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“फिर जब हराम के महीने बीत जाएं तो मुश्रिको को जहाँ पाओ मारो, उन्हें पकड़ो और उन्हें घेरो, और घात लगाने वाली जगह पर उनकी घात लगाकर बैठो ” (Al Qur’an 9:5)
सूरह तौबा की इस आयत नम्बर पांच का प्रयोग, इस्लाम के विरोधियों ने इस्लाम की छवि धूमिल करने के लिए खूब किया है कि इस्लाम गैर मुस्लिमों के साथ ऐसा हिंसक व्यवहार करने की शिक्षा मुस्लिमों को देता है,.... क्या वास्तव में, सूरह तौबा मे अल्लाह ने मुस्लिमों को क्रूरता और हिंसा की ही तालीम दी है ॥ आईए देखें
सूरह तौबा की इन आयतों का ऐतिहासिक परिदृश्य ये है कि पैगंबर सल्ल. को नबूवत मिलने के 13 वर्ष बाद तक बहुदेववादियो ने मुस्लिमों पर बड़े बड़े ज़ुल्म ढाए, जिन ज़ुल्मो को मुस्लिमों ने चुपचाप बर्दाश्त किया और मक्का से बाहर मदीना चले गए, तब इन हिंसक गैर मुस्लिमों ने सोचा कि यदि ये मुस्लिम इस्लाम का त्याग नहीं कर रहे हैं, तो फिर मदीना पर चढ़ाई कर के सारे मुस्लिमों की ही हत्या कर डाली जाए तो इस्लाम जड़ से खत्म हो जाएगा ...
लेकिन पासा उल्टा पड़ा और मदीना पर इन बहुदेववादियो की चढ़ाई के फलस्वरूप जब मुस्लिमों ने आत्मरक्षा मे हथियार उठाए तो हर बार इन अत्याचारियों पर वे गिनती के कुछ मुस्लिम भारी पड़े
जब मुस्लिमों से सीधे युद्ध मे बहुदेववादी जीतना मुश्किल समझने लगे तो उन्होंने धोखे से मुस्लिमों के खात्मे की योजना बनाई कि ऊपर से तो युद्ध बंद रखने का एक समझौता उन्होंने मुस्लिमों के साथ कर लिया लेकिन पीछे पीछे वो मुस्लिमों की जड़ें काटने की जुगत मे थे
जब अरब के बहुदेववादियों ने मुस्लिमों के साथ किया हुआ युद्धबन्दी का एक ऐसा ही समझौता तोड़ दिया और धोखे से मुस्लिमों के साथियों की हत्याएं कीं, तो अल्लाह ने भी कुरान मे यह घोषणा कर दी कि मुस्लिमों को भी अब उन बहुदेववादियों से युद्ध बंद रखने की कोई जरूरत नहीं है ''Tum (muslimo) ne mushriko ke sath jangbandi ka jo samjhauta kia tha Allah aur Rasool ab us se bezaar hain'' [9:1]
लेकिन साथ ही जिन बहुदेववादी लोगों ने संधि समझौते को तोड़ा नहीं था, मुस्लिमों को भी उनसे संधि कायम रखने और युद्ध न करने की तालीम अल्लाह ने दी ,
''Siway un mushriko ke jinhone tumhare sath samjhauta kia tha aur usy nahi toda, na he tumhare khilaf (yuddh me) kisi ki madad ki. to tum un mushriko ke sath samjhauta uska samay pura hone tak jaari rakho. beshaq Allah nek logo ko pasand krta hai'' [9:4]
हालांकि बहुदेववादियों ने तो सुलह की आड़ मे धोखे से मुसलमानों के साथियों की जानें ली थीं, लेकिन फिर भी अल्लाह के हुक्म से मुस्लिमों ने उन हत्यारों को 4 महीने पहले से चेतावनी सुना दी कि यदि वे हत्यारे अपने पाप का पश्चाताप करना चाहें, तो इस अवधि मे कर लें ,
''to 4 maheene aur zameen pr aaram se chal phir lo aur ye jaan lo ki tum Allah ke kabu se bahar nahi ja sakte. aur Allah inkar karne walo ko apmanit karta hai''. [9:2]
