Thursday, 25 March 2021

जंहा पाओ मारो, 24 आयतें।

Page-Post/011

“फिर जब हराम के महीने बीत जाएं तो मुश्रिको को जहाँ पाओ मारो, उन्हें पकड़ो और उन्हें घेरो, और घात लगाने वाली जगह पर उनकी घात लगाकर बैठो ” (Al Qur’an 9:5)

सूरह तौबा की इस आयत नम्बर पांच का प्रयोग, इस्लाम के विरोधियों ने इस्लाम की छवि धूमिल करने के लिए खूब किया है कि इस्लाम गैर मुस्लिमों के साथ ऐसा हिंसक व्यवहार करने की शिक्षा मुस्लिमों को देता है,.... क्या वास्तव में, सूरह तौबा मे अल्लाह ने मुस्लिमों को क्रूरता और हिंसा की ही तालीम दी है ॥ आईए देखें 

सूरह तौबा की इन आयतों का ऐतिहासिक परिदृश्य ये है कि पैगंबर सल्ल. को नबूवत मिलने के 13 वर्ष बाद तक बहुदेववादियो ने मुस्लिमों पर बड़े बड़े ज़ुल्म ढाए, जिन ज़ुल्मो को मुस्लिमों ने चुपचाप बर्दाश्त किया और मक्का से बाहर मदीना चले गए, तब इन हिंसक गैर मुस्लिमों ने सोचा कि यदि ये मुस्लिम इस्लाम का त्याग नहीं कर रहे हैं, तो फिर मदीना पर चढ़ाई कर के सारे मुस्लिमों की ही हत्या कर डाली जाए तो इस्लाम जड़ से खत्म हो जाएगा ...
लेकिन पासा उल्टा पड़ा और मदीना पर इन बहुदेववादियो की चढ़ाई के फलस्वरूप जब मुस्लिमों ने आत्मरक्षा मे हथियार उठाए तो हर बार इन अत्याचारियों पर वे गिनती के कुछ मुस्लिम भारी पड़े 
जब मुस्लिमों से सीधे युद्ध मे बहुदेववादी जीतना मुश्किल समझने लगे तो उन्होंने धोखे से मुस्लिमों के खात्मे की योजना बनाई कि ऊपर से तो युद्ध बंद रखने का एक समझौता उन्होंने मुस्लिमों के साथ कर लिया लेकिन पीछे पीछे वो मुस्लिमों की जड़ें काटने की जुगत मे थे 
जब अरब के बहुदेववादियों ने मुस्लिमों के साथ किया हुआ युद्धबन्दी का एक ऐसा ही समझौता तोड़ दिया और धोखे से मुस्लिमों के साथियों की हत्याएं कीं, तो अल्लाह ने भी कुरान मे यह घोषणा कर दी कि मुस्लिमों को भी अब उन बहुदेववादियों से युद्ध बंद रखने की कोई जरूरत नहीं है ''Tum (muslimo) ne mushriko ke sath jangbandi ka jo samjhauta kia tha Allah aur Rasool ab us se bezaar hain'' [9:1]

लेकिन साथ ही जिन बहुदेववादी लोगों ने संधि समझौते को तोड़ा नहीं था, मुस्लिमों को भी उनसे संधि कायम रखने और युद्ध न करने की तालीम अल्लाह ने दी ,
''Siway un mushriko ke jinhone tumhare sath samjhauta kia tha aur usy nahi toda, na he tumhare khilaf (yuddh me) kisi ki madad ki. to tum un mushriko ke sath samjhauta uska samay pura hone tak jaari rakho. beshaq Allah nek logo ko pasand krta hai'' [9:4]

