंदेह इतिहास से यह प्रमाणित होता हैं कि औरंगजेब ने बनारस के विश्वनाथ मन्दिर और गोलकुण्डा की जामा-मस्जिद को ढहा देने का आदेश दिया था, परन्तु इसका कारण कुछ और ही था। विश्वनाथ मन्दिर के सिलसिले में घटनाक्रम यह बयान किया जाता है कि जब औरंगज़ेब बंगाल जाते हुए बनारस के पास से गुज़र रहा था, तो उसके काफिले में शामिल हिन्दू राजाओं ने बादशाह से निवेदन किया कि यदि यह क़ाफ़िला एक दिन ठहर जाए तो उनकी रानियां बनारस जा कर गंगा नदी में स्नान कर लेंगी और विश्वनाथ मन्दिर में श्रद्धा सुमन भी अर्पित कर आएँगी। औरंगज़ेब ने तुरंत ही यह निवेदन स्वीकार कर लिया और क़ाफिले के पडा़व से बनारस तक पांच मील के रास्ते पर फ़ौजी पहरा बैठा दिया। रानियां पालकियों में सवार होकर गईं और स्नान एवं पूजा के बाद वापस आ गईं, परन्तु एक रानी (कच्छ की महारानी) वापस नहीं आई, तो उनकी बड़ी तलाश हुई, लेकिन पता नहीं चल सका। जब औरंगजै़ब को मालूम हुआ तो उसे बहुत गुस्सा आया और उसने अपने फ़ौज के बड़े-बड़े अफ़सरों को तलाश के लिए भेजा। आखिर में उन अफ़सरों ने मंदिर में देखा कि गणेश की मूर्ति जो दीवार में जड़ी हुई है, हिलती है। उन्होंने मूर्ति हटवा कर देखा तो तहखाने की सीढ़ी मिली और गुमशुदा रानी उसी में पड़ी रो रही थी। उसकी इज़्ज़त भी लूटी गई थी और उसके आभूषण भी छीन लिए गए थे। यह तहखाना विश्वनाथ मूर्ति के ठीक नीचे था। राजाओं ने इस हरकत पर अपनी नाराज़गी जताई और विरोध प्रकट किया। चूंकि यह बहुत घिनौना अपराध था, इसलिए उन्होंने कड़ी से कड़ी कार्रवाई करने की मांग की। उनकी मांग पर औरंगज़ेब ने आदेश दिया कि चूंकि पवित्र-स्थल को अपवित्र किया जा चुका है। अतः विश्वनाथ की मूर्ति को कहीं और ले जाकर स्थापित कर दिया जाए और मन्दिर को गिरा कर ज़मीन को बराबर कर दिया जाय और महंत को गिरफ्तार कर लिया जाए। डॉ. पट्टाभि सीतारमैया ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘द फ़ेदर्स एण्ड द स्टोन्स’ मे इस घटना को दस्तावेजों के आधार पर प्रमाणित किया है। पटना म्यूज़ियम के पूर्व क्यूरेटर डॉ. पी. एल. गुप्ता ने भी इस घटना की पुष्टि की है।
  गोलकुण्डा (हैदराबाद) की जामा-मस्जिद की घटना यह है कि वहां के राजा जो तानाशाह के नाम से प्रसिद्ध थे, रियासत की मालगुज़ारी वसूल करने के बाद दिल्ली का हिस्सा नहीं भेजते थे। कुछ ही वर्षों में यह रक़म करोड़ों की हो गई। तानाशाह ने यह ख़ज़ाना एक जगह ज़मीन में दबा कर उस पर मस्जिद बनवा दी। जब औरंज़ेब को इसका पता चला तो उसने आदेश दिया कि यह मस्जिद गिरा दी जाए और गड़ा हुआ खज़ाना निकाल कर उसे जन-कल्याण के कामों में ख़र्च किया गया। यह दोनों मिसालें यह साबित करने के लिए काफ़ी हैं कि औरंगज़ेब न्याय के मामले में मन्दिर और मस्जिद में कोई फ़र्क़ नहीं समझता था। ‘‘दुर्भाग्य से मध्यकाल और आधुनिक काल के भारतीय इतिहास की घटनाओं एवं चरित्रों को इस प्रकार तोड़- मरोड़ कर मनगढंत अंदाज़ में पेश किया जाता रहा है कि झूठ ही ईश्वरीय आदेश की सच्चाई की तरह स्वीकार किया जाने लगा और उन लोगों को दोषी ठहराया जाने लगा जो तथ्य और मनगढंत बातों में अन्तर करते हैं। आज भी स्वार्थी एवं सांप्रदायिक तत्व इतिहास को तोड़ने -मरोड़ने व उसे गलत रंग देने में लगे हुए हैं।
   [साभार: इतिहास के साथ यह अन्याय!!: प्रकाशक - E -20 मधुर संदेश संगम, अबुल फज़्ल इन्कलेव, नई दिल्ली- 25, लेखक - प्रो. बिशम्भर नाथ (बी.एन.) पाण्डेय, पूर्व राज्यपाल उडीसा, (17.08. 1983- 20.11.1988), राज्य सभा सदस्य (25.11. 1988- 24.11. 1994 : मनोनीत), पूर्व चेयरमैन - इलाहाबाद नगरपालिका (1948- 1953), पद्मश्री पुरस्कृत -1976 (समाज कार्य) एवं इतिहासकार]
https://youtu.be/CvSTMDx1QjU

सनातनी ग्रंथो में आतंक व हिंसा।

श्री यति नरसिंहानंद सरस्वती 

【भारतीय धर्म  ग्रंथों मार काट की शिक्षा।  】

निरंतर मुसलमानो , क़ुरआन और नबी सलल्लाहुअलैहिवस की जात को निशाना बनाया जा रहा है और सत्ता के संरक्ष्ण में अशोभनीय भाषा का निरंतर प्रयोग किया जा रहा है आपने क़ुरआन को गुंडों की किताब , जिहादियों की किताब मारकाट की किताब कहा है।  
उच्च शिक्षा ग्रहण करने बाद भी आपको इतना ज्ञान नहीं है कि जब कोई बात सामने आती है तो ये देखा जाता है कि वह किस परिपेक्ष्य में कही गयी है । 
क़ुरआन में जो आयात मार क़ाट से संबंधित हैं वह प्रशासनिक आदेश एवं युद्ध संबन्धित हैं अतः क़ुरआन तो  यह शिक्षा देता है कि यदि किसी व्यक्ति ने किसी एक कि जान बचाई तो उसने समस्त मानव जाति की जान बचाने का कार्य किया । 
बेहतर होता कि आप स्वच्छ हृदय से क़ुरआन का अध्यन करते । 

【क्या ये भी गुंडों वाली किताबें हैं ?】
स्वामी जी अब आप बताइए कि आपके इन धर्म ग्रंथों में जो मार काट खून खराबे की शिक्षा दी गयी है ये कौन से गुण्डई की शिक्षा है
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स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि।
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते॥

अर्थात "अपने धर्म को देखकर भी तू भय करने योग्य नहीं है  तुझे भय नहीं करना चाहिए क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी कर्तव्य नहीं है"    (भगवतगीता अध्याय 2 शलोक 31)

यदृच्छया चोपपन्नां स्वर्गद्वारमपावृतम्‌।
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्‌॥

हे पार्थ! अपने-आप प्राप्त हुए और खुले हुए स्वर्ग के द्वार रूप इस प्रकार के युद्ध को भाग्यवान क्षत्रिय लोग ही पाते हैं
(भगवतगीता अध्याय 2 शलोक 32)

अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं सङ्‍ग्रामं न करिष्यसि।
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि॥

"किन्तु यदि तू इस धर्मयुक्त युद्ध को नहीं करेगा तो स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त होगा" 
(भगवतगीता अध्याय 2 शलोक 33) 

【वेदनिन्दकों को मारने की शिक्षा 】

अथर्ववेद 12/5/62 का उदहारण देते हुए कहता है कि ,” तू वेदनिंदक को काट डाल, चीर डाल,फाड़ दे, जला दे, फूंक दे, भस्म कर दे।”

अथर्ववेद 12/5/68 कहता है कि 

“वेद विरोधी के लोगों को काट डाल, उसके मांस के टुकड़ों की बोटी बोटी कर दे, उसके नसों को ऐंठ दे, उसकी हड्डियां मिसल कर, उसकी मिंग निकाल दे, उसके सब अंगों को, जोड़ों को ढीला कर दे।”

(धार्मिक ग्रंथों मैं नीच जाति के नाम पर शूद्रों पर अत्याचार)
 
1. ब्राह्मण को कठोर वचन कहने वाले शूद्र को शारीरिक दंड देना चाहिए(मनुस्मृति,२-७८,)

2. यदि कोई शूद्र द्धिज(ब्राह्मण,क्षत्रिय,वेश्य) को गली दे तो राजा उसके मूंह मैं दस उँगल की गरम सलाखें उसके मूंह मैं घुसेड़ दे और अगर ब्राह्मण के सामने पाद दे तो उसका लिंग एवं चूतड़ कटवा दे।
 (मनुस्मृति,2,270-282)

3. शील रहित ब्राह्मण पूजनीय होता है।
 (परासर स्मृति,192)

4. परन्तु शुद्र ब्रह्नमा के चरणों से पैदा हुआ है इसलिए हरहाल मैं नीच है। 

5. शूद्र पुराने वस्त्र पहने और अपनी ही स्त्री से प्रेम करे और पराइ स्त्री से परहेज़ कर और यदि वासना तृप्ति हेतु अगर कोई ब्राह्मण शूद्र की पत्नी से संम्भोग करे तो उसे कोई पाप नही लगता
 (बोद्ध्ययन स्मृति एवं  मनु स्मृति 3-12)  

6. ब्राह्मण की झूठन ही शूद्र को कुत्ते की तरह ज़मीन गिरा कर और पत्तल को चटवाने के लिए देना चाहिए। (मनु,3-246,याज्ञवाल्क्य-103)

7.धर्म ग्रंथों मैं शूद्रो को हर प्रकार की शिक्षा  दिक्षा मना है यदि कोई धर्मोपदेश भी दे वेह नरक का अधिकारी होगा 
(मनु,4-48)

7.ऐसा इसलिए है क्यों कि 
"एक्मॆवयु शूद्रस्य: प्रभु: कर्म समादिशत्।
एतेषामेव वर्णाना शुस्रुशामंसूय्या।।

अर्थात "प्रभु ने शूद्र के लिए केवल एक ही कर्म निश्चित किया है कि वेह तीनों वर्णों अर्थात ब्राह्मण क्षत्रिय एवं वेश्य की सेवा करे।"

9.यदि शूद्र का स्वामी उसे दास कर्म से मुक्त भी कर देता है तो उसे दास ही समझा जायेगा।  (मनु,8-444)

तो स्वामी जी इन के।आधार पर बताइये कि आप को ये धर्म ग्रंथ कौनसी गुंडागर्दी की शिक्षा देते हैं ।।
श्री यति नरसिंहानंद सरस्वती  जिनके घर शीशे के होतव हैं वो दूसरों के घरों में पत्थर नहीं मारा करते । 

#अहसन #फ़िरोज़ाबादी





नियोग।



नियोग और नारी 

सत्यार्थ प्रकाश’ के चतुर्थ समुल्लास 
 अगर किसी पुरुष की स्त्री मर गई है और उसके कोई संतान नहीं है तो वह पुरुष किसी नियुक्त विधवा स्त्री से यौन संबंध स्थापित कर संतान उत्पन्न कर सकता है। गर्भ स्थिति के निश्चय हो जाने पर नियुक्त स्त्री और पुरुष के संबंध खत्म हो जाएंगे और नियुक्ता स्त्री दो-तीन वर्ष तक लड़के का पालन करके नियुक्त पुरुष को दे देगी। ऐसे एक विधवा स्त्री दो अपने लिए और दो-दो चार अन्य पुरुषों के लिए अर्थात कुल 10 पुत्र उत्पन्न कर सकती है। (यहाँ यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि यदि कन्या उत्पन्न होती है तो नियोग की क्या ‘शर्ते रहेगी ?) इसी प्रकार एक विधुर दो अपने लिए और दो-दो चार अन्य विधवाओं के लिए पुत्र उत्पन्न कर सकता है। ऐसे मिलकर 10-10 संतानोत्पत्ति की आज्ञा वेद में है।
इमां त्वमिन्द्र मीढ्वः सुपुत्रां सुभगां कृणु।
दशास्यां पुत्राना धेहि पतिमेकादशं कृधि।
(ऋग्वेद 10-85-45)
भावार्थ ः ‘‘हे वीर्य सेचन हार ‘शक्तिशाली वर! तू इस विवाहित स्त्री या विधवा स्त्रियों को श्रेष्ठ पुत्र और सौभाग्य युक्त कर। इस विवाहित स्त्री से दस पुत्र उत्पन्न कर और ग्यारहवीं स्त्री को मान। हे स्त्री! तू भी विवाहित पुरुष या नियुक्त पुरुषों से दस संतान उत्पन्न कर और ग्यारहवें पति को समझ।’’ (4-125)

वेद की आज्ञा है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्णस्थ स्त्री और पुरुष दस से अधिक संतान उत्पन्न न करें, क्योंकि अधिक करने से संतान निर्बल, निर्बुद्धि और अल्पायु होती है। जैसा कि उक्त मंत्र से स्पष्ट है कि नियोग की व्यवस्था केवल विधवा और विधुर स्त्री और पुरुषों के लिए नहीं है बल्कि पति के जीते जी पत्नी और पत्नी के जीते जी पुरुष इसका भरपूर लाभ उठा सकते हैं। (4-143)

आ घा ता गच्छानुत्तरा युगानि यत्र जामयः कृराावन्नजामि।
उप बर्बृहि वृषभाय बाहुमन्यमिच्छस्व सुभगे पति मत्।
(ऋग्वेद 10-10-10)
भावार्थ ः ‘‘नपुंसक पति कहता है कि हे देवि! तू मुझ से संतानोत्पत्ति की आशा मत कर। हे सौभाग्यशालिनी! तू किसी वीर्यवान पुरुष के बाहु का सहारा ले। तू मुझ को छोड़कर अन्य पति की इच्छा कर।’’
इसी प्रकार संतानोत्पत्ति में असमर्थ स्त्री भी अपने पति महाशय को आज्ञा दे कि हे स्वामी! आप संतानोत्पत्ति की इच्छा मुझ से छोड़कर किसी दूसरी विधवा स्त्री से नियोग करके संतानोत्पत्ति कीजिए।

अगर किसी स्त्री का पति व्यापार आदि के लिए परदेश गया हो तो तीन वर्ष, विद्या के लिए गया हो तो छह वर्ष और अगर धर्म के लिए गया हो तो आठ वर्ष इंतजार कर वह स्त्री भी नियोग द्वारा संतान उत्पन्न कर सकती है। ऐसे ही कुछ नियम पुरुषों के लिए हैं कि अगर संतान न हो तो आठवें, संतान होकर मर जाए तो दसवें और कन्या ही हो तो ग्यारहवें वर्ष अन्य स्त्री से नियोग द्वारा संतान उत्पन्न कर सकता है। पुरुष अप्रिय बोलने वाली पत्नी को छोड़कर दूसरी स्त्री से नियोग का लाभ ले सकता है। ऐसा ही नियम स्त्री के लिए है। (4-145)

प्रश्न सं0 149 में लिखा है कि अगर स्त्री गर्भवती हो और पुरुष से न रहा जाए और पुरुष दीर्घरोगी हो और स्त्री से न रहा जाए तो ऐसी स्थिति में दोनों किसी से नियोग कर पुत्रोत्पत्ति कर ले, परन्तु वेश्यागमन अथवा व्यभिचार कभी न करें। (4-149)
लिखा है कि नियोग अपने वर्ण में अथवा उत्तम वर्ण और जाति में होना चाहिए। एक स्त्री 10 पुरुषों तक और एक पुरुष 10 स्त्रियों तक से नियोग कर सकता है। अगर कोई स्त्री अथवा पुरुष 10वें गर्भ से अधिक समागम करे तो कामी और निंदित होते हैं। (4-142) विवाहित पुरुष कुंवारी कन्या से और विवाहित स्त्री कुंवारे पुरुष से नियोग नहीं कर सकती।
पुनर्विवाह और नियोग से संबंधित कुछ नियम, कानून, ‘शर्ते और सिद्धांत आपने पढ़े जिनका प्रतिपादन स्वामी दयानंद ने किया है और जिनको कथित लेखक ने वेद, मनुस्मृति आदि ग्रंथों से सत्य, प्रमाणित और न्यायोचित भी साबित किया है। व्यावहारिक पुष्टि हेतु कुछ ऐतिहासिक प्रमाण भी कथित लेखक ने प्रस्तुत किए हैं और साथ-साथ नियोग की खूबियां भी बयान की हैं। इस कुप्रथा को धर्मानुकूल और न्यायोचित साबित करने के लिए लेखक ने बौद्धिकता और तार्किकता का भी सहारा लिया है। कथित सुधारक ने आज के वातावरण में भी पुनर्विवाह को दोषपूर्ण और नियोग को तर्कसंगत और उचित ठहराया है। आइए उक्त धारणा का तथ्यपरक विश्लेषण करते हैं।
ऊपर (4-134) में पुनर्विवाह के जो दोष स्वामी दयानंद ने गिनवाए हैं वे सभी हास्यास्पद, बचकाने और मूर्खतापूर्ण हैं। विद्वान लेखक ने जैसा लिखा है कि दूसरा विवाह करने से स्त्री का पतिव्रत धर्म और पुरुष का स्त्रीव्रत धर्म नष्ट हो जाता है परन्तु नियोग करने से दोनों का उक्त धर्म ‘शुद्ध और सुरक्षित रहता है। क्या यह तर्क मूर्खतापूर्ण नहीं है ? आख़िर वह कैसा पतिव्रत धर्म है जो पुनर्विवाह करने से तो नष्ट और भ्रष्ट हो जाएगा और 10 गैर पुरुषों से यौन संबंध बना बनाने से सुरक्षित और निर्दोष रहेगा ?