4 महीने बीत जाने के बावजूद भी जिन व्यक्तियों को कोई पश्चाताप ना हो और वो मुस्लिमों से युद्ध करने को ही पसंद करें, तो ऐसे लोगों के लिए ही सूरह तौबा की वो पांचवीं आयत आई है जिसे बिना उसकी पृष्ठभूमि सामने रखे, जगह जगह लिखकर, बताकर विरोधी इस्लाम को बुरा साबित करना चाहते हैं
लेकिन जरा अपने दिल पर हाथ रखकर बोलिए कि यदि कोई व्यक्ति आपके कुछ पारिवारिक सदस्यों की हत्या कर चुका हो, और फिर भी उसके मन मे कोई पश्चाताप न हो बल्कि वो फिर से आप पर आक्रमण कर के आपके मां बाप, भाई बहनों समेत आपका समूल नाश करना चाहता हो तो क्या आप उस व्यक्ति पर दया दिखाएंगे ?? जी नहीं यदि आप बुद्धिमान होंगे तो समझते होंगे कि उस वक्त दया का पात्र वो हत्यारा नहीं बल्कि आप और आपका परिवार होगा, और निश्चय ही आप बातचीत ,और बातचीत विफल होने पर शक्ति के जरिए आत्मरक्षा के उपाय करेंगे, बिल्कुल यही शिक्षा कुरान मे है
आगे भी देखिए कि यदि इन्हीं दुष्ट हत्यारों मे से कोई युद्ध के मैदान मे पहुंचने के बाद भी मुस्लिमों से युद्ध छोड़कर युद्ध भूमि से बाहर जाना चाहे तो युद्ध के मैदान मे दुश्मन के साथ भी दयालुता और नेकी की क्या खूब तालीम दी है मेरे रब ने, इसी सूरह तौबा की अगली ही आयत यानि आयत 6 मे ..
''Aur agar un mushriko me se koi tumhari sharan chahe to uski hifazat karo taki wo Allah ke shabd sun len . aur fir usko us ki surakshit jagah pahoncha do. kyonki ye wo log hain jo nahi jaante'' [9:6]
आगे की आयतों मे भी आप देख सकते हैं, कि अरब के वे बहुदेववादी किसी भी वादे या कसम या रिश्ते नाते का भी खयाल नहीं करते थे जब वे मुस्लिमों को कमजोर पाते थे.... ऐसे अत्याचारियों के साथ युद्ध भी करने की शिक्षा दी मेरे अल्लाह ने तो वो भी कितनी नेकी की तालीम के साथ ॥
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“फिर जब हराम के महीने बीत जाएं तो मुश्रिको को जहाँ पाओ मारो, उन्हें पकड़ो और उन्हें घेरो, और घात लगाने वाली जगह पर उनकी घात लगाकर बैठो ” (Al Qur’an 9:5)
सूरह तौबा की इस आयत नम्बर पांच का प्रयोग, इस्लाम के विरोधियों ने इस्लाम की छवि धूमिल करने के लिए खूब किया है कि इस्लाम गैर मुस्लिमों के साथ ऐसा हिंसक व्यवहार करने की शिक्षा मुस्लिमों को देता है,.... क्या वास्तव में, सूरह तौबा मे अल्लाह ने मुस्लिमों को क्रूरता और हिंसा की ही तालीम दी है ॥ आईए देखें
सूरह तौबा की इन आयतों का ऐतिहासिक परिदृश्य ये है कि पैगंबर सल्ल. को नबूवत मिलने के 13 वर्ष बाद तक बहुदेववादियो ने मुस्लिमों पर बड़े बड़े ज़ुल्म ढाए, जिन ज़ुल्मो को मुस्लिमों ने चुपचाप बर्दाश्त किया और मक्का से बाहर मदीना चले गए, तब इन हिंसक गैर मुस्लिमों ने सोचा कि यदि ये मुस्लिम इस्लाम का त्याग नहीं कर रहे हैं, तो फिर मदीना पर चढ़ाई कर के सारे मुस्लिमों की ही हत्या कर डाली जाए तो इस्लाम जड़ से खत्म हो जाएगा ...