हालांकि बहुदेववादियों ने तो सुलह की आड़ मे धोखे से मुसलमानों के साथियों की जानें ली थीं, लेकिन फिर भी अल्लाह के हुक्म से मुस्लिमों ने उन हत्यारों को 4 महीने पहले से चेतावनी सुना दी कि यदि वे हत्यारे अपने पाप का पश्चाताप करना चाहें, तो इस अवधि मे कर लें ,
''to 4 maheene aur zameen pr aaram se chal phir lo aur ye jaan lo ki tum Allah ke kabu se bahar nahi ja sakte. aur Allah inkar karne walo ko apmanit karta hai''. [9:2]

4 महीने बीत जाने के बावजूद भी जिन व्यक्तियों को कोई पश्चाताप ना हो और वो मुस्लिमों से युद्ध करने को ही पसंद करें, तो ऐसे लोगों के लिए ही सूरह तौबा की वो पांचवीं आयत आई है जिसे बिना उसकी पृष्ठभूमि सामने रखे, जगह जगह लिखकर, बताकर विरोधी इस्लाम को बुरा साबित करना चाहते हैं
लेकिन जरा अपने दिल पर हाथ रखकर बोलिए कि यदि कोई व्यक्ति आपके कुछ पारिवारिक सदस्यों की हत्या कर चुका हो, और फिर भी उसके मन मे कोई पश्चाताप न हो बल्कि वो फिर से आप पर आक्रमण कर के आपके मां बाप, भाई बहनों समेत आपका समूल नाश करना चाहता हो तो क्या आप उस व्यक्ति पर दया दिखाएंगे ?? जी नहीं यदि आप बुद्धिमान होंगे तो समझते होंगे कि उस वक्त दया का पात्र वो हत्यारा नहीं बल्कि आप और आपका परिवार होगा, और निश्चय ही आप बातचीत ,और बातचीत विफल होने पर शक्ति के जरिए आत्मरक्षा के उपाय करेंगे, बिल्कुल यही शिक्षा कुरान मे है

आगे भी देखिए कि यदि इन्हीं दुष्ट हत्यारों मे से कोई युद्ध के मैदान मे पहुंचने के बाद भी मुस्लिमों से युद्ध छोड़कर युद्ध भूमि से बाहर जाना चाहे तो युद्ध के मैदान मे दुश्मन के साथ भी दयालुता और नेकी की क्या खूब तालीम दी है मेरे रब ने, इसी सूरह तौबा की अगली ही आयत यानि आयत 6 मे ..
''Aur agar un mushriko me se koi tumhari sharan chahe to uski hifazat karo taki wo Allah ke shabd sun len . aur fir usko us ki surakshit jagah pahoncha do. kyonki ye wo log hain jo nahi jaante'' [9:6]

आगे की आयतों मे भी आप देख सकते हैं, कि अरब के वे बहुदेववादी किसी भी वादे या कसम या रिश्ते नाते का भी खयाल नहीं करते थे जब वे मुस्लिमों को कमजोर पाते थे.... ऐसे अत्याचारियों के साथ युद्ध भी करने की शिक्षा दी मेरे अल्लाह ने तो वो भी कितनी नेकी की तालीम के साथ ॥

■■■■■■■

Page-Post/011

“फिर जब हराम के महीने बीत जाएं तो मुश्रिको को जहाँ पाओ मारो, उन्हें पकड़ो और उन्हें घेरो, और घात लगाने वाली जगह पर उनकी घात लगाकर बैठो ” (Al Qur’an 9:5)

सूरह तौबा की इस आयत नम्बर पांच का प्रयोग, इस्लाम के विरोधियों ने इस्लाम की छवि धूमिल करने के लिए खूब किया है कि इस्लाम गैर मुस्लिमों के साथ ऐसा हिंसक व्यवहार करने की शिक्षा मुस्लिमों को देता है,.... क्या वास्तव में, सूरह तौबा मे अल्लाह ने मुस्लिमों को क्रूरता और हिंसा की ही तालीम दी है ॥ आईए देखें 