अगर किसी पुरुष की पत्नी जीवित है और किसी कारण पुरुष संतान उत्पन्न करने में असमर्थ है तो इसका मतलब यह तो हरगिज़ नहीं है कि उस पुरुष में काम इच्छा ;ैमगनंस कमेपतम) नहीं है। अगर पुरुष के अन्दर काम इच्छा तो है मगर संतान उत्पन्न नहीं हो रही है और उसकी पत्नी संतान के लिए किसी अन्य पुरुष से नियोग करती है तो ऐसी स्थिति में पुरुष अपनी काम तृप्ति कहाँ और कैसे करेगा ? यहाँ यह भी विचारणीय है कि नियोग प्रथा में हर जगह पुत्रोत्पत्ति की बात कही गई है, जबकि जीव विज्ञान के अनुसार 50 प्रतिशत संभावना कन्या जन्म की होती है। कन्या उत्पन्न होने की स्थिति में नियोग के क्या नियम, कानून और ‘शर्ते होंगी, यह स्पष्ट नहीं किया गया है ?

जैसा कि स्वामी जी ने कहा है कि अगर किसी स्त्री के बार-बार कन्या ही उत्पन्न हो तो भी पुरुष नियोग द्वारा पुत्र उत्पन्न कर सकता है। यहाँ यह तथ्य विचारणीय है कि अगर किसी स्त्री के बार-बार कन्या ही उत्पन्न हो तो इसके लिए स्त्री नहीं, पुरुष जिम्मेदार है। यह एक वैज्ञानिक तथ्य है कि मानव जाति में लिंग का निर्धारण नर द्वारा होता है न कि मादा द्वारा।
यह भी एक तथ्य है कि पुनर्विवाह के दोष और हानियाँ तथा नियोग के गुण और लाभ का उल्लेख केवल द्विज वर्णों, ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के लिए किया गया है। चैथे वर्ण ‘शूद्र को छोड़ दिया गया है। क्या ‘शुद्रों के लिए नियोग की अनुमति नहीं है ? क्या ‘शूद्रों के लिए नियोग की व्यवस्था दोषपूर्ण और पाप है ?
जैसा कि लिखा है कि अगर पत्नी अथवा पति अप्रिय बोले तो भी वे नियोग कर सकते हैं। अगर किसी पुरुष की पत्नी गर्भवती हो और पुरुष से न रहा जाए अथवा पति दीर्घरोगी हो और स्त्री से न रहा जाए तो दोनों कहीं उचित साथी देखकर नियोग कर सकते हैं। क्या यहाँ सारे नियमों और नैतिक मान्यताओं को लॉकअप में बन्द नहीं कर दिया गया है ? क्या नियोग का मतलब स्वच्छंद यौन संबंधों ;ैमग थ्तमम) से नहीं है ? क्या इससे निम्न और घटिया किसी समाज की कल्पना की जा सकती है? 


पर्दा।

क्या इस्लाम औरतों को पर्दे में रखकर उनका अपमान करता है ? …

» उत्तर : इस्लाम में औरतों की जो स्थिति है, उसपर सेक्यूलर मीडिया का ज़बरदस्त हमला होता है। वे पर्दे और इस्लामी लिबास को इस्लामी क़ानून में स्त्रियों की दासता के तर्क के रूप में पेश करते हैं। इससे पहले कि हम पर्दे के धार्मिक निर्देश के पीछे मौजूद कारणों पर विचार करें, इस्लाम से पूर्व समाज में स्त्रियों की स्थिति का अध्ययन करते हैं।

1. भूतकाल में स्त्रियों का अपमान किया जाता और उनका प्रयोग केवल काम-वासना के लिए किया जाता था। इतिहास से लिए गए निम्न उदाहरण इस तथ्य की पूर्ण रूप से व्याख्या करते हैं कि आदिकाल की सभ्यता में औरतों का स्थान इस सीमा तक गिरा हुआ था कि उनको प्राथमिक मानव सम्मान तक नहीं दिया जाता था—

(क) बेबिलोनिया सभ्यता –
औरतें अपमानित की जातीं थीं, और बेबिलोनिया के क़ानून में उनको हर हक़ और अधिकार से वंचित रखा जाता था। यदि एक व्यक्ति किसी औरत की हत्या कर देता तो उसको दंड देने के बजाय उसकी पत्नी को मौत के घाट उतार दिया जाता था।

(ख) यूनानी सभ्यता –
इस सभ्यता को प्राचीन सभ्यताओं में अत्यन्त श्रेष्ठ माना जाता है। इस ‘अत्यंत श्रेष्ठ’ व्यवस्था के अनुसार औरतों को सभी अधिकारों से वंचित रखा जाता था और वे नीच वस्तु के रूप में देखी जाती थीं। यूनानी देवगाथा में ‘‘पांडोरा’’ नाम की एक काल्पनिक स्त्री पूरी मानवजाति के दुखों की जड़ मानी जाती है। यूनानी लोग स्त्रियों को पुरुषों के मुक़ाबले में तुच्छ जाति मानते थे।
यद्यपि उनकी पवित्रता अमूल्य थी और उनका सम्मान किया जाता था, परंतु बाद में यूनानी लोग अहंकार और काम-वासना में लिप्त हो गए। वैश्यावृति यूनानी समाज के हर वर्ग में एक आम रिवाज बन गई।

(ग) रोमन सभ्यता –
जब रोमन सभ्यता अपने गौरव की चरमसीमा पर थी, उस समय एक पुरुष को अपनी पत्नी का जीवन छीनने का भी अधिकार था। वैश्यावृति और नग्नता रोमवासियों में आम थी।

(घ) मिस्री सभ्यता –
मिस्री लोग स्त्रियों को शैतान का रूप मानते थे।

(ङ) इस्लाम से पहले का अरब –
इस्लाम से पहले अरब में औरतों को नीच माना जाता और किसी लड़की का जन्म होता तो कभी-कभी उसे जीवित दफ़न कर दिया जाता था।

2. इस्लाम में पर्दे का महत्त्व –
इस्लाम ने औरतों को ऊपर उठाया और उनको बराबरी का दर्जा दिया और वह उनसे अपेक्षा करता है कि वे अपना स्तर बनाए रखें! लगभग 1400 साल पहले ही उनके अधिकार उनको दे दिए और वह उनसे अपेक्षा करता है कि वे अपने स्तर को बनाए रखेंगी।
• पुरुषों के लिए पर्दा – आमतौर पर लोग यह समझते हैं कि पर्दे का संबंध केवल स्त्रियों से है। हालांकि पवित्र क़ुरआन में अल्लाह ने औरतों से पहले मर्दों केपर्दे का वर्णन किया है —
‘‘ऐ नबी (सलल्लाहो अलैहि वसल्लम)! ईमान वालों से कह दो कि वे अपनी नज़रें नीची रखें और अपनी पाकदामिनी (शील) की सुरक्षा करें। यह उनको अधिक पवित्र बनाएगा और अल्लाह ख़ूब जानता है हर उस काम को जो वे करते हैं।’’ – (क़ुरआन, 24:30)
उस क्षण जब एक व्यक्ति की नज़र किसी स्त्री पर पड़े तो उसे चाहिए कि वह अपनी नज़र नीची कर ले।

• स्त्रियों के लिए पर्दा क़ुरआन की सूरा नूर में कहा गया है —
‘‘ऐ नबी (सलल्लाहो अलैहि वसल्लम)! और अल्लाह पर ईमान रखने वाली औरतों से कह दो कि वे अपनी नज़रें नीची रखें और अपनी पाकदामिनी (शील) की सुरक्षा करें और वे अपने बनाव-श्रृंगार और आभूषणों को न दिखाएँ, इसमें कोई आपत्ति नहीं जो सामान्य रूप से ज़ाहिर हो जाए। और उन्हें चाहिए कि वे अपने सीनों पर ओढ़नियाँ ओढ़ लें और अपने पतियों, बापों, अपने बेटों….के अतिरिक्त किसी के सामने अपने बनाव-श्रृंगार प्रकट न करें।’’ –(क़ुरआन, 24:31)

3. पर्दे के लिए आवश्यक शर्तें –
पवित्र क़ुरआन और हदीस (पैग़म्बर के कथन) के अनुसार पर्दे के लिए निम्नलिखित छह बातों का ध्यान देना आवश्यक है —
(i) पहला शरीर का पर्दा है जिसे ढका जाना चाहिए। यह पुरुष और स्त्री के लिए भिन्न है। पुरुष के लिए नाभि (Navel) से लेकर घुटनों तक ढकना आवश्यक है और स्त्री के लिए चेहरे और हाथों की कलाई को छोड़कर पूरे शरीर को ढकना आवश्यक है। यद्यपि वे चाहें तो खुले हिस्से को भी छिपा सकती हैं। इस्लाम के कुछ आलिम इस बात पर ज़ोर देते हैं कि चेहरा और हाथ भी पर्दे का आवश्यक हिस्सा है। अन्य बातें ऐसी हैं जो स्त्री एवं पुरुष के लिए समान हैं।
(ii) धारण किया गया वस्त्र ढीला हो और शरीर के अंगों को प्रकट न करे।
(iii) धारण किया गया वस्त्र पारदर्शी न हो कि कोई शरीर के भीतरी हिस्से को देख सके।
(iv) पहना हुआ वस्त्र ऐसा भड़कीला न हो कि विपरीत लिंग को आकर्षित या उत्तेजित करे।
(v) पहना हुआ वस्त्र विपरीत लिंग के वस्त्रों की तरह न हो।
(vi) धारण किया गया वस्त्र ऐसा नहीं होना चाहिए जो किसी विशेष ग़ैर-मुस्लिम धर्म को चिंहित करता हो और उस धर्म का प्रतीक हो।

4. पर्दा इंसान के व्यवहार और आचरण का भी पता देता है –
पर्दा दूसरी चीज़ों के साथ-साथ इंसान के व्यवहार और आचरण का भी पता देता है पूर्ण पर्दा, वस्त्र (लिबास) की छह कसौटियों के अलावा नैतिक व्यवहार और आचरण को भी अपने भीतर समोए हुए है। कोई व्यक्ति यदि केवल वस्त्र की कसौटियों को अपनाता है तो वह पर्दे के सीमित अर्थ का पालन कर रहा है। वस्त्र के द्वारा पर्दे के साथ-साथ आँखों और विचारों का भी पर्दा करना चाहिए। किसी व्यक्ति के चाल-चलन, बातचीत एवं व्यवहार को भी पर्दे के दायरे में लिया जाता है।

5. पर्दा दुर्व्यवहार से रोकता है –
पर्दे का औरतों को क्यों उपदेश दिया जाता है इसके कारण का पवित्र क़ुरआन की सूरा अल अहज़ाब में उल्लेख किया गया है —
‘‘ऐ नबी! अपनी पत्नियों, पुत्रियों और ईमान वाली स्त्रियों से कह दो कि वे (जब बाहर जाएँ) तो ऊपरी वस्त्र से स्वयं को ढाँक लें। यह अत्यन्त आसान है कि वे इसी प्रकार जानी जाएँ और दुर्व्यवहार से सुरक्षित रहें और अल्लाह तो बड़ा क्षमाकारी और बड़ा ही दयालु है।’’ – (क़ुरआन, 33:59)
पवित्र क़ुरआन कहता है कि औरतों को पर्दे का इसलिए उपदेश दिया गया है कि वे पाक-दामिनी के रूप में देखी जाएँ और पर्दा उनसे दुर्व्यवहार और दुराचरण को भी रोकता है।

6. जुड़वाँ बहनों का उदाहरण –
मान लीजिए कि समान रूप से सुन्दर दो जुड़वाँ बहनें सड़क पर चल रही हैं। एक केवल कलाई और चेहरे को छोड़कर पर्दे में पूरी तरह ढकी हो और दूसरी पश्चिमी वस्त्र मिनी स्कर्ट (छोटा लंहगा) और ब्लाऊज पहने हुए हो। एक लफंगा किसी लड़की को छेड़ने के लिए किनारे खड़ा हो तो ऐसी स्थिति में वह किससे छेड़छाड़ करेगा। उस लड़की से जो पर्दे में है या उस लड़की को जो मिनी स्कर्ट पहने है?
स्वाभाविक रूप से वह दूसरी लड़की से दुर्व्यवहार करेगा। ऐसे वस्त्र विपरीत लिंग को अप्रत्यक्ष रूप से छेड़छाड़ और दुर्व्यवहार का निमंत्रण (Provocation, invitation) देते हैं। क़ुरआन बिल्कुल सही कहता है कि पर्दा औरतों के साथ छेड़छाड़ और उत्पीड़न को रोकता है।

7. बलात्कारियों के लिए मौत की सज़ा –
इस्लामी क़ानून में बलात्कार की सज़ा मौत है। बहुत से लोग इसे निर्दयता कहकर इस दंड पर आश्चर्य प्रकट करते हैं। कुछ का तो कहना है कि इस्लाम एक जंगली धर्म है। एक सरल-सा प्रश्न गै़र-मुस्लिमों से किया गया कि ईश्वर न करे कि कोई आपकी माँ अथवा बहन के साथ बलात्कार करता है और आप को न्यायाधीश बना दिया जाए और बलात्कारी को आपके सामने लाया जाए तो उस दोषी को आप कौनसी सज़ा सुनाएँगे?
प्रत्येक से एक ही उत्तर मिला कि मृत्यु-दंड दिया जाएगा। कुछ ने कहा कि वे उसे कष्ट दे-देकर मारने की सज़ा सुनाएँगे।
अगला प्रश्न किया गया कि यदि कोई आपकी माँ, पत्नी अथवा बहन के साथ बलात्कार करता है तो आप उसे मृत्यु-दंड देना चाहते हैं परंतु यही घटना किसी दूसरे
की माँ, पत्नी अथवा बहन के साथ होती है तो आप कहते हैं कि मृत्यु-दंड देना जंगलीपन है। इस स्थिति में यह दोहरा मापदंड क्यों है?