लेकिन पासा उल्टा पड़ा और मदीना पर इन बहुदेववादियो की चढ़ाई के फलस्वरूप जब मुस्लिमों ने आत्मरक्षा मे हथियार उठाए तो हर बार इन अत्याचारियों पर वे गिनती के कुछ मुस्लिम भारी पड़े
जब मुस्लिमों से सीधे युद्ध मे बहुदेववादी जीतना मुश्किल समझने लगे तो उन्होंने धोखे से मुस्लिमों के खात्मे की योजना बनाई कि ऊपर से तो युद्ध बंद रखने का एक समझौता उन्होंने मुस्लिमों के साथ कर लिया लेकिन पीछे पीछे वो मुस्लिमों की जड़ें काटने की जुगत मे थे
जब अरब के बहुदेववादियों ने मुस्लिमों के साथ किया हुआ युद्धबन्दी का एक ऐसा ही समझौता तोड़ दिया और धोखे से मुस्लिमों के साथियों की हत्याएं कीं, तो अल्लाह ने भी कुरान मे यह घोषणा कर दी कि मुस्लिमों को भी अब उन बहुदेववादियों से युद्ध बंद रखने की कोई जरूरत नहीं है ''Tum (muslimo) ne mushriko ke sath jangbandi ka jo samjhauta kia tha Allah aur Rasool ab us se bezaar hain'' [9:1]
लेकिन साथ ही जिन बहुदेववादी लोगों ने संधि समझौते को तोड़ा नहीं था, मुस्लिमों को भी उनसे संधि कायम रखने और युद्ध न करने की तालीम अल्लाह ने दी ,
''Siway un mushriko ke jinhone tumhare sath samjhauta kia tha aur usy nahi toda, na he tumhare khilaf (yuddh me) kisi ki madad ki. to tum un mushriko ke sath samjhauta uska samay pura hone tak jaari rakho. beshaq Allah nek logo ko pasand krta hai'' [9:4]
हालांकि बहुदेववादियों ने तो सुलह की आड़ मे धोखे से मुसलमानों के साथियों की जानें ली थीं, लेकिन फिर भी अल्लाह के हुक्म से मुस्लिमों ने उन हत्यारों को 4 महीने पहले से चेतावनी सुना दी कि यदि वे हत्यारे अपने पाप का पश्चाताप करना चाहें, तो इस अवधि मे कर लें ,
''to 4 maheene aur zameen pr aaram se chal phir lo aur ye jaan lo ki tum Allah ke kabu se bahar nahi ja sakte. aur Allah inkar karne walo ko apmanit karta hai''. [9:2]
4 महीने बीत जाने के बावजूद भी जिन व्यक्तियों को कोई पश्चाताप ना हो और वो मुस्लिमों से युद्ध करने को ही पसंद करें, तो ऐसे लोगों के लिए ही सूरह तौबा की वो पांचवीं आयत आई है जिसे बिना उसकी पृष्ठभूमि सामने रखे, जगह जगह लिखकर, बताकर विरोधी इस्लाम को बुरा साबित करना चाहते हैं
लेकिन जरा अपने दिल पर हाथ रखकर बोलिए कि यदि कोई व्यक्ति आपके कुछ पारिवारिक सदस्यों की हत्या कर चुका हो, और फिर भी उसके मन मे कोई पश्चाताप न हो बल्कि वो फिर से आप पर आक्रमण कर के आपके मां बाप, भाई बहनों समेत आपका समूल नाश करना चाहता हो तो क्या आप उस व्यक्ति पर दया दिखाएंगे ?? जी नहीं यदि आप बुद्धिमान होंगे तो समझते होंगे कि उस वक्त दया का पात्र वो हत्यारा नहीं बल्कि आप और आपका परिवार होगा, और निश्चय ही आप बातचीत ,और बातचीत विफल होने पर शक्ति के जरिए आत्मरक्षा के उपाय करेंगे, बिल्कुल यही शिक्षा कुरान मे है
आगे भी देखिए कि यदि इन्हीं दुष्ट हत्यारों मे से कोई युद्ध के मैदान मे पहुंचने के बाद भी मुस्लिमों से युद्ध छोड़कर युद्ध भूमि से बाहर जाना चाहे तो युद्ध के मैदान मे दुश्मन के साथ भी दयालुता और नेकी की क्या खूब तालीम दी है मेरे रब ने, इसी सूरह तौबा की अगली ही आयत यानि आयत 6 मे ..
''Aur agar un mushriko me se koi tumhari sharan chahe to uski hifazat karo taki wo Allah ke shabd sun len . aur fir usko us ki surakshit jagah pahoncha do. kyonki ye wo log hain jo nahi jaante'' [9:6]
आगे की आयतों मे भी आप देख सकते हैं, कि अरब के वे बहुदेववादी किसी भी वादे या कसम या रिश्ते नाते का भी खयाल नहीं करते थे जब वे मुस्लिमों को कमजोर पाते थे.... ऐसे अत्याचारियों के साथ युद्ध भी करने की शिक्षा दी मेरे अल्लाह ने तो वो भी कितनी नेकी की तालीम के साथ ॥
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