8. पश्चिमी समाज के झूटे दावे –
पश्चिमी समाज औरतों को ऊपर उठाने का झूठा दावा करता है औरतों की आज़ादी का पश्चिमी दावा एक ढोंग है, जिसके सहारे वे उनके शरीर का शोषण करते हैं, उनकी आत्मा को गंदा करते हैं और उनके मान-सम्मान से उनको वंचित रखते हैं। पश्चिमी समाज दावा करता है कि उसने औरतों को ऊपर उठाया। इसके विपरीत उन्होंने उनको रखैल और समाज की तितलियों का स्थान दिया है, जो केवल उन जिस्मफ़रोशों और काम-इच्छुकों के हाथों का एक खिलौना हैं, जो कला और संस्कृति के रंग-बिरंगे पर्दे के पीछे छिपे हुए हैं।

9. अमेरिका में बलात्कार की संख्या सबसे अधिक –
अमेरिका में बलात्कार की दर सबसे अधिक है अमेरिका को दुनिया का सबसे उन्नत देश समझा जाता है। 1990 ई॰ की FBI रिपोर्ट से पता चलता है कि अमेरिका में उस साल 1,02,555 बलात्कार की घटनाएँ दर्ज की गईं। रिपोर्ट में यह बात भी बताई गई है कि इस तरह की कुल घटनाओं में से केवल 16 प्रतिशत ही प्रकाश में आ सकी हैं। इस प्रकार 1990 ई॰ में बलात्कार की घटना का सही अंदाज़ा लगाने के लिए उपरोक्त संख्या को 6.25 से गुना करके जो योग सामने आता है वह 6,40,968 है। अगर इस पूरी संख्या को साल के 365 दिनों में बाँटा जाए तो प्रतिदिन के लिहाज से 1756 की संख्या सामने आती है।
एक दूसरी रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका में प्रतिदिन 1900 बलात्कार की घटनाएँ पेश आती हैं। National Crime Victimization Survey Bureau of Justice Statistics (U.S.Deptt.Of Justice) के अनुसार केवल 1996 में 3,07,000 घटनाएँ दर्ज हुईं। लेकिन सही घटनाओं की केवल 31 प्रतिशत घटना ही दर्ज हुईं। इस प्रकार 3,07,000-3,226 = 9,90,322 बलात्कार की घटनाएँ सन् 1996 ई॰ में दर्ज हुईं। प्रतिदिन के लिहाज से औसत 2713 बलात्कार की घटनाएँ 1996 ई॰ में अमेरिका में हुईं। ज़रा विचार करें कि अमेरिका में हर 32 सेकेंड में एक बलात्कार होता है।
ऐसा लगता है कि अमेरिकी बलात्कारी बड़े ही निडर हैं। FBI की 1990 ई॰ की रिपोर्ट आगे बताती है कि बलात्कार की घटनाओं में केवल 10 प्रतिशत बलात्कारी ही गिरफ़्तार किए जा सके हैं। जो कुल संख्या का 1.6 प्रतिशत है। बलात्कारियों में से 50 प्रतिशत लोगों को मुक़द्दमा से पहले रिहा कर दिया गया। इसका मतलब यह हुआ कि केवल 0.8 प्रतिशत बलात्कारियों के विरुद्ध ही मुक़द्दमा चलाया जा सका। दूसरे शब्दों में अगर एक व्यक्ति 125 बार बलात्कार की घटनाओं में लिप्त हो तो केवल एक बार ही उसे सज़ा दी जाने की संभावना है। बहुत से लोग इसे एक अच्छा जुआ समझेंगे। रिपोर्ट से यह भी अंदाज़ा होता है कि सज़ा दिए जाने वालों में से केवल 50 प्रतिशत लोगों को एक साल से कम की सज़ा दी गई है।

*हालाँकि अमेरिकी क़ानून के अनुसार सात साल की सज़ा होनी चाहिए। उन लोगों के संबंध में जो पहली बार बलात्कार के दोषी पाए गए हैं, जज नर्म पड़ जाते हैं। ज़रा विचार करें कि एक व्यक्ति 125 बार बलात्कार करता है लेकिन उसके विरुद्ध मुक़द्दमा किए जाने का अवसर केवल एक बार ही आता है और फिर 50 प्रतिशत लोगों को जज की नर्मी का लाभ मिल जाता है और एक साल से भी कम मुद्दत की सज़ा किसी ऐसे बलात्कारी को मिल पाती है जिस पर यह अपराध सिद्ध हो चुका है।

*उस दृश्य की कल्पना कीजिए कि अगर अमेरिका में पर्दे का पालन किया जाता। जब कभी कोई व्यक्ति एक स्त्री पर नज़र डालता और कोई अशुद्ध विचार उसके मस्तिष्क में उभरता तो वह अपनी नज़र नीची कर लेता। प्रत्येक स्त्री पर्दा करती अर्था्त पूरे शरीर को ढक लेती सिवाय कलाई और चेहरे के। इसके बाद यदि कोई उसके साथ बलात्कार करता तो उसे मृत्यु-दंड दिया जाता। ऐसी स्थिति में क्या अमेरिका में बलात्कार की दर बढ़ती या स्थिर रहती या कम होती?

10. इस्लामी क़ानून निश्चित रूप से बलात्कार की दर घटाएगा –
स्वाभाविक रूप से जब भी इस्लामी सभ्यता क़ायम होगी, और इस्लामी क़ानून लागू किया जाएगा तो इसका परिणाम निश्चित रूप से सकारात्मक होगा। यदि इस्लामी क़ानून संसार के किसी भी हिस्से में लागू किया जाए, चाहे अमेरिका हो या यूरोप, समाज में शान्ति आएगी।
पर्दा औरतों का अपमान नहीं करता बल्कि उनके शील की पवित्रता और मान की रक्षा करके उन्हें ऊपर उठाता है।


जिहाद। काफिर।



जिहाद या फ़साद

वर्तमान में जिहाद के नाम पर लोगों ने इस्लाम को जी भर के बदनाम किया है। इनमें वह मुस्लिम संगठन भी शामिल हैं जो अपने राजनितिक स्वार्थों की प्राप्ति के लिए अपनी सियासी लड़ाई को जिहाद की संज्ञा देते हैं जब कि मुस्लिम विद्वानों, धार्मिक नेताओं एवं इस्लामिक संस्थाआओं ने कभी भी इन राजनितिक गतिविधियों को न तो “जिहाद“ माना है न ही उनका समर्थन किया है, 
मुगलों एवं तुर्कों के द्वारा भारत में जो आक्रमण किए गए, इस्लाम का उनसे कोई सम्बन्ध नहीं था। वास्तविकता यह है कि मध्यकालीन युग के राजा, महाराजा अपने साम्राज्य के विस्तार की ख़ातिर इस प्रकार के आक्रमण करते रहते थे।

प्राचीनकाल में यूनान के महाराजा “सिकन्दर” ने पूरे मध्य एशिया एवं भारत पर आक्रमण कर उन पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया था या “अशोक महान” ने अनेक क्षेत्रों पर आक्रमण करके उन्हें अपने अधीन कर लिया था, तो क्या यह कहा जाएगा कि यही उनके धर्म की शिक्षा थी? एक समय में मंगोलिया से उठने वाले मुगलों ने पूरे मध्य एशिया में उत्पात मचाया, उस समय वह मुसलमान नहीं थे। उन्होंने मुस्लिम साम्राज्य की राजधानी “बगदाद“ में खून की नदियाँ बहा दीं। यहाँ तक कि मुगल सम्राट हलाकू ने “बगदाद“ में मनुष्यों की खोपड़ियों से एक बडे़ स्तूप का निर्माण कराया। उनकी इस बर्बरता का शिकार होने वाले तो मुस्लिम थे, तो क्या उनके इस आक्रमण को उनके धर्म से जोड़ दिया जाए?
भारत पर आक्रमण करने वाला प्रथम मुगल शासक तैमूर लंग था परन्तु उस समय संयुक्त रूप से मुगलों ने इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया था। लेकिन उनकी शिक्षा दीक्षा इस्लामिक सिद्धांतों से नहीं बल्कि मंगोली एवं चंगे़जी सिद्धांतों से हुई थी, एवं उनकी कार्यशैली उसी के अनुरूप थी। 

जिहाद
“जिहाद“ के बारे में आजकल बहुत भ्रांतियाँ फैली हुई हैं। कुछ अपनों ने और कुछ गैरों ने “जिहाद“ को इस प्रकार प्रस्तुत किया है मानो वह लड़ने झगड़ने, मारने मरने का नाम है जब कि ऐसा नहीं है। “जिहाद“ अरबी भाषा का शब्द है जिसका मूल अर्थ है “प्रयास करना” “जद्दो जहद करना” और “संघर्ष” करना। ख़्याल रहे कि अरबी भाषा में युद्ध करने के लिए “क़िताल” शब्द बोला जाता है न कि जिहाद।
इस्तिलाही मायनों में “जिहाद“ शब्द अलग-अलग स्थान पर अलग मायनों में प्रयोग हुआ है, कहीं अपने नफ़्स (अन्तरात्मा या इन्द्रियों) से संघर्ष करने को “जिहाद“ कहा गया है, कहीं माँ-बाप की सेवा करने को “जिहाद“ कहां गया है, और कहीं ज़ालिम राजा के सामने हक़ बात कहने को “जिहाद“ कहा गया है, परन्तु इस्तिलाह में जिहाद अपने मूल अधिकारों की प्राप्ति के लिए हर सम्भव एवं उचित प्रयास करने को भी कहते हैं। उस में युद्ध की स्थिति केवल इसी प्रकार उत्पन्न हो सकती है जैसे मदीने में मुहम्मद साहब एवं उनके अनुयाइयों के सामने युद्ध करने के अतिरिक्त कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा था, 
उसमे भी कई सरते है जैसे युद्ध के दौरान बच्चे बूढे और औरतो पर हमला नहीं करना है हरे पेड़ पौदों को नुकसान नहीं पहुचना है कोई हथियार डाल दे तो उसपे हमला नहीं करना है कोई अगर समझौता करना चाहे तो युद्ध को रोक देना है ।
युद्ध के दौरान भी किसी के साथ ज्यादती और ना इंसाफी ना हो ।


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जिहाद क्या है 

जिहाद उन अनेक विषयों में से एक प्रमुख व प्रज्वलंत विषय है जिन्हें इस्लाम के अपने सूत्रों तथा विश्वसनीय माध्यमों से समझने के बजाय इस्लाम-विरक्त, इस्लाम-विरोधी व इस्लाम-दुश्मन सूत्रों व माध्यमों से समझने का प्रयास किया गया। अतः ऐसी अनुचित व असैद्धांतिक प्रक्रिया के परिणामस्वरूप ‘इस्लाम में जिहाद’ की जो कुछ भी, जैसी कुछ भी, जितनी भी ग़लत, त्रुटिपूर्ण तथा भयावह व घृणाजनक तस्वीरें बनीं, उन्हें विशाल, सशक्त व व्यापक मीडिया-तंत्र द्वारा विश्व के लगभग हर व्यक्ति के समक्ष ‘वास्तविक तस्वीरें’ बनाकर पेश किया जाता रहा है। परिणामस्वरूप अज्ञानता, ग़लतफ़हमियों और घृणा व भय की गन्दी ज़मीन पर उपरोक्त आक्षेपों के कटीले व ज़हरीले झाड़-झंकाड़ हर ओर उगे और ‘लहलहाते’ नज़र आ रहे हैं। किसी भी चीज़, या बात को उसकी वास्तविकता के साथ समझने का उचित माध्यम, मीडिया या राजनीतिज्ञों के बयानात नहीं हुआ करते बल्कि स्वयं उसी चीज़ या वस्तु से, मूलरूप से संबंधित विश्वसनीय (Authentic sources) सूत्र होते हैं।
जिहाद का अर्थ
अरबी शब्द ‘जिहाद’ जिन मूल-अक्षरों ‘ज-ह-द’ से बना है उनसे बनने वाले शब्द (जो क़ुरआन में कुल 17 हैं और 19 अध्यायों (सूरा) में 41 बार प्रयुक्त हुए हैं) घोर परिश्रम, संघर्ष, प्रयत्न, प्रयास के अर्थ रखते हैं। जिस ‘जिहाद’ पर आपत्ति जताई जाती है वह जिहाद (प्रयास, प्रयत्न, संघर्ष) के विभिन्न स्तरों तथा चरणों (Phases) में ऐसा अंतिम व अतिशय चरण और शिखर-बिन्दु है जहां ‘‘सशस्त्र संघर्ष’’ अनिवार्य (Inevitable) हो जाता है। ऐसे ‘जिहाद’ (क़िताल अर्थात् ‘युद्ध’) पर क़ुरआन के मुस्लिम विद्वान भाष्यकारों (मुफ़स्सिरीन) ने बहुत विस्तार से लिखा है तथा इस विषय पर विभिन्न भारतीय व विदेशीय भाषाओं में पर्याप्त साहित्य भी उपलब्ध है। उपरोक्त शंकाओं, भ्रांतियों तथा आक्षेपों के तथ्यपरक तथा वास्तविक उत्तर व निवारण के लिए इस साहित्य का अध्ययन—सत्यनिष्ठ अध्ययन—करना चाहिए। यहां संक्षेप में और कम से कम शब्दों में यदि जिहाद की वास्तविकता बयान की जाए तो वह कुछ यूं होगी:
जिहाद की संक्षिप्ततम व्याख्या
अन्याय, अत्याचार व शोषण करने वाली शक्तियां, रक्तपात, नरसंहार करने व तबाही, बरबादी फैलाने वाली शक्तियां, कमज़ोरों पर जु़ल्म ढाने वाली, उन्हें उनकी बस्तियों, आबादियों, घरों से निकाल देने या निकलने पर विवश कर देने वाली शक्तियां, ये सारे कुकृत्य ‘सशस्त्र’ होकर करें तो मुस्लिम समुदाय और मुस्लिम शासन का कर्तव्य है कि सशस्त्र होकर जु़ल्म का मुक़ाबिला किया जाए, अपनी रक्षा (Defense) की जाए, ज़ालिम की अत्याचार-शक्ति-सामर्थ्य को कमज़ोर करके, तोड़कर अत्याचार व शोषण का उन्मूलन किया जाए। सत्य व ईशपरायणता तथा न्याय व शान्ति के दुश्मनों को पस्त किया जाए। न्याय व शान्ति की स्थापना की जाए। उस सत्य मार्ग, अर्थात् शाश्वत ईश्वरीय मार्ग को प्रशस्त किया जाए जिस पर चलकर मानव-समाज और मानवजाति इहलौकिक व पारलौकिक सुख-समृद्धि-सफलता से आलंगित होना सहज, सरल व संभव पा सके। इस सशस्त्र संघर्ष में स्वयं अत्याचार व अन्याय करने से पूरी तरह रुका जाए। ईश्वरीय आदेशों, नियमों, शिक्षाओं और सीमाओं का पालन किया जाए...।
यह इस्लामी जिहाद की संक्षिप्ततम व्याख्या है। ऐसा ‘जिहाद’ किन्हीं भी (अलग-अलग) नामों से मानवजाति के दीर्घ इतिहास में हमेशा से होता आया है। सारे इन्सानों ने सशस्त्र जु़ल्म व अत्याचार के सामने घुटने टेक दिए हों, ऐसा मानव इतिहास में कभी नहीं हुआ है, क्योंकि ऐसा होना उस मूल प्रकृति के प्रतिकूल है जिस पर मनुष्य की संरचना हुई है। अलबत्ता इस्लाम ने इतिहास में पहली बार यह श्रेय प्राप्त किया है कि उसने जिहाद के नियम और आदेश नैतिक व वैधानिक (क़ानूनी), दोनों स्तरों पर पूरी तरह से निश्चित (Codified) कर दिए हैं, और इस बात को यक़ीनी व अवश्यंभावी बनाया है कि ज़ल्म के प्रतिरोध में ख़ुद जु़ल्म हरगिज़ न होने पाए। प्रतिशोध-भावना ऐसी प्रबल हरगिज़ न होने पाए कि न्याय, दयाशीलता और इन्सानियत का दामन हाथ से छूट जाए (क़ुरआन, 5:8)।
जिहाद—आतंक?
जहां तक जिहाद के आतंकवाद होने का प्रश्न है, इस्लाम के पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) तथा उनके अनुयायी, सत्य-धर्म के आह्नान के साथ ही मक्कावासी विधर्मियों के क्रू$र आतंकवाद से, 13 वर्ष तक जूझते; तथा स्वामी लक्ष्मीशंकराचार्य के अनुसार (पुस्तक ‘इस्लाम आतंक या आदर्श’-2008), 23 वर्षों तक आतंकवाद के विरुद्ध लड़ते रहे। (यहां तक कि नगर ‘मक्का’ और निकटवर्ती क्षेत्रों से जु़ल्म व आतंक का सफ़ाया हो गया)।
इस्लाम में ‘जिहाद’ दरअस्ल आतंक को ख़त्म करने, आतंकवाद को पस्त व परास्त करने का एक ‘ईश्वरीय-मार्गदर्शित’ प्रक्रम है। इस प्रक्रम में अत्याचारी शक्तियां यदि आतंकित होती हैं अतः जिहाद को आतंकवाद की संज्ञा देती हैं तो यह बात समझ में आती है। वरना स्वयं जिहाद का आतंकवाद कहा जाना घोर मिथक है। किसी पाश्चात्य विद्वान-विचारक के ये शब्द, वस्तुस्थिति को उसके वस्तुनिष्ठ रूप में पेश करते हैं



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कुफ़्र, काफ़िर का अर्थ 

इस्लाम में ‘कुफ़्र’ और ‘काफ़िर’ कुछ विशेष पारिभाषिक शब्दों में से दो शब्द हैं। इसका एक विशेष अर्थ है, लेकिन दुख की बात यह है कि विभिन्न पारिभाषिक शब्दों की तरह इस शब्द को भी ग़लत अर्थ देकर ऐसा प्रभाव पैदा करने की कोशिश की जा रही है, जो इसके अस्ल (मूल) अर्थ से बहुत दूर है। शब्द ‘काफ़िर’ के बारे में इस तरह बताया जाता है जैसे इसमें ग़ैर-मुस्लिम भाइयों के लिए नफ़रत, तिरस्कार और अपमान का पहलू है। यह शब्द जैसे एक अपमान बोधक शब्द है। इस्लाम काफ़िर कहकर ग़ैर-मुस्लिम भाइयों को मूल मानव-अधिकारों से वंचित कर देता है और जीवित रहने का अधिकार भी देना नहीं चाहता। यह बात सच्चाई के बिल्कुल विपरीत है।
क़ुरआन में काफ़िर, कुफ़्र और शिर्क के शब्द बहुत-सी जगहों पर प्रयुक्त हुए हैं। कुफ़्र  के अर्थ अवसर के अनुरूप विभिन्न होते हैं। जैसे इन्कार, अवज्ञा, कृतघ्नता, निरादर और नाक़द्री, सच्चाई को छिपाना और अधर्म आदि। कुफ़्र करने वाले को अरबी भाषा में ‘काफ़िर’ कहते हैं।
‘काफ़िर’ शब्द व्याकरण की दृष्टि से गुणवाचक संज्ञा है, यह अपमानबोधक शब्द नहीं है। यह शब्द उन लोगों के लिए भी प्रयुक्त हुआ है जिनके सामने ईश्वरीय धर्म इस्लाम की शिक्षाएं पेश की गईं और उन्होंने किसी भी कारण से उनको ग़लत समझा और उनका इन्कार कर दिया। कुफ़्र का शब्द उन लोगों के लिए भी प्रयुक्त हुआ है, जो अपने को इस्लाम का अनुयायी और मुसलमान कहते थे, परन्तु इस्लाम के प्रति निष्ठावान न थे। उदाहरणार्थ ईशदूत हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) का कथन है:
‘‘जिस (मुसलमान) ने जान-बूझकर नमाज़ छोड़ दी उसने कुफ़्र किया।’’ (हदीस)
कु़रआन मजीद में कहा गया है—
‘‘जो लोग अल्लाह के भेजे हुए निर्देशों के अनुसार फ़ैसला न करें वे काफ़िर (अधर्मी) हैं।’’ (क़ुरआन, 5:44)
उपर्युक्त शिक्षाओं में संबोधन साफ़ तौर पर उन लोगों से है, जो इस्लाम के अनुयायी होने का दावा करते थे और अपने को मुसलमान कहते थे, परन्तु वे इस्लाम के प्रति निष्ठावान न थे।
कु़रआन में एक जगह है—
‘‘जिसने ताग़ूत (काल्पनिक देवों) का कुफ़्र (इन्कार) किया और अल्लाह को मान लिया उसने एक ऐसा मज़बूत सहारा थाम लिया जो कभी टूटने वाला नहीं।’’     
(क़ुरआन, 2:256)
क़ुरआन की इस आयत में शब्द ‘कुफ़्र’ इन्कार के अर्थ में है और मुसलमानों से ताग़ूत (काल्पनिक देवों) का इन्कार कराना अपेक्षित है।
‘कुफ़्र’ अरबी भाषा का शब्द है। इसक शाब्दिक अर्थ किसी चीज़ को छिपाना या ढांकना है। इसी तरह ‘कुफ़्र’ कृतघ्नता या नाशुक्री के अर्थ में भी आता है। अर्थात् कोई व्यक्ति किसी की कृतघ्नता या एहसानफ़रामोशी करता है, तो जैसे वह अपने उपकार करने वाले के उपकार को छिपा देता है और उस पर परदा डाल देता है। इसी तरह ‘कुफ़्र’ का एक अर्थ यह भी है कि दुनिया को पैदा करने वाले ने अपने ईशदूतों को भेजकर अपने बन्दों के लिए सत्यमार्ग पर चलने का जो आदेश दिया है उस आदेश को मानने से इन्कार करना।
पवित्र क़ुरआन में ‘कुफ़्र’ शब्द का प्रयोग कई दूसरे अर्थों में भी हुआ है और ईमान तथा इस्लाम के मुक़ाबले में एक पारिभाषिक शब्द के रूप में भी। जैसे, किसान खेती के दौरान बीज को ज़मीन के अन्दर छिपा देता है, इसलिए किसान को भी काफ़िर (छिपाने वाला) कहा गया है। कुछ जगहों में कृतज्ञता (शुक्र) की तुलना में अकृतज्ञता (नाशुक्री) के अर्थ में भी प्रयोग हुआ है, इसलिए पैदा करने वाले के उपकारों के उत्तर में कृतघ्नता का रवैया (सुलूक) ‘कुफ़्र’ है और ऐसा करने वाला व्यक्ति ‘काफ़िर’ कहलाता है।
कु़रआन में एक दूसरी जगह है—
‘‘जान लो कि यह सांसारिक जीवन मात्र एक खेल और तमाशा है और एक साज-सज्जा और तुम्हारा आपस में एक-दूसरे पर गर्व करना और धन और संतान में एक-दूसरे से बढ़ा हुआ ज़ाहिर करना। इसकी मिसाल ऐसी है कि बारिश हुई तो उससे पैदा होने वाली खेती से कुफ़्फ़ार (किसान) ख़ुश हो गए। फिर वही खेती पक जाती है और तुम देखते हो कि वह पीली हो जाती है। फिर वह भुस बनकर रह जाती है।’’ (क़ुरआन, 57:20)
क़ुरआन की इस आयत में शब्द कुफ़्फ़ार(काफ़िरों) किसान के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।
क़ुरआन में एक जगह परमेश्वर कहता है—‘‘तुम मुझे याद रखो, मैं तुम्हें याद रखूंगा और मेरा आभार प्रकट करते रहो और मेरे प्रति कुफ़्र (अकृतज्ञता) न दिखलाओ।’’ (क़ुरआन, 2:152)
क़ुरआन की इस आयत में ‘कुफ़्र’ शब्द ‘अकृतज्ञता’ के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।
क़ुरआन में जहां कहीं भी ईश्वर और उसकी शिक्षाओं और उसके आदेशों का इन्कार करने वालों के लिए ‘काफ़िर’ शब्द प्रयुक्त हुआ है तो उसका उद्देश्य गाली, घृणा और निरादर नहीं है, बल्कि उनके इन्कार करने के कारण वास्तविकता प्रकट करने के लिए ऐसा कहा गया है। ‘काफ़िर’ शब्द हिन्दू का पर्यायवाची भी नहीं है जैसा कि दुष्प्रचार किया जाता है। ‘काफ़िर’ शब्द का लगभग पर्यायवाची शब्द ‘नास्तिक’ है।
पवित्र क़ुरआन में अधिकतर कुफ़्र शब्द का प्रयोग ईमान के मुक़ाबले में इन्कार के अर्थ में हुआ है। धर्म पर विश्वास न रखने वाले लोगों के लिए हर धर्म ने विशेष शब्दावली का प्रयोग किया है। उदाहरण के लिए, जो व्यक्ति हिन्दू परिवार में पैदा हुआ है, लेकिन धर्म में विश्वास नहीं रखता है, उसे ‘नास्तिक’ कहते हैं।
इसी तरह हर धर्म में उस धर्म की मौलिक धारणाओं एवं शिक्षाओं को मानने वालों और न मानने वालों के लिए अलग-अलग विशेष शब्द प्रयुक्त किए जाते हैं। जैसे हिन्दू धर्म में उन लोगों के लिए नास्तिक, अनार्य, असभ्य, दस्यु और मलिच्छ शब्द प्रयुक्त हुए हैं जो हिन्दू धर्म के अनुयायी न हों।
कुफ़्र का एक अर्थ है सच्चाई पर परदा डालना। सारी नेमतें (कृपादान) अल्लाह, ईश्वर की दी हुई हैं। इस सच्चाई पर परदा डालकर इन नेमतों का सम्बन्ध दूसरों से जोड़ना, अल्लाह को छोड़कर दूसरों का आभारी बनना कुफ़्र का तरीक़ा है।
‘काफ़िर’ शब्द वास्तव में ईश्वरीय सत्य धर्म को न मानने वालों और मानने वालों के बीच अन्तर को स्पष्ट करने के लिए है, न कि गाली देने या निरादर करने के लिए।
अब यह बात स्पष्ट हो जाती है कि शब्द ‘काफ़िर’ में तिरस्कार और अपमान का कोई पहलू नहीं है। इस्लाम सैद्धांतिक रूप से सत्य धर्म (दीने-हक़) को मानने और न मानने वालों के बीच अन्तर स्पष्ट करता है, ताकि इस्लामी आदेशों को लागू करने के मामले में दोनों के साथ अलग-अलग बर्ताव किया जा सके। इस्लाम को मानने वालों को इसका पाबन्द (नियमबद्ध) बनाया जा सके और न मानने वालों को इसकी पाबन्दी (नियमबद्धता) से अलग रखा जाए। इस्लाम की मूल शिक्षाओं को न मानने वाले व्यक्ति को काफ़िर कहकर इस्लाम ने वास्तव में उसकी पोज़ीशन स्पष्ट कर दी है, लेकिन इससे इस्लामी राज्य या समाज में उसके मौलिक अधिकारों पर कोई आंच नहीं आती और दुनिया के मामलों में उसके साथ कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता।
ईश्वर ने इन्सान को सबसे सुन्दर रूप-रंग में पैदा किया है। ज़िन्दगी गुज़ारने के लिए हर प्रकार की सुविधाएं प्रदान कीं और सारी ज़रूरतें पूरी कीं। इन सारी नेमतों (कृपादानों) की मांग है कि लोग अल्लाह पर ईमान लाएं, जिसने उनको ये नेमतें दी हैं। इसी तरह अल्लाह के सभी पैग़म्बर (ईशदूत), विशेष रूप से आख़िरी ईशदूत हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) पर भी ईमान लाएं और मरने के बाद परलोक की हमेशा-हमेशा रहने वाली ज़िन्दगी और वहां सभी इन्सानों के अच्छे-बुरे कर्मों के बारे में पूछताछ तथा हिसाब-किताब पर ईमान लाएं। विशुद्ध रूप से अल्लाह की इबादत (उपासना) और बन्दगी करें तथा उसके आदेशों का पालन करें, जो लोग अल्लाह की नेमतों (कृपादानों) से लाभ उठाते हैं, लेकिन उस पर ईमान नहीं लाते, या उसकी ख़ुदाई (ईश्वरत्व) में दूसरों को साझी ठहराते हैं, वही लोग अकृतज्ञ और नाशुक्रे हैं और कुफ़्र (इन्कार) का रवैया अपनाते हैं। 
अल्लाह के आदेशों को मालूम करने का साधन अल्लाह के आख़िरी ईशदूत हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) पर अवतरित पवित्र क़ुरआन का अध्ययन करना है। पवित्रा क़ुरआन की शिक्षाओं का व्यावहारिक आदर्श ईशदूत हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) की जीवनी में मिलता है। ये दोनों चीज़ें सुरक्षित और विशुद्ध रूप में आज भी मौजूद हैं, जो इसकी सत्यता का प्रमाण है।

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सुवर का मांस।

जानीये – क्यों हराम है सुअर का मांस ….

इस्लाम में सुअर का माँस खाना वर्जित(हराम) होने की बात से सभी परिचित हैं। निम्नलिखित तथ्यों द्वारा इस प्रतिबन्ध की व्याख्या की गई है।

1). सुअर के मांस का निषेध पवित्र कुरआन में ।
पवित्र क़ुरआन में कम से कम चार स्थानों पर सुअर का मांस खाने की मनाही की गई है। पवित्र क़ुरआन की सूरह 2 आयत 173, सूरह 5 आयत 3, सूरह 6 आयत 145, सूरह 16 आयत 115 में इस विषय पर स्पष्ट आदेश दिये गए है।
पवित्र कुरआन की निम्न आयत इस बात को स्पष्ट करने के लिए काफी है, कि सुअर का मांस क्यों हराम किया गया है।
» तुम्हारे लिए (खाना) हराम (निषेध) किया गया मुर्दार, खून, सुअर का मांस और वह जानवर जिस पर अल्लाह के अलावा किसी और का नाम लिया गया हो। – (कुरआन 5:3)
इस संदर्भ में पवित्र क़ुरआन की सभी आयतें मुसलमानों को संतुष्ट करने हेतु पर्याप्त है, कि सुअर का मांस उनके लिए हराम है।

2). बाइबल ने भी सुअर का मांस खाने की मनाही की है।
संभवतः ईसाई लोग अपने धर्मग्रंथ में तो विश्वास रखते ही होंगे।
बाइबल में सुअर का मांस खाने की मनाही इस प्रकार की गई है।
» और सुअर को, क्योंकि उसके पाँव अलग और चिरे हुए हैं। पर वह जुगाली (Rumination/पागुर) नहीं करता, वह भी तुम्हारे लिये अपवित्र है, तुम उनका मांस न खाना, उनकी लाशो को न छूना, वह तुम्हारे लिए अपवित्र हैं। – (ओल्ड टेस्टामेंट, अध्याय 11, 7 से 8 
कुछ ऐसे ही शब्दों के साथ ओल्ड टेस्टामेंट की पाँचवी पुस्तक में सुअर खाने से मना किया गया है।
» और सुअर तुम्हारे लिए इस कारण से अपवित्र है कि इसके पाँव तो चिरे हुए हैं परन्तु वह जुगाली नहीं करता, तुम न तो उनका माँस खाना और न उनकी लाशों को हाथ लगाना। –(ओल्ड टेस्टामेंट, अध्याय 14 : 8

3). सुअर के मांसाहार से अनेक रोग उत्पन्न होते हैं।
अब आईए ! ग़ैर मुस्लिमों और ईश्वर को न मानने वालों की ओर । उन्हें तो बौद्धिक तर्क, दर्शन और विज्ञान के द्वारा ही संतुष्ट किया जा सकता है।
सुअर का मांस खाने से कम से कम 70 विभिन्न रोग लग सकते हैं। एक व्यक्ति के उदर में कई प्रकार के कीटाणु हो सकते हैं, जैसे राउण्ड वर्म, पिन वर्म और हुक वर्म इत्यादि। उनमें सबसे अधिक घातक टाईनिया सोलियम (Taenia Soliam) कहलाता है। सामान्य रूप से इसे टेपवर्म या फीताकृमि भी कहा जाता है। यह बहुत लम्बा होता है और आंत में रहता है। इसके अण्डे रक्त प्रवाह में मिलकर शरीर के किसी भी भाग में पहुंच सकते हैं। यदि यह मस्तिष्क तक जा पहुंचे तो स्मरण शक्ति को बहुत हानि पहुंचा सकते हैं। यदि दिल में प्रवेश कर जाए तो दिल का दौरा पड़ सकता है। आँख में पहुंच जाए तो अंधा कर सकते हैं। जिगर में घुसकर पूरे जिगर को नष्ट कर सकते हैं। इसी प्रकार शरीर के किसी भाग को हानि पहुंचा सकते हैं। एक अन्य अत्यन्त घातक कृमि (कीड़ा) Trichura Tichurasis है ।

यह एक सामान्य भ्रांति है कि यदि सुअर के मांस को भली भांति पकाया जाए तो इन रोगाणुओं के अण्डे नष्ट हो जाएंगे। अमरीका में किये गए अनुसंधान के अनुसार ट्राईक्योरा से प्रभावित 24 व्यक्तियों में 20 ऐसे थे जिन्होंने सुअर का माँस अच्छी तरह पका कर खाया था। इससे पता चला कि सुअर का मांस अच्छी तरह पकाने पर सामान्य तापमान पर भी उसमें मौजूद रोगाणु नहीं मरते जो भोजन पकाने के लिए पर्याप्त माना जाता है।

4). सुअर के मांस में चर्बी बढ़ाने वाला तत्व होता है।
सुअर के मांस में ऐसे तत्व बहुत कम होते हैं, जो मांसपेशियों को विकसित करने के काम आते हों। इसके विपरीत यह चर्बी से भरपूर होता है। यह वसा रक्त नलिकाओं में एकत्र होती रहती है, और अंततः अत्याधिक दबाव (हाइपर टेंशन) ओर हृदयघात का कारण बन सकती है। अतः इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि 50 प्रतिशत से अधिक अमरीकियों को हाइपर टेंशन का रोग लगा हुआ है।

5). सुअर संसार के समस्त जानवरों से अधिक घिनौना जीव है।
सुअर संसार में सबसे अधिक घिनौना जानवर है। यह गंदगी, मैला इत्यादि खाकर गुज़ारा करता है। मेरी जानकारी के अनुसार यह बेहतरीन सफ़ाई कर्मचारी है, जिसे ईश्वर ने पैदा किया है। वह ग्रामीण क्षेत्र जहाँ शौचालय आदि नहीं होते और जहाँ लोग खुले स्थानों पर मलमूत्र त्याग करते हैं, वहाँ की अधिकांश गन्दगी यह सुअर ही साफ़ करते हैं।
कुछ लोग कह सकते हैं कि आस्ट्रेलिया जैसे उन्नत देशों में सुअर पालन स्वच्छ और स्वस्थ वातावरण में किया जाता है। परन्तु इतनी सावधानी के बावजूद कि जहाँ सुअरों को बाड़ों में अन्य पशुओं से अलग रखा जाता है, कितना ही प्रयास कर लिया जाए कि उन्हें स्वच्छ रखा जा सके किन्तु यह सुअर अपनी प्राकृतिक प्रवत्ति में ही इतना गन्दा है कि उसे अपने साथ के जानवरों का मैला खाने में ही आनन्द आता है।


क़ुरआनी विज्ञान।

क़ुरआन के वैज्ञानिक सत्य
 
    
क़ुरआन न हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) की रचना है, न किसी दूसरे इन्सान की। यह तो ईश्वर द्वारा अवतरित ग्रंथ है जो सभी इन्सानों के मार्गदर्शन के लिए भेजी गई है और मुसलमानों का इस पर कोई आधिपत्य नहीं है। इसकी अद्भुत शैली से यह बात स्वयं ही स्पष्ट हो जाती है कि यह एक ईश-ग्रंथ है और इसके लिए किसी अतिरिक्त प्रमाण की आवश्यकता नहीं पड़ती।
वैसे तो क़ुरआन विज्ञान की पुस्तक नहीं है परन्तु इसमें कुछ ऐसे वैज्ञानिक सत्य मौजूद हैं, जिन्हें अब से 1400 वर्ष पूर्व ईश्वर के अतिरिक्त कोई नहीं जान सकता था और जिनका ज्ञान इन्सान को बीसवीं शताब्दी में पहुंचकर अनेक उपकरणों का प्रयोग करने के बाद हुआ। यह इसके ईश-ग्रंथ होने का एक ठोस प्रमाण है। इन सभी अंशों को एकत्रित किया जाए तो एक लम्बी सूची बन जाएगी और अगर विस्तार से इनका वर्णन किया जाए तो अनगिनत पुस्तकें तैयार हो जाएंगी। इनमें से कुछ यहां संक्षेप में प्रस्तुत हैं।
विश्व की रचना
आधुनिक खगोल-भौतिकी (Astro Physics) इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि सम्पूर्ण विश्व एक महाविस्फोट के नतीजे में अस्तित्व में आया। इससे पूर्व न तो कोई भौतिक तत्व था, न ही समय। इसी शून्य की स्थिति से इस विश्व की रचना हुई। सन् 1992 में नासा ने COBE अन्तरिक्ष-यान द्वारा लिए गए चित्रों के आधार पर भी यही निष्कर्ष निकाला कि महाविस्फोट से ही इस विश्व का आरंभ हुआ है उससे पूर्व शून्य के अतिरिक्त कुछ भी नहीं था। क़ुरआन में ईश्वर ने इस सत्य को इस प्रकार व्यक्त किया है—
‘‘वह तो आकाशों और धरती का आविष्कारक है।’’ (क़ुरआन, 6:101)
संसार का विस्तार हो रहा है
इस विशाल संसार की सीमाएं स्थिर या स्थैतिक नहीं हैं बल्कि इनमें हर पल विस्तार हो रहा है। बीसवीं शताब्दी के आरंभ में रूस के भौतिक-शास्त्री अलेक्जेंडर फ्रीडमैन ने यह खोज की कि यह संसार स्थिर नहीं है और इसकी सीमाओं में निरंतर विस्तार हो रहा है। 1929 में ‘हबल’ दूरबीन से इसकी पुष्टि भी हो गई। इसके पहले हज़ारों वर्षों से यही धारणा थी कि यह विश्व एक स्थिर इकाई है।
अब से 1400 वर्ष पूर्व जबकि न तो भौतिक विज्ञान का कोई अस्तित्व था न दूरबीन का, क़ुरआन ने इस सत्य की घोषणा कर दी थी।
‘‘आसमान (अर्थात् ब्रह्माण्ड) को हमने अपने ज़ोर से बनाया और हम ही उसका विस्तार भी कर रहे हैं।’’ (क़ुरआन, 51:47)
सूर्य और अन्य सभी ग्रहों की अपने-अपने कक्ष में परिक्रमा 
खगोलशास्त्र ने अब यह सत्य स्थापित कर दिया है कि सूर्य और अन्य सभी ग्रह जो कि आकाश में पाए जाते हैं, अपने-अपने कक्ष में परिक्रमा कर रहे हैं। सूर्य 72,000 किमी॰ प्रतिघंटे की रफ़्तार से प्रतिदिन 17,280,000 किमी॰ की दूरी तय करता है। इस सौरमंडल में स्थित सभी ग्रह एवं उपग्रह भी सूर्य के साथ ही चक्कर लगाते हैं। अनुमान है कि इस संसार में 200 अरब आकाशगंगा अपने-अपने सूर्य और अनगिनत ग्रह-उपग्रह के साथ अपने-अपने कक्ष में परिक्रमा कर रहे हैं।
कु़रआन ने इस सत्य को 1400 वर्ष पूर्व इस प्रकार व्यक्त किया है—
‘‘और वह अल्लाह ही है जिसने रात और दिन बनाए और सूरज और चांद की रचना की। सब एक-एक कक्ष में तैर रहे हैं।’’ (क़ुरआन, 21:33)
लोहे का स्रोत
आधुनिक युग में खगोलशास्त्रियों ने यह खोज की है कि पृथ्वी पर जितना भी लोहा पाया जाता है उसका उत्पादन पृथ्वी पर नहीं, बल्कि अंतरिक्ष में फैले हुए बड़े-बड़े सितारों पर हुआ था और उल्कापिंड के पृथ्वी से टकराने से यहां तक पहुंचा है।
क़ुरआन ने लोहे के पृथ्वी के बाहर से यहां आने की बात 1400 वर्ष पूर्व ही बता दी थी।
‘‘...और हमने लोहा उतारा जिसमें बड़ा ज़ोर है और लोगों के लिए लाभ है...।’’ (क़ुरआन, 57:25)
यहां ‘‘उतारा’’ शब्द इस ओर संकेत कर रहा है कि लोहा पृथ्वी पर उत्पन्न नहीं हुआ बल्कि बाहर से आया है।
संसार में हर चीज़ जोड़े के रूप में पाई जाती है
1933 में ब्रिटेन के वैज्ञानिक ‘पॉल डिराक’ ने यह खोज की कि संसार में हर चीज़ जोड़े के रूप में पाई जाती है। इस खोज के लिए उसे नॉबेल पुरस्कार भी दिया गया।
अब से 1400 वर्ष पूर्व ईश्वर इस सत्य की घोषणा क़ुरआन में इन शब्दों में कर चुका था—
‘‘पवित्र है वह सत्ता जिसने सब प्रकार के जोड़े पैदा किए चाहे वे ज़मीन की वनस्पतियों में से हों या ख़ुद उनकी अपनी जाति (अर्थात् मानवजाति) में से या उन चीज़ों में से जिनको ये जानते तक नहीं हैं।’’ (क़ुरआन, 36:36)
‘‘और हर चीज़ के हमने जोड़े बनाए हैं। शायद कि तुम उससे शिक्षा ग्रहण करो।’’ (क़ुरआन, 51:49)
समय की सापेक्षता
बीसवीं शताब्दी के आरंभ में ‘आइंसटाइन’ ने सबसे पहले ‘सापेक्षता के सिद्धांत’ के माध्यम से ‘समय की सापेक्षता’ को उजागर किया। इससे पूर्व लोगों को इसका कोई ज्ञान नहीं था और वह यह नहीं जानते थे कि समय पर अन्य तथ्यों का प्रभाव भी पड़ता है। उसने प्रमाणित किया कि भार और गति के परिवर्तन से समय भी परिवर्तित होता है। ईश्वर ने 1400 वर्ष पूर्व ही क़ुरआन में इस ओर संकेत कर दिया था।
‘‘ये लोग अज़ाब के लिए जल्दी मचा रहे हैं। अल्लाह हरगिज़ अपने वादे के ख़िलाफ़ नहीं करेगा, मगर तेरे रब के यहां का एक दिन तुम्हारी गणना के हज़ार वर्ष के बराबर हुआ करता है।’’ (क़ुरआन, 22:47)
‘‘वह आसमान से ज़मीन तक दुनिया के मामलों का संचालन करता है और इस संचालन का ब्योरा उसके पास जाता है एक ऐसे दिन में जिसकी माप तुम्हारी गणना से एक हज़ार वर्ष है।’’ (क़ुरआन, 32:5)
पृथ्वी के वातावरण की परतें
अब वैज्ञानिकों ने यह खोज कर ली है कि हमारी पृथ्वी के चारों ओर का पूरा वातावरण सात परतों में बना है। इन परतों के नाम इस प्रकार हैं—
क्षोभ-मंडल (Tropo-sphere), समताप-मंडल (Strato-sphere), मध्य-मंडल (Meso-sphere), ताप-मंडल (Thermo-sphere), आयन-मंडल (Iono-sphere), बाह्य-मंडल (Exosphere) और ओज़ोन-मंडल (Ozone-sphere)।
ईश्वर ने क़ुरआन के माध्यम से इन्सानों को इस सत्य से 1400 पूर्व ही अवगत करा दिया था। साथ ही उसने यह भी अवगत करा दिया था कि इनमें से हर परत की अलग भूमिका है जो उसके लिए निर्धारित कर दी गई है।
‘‘वही तो है जिसने तुम्हारे लिए धरती की सारी चीज़ें पैदा की, फिर ऊपर की ओर रुख़ किया और सात आसमान ठीक तौर पर बनाए। और वह हर चीज़ का ज्ञान रखने वाला है।’’ (क़ुरआन, 2:29)
‘‘फिर उसने आसमान की ओर रुख़ किया जो उस समय सिर्फ़ धुआं था। उसने आसमान और ज़मीन से कहा, ‘‘अस्तित्व ग्रहण करो, चाहे तुम चाहो या न चाहो।’’ दोनों ने कहा—‘‘हम आ गए आज्ञाकारियों की तरह।’’ तब उसने दो दिन के अन्दर सात आसमान बना दिए, और हर आसमान में उसके क़ानून की प्रकाशना कर दी।’’ (क़ुरआन, 41:11-12)
वर्षा उपक्रम
बीसवीं शताब्दी से पूर्व यह धारणा थी कि वर्षा में हवाओं की भूमिका मात्र बादलों को इधर-उधर उड़ाने की है। परन्तु आज मौसम विज्ञान का मानना है कि हवाएं बादलों को उड़ाने के अतिरिक्त समुद्र के पानी को बादल में परिवर्तित करने का काम भी करती हैं। यदि हवा में यह विशेषता न होती तो न बादल बनता और न वर्षा होती।
ईश्वर ने, जिसने इस सारे प्रक्रम की रचना की, 1400 वर्ष पूर्व क़ुरआन में इस सत्य को व्यक्त कर दिया था।
‘‘फलदायक हवाओं को हम ही भेजते हैं, फिर आसमान से पानी बरसाते हैं और उस पानी से तुम्हें सिंचित कर देते हैं।’’ (क़ुरआन, 15:22)
‘‘अल्लाह ही है जो हवाओं को भेजता है और वे बादल उठाती हैं, फिर वह उन बादलों को आसमान में फैलाता है जिस तरह चाहता है और उन्हें टुकड़ियों में बांटता है, फिर तू देखता है कि वर्षा की बूंदे बादल में से टपकी चली आती हैं। यह वर्षा जब वह अपने बन्दों में से जिन पर चाहता है बरसाता है तो अचानक वे ख़ुश और प्रसन्न हो जाते हैं, हालांकि इसके उतरने से पहले वे निराश हो रहे थे।’’ (क़ुरआन, 30:48-49)
दो प्रकार के समुद्र
समुद्र का पानी कहीं पर मीठा होता है और कहीं पर खारा। एक ही समुद्र होने के बाद भी यह पानी आपस में मिलते नहीं। इसका ज्ञान समुद्र वैज्ञानिकों को अब से कुछ ही वर्ष पूर्व हुआ है जब पृष्ठ-तनाव (Surface Tension) की खोज हो गई। क़ुरआन में ईश्वर ने इस अद्भुत तथ्य से मनुष्य को 1400 वर्ष पूर्व ही अवगत करा दिया था।
‘‘दोनों समुद्रों को उसने छोड़ दिया कि परस्पर मिल जाएं, फिर भी उनके बीच एक परदा पड़ा है जिसको वे पार नहीं करते।’’ (क़ुरआन, 55:19-20)
‘‘और वही है जिसने दो समुद्रों को मिला रखा है। एक स्वादिष्ट और मीठा, दूसरा कड़ुआ और खारा। और दोनों के बीच एक परदा पड़ा है। एक रुकावट है जो उन्हें गड्मड् होने से रोके हुए है।’’ (क़ुरआन, 25:53)
समुद्र की गहराई में लहरों और प्रकाश की स्थिति
उपकरणों की सहायता के बिना इन्सान समुद्र में 40 मीटर से अधिक गहराई तक प्रवेश नहीं कर सकता। परन्तु आधुनिक युग में ऐसे उपकरणों का आविष्कार हो गया है कि 200-300 मीटर की गहराई तक प्रवेश संभव हो गया है और वहां पर लहरों और प्रकाश की स्थिति के बारे में जानना बहुत सरल हो गया है। लंदन से प्रकाशित पुस्तक ‘समुद्र’ में इस विषय पर विस्तार से जानकारी उपलब्ध है। समुद्र-विज्ञान ने यह ज्ञात कर लिया है कि समुद्र की सतह के नीचे भी लहरें होती हैं और गहराई में धनत्व के साथ ही लहरों के स्वरूप में भी परिवर्तन हो जाता है। इन आन्तरिक लहरों को आंखों से नहीं देखा जा सकता। यह भी ज्ञात हुआ है कि समुद्र की सतह के नीचे गहराई के साथ अंधकार बढ़ता जाता है।
क़ुरआन के ईश-ग्रंथ होने का यह एक बड़ा प्रमाण है कि इसमें 1400 वर्ष पूर्व ही इन आन्तरिक लहरों और वहां पर व्याप्त अंधकार के बारे में चर्चा मिलती है।
‘‘या फिर (इन्कार करने वालों के कर्मों की) मिसाल ऐसी है जैसे एक गहरे समुद्र में अंधकार, कि ऊपर एक मौज छाई हुई है, उस पर एक और मौज और उसके ऊपर बादल, अंधकार पर अंधकार छाया हुआ है, आदमी अपना हाथ निकाले तो उसे भी न देखने पाए। जिसे अल्लाह प्रकाश न प्रदान करे उसके लिए फिर कोई प्रकाश नहीं।’’ (क़ुरआन, 24:40)
गर्भ में भ्रूण के विकास के विभिन्न चरण
भ्रूण-विज्ञान ने आज यह ज्ञात कर लिया है कि मां के गर्भ में भ्रूण किन-किन चरणों से गुज़रता हुआ एक जीवित शिशु की अवस्था को पहुंचता है। अब से 1400 वर्ष पूर्व इस विषय में किसी को कोई ज्ञान नहीं था। उस समय ईश्वर ने क़ुरआन में इस विषय पर जो बातें अवतरित की थीं उनके आधार पर निम्नलिखित सत्य की स्थापना हो गई थी—
(क) पुरुष के वीर्य के अति-सूक्ष्म अंश से ही मनुष्य के जीवन की नींव पड़ती है।
‘‘क्या इन्सान ने यह समझ रखा है कि वह यूं ही आज़ाद छोड़ दिया जाएगा? क्या वह एक तुच्छ पानी का वीर्य न था जो (मां के गर्भाशय में) टपकाया जाता है?’’  
(क़ुरआन, 75:36-37)
(ख) शिशु के लिंग का चयन पुरुष के शुक्राणु पर निर्भर करता है न कि स्त्री के।
‘‘और यह कि उसी ने नर और मादा का जोड़ा पैदा किया एक बूंद से जब वह टपकाई जाती है।’’ (क़ुरआन, 53:45-46)
(ग) भ्रूण आरंभिक अवस्था स्त्री के गर्भ में जोंक की तरह चिपका होता है।
‘‘जमे हुए ख़ून के एक लोथड़े से इन्सान की रचना की।’’ (क़ुरआन, 96:2)
(घ) भ्रूण को मां के गर्भ के अंधकार में तीन चरणों से गुज़रना पड़ता है।
‘‘...वह तुम्हारी मांओं के पेटों में तीन-तीन अंधकारमय परदों के भीतर तुम्हें एक के बाद एक रूप देता चला जाता है...।’’ (क़ुरआन, 39:6)
(ड़) मां के गर्भ में पहले हड्डी का निर्माण होता है फिर उस पर गोश्त की परत चढ़ाई जाती है।
‘‘फिर उस बूंद को लोथड़े का रूप दिया, फिर लोथड़े की बोटी बना दिया, फिर बोटी की हड्डियां बनाईं, फिर हड्डियों पर मांस चढ़ाया, फिर उसे एक दूसरी ही सृष्टि बना खड़ा किया।’’ (क़ुरआन, 23:14)
शिशु के लिए मां के दूध का महत्व
मां का दूध नवजात शिशु के शारीरिक एवं मानसिक विकास के लिए कितना आवश्यक है यह बात किसी से छिपी नहीं है। बाज़ार में बिकने वाला कृत्रिम दूध मां के दूध का बदल नहीं हो सकता। आहार विशेषज्ञों ने यह बात भी ज्ञात कर ली है कि जन्म के उपरांत दो वर्ष तक मां का दूध शिशु के लिए अति लाभदायक होता है।
यह जानकारी ईश्वर ने क़ुरआन में 1400 वर्ष पूर्व ही दे दी थी कि मां को दो वर्ष तक नवजात शिशु को अपना ही दूध पिलाना चाहिए।
‘‘और यह वास्तविकता है कि हमने इन्सान को अपने मां-बाप का हक़ पहचानने की स्वयं ताकीद की है। उसकी मां ने कमज़ोरी पर कमज़ोरी झेलकर उसे अपने पेट में रखा और दो वर्ष उसका दूध छूटने में लगे। (इसीलिए हमने इन्सान को नसीहत की कि) मेरे प्रति कृतज्ञता दिखाओ और अपने मां-बाप के प्रति कृतज्ञ हो, मेरी ही ओर तुझे पलटना है।’’ (क़ुरआन, 31:14)

पत्नी की पिटाई।

प्र्शन-  क्या इस्लाम बीवी को मारने का हुक्म देता है? Wife Beating in Islam ?


उत्तर- यह झूठ के सहारे फैलाई गई एक झूठी अफवाह एक गलत फहमी है जो कुरआन की उस आयात को गलत तरीके तोड़ मरोड़ कर पेश  किया जाता अनजान लोगो में भर्म फैलाया   जाता है 


असल बात ये नहीं कि शोहर जब चाहे किसी भी बात पर बीवी को मार सकता है बल्कि कुरआन में यह पूरी बात देखें तो वहां मामला ही कुछ और है।

यह कुरआन की सूरेह 4:आयत 34 नं है! इसमें पूरी बात यह लिखी है कि अगर तुम बीवी में सरकशी देखो यानि अगर बीवी बेवफ़ाई पर उतर आए या बगावत करे या अपनी कोई जिम्मेदारी जो इस्लाम ने उसपर बीवी की हैसियत से डाली है निभाने से इनकार करे यानि तलाक भी ना मांग रही हो और बीवी की तरह भी रहने के लिए तैयार ना हो जिसके नतीजे में घर का निज़ाम ना चल सकता हो तो कुरआन ने शोहर को मशवरा दिया कि उन्हें सीधे तलाक ना दो बल्कि घर बचाने की कोशिश इस तरह करो कि पहले उसे समझाओ! ज़ाहिर है समझाने के भी कई तरीके होते हैं पहले शोहर खुद समझाएगा उससे बात ना बनी तो अपने बड़ों को, अपने घर के शुभचिंतकों को और बीवी के घर वालों को साथ में ला कर भी समझाने की कोशिश करेगा!

इसके बाद भी अगर समझाने में कामयाबी नहीं मिली तो कुरआन ने कहा है कि बीवी से अपना बिस्तर अलग कर दो! यानि बहुत ज़्यादा नाराज़गी का इज़हार करो शायद इस से वो बाज़ आजाए! इसके बाद भी अगर बात नहीं बनी तो उसे सही रास्ते पर लाने के लिए हलकी मार मार सकते हो! जिसे हज़रत मुहम्मद (स) ने फ़रमाया कि इतना ज़ोर से ना मारो कि निशान वगैरा हो जाए (सही मुस्लिम 2950) और मूह पर मारने से भी आप ने माना फ़रमाया!

यह शोहर के हक की आखरी हद है इससे आगे उसे कोई कदम उठाने का हक नहीं, फिर बस तलाक ही आखरी रास्ता है! लेकिन अगर इससे बात बन जाए तो इसी आयत में आगे अल्लाह ने फ़रमाया है कि फिर बीवी को बिलकुल माफ़ कर दो और उससे बदला लेने के बहाने तलाश ना करो! यहाँ देखें 


पति पत्नियों संरक्षक और निगराँ है, क्योंकि अल्लाह ने उनमें से कुछ को कुछ के मुक़ाबले में आगे रहा है,  तो नेक पत्ऩियाँ तो आज्ञापालन करनेवाली होती है और गुप्त बातों की रक्षा करती है, क्योंकि अल्लाह ने उनकी रक्षा की है। और जो पत्नियों ऐसी हो जिनकी सरकशी का तुम्हें भय हो, उन्हें समझाओ और बिस्तरों में उन्हें अकेली छोड़ दो और (अति आवश्यक हो तो) उन्हें मारो भी। फिर यदि वे तुम्हारी बात मानने लगे, तो उनके विरुद्ध कोई रास्ता न ढूढ़ो। अल्लाह सबसे उच्च, सबसे बड़ा है । सूरह 4: आयत 34 


याद रखये यह हक भी सिर्फ एक कंडीशन में दिया गया है जब शोहर तलाक देने से बचना चाहता हो और कोशिश करना चाहता हो कि किसी तरह मेरा परिवार बच जाए! बीवी से बदला लेने के लिए या उसे सज़ा देने के लिए यह नियम बिलकुल नहीं है! और ध्यान रहे इस हाथ उठाने का मतलब भी ज़ुल्म करना नहीं है अगर शोहर ने ऐसे मारा जिसे ज़ुल्म कहते हैं तो फिर वो क़ानूनी सज़ा का हकदार हो जाएगा! 


इस पर सवाल किया जा सकता है कि अगर शोहर अपने फ़र्ज़ ना निभा रहा हो तो क्या बीवी को भी उसे सीधे रास्ते पर लाने के लिए ऐसे ही सब शोहर के साथ करने का हक है ?

तो जी हाँ बीवी उसे समझाएगी, बड़ों को भी बीच में लाएगी, नाराज़गी का इज़हार भी हर तरह से करेगी लेकिन वो शोहर को मार नहीं सकती! और मार इसलिए नहीं सकती क्यों कि वो रिश्ते में बीवी से बड़ा है! जैसे बाप का रिश्ता बेटे से बड़ा होता है इसी लिए बाप हज़ार गलती करे लेकिन बेटे को उस पर हाथ उठाने का हक नहीं है, बाकि वो बाप को सही राह पर लाने के सब तरीके आज़माए गा! लेकिन अगर उसने हाथ उठा दिया तो यह उसके रिश्ते की तौहीन होगी इसी तरह अगर बीवी को भी हाथ उठाने का हक दिया जाए तो फिर शोहर का रिश्ता बड़ा कहाँ रहा ?


क़ुरआन की नसीहत : औरतों के साथ किस तरह पेश आना चाहिए ?

क़ुरआन में अल्लाह ( ईश्वर) ने फ़र्माया है 


तुम औरतों के साथ हुस्ने सुलूक से ज़िन्दगी गुज़ारो और अगर तुम को उन की ( कोई आदत ) अच्छी न लगे ( तो उस की वजह से सख्ती का बर्ताव न किया करो बल्कि उस पर सब्र करो )

क्योंकि , मुमकिन है तुम किसी चीज़ को ना पसंद करो , मगर अल्लाह ने उस में बहुत ज़ियादा भलाई रख दी हो ।


(सूरह निसा 4: आयत11)


आप प्यारे नबी ए करीम सल्ल

लल्लाहु अलैहे वैसल्लम ने फरमाया है की तुम मे से बेहतरिन शख्स वो है जो अपनी बीवी से अच्छा

सलुक करे । ( मिश्कात सफा 282)


वर्जिन मैरी कैसे।

हज़रत मरयम पर जिस समय लोग व्यभिचार का आरोप लगा रहे थे उस का उत्तर देते हुए अल्लाह ने फरमाया-

وَالَّتِي أَحْصَنَتْ فَرْجَهَا فَنَفَخْنَا فِيهَا مِنْ رُوحِنَا وَجَعَلْنَاهَا وَابْنَهَا آيَةً لِلْعَالَمِينَ

और वह नारी जिसने अपनी पवित्रता की रक्षा की थी, हमने "उसके भीतर अपनी रूह फूँकी और उसे और उसके बेटे को सारे संसार के लिए एक निशानी बना दिया" [सूरह अंबिया 21; आयत 91]

यहाँ पर अरबी शब्द 'अह्सनत फर्जहा' का अर्थ होता है अपनी पवित्रता (अर्थात इज्ज़त) की सुरक्षा। हज़रत मरयम की एक खूबी यहाँ यह बतायी गयी कि उन्हों ने अपनी शेह्वत (वासना) को काबू में रखा।

'आत्मा (रूह) फूंकने' का अर्थ है आत्मा का शरीर में प्रवेश कराना। इस प्रकार का जनम हज़रत मरयम और हजरत ईसा के साथ एक विशेष मामला था जिसके विशेष कारण थे। इस बात को सारे मनुष्यों पर लागू नहीं कर सकते।

हज़रत मरयम का बिना पति के संतान पैदा करना आधुनिक विज्ञान के अनुसार संभव था
आधुनिक विज्ञान ने एक नयी खोज कर ली है जिसमें बिना बाप के पुरुष संतान पैदा हो सकती है। इसको वैज्ञानिक भाषा में पार्थीनोजेनेसिस (parthenogenesis) कहा जाता है। पहले पहले यह केवल निचले कीड़े मकोड़ों में देखा जाता था, लेकिन 2 अगस्त 2007 को यह पता चल गया कि दक्षिण कोरया के वैज्ञानिक Hwang Woo-Suk ने parthenogenesis के माध्यम से पहला मनुष्य भ्रूण (embryo) पैदा किया। अधिक जानकारी के लिए देखिए यह वेबसाइट

http://www.scientificamerican.com/article.cfm?id=korean-cloned-human-cells

अफ़सोस कि विज्ञान ने आपका साथ नहीं दिया बल्कि कुरआन की पुष्टि करदी। निश्चित रूप से कुरआन अल्लाह की कित्ताब है जिस पर अब आपको विशवास करना चाहिए।

कलश से अगस्त्य और वसिष्ठ

ऋग्वेद में आता है कि मित्र और वरुण देवता उर्वशी नामक अप्सरा को देख कर कामपीडित हुए। उन का वीर्य स्खलित हो गया, जिसे उन्होंने यज्ञ कलश में दाल दिया। उसी कलश से अगस्त्य और वसिष्ठ उत्पन्न हुए:

उतासि मैत्रावरुणो वसिष्ठोर्वश्या बरह्मन मनसो.अधि जातः |
दरप्सं सकन्नं बरह्मणा दैव्येन विश्वे देवाः पुष्करे तवाददन्त ||
स परकेत उभयस्य परविद्वान सहस्रदान उत वा सदानः |
यमेन ततं परिधिं वयिष्यन्नप्सरसः परि जज्ञे वसिष्ठः ||
सत्रे ह जाताविषिता नमोभिः कुम्भे रेतः सिषिचतुः समानम |
ततो ह मान उदियाय मध्यात ततो जातं रषिमाहुर्वसिष्ठम ||
- ऋग्वेद 7/33/11-13

अर्थात "हे वसिष्ठ, तुम मित्र और वरुण के पुत्र हो। हे ब्रह्मण, तुम उर्वशी के मन से उत्पन्न हो। उस समय मित्र और वरुण का वीर्य स्खलन हुआ था। विश्वादेवगन ने दैव्य स्तोत्र द्वारा पुष्कर के बीच तुम्हें धारण किया था। यज्ञ में दीक्षित मित्र और वरुण ने स्तुति द्वारा प्रार्थित हो कर कुंभ के बीच एकसाथ ही रेत (वीर्य) स्खलन किया था। अनंतर मान (अगस्त्य)उत्पन्न हुए। लोग कहते हंस कि ऋषि वसिष्ठ उसी कुंभ से जन्मे थे."

आप बोलिए यह कैसे संभव है?


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हज़रत मरयम पर जिस समय लोग व्यभिचार का आरोप लगा रहे थे उस का उत्तर देते हुए अल्लाह ने फरमाया-
وَالَّتِي أَحْصَنَتْ فَرْجَهَا فَنَفَخْنَا فِيهَا مِنْ رُوحِنَا وَجَعَلْنَاهَا وَابْنَهَا آيَةً لِلْعَالَمِينَ
और वह नारी जिसने अपनी पवित्रता की रक्षा की थी, हमने "उसके भीतर अपनी रूह फूँकी और उसे और उसके बेटे को सारे संसार के लिए एक निशानी बना दिया" [सूरह अंबिया 21; आयत 91]
यहाँ पर अरबी शब्द 'अह्सनत फर्जहा' का अर्थ होता है अपनी पवित्रता (अर्थात इज्ज़त) की सुरक्षा। हज़रत मरयम की एक खूबी यहाँ यह बतायी गयी कि उन्हों ने अपनी शेह्वत (वासना) को काबू में रखा।
'आत्मा (रूह) फूंकने' का अर्थ है आत्मा का शरीर में प्रवेश कराना। इस प्रकार का जनम हज़रत मरयम और हजरत ईसा के साथ एक विशेष मामला था जिसके विशेष कारण थे। इस बात को सारे मनुष्यों पर लागू नहीं कर सकते।
हज़रत मरयम का बिना पति के संतान पैदा करना आधुनिक विज्ञान के अनुसार संभव था
आधुनिक विज्ञान ने एक नयी खोज कर ली है जिसमें बिना बाप के पुरुष संतान पैदा हो सकती है। इसको वैज्ञानिक भाषा में पार्थीनोजेनेसिस (parthenogenesis) कहा जाता है। पहले पहले यह केवल निचले कीड़े मकोड़ों में देखा जाता था, लेकिन 2 अगस्त 2007 को यह पता चल गया कि दक्षिण कोरया के वैज्ञानिक Hwang Woo-Suk ने parthenogenesis के माध्यम से पहला मनुष्य भ्रूण (embryo) पैदा किया। अधिक जानकारी के लिए देखिए यह वेबसाइट
http://www.scientificamerican.com/article.cfm?id=korean-cloned-human-cells

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कज़िन से शादी।

मुस्लिमों द्वारा अपने चाचा, मामा, बुआ की बेटियों से विवाह करने की प्रथा पर हमारे कुछ अन्य धर्म वाले भाईयों का बड़ी घृणा के साथ कहना है कि मुस्लिम अपनी ही बहनों के ही भाई नहीं होते, और मुस्लिमों की गन्दी नज़र ने उनकी अपनी बहनें ही नहीं बच पातीं 

 भाईयों आपका ये कटाक्ष सर आंखो पर लेते हुए मैं ये कहना चाहता हूँ कि मुस्लिमों को सिर्फ अपनी बहनों का ही नही बल्कि इसकी, उसकी, आपकी, मेरी सभी की बहनों का भाई बनने का, यानि संसार की सारी लड़कियों का भाई बनने का आदेश दिया गया है, चाहे वो लड़कियां किसी भी धर्म, जाति समुदाय की हों, उनके मान-सम्मान उनके सतीत्व और उनके जीवन की रक्षा हमें ठीक उसी प्रकार करनी है, जैसे एक भाई अपनी बहन की रक्षा करता है 

अब भाई, रहा सवाल इस बात का कि जो मुस्लिम अपनी ही चचेरी, ममेरी, फुफेरी और मौसेरी बहनों से विवाह करते हैं, ये उचित है या अनुचित, सराहनीय कार्य है या घृणास्पद ?
 तो इस बारे मैं इतना ही कहना चाहूंगा कि क्योंकि ऐसे विवाह की हर धर्म मे अनुमति है, तो आप चाहे जिस भी धर्म को उचित मानें, ये विवाह भी आपको उचित ही मानना होगा .....

ऐसे विवाह की विशेषता ये है कि क्योंकि वधू, वर पक्ष के किसी अपने ही प्रिय सम्बन्धी की ही बेटी होती है, इसलिए दहेज प्रताड़ना, दहेज हत्या की संभावना शून्य, और वधू के मानसिक या शारीरिक उत्पीड़न की संभावना बिलकुल क्षीण रहती है ... पति को अपने ससुराल पक्ष का इस कारण और लिहाज़ रहता है, कि वो पहले से उनके रिश्तेदार हैं, इसलिए अकारण वो पत्नी को त्यागने आदि से खुद को रोकता है...
 फिर ऐसे विवाह मे विशेषकर लड़की के विवाह मे आसानी रहती है, लड़की यदि गुणवती है तो उसके गुणों से मुग्ध हो कर, और यदि गुणवती नहीं भी है तो भी उसके परिवार से प्रेम के कारण खानदान से ही लड़की के रिश्ते आ जाते हैं, क्योंकि लड़की को देखने वाला उसका भावी ससुराल पक्ष उसके घर मे सदा से ही आता जाता रहा है 
 पति पत्नी या उनके परिवारों के आपस मे व्यवहार न मिल पाने के कारण विवाह के टूटने का भय भी इस विवाह मे न्यून है क्योंकि दोनों परिवार वर वधू के जन्म से भी पहले से एक दूसरे को अच्छी तरह जानते हैं, और एक दूसरे के व्यवहार को वर्षों अच्छी तरह परखने, और विवाह के लिए वर वधू की सहमति के बाद ही आपस मे ये नया सम्बन्ध जोड़ते हैं .... और सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि करीबी सम्बन्धियों मे विवाह की प्रथा से लड़के लड़कियों के विवाह मे देरी की नौबत नही आती, जिससे नई पीढ़ी मे भटकाव की समस्या भी नही आने पाती, जबकि अन्य परिवारों मे रिश्ता ढूंढने और पसंद करने मे कई वर्ष लग जाते हैं, इसके बाद भी विवाह के सफल न होने का डर अलग ...!! इन्हीं सारे कारणों से मैं तो करीबी रिश्तेदारियों मे विवाह की प्रथा को एक सराहनीय कार्य मानता हूँ .
आज भी हिन्दू समाज में पुरे साऊथ इंडिया में up और उड़ीसा के कुछ जगहों पे चचेरी ममेरी फुफेरी बहन से शादिया होती है और साऊथ में तो सगी भांजी से भी 

संभवत: इसी कारण हर धर्म ने इस विवाह की अनुशंसा की है, महात्मा बुद्ध की पत्नी यशोधरा उनके सगे मामा और सगी बुआ की बेटी थीं, और स्वयं श्रीकृष्ण जी ऐसे विवाह के पक्ष मे थे . कृष्ण जी ने अपनी बहन सुभद्रा का विवाह अपनी सगी बुआ के पुत्र अर्जुन से करवाया था ! अर्जुन सुभद्रा के सगे फुफेरे भाई थे, और सुभद्रा अर्जुन की सगी ममेरी बहन थीं, नीचे लिखे प्रमाणों से ये बात भली प्रकार सिद्ध होती है :- 

1- वसुदेव एक यदुवंशी जिनके पिता का नाम शूर और माता का नाम मारिषा था।
 *. ये मथुरा के राजा उग्रसेन के मन्त्री थे। पांडवों की माता कुंती वसुदेव की सगी बहन थी ।

http://bharatdiscovery.org/india/वसुदेव

2- पृथा (कुंती) महाराज शूरसेन की बेटी और वसुदेव की बहन थीं। शूरसेन के ममेरे भाई कुंतिभोज ने पृथा को माँगकर अपने यहाँ रखा। इससे उनका नाम 'कुंती' पड़ गया, कुंती भगवान श्रीकृष्ण की बुआ थीं। कुन्ती को इन्द्र के अंश से अर्जुन का जन्म हुआ। 

http://bharatdiscovery.org/india/कुन्ती

3- सुभद्रा कृष्ण की बहिन जो वसुदेव की कन्या और अर्जुन की पत्नी थीं। इनके बड़े भाई बलराम इनका ब्याह दुर्योधन से करना चाहते थे पर कृष्ण के प्रोत्साहन से अर्जुन इन्हें द्वारका से भगा लाए। सुभद्रा के पुत्र अभिमन्यु , महाभारत के प्रसिद्ध योद्धा हैं।
http://bharatdiscovery.org/india/सुभद्रा 


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मुस्लिम वैज्ञानिक।


मुस्लिमो के लिए धार्मिक और आधुनिक ज्ञान का महत्व

मुस्लिमो के लिए ज्ञान के क्या मायने हैं उसे कुरआन ने अपनी पहली ही आयत में स्पष्ट कर दिया है अतीत 
में मुस्लिमो ने इसी आयत  का पालन करते हुए वह स्थान प्राप्त कर लिये थे जिस के बारे में आज कोई विचार नही कर सकता।
मुस्लिम ज्ञान के हर क्षेत्र में आगे थे चाहे उसका सम्बन्ध धार्मिक ज्ञान से हो या आधुनिक ज्ञान से , धार्मिक ज्ञान में वे मुफक्किर-ए-इस्लाम और वलीउल्लाह थे तो आधुनिक ज्ञान में उनकी गणना दुनिया के बड़े वैज्ञानिकों में होती थी यही कारण था कि अल्लाह ने धार्मिक और आधुनिक ज्ञान के कारण उन्हें बुलंदियों पर बिठा दिया था।
मुस्लिमो ने विज्ञान के हर क्षेत्र में अपनी खिदमतों को अंजाम दिया है और विज्ञान को मजबूती प्रदान की है खुद कुरआन में 1000 आयत ऐसी है जिन का सम्बन्ध वैज्ञानिक संस्था से है , विज्ञान का कोई क्षेत्र ऐसा नही जिसमे मुस्लिमो  ने अपनी खिदमतों को अंजाम न दिया हो अगर रसायन (Chemistry) का इतिहास उठा कर देखो तो पता चलता है कि हम रसायन शास्त्री (Chemist) थे गणित (Mathematics) का इतिहास उठा कर देखो तो पता चलता है कि हम गणितज्ञ (Mathematician) थे , जीव बताती है कि हमे जीवविज्ञान में उच्च स्थान प्राप्त था लेकिन इन सबकी वज़ह मुस्लिमो  का इस्लाम से कुराआन से अल्लाह से जुड़ा होना था कोई साइंसदान हाफिज था तो कोई किसी मदरसे का कुल शोधकर्ता।
– तब हम तादाद में कम थे लेकिन ज्ञान के हुनर-ओ-फन में हमारा कोई सानी(competitor) नही था , हमारे ज्ञान व कला को देख कर विरोधी तक हमारी प्रशंसा करने के लिए मजबूर हो जाते थे , आज हम करोड़ो में हैं लेकिन ये फन हमारे हाथों से निकलता जा रहा है क्यूंकि हमारा सम्बन्ध अल्लाह और उसके रसूल से हटता जा रहा है।

मुस्लिम वैज्ञानिकों की विज्ञान में अंजाम दी गयी सेवाओं का एक हिस्सा आपकी सेवा में-

१. अल तूसी (खगोलशास्त्र)

इनका पूरा नाम अल अल्लामा अबू जाफर मुहम्मद बिन मुहम्मद बिन हसन अल तूसी है ये सातवीं सदी हिजरी के शुरू में तूस में पैदा हुए इनकी गणना इस्लाम धर्म के बड़े साइंसदानो में होती है इन्होने बहुत सारी किताबे लिखीं जिनमे सब से अहम “शक्ल उल किताअ” है, यह पहली किताब थी जिसने त्रिकोणमिति को खगोलशास्त्र से अलग किया।
अल तूसी ने अपनी रसदगाह में खगोलीय टेबल बनाया जिस से यूरोप ने भरपूर फायदा उठाया अल तूसी ने बहुत से खगोलीय समस्याओ को हल किया और बत्लूम्स से ज्यादा आसान खगोलीय मानचित्र बनाया उन्ही की मेहनत और परिश्रम ने कूपर निकस को सूरज को सौर मण्डल का केंद्र करार देने में मदद दी इससे पहले पृथ्वी को ब्रह्मांड का केंद्र माना जाता था।
इन्होने आज के आधुनिक खगोल का मार्ग प्रशस्त किया इसके साथ उन्होंने ज्यामिति के द्रष्टिकोण में नये तथ्य शामिल किये।
मशहूर इतिहासकार शार्टन लिखता है “तूसी इस्लाम के सब से महान वैज्ञानिक और सबसे बड़े गणितज्ञ थे इसी मशहूर वैज्ञानिक ने त्रिकोणमिति की बुनियाद डाली और उससे सम्बंधित कई कारण भी बतलाये , खगोल विज्ञान की पुस्तकों में “अलतजकिरा अलनासरिया ” जिसे “तजकिरा फी इल्म नसख” के नाम से भी जाना जात है खगोल शास्त्र की एक मशहूर किताब है जिसमें इन्होने ब्रह्मांड प्रणाली में हरकत की महत्वता , चाँद का परिसंचरण (Rotation) और उसका हिसाब , धरती पर खगोलीय प्रभाव, कोह, रेगिस्तान , समुन्द्र, हवाएं और सौर प्रणाली के सभी विवरण स्पष्ट कर दिए, तूसी ने सूर्य और चंद्रमा की दूरी को भी स्पष्ट किया और ये भी बताया कि रात और दिन कैसे होते हैं।

२. जाबिर बिन हियान (रसायन शास्त्री)

जाबिर बिन हियान जिन्हें इतिहास का पहला रसायनशास्त्री कहा जाता है उसे पश्चिमी देश में गेबर (geber) के नाम से जाना जाता है, इन्हें रसायन विज्ञान का संस्थापक माना जाता है ,इनका जन्म 733 ईस्वी में तूस में हुई थी ,जाबिर बिन हियान ने ही एसिड की खोज की इन्होने एक ऐसा एसिड भी बनाया जिससे सोने को भी पिघलाना मुमकिन था जाबिर बिन हियान पहले व्यक्ति थे जिन्होंने पदार्थ को तीन भागों वनस्पति ,पशु और ,खनिज में विभाजित किया।
इसी मुस्लिम साइंसदान ने रासायनिक यौगिकों जैसे – कार्बोनेट, आर्सेनिक, सल्फाइड की खोज की नमक के तेजाब, नाइट्रिक एसिड, शोरे के तेजाब, और फास्फोरस से जाबिर बिन हियान ने ही दुनिया को परिचित कराया ,जाबिर बिन हियान ने मोम जामा और खिजाब बनाने का तरीका खोजा और यह भी बताया कि वार्निश के द्वारा लोहे को जंग से बचाया जा सकता है।
जाबिर बिन हियान ने 200 से अधिक पुस्तकें रचना में लायीं जिनमें किताब अल रहमा ,किताब-उल-तज्मिया , जैबक अल शर्की , किताब-उल-म्वाजीन अल सगीर को बहुत लोकप्रियता प्राप्त है जिनका अनुवाद विभिन्न भाषाओँ में हो चुका है।

३. अल जज़री –

अल जजरी अपने समय के महान वैज्ञानिक थे ,इंजीनियरिंग के क्षेत्र में इन्होने अपार सेवाएँ प्रदान की ,इस महान वैज्ञानिक ने अपने समय में इंजीनियरिंग के क्षेत्र में इन्कलाब बरपा कर दिया था इनका सबसे बड़ा कारनामा ऑटोमोबाइल इंजन की गति का मूल स्पष्ट करना था और आज उन्हीं के सिद्धांत पर रेल के इंजन और अन्य मोबाइलों का आविष्कार संभव हो सका ,अल-जजरी ने ही सबसे पहले दुनिया को रोबोट का मंसूबा अता किया, इन्होने ही पानी निकालने वाली मशीन का आविष्कार किया और कई घड़ियों की भी खोज की जिनमे हाथी घड़ी,कैसल घड़ी,मोमबत्ती घड़ी,और पानी घड़ी भी शामिल हैं |

४. इब्न अल हैशम –

इब्न अल हैशम का पूरा नाम अबू अली अल हसन बिन अल हैशम है ये ईराक के एतिहासिक शहर बसरा में 965 ई में पैदा हुए , इन्हें भौतिक विज्ञान , गणित, इंजीनियरिंग और खगोल विज्ञान में महारत हासिल थी , इब्न अल हैशम अपने दौर में नील नदी के किनारे बाँध बनाने चाहते थे ताकि मिश्र के लोगों को साल भर पानी मिल सके लेकिन अपर्याप्त संसाधन के कारण उन्हें इस योजना को छोड़ना पड़ा , लेकिन बाद में उन्हीं की इस योजना पर उसी जगह एक बाँध बना जिसे आज असवान बाँध के नाम से जाना जाता है |
अतीत में माना जाता था कि आँख से प्रकाश निकल कर वस्तुओं पर पड़ता है जिससे वह वस्तु हमें दिखाई देती है लेकिन इब्न अल हैशम ने अफलातून और कई वैज्ञानिकों के इस दावे को गलत शाबित कर दिया और बताया कि जब प्रकाश हमारी आँख में प्रवेश करता है तब हमे दिखाई देता है इस बात को शाबित करने के लिए इब्न अल हैशम को गणित का सहारा लेना पड़ा , इब्न अल हैशम ने प्रकाश के प्रतिबिम्ब और लचक की प्रकिया और किरण के निरक्षण से कहा कि जमीन की अन्तरिक्ष की उंचाई एक सौ किलोमीटर है इनकी किताब “किताब अल मनाज़िर”प्रतिश्रवण के क्षेत्र में एक उच्च स्थान रखती है,उनकी प्रकाश के बारे में की गयी खोजें आधुनिक विज्ञान का आधार बनी , इब्न-अल-हैशम ने आँख पर एक सम्पूर्ण रिसर्च की और आँख के हर हिस्से को पूरे विवरण के साथ अभिव्यक्ति किया |
जिसमें आज की आधुनिक साइंस भी कोई बदलाव नही कर सकी है, इन्होने आँख का धोखा या भ्रम को खोजा जिसमे एक विशेष परिस्थिति में आदमी को दूर की चीजें पास और पास की दूर दिखाई देती हैं , प्रकाश पर इब्न अल हैशम ने एक परिक्षण किया जिसके आधार पर अन्य वैज्ञानिकों ने फोटो कैमरे का आविष्कार किया उनका कहना था कि “अगर किसी अंधेरे कमरे में दीवार के ऊपर वाले हिस्से से एक बारीक छेंद के द्वारा धूप की रौशनी गुजारी जाये तो उसके उल्ट अगर पर्दा लगा दिया जाये तो उस पर जिन जिन वस्तुओं का प्रतिबिम्ब पड़ेगा वह उल्टा होगा ” उन्होंने इसी आधार पर पिन होल कैमरे का आविष्कार किया।
इब्न अल हैशम ने जिस काम को अंजाम दिया उसी के आधार पर बाद में गैलीलियो, कापरनिकस और न्यूटन जैसे वैज्ञानिकों ने काम किया, इब्न अल हैशम से प्रभावित होकर गैलीलियो ने दूरबीन का आविष्कार किया – इब्न अल हैशम की वैज्ञानिक सेवाओं ने पिछले प्रमुख वज्ञानिकों के चिराग बुझा दिए।
इन्होने इतिहास में पहली बार लेंस की आवर्धक पावर की खोज की , इब्न अल हैशम ने ही यूनानी दृष्टि सिद्धांत (Nature of Vision) को अस्वीकार करके दुनिया को आधुनिक दृष्टि दृष्टिकोण से परिचित कराया।
जो चीजें इब्न अल हैशम ने खोजी पश्चिमी देशों ने हमेशा उन पर पर्दा डालने की कोशिस की , इब्न अल हैशम ने 237 किताबें लिखीं, यही कारण है कि अबी उसैबा ने कहा कि वो कशीर उत तसनीफ (अत्यधिक पुस्तक लिखने वाले) थे।

५. अबुलकासिस (सर्जरी का संस्थापक)

अबू कासिम बिन खल्फ बिन अल अब्बास अल जहरवी 936 में पैदा हुए मगरिब (पश्चिम) में इन्हें अबुलकासिस (Abulcasis) के नाम से जाना जाता है, इनकी पुस्तक “किताब अल तसरीफ” चिकित्सा के क्षेत्र की महान पुस्तक है जिसमें चिकित्सा विज्ञान के सभी कलाओं का उल्लेख किया गया है अल जहरवी ने ही सर्जरी की खोज की और इतिहास में पहली बार सर्जरी का प्रयोग कर दुनिया को इस नये फन से वाकिफ कराया।

६. अल-किंदी

इनका पूरा नाम याकूब इब्न इशहाक अल-किंदी है।  इनके पिता कूफा के गवर्नर थे इन्होने प्रारंभिक शिक्षा कूफ़ा ही में प्राप्त बाद में बगदाद चले गये, इनकी गणना इस्लाम के सर्वोच्च हुकमा और दार्शनिकों में होती है।  इन्हें गणित , चिकित्सा और खगोल विज्ञान में महारत हासिल थी।
अलकिंदी ने ही इस्लामी दुनिया को हकीम अरस्तू के ख्यालों से परिचित कराया और गणित, चिकित्सा विज्ञान, दर्शन, और भूगोल पर 241 उत्कृष्ट पुस्तकें लिखी जिनमें उनकी पुस्तक “बैत-उल-हिक्मा” (House of Wisdom) को बहुत लोकप्रियता प्राप्त है।

७. अल-बैरूनी

अबू रेहान अल बैरूनी का पूरा नाम अबू रेहान मुहम्मद इब्न अहमद अल बैरूनी है,.. ये 9 सितंम्बर 973 ई को ख्वारिज्म के एक गाँव बैरून में पैदा हुए, ये बहुत बड़े शोधकर्ता और वैज्ञानिक थे।
अल बैरूनी ने गणित , इतिहास के साथ भूगोल में ऐसी पुस्तकें लिखीं हैं जिन्हें आज तक पढ़ा जाता है, उनकी पुस्तक “किताब-अल-हिंद” को बहुत लोकप्रियता प्राप्त है, इस पुस्तक में अल बैरूनी ने हिन्दुओं के धार्मिक विश्वासों और इतिहास के साथ भारतीय भौगोलिक स्थिति बड़ी ही तहकीक से लिखें हैं।
बैरूनी ने कई साल हिन्दुस्तान में रह कर संस्कृत भाषा सीखी और हिन्दुओं के ज्ञान में ऐसी महारत हासिल की कि ब्राह्मण भी आश्चर्य करने लगे।
अल बैरूनी की लिखी पुस्तक “कानून मसूद” खगोल विज्ञान और गणित की बहुत महत्वपूर्ण पुस्तक है इस पुस्तक मन ऐसे साक्ष्य पेश किये गये हैं जो और कहीं नहीं मिलते। स्वरूप विज्ञान और गणित में अल बैरूनी को महारत हासिल थी, इन्होने भौतिकी, इतिहास, गणित के साथ-साथ धर्म, रसायन , और भूगोल पर 150 से अधिक पुस्तकें लिखी।
बैरूनी ने ही सब से पहले पृथ्वी को मापा था , अल बैरूनी ने आज से 1000 साल पहले महमूद गज़नवी के दौर में मौजूदा पाकिस्तान आने वाले उत्तरी पंजाब के शहर पिंड दादन खान से 22 किलोमीटर दूर स्थित नंदना में रुके , इसी प्रवास के दौरान इन्होने पृथ्वी की त्रिज्या को ज्ञात किया जो आज भी सिर्फ एक प्रतिशत के कम अंतर के साथ दुरुस्त है। सभी वैज्ञानिक इस बात से हैरत में हैं कि अल – बैरूनी ने आज से 1000 साल पहले जमीन की माप इतनी सटीकता के साथ कैसे कर ली?
अल-बैरूनी ने ही बताया कि पृथ्वी अपनी अक्ष (Axis) पर घूम रही है और ये भी स्पष्ट किया फव्वारों का पानी नीचे से ऊपर कैसे जाता है।

८. इब्न सीना

इब्न सीना का पूरा नाम “अली अल हुसैन बिन अब्दुल्लाह बिन अल-हसन बिन अली बिन सीना” है। इनकी गणना इस्लाम के प्रमुख डाक्टर और दर्शिनिकों में होती है पश्चिम में इन्हें अवेसेन्ना (Avicenna) के नाम से जाना जाता है ये इस्लाम के बड़े विचारकों में से थे , इब्न सीना ने 10 साल की उम्र में ही कुरआन हिफ्ज़ कर लिया था।
बुखारा के सुलतान नूह इब्न मंसूर बीमार हो गये। किसी हकीम की कोई दवाई कारगर शाबित न हुई, 18 साल की उम्र में इब्न सीना ने उस बीमारी का इलाज़ किया जिस से तमाम नामवर हकीम तंग आ चुके थे। इब्न सीना की दवाई से सुल्तान-इब्न-मंसूर स्वस्थ हो गये , सुल्तान ने खुश हो कर इब्न सीना को पुरस्कार रूप में एक पुस्तकालय खुलवा कर दिया।
अबू अली सीना की स्मरण शक्ति बहुत तेज़ थी उन्होंने जल्द ही पूरा पुस्तकालय छान मारा और जरूरी जानकारी एकत्र कर ली, फिर 21 साल की उम्र में अपनी पहली किताब लिखी |
अबू अली सीना ने २१ बड़ी और २४ छोटी किताबें लिखीं लेकिन कुछ का मानना है कि उन्होंने 99 किताबों की रचना की। उनकी गणित पर लिखी 6 पुस्तकें मौजूद हैं जिनमे “रिसाला अल-जराविया , मुख्तसर अक्लिद्स, अला रत्मातैकी, मुख़्तसर इल्म-उल-हिय , मुख्तसर मुजस्ता , रिसाला फी बयान अला कयाम अल-अर्ज़ फी वास्तिससमा (जमीन की आसमान के बीच रहने की स्थिति का बयान )” शामिल हैं।
इनकी किताब “किताब अल कानून (canon of medicine)” चिकित्सा की एक मशहूर किताब है जिनका अनुवाद अन्य भाषाओँ में भी हो चुका है। उनकी ये किताब 19वीं सदी के अंत तक यूरोप की यूनिवर्सिटीयों में पढाई जाती रही। अबू अली सीना की वैज्ञानिक सेवाओं को देखते हुए यूरोप में उनके नाम से डाक टिकट जारी किये गये हैं। 
आज हमें स्कूल और कॉलेजों में बताया जाता है कि “मुस्लिमो  ने जब कुस्तुन्तुनिया को अपने कब्जे में लिया तो वहां साइंस के और ज्ञान विज्ञान के तमाम स्त्रोत मौजूद थे लेकिन मुस्लिमो के लिए इन सब की कोई अहमियत न थी इस लिए मुस्लिमो ने उनको तबाह बर्बाद कर डाला” इस झूठे इतिहास को पढ़ा कर मुल्क हिन्दुस्तान और दुनिया के तमाम मुल्क के शिक्षा प्राप्त कर रहे विद्यार्थीयों कि मानसिकता को बदला जाता है और हकीकत को पैरों तले कुचल दिया जाता है – और मुस्लिम भी इसी झूठे इतिहास को पढ़ता रहता है क्यूंकि उसे असलियत का पता नही होता उसे ये इल्म नही होता कि हमने बहर-ए-जुल्मात में घोड़े दौडाएं हैं हमने समन्दरों के सीने चाक किये हैं हम ही ने परिंदों की तरह इंसान को परवाज़ करना सिखाया है, हम ही ने साइंस को महफूज़ किया है।
बड़ी अजीब बात है कि मुस्लिमो ने अपना इतिहास भुला दिया, उसे वह हुनर तो छोड़ो वह नाम ही याद नही जिनकी वज़ह से आधुनिक विज्ञान ने इतनी प्रगति की है ,मुस्लिम अतीत में एक सफल इंजिनियर भी रहे, एक चिकित्सक भी रहे, एक उच्च सर्जन भी रहे हैं, कभी इब्न-उल-हैशम बन कर प्रतिश्रवण के सिंहासन पर काबिज हो गये तो कभी जाबिर बिन हियान के रूप में रसायन विज्ञान का बाबा आदम बन कर सामने आये।


कश्मीरी पंडित।


काश्मीर और काश्मीरी पंडित

इस लेख को लिखने का आशय उस सच को सामने लाना है जो समाज में जहर घोलने वाले समाज के जहरीले सांप संघ के लोग हर समय काश्मीरी पंडितों पर हुए अन्याय और कत्लेआम को शेष भारत के मुसलमानों के सामने रखकर उन्हें गालियाँ देना शुरु कर देते हैं जब भी कश्मीरियों पे जुल्म की बात होती है तो ये अमन के दुश्मन धर्म के नाम पर समाज में जहर घोलने वाले लोग कश्मीरी पंडितो की बात करके खून को खून से धोने की कोसिस करते है जब की हक़ीक़त यह है की कश्मीरी पण्डित आज भी सकारी फ्लेट  सरकारी नोकरी और सर्कार के पैसो पर पल रहे है 

दरअसल संघ ने  झूठ का सहारा लेकर और अपने समर्थकों के हृदय में यह भर दिया कि काश्मीर में मुसलमानों ने काश्मीरी पंडितों को वहाँ से भगा दिया जो इधर उधर भटक रहे हैं और काश्मीरी पंडितों की हत्याएं भी कर दी
जो विषय काश्मीर में एक समग्र आतंकवाद का था उसे हिन्दू और मुसलमानों में बांट कर काश्मीरी मुसलमानों को भारत से दूर कर दिया

कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग मानने वालों का खून उस वक़्त क्यों नही खौलता है जब कश्मीरीयो पर जुल्म होती है उनकी बहन बेटियो की इज़्ज़त को तार तार किया जाता है 
नौजवानो की गोली मार दी जाती है 
उस वक़्त हमें गुस्सा क्यों नहीं आता  हम मोमबत्तियां लेकर सड़कों पर विद्रोह करते नजर क्यों नहीं आते है
फूलन देवी डाकू क्यों बनी थी इन्ही मनुवादी लोगो की वजह से नक्सलवाद को किसने पैदा किया है  इन्ही बनुवादि लोगो ने जब भी कोई पुलिस कर्मी पकड़ा जाता है तो नक्सली उनका प्राइवेट पार्ट्स क्यों काट देते है यह भी विचारणीय है 

इस लेख को लिखने के लिए जब मैने तथ्यों की पड़ताल  किया तो हैरान रह गया देख कर कि काश्मीरी पंडितो की हत्या से संबंधित लगभग सैकड़ों भगवा वेबसाइट्स गलत आंकड़ों और तथ्यों के साथ किस तरह समाज में गलत तस्वीरें पैदा कर रही हैं और अधिकांश वेबसाइट एक ही लेखों और आंकड़ों के साथ झूठा प्रपंच फैला रही हैं , वेबसाइटों के नाम अलग अलग और उसपर उपलब्ध सामग्री सब एक जिसमें एक मात्रा का भी अंतर नहीं। 
उनके नामों से ही लगता है कि वह किस गिरोह की वेबसाइट्स हैं और किस उद्देश्य से हैं।

1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार भाजपा और वाम मोर्चा के सहयोग से बनती है और जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री मुफ्ती मुहम्मद सईद तब भारत के गृहमंत्री बन जाते हैं , उनकी बेटी डाक्टर रूबिया सईद का आतंकवादी अपहरण कर लेते हैं तब देश को काश्मीर के आतंकवाद का पता चलता है , गृहमंत्री की बेटी देश से महत्वपूर्ण साबित हुई और विश्वनाथ प्रताप सिंह की  सरकार काश्मीर के तब तक के सबसे बड़े पाँच आतंकवादियों को छोड़कर गृहमंत्री की लाडली की रिहाई कराती है।
फिर हजरत बल दरगाह पर कब्ज़ा करके पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों ने देश को काश्मीर के आतंकवाद की ओर ध्यान दिलाया 

संघ और भाजपा के दबाव में संघ के चहेते  जगमोहन को काश्मीर में राज्यपाल बनाकर भेजा गया और आतंकवाद प्रभावित काश्मीर को उन्होंने समग्र रूप से देखने की बजाए हिन्दू मुस्लिम के आधार पर विभाजित कर दिया ।

पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद की चपेट में सब आए सब मारे गये , कहीं काश्मीरी पंडित तो कहीं काश्मीरी मुस्लिम , हिन्दू भी मरे तो मुस्लिम भी मरे पर जगमोहन ने दोगलापन दिखाते हुए काश्मीर की घाटी से केवल काश्मीरी पंडितों को सुरक्षित बाहर निकालने का काम शुरू कर दिया और संघ ने काश्मीरी पंडितों की लाशों को गिनना शुरु कर दिया जिससे पूरे भारत में बरगला कर ज़हर फैलाया जा सके।

मुस्लिम काश्मीरी वहीं आतंकवाद से मरने के लिए छोड़ दिये गये। दरअसल काश्मीर के आज की स्थिति के लिए जिम्मेदार  जगमोहन ही है जिसने मुसलमानों से नफरत के कारण घाटी को निर्दोष लोगों के खून से लाल कर दिया और यह आजतक होता आ रहा है।
 तक विकीपीडिया के अनुसार 47000 काश्मीरी मारे जा चुके हैं ( लिंक देखिए ) 

https://hi.m.wikipedia.org/wiki/भारत_में_आतंकवाद

और इस 47000 में काश्मीरी पंडितों की संख्या कुल 209 मात्र है जिसमें 7 काश्मीरी पंडित संग्रामपुरा 21-22 मार्च 1997 , 25 जनवरी 1998 को वंधमा में 23 काश्मीरी पंडित , और नदीमार्ग में 25 जनवरी 1998 को 24 काश्मीरी पंडित मारे गये , बाकी जो हैं वह अलग अलग घटनाओ में मारे गये।

http://archive.indianexpress.com/news/209-kashmiri-pandits-killed-since-1989-say-jk-cops-in-first-report/305457/

यह आंकड़े "दी हिन्दू" और "इकनॉमिक्स टाईम्स" के दिए आंकड़ों के अनुसार हैं कोई मनगढंत आंकड़े नहीं हैं हालाकि तब तक 46600 अन्य मुसलमानों के मारे जाने की कोई चर्चा कहीं नहीं होती।

http://www.thehindu.com/todays-paper/219-kashmiri-pandits-killed-by-militants-since-1989/article734089.ece 

काश्मीरी विस्थापितों के संगठन "काश्मीर पंडित संघर्ष समिति" के अध्यक्ष संजय टिकू के अनुसार इन 20-25 वर्षों में काश्मीरी पंडितों की 399 तो प्रमाणित हत्याएं हुईं और यदि अप्रामाणित को भी जोड़ दें तो अधिकतम 600 काश्मीरी पंडितों की आतंकवादियों ने हत्याएं की जबकि इतने वर्षों में कुल लगभग 47000  हत्याएं काश्मीर में हुईं तो 46400 लोग कौन थे जिनको मारा आतंकवादियों ने ? 

निश्चित रूप से मुस्लिम थे।टिक्कू काश्मीरी पंडितो के 3000 या 4000 की हत्या होने की अफवाहों को सिरे से खारिज करते हैं ।( लिंक देखिए )।

http://articles.economictimes.indiatimes.com/2011-06-19/news/29676901_1_kashmiri-pandit-jammu-and-kashmir-photo-exhibition

दरअसल संघ की अफवाहबाज टीम ने ऐसा प्रचारित कर दिया कि काश्मीर में केवल काश्मीरी पंडित ही मारे गये और यह मुसलमानों ने किया कि घाटी खाली हो जाए तो जो 46400 लोग मारे गये वह किस लिए ? क्या खाली करने के लिए ? 
जम्मू कश्मीर की सरकार के अनुसार मृतक काश्मीरी पंडितों के 399 परिवारों को लगभग 40 करोड़ का मुआवजा दिया जा चुका है ( लिंक देखिए ) । 

http://www.bbc.com/hindi/india/2015/04/150416_kashmiri_pandit_resettlement_rd

जगमोहन ने मुसलमानों को आतंकवाद से मरने के लिए छोड़ कर एक लाख चालिस हजार जो काश्मीरी पंडितों को घाटी से निकाला , मुस्लमान और हिन्दुओं की अन्य जातियाँ और सिख भी वहाँ आतंकवाद से वैसे ही प्रभावित थे परन्तु उनकी आवाज़ आपने नहीं सुनी होगी। 
काश्मीर से सिर्फ काश्मीरी पण्डितों को ही क्यों निकाला गया 
जब की काश्मीर में आज भी बाकि हिन्दू भाई सिख भाई है 

बस काश्मीरी पंडित सरकारी मदद मुआवजे और पुनर्वास का सरकारी लाभ और प्रति व्यक्ति ₹10000/= की सरकारी पेन्शन लेकर अपने अपने जगह पूरे भारत में या विदेशों में "सेट" हो गये हैं बाकी वहीं मर रहे हैं।

ध्यान रहे कि केन्द्र सरकार ने सैकड़ों करोड़ का धन केंद्रीय बजट में इनके लिए दिया है ।कभी सुना है गुजरात मेरठ मलियाना हाशिमपुरा मुजफ्फरपुर कानपुर मुम्बई सूरत के दंगों में मारे गये परिजनों के लिए बजट मे एलोकेशन ? या रणवीर सेना के द्वारा बाथे लक्षमणपुर में 60 दलितों की हत्या हुई उनके परिजनों के लिए कोई एलोकेशन ? तब तो एक तरफ दंगा चलता रहा दूसरी तरफ सैफई में माधुरी दीक्षित ठुमके लगाकर सबका मनोरंजन करती रहीं । 

यही है दोगलापन ध्यान दीजिये कि यदि देश सिर्फ काश्मीरी पंडितों के लिए रोता रहेगा और काश्मीर के अन्य लोगों को इग्नोर करता रहेगा तो हम कश्मीरियों को ना कभी अपना बना सकते हैं ना काश्मीर को बचा सकते हैं । 

काफी दिन पहले मेरा एक दोस्त बोर्डर पे था उससे बातो बातो में कश्मीर की जिक्र हुई तो उसने मुझसे बताया की काश्मीरी कहते है आप हिन्दू हो या मुस्लिम हम कश्मीरियों को फर्क नहीं पड़ता क्योंकि हमारे घर से जब लाशें उठती हैं तो  हमारे साथ हिन्दुस्तान का हिन्दू जो बर्ताव करता है वही आप भी करते हो 

मेहरबानी करके मेरे सवालों के जवाब अब आगे कश्मीरी पंडितों का नाम लेकर मत दीजिएगा। कश्मीर में अब तक पिछले 30 साल में 1 लाख से अधिक लोग मारे गए हैं। उनमें से कितने कश्मीरी पंडित हैं ? 

अगर काश्मीरी पंडित काश्मीर को अपनी जमीन कहते हैं तो वहां जाएं, रहें और सामना करें जैसे वहाँ का मुसलमान अन्य हिन्दू सिख कर रहे है ।

आखरी में यही कहना चाहूँगा की काश्मीरी पंडितों के साथ जो हुआ वह दुखद है उनके साथ जितनी मदद हो किया जाए परन्तु शेष का क्या कसूर जो 1989 से आज तक प्रतिदिन काश्मीरी पंडितों जैसी घटनाओं को बर्दाश्त कर रहे हैं  मारे जा रहे है उनका क्या ?

मस्जिदे अक्सा।

मस्जिद ए अक्सा अथवा बैतुल मुकद्दस इस्लाम की तीसरी सबसे महत्वपूर्ण मस्जिद है, बुखारी शरीफ मे नबी करीम सल्ल. की एक हदीस के अनुसार मस्जिद ए अक्...