सूरह तौबा की इन आयतों का ऐतिहासिक परिदृश्य ये है कि पैगंबर सल्ल. को नबूवत मिलने के 13 वर्ष बाद तक बहुदेववादियो ने मुस्लिमों पर बड़े बड़े ज़ुल्म ढाए, जिन ज़ुल्मो को मुस्लिमों ने चुपचाप बर्दाश्त किया और मक्का से बाहर मदीना चले गए, तब इन हिंसक गैर मुस्लिमों ने सोचा कि यदि ये मुस्लिम इस्लाम का त्याग नहीं कर रहे हैं, तो फिर मदीना पर चढ़ाई कर के सारे मुस्लिमों की ही हत्या कर डाली जाए तो इस्लाम जड़ से खत्म हो जाएगा ...
लेकिन पासा उल्टा पड़ा और मदीना पर इन बहुदेववादियो की चढ़ाई के फलस्वरूप जब मुस्लिमों ने आत्मरक्षा मे हथियार उठाए तो हर बार इन अत्याचारियों पर वे गिनती के कुछ मुस्लिम भारी पड़े 
जब मुस्लिमों से सीधे युद्ध मे बहुदेववादी जीतना मुश्किल समझने लगे तो उन्होंने धोखे से मुस्लिमों के खात्मे की योजना बनाई कि ऊपर से तो युद्ध बंद रखने का एक समझौता उन्होंने मुस्लिमों के साथ कर लिया लेकिन पीछे पीछे वो मुस्लिमों की जड़ें काटने की जुगत मे थे 
जब अरब के बहुदेववादियों ने मुस्लिमों के साथ किया हुआ युद्धबन्दी का एक ऐसा ही समझौता तोड़ दिया और धोखे से मुस्लिमों के साथियों की हत्याएं कीं, तो अल्लाह ने भी कुरान मे यह घोषणा कर दी कि मुस्लिमों को भी अब उन बहुदेववादियों से युद्ध बंद रखने की कोई जरूरत नहीं है ''Tum (muslimo) ne mushriko ke sath jangbandi ka jo samjhauta kia tha Allah aur Rasool ab us se bezaar hain'' [9:1]

लेकिन साथ ही जिन बहुदेववादी लोगों ने संधि समझौते को तोड़ा नहीं था, मुस्लिमों को भी उनसे संधि कायम रखने और युद्ध न करने की तालीम अल्लाह ने दी ,
''Siway un mushriko ke jinhone tumhare sath samjhauta kia tha aur usy nahi toda, na he tumhare khilaf (yuddh me) kisi ki madad ki. to tum un mushriko ke sath samjhauta uska samay pura hone tak jaari rakho. beshaq Allah nek logo ko pasand krta hai'' [9:4]

हालांकि बहुदेववादियों ने तो सुलह की आड़ मे धोखे से मुसलमानों के साथियों की जानें ली थीं, लेकिन फिर भी अल्लाह के हुक्म से मुस्लिमों ने उन हत्यारों को 4 महीने पहले से चेतावनी सुना दी कि यदि वे हत्यारे अपने पाप का पश्चाताप करना चाहें, तो इस अवधि मे कर लें ,
''to 4 maheene aur zameen pr aaram se chal phir lo aur ye jaan lo ki tum Allah ke kabu se bahar nahi ja sakte. aur Allah inkar karne walo ko apmanit karta hai''. [9:2]

4 महीने बीत जाने के बावजूद भी जिन व्यक्तियों को कोई पश्चाताप ना हो और वो मुस्लिमों से युद्ध करने को ही पसंद करें, तो ऐसे लोगों के लिए ही सूरह तौबा की वो पांचवीं आयत आई है जिसे बिना उसकी पृष्ठभूमि सामने रखे, जगह जगह लिखकर, बताकर विरोधी इस्लाम को बुरा साबित करना चाहते हैं
लेकिन जरा अपने दिल पर हाथ रखकर बोलिए कि यदि कोई व्यक्ति आपके कुछ पारिवारिक सदस्यों की हत्या कर चुका हो, और फिर भी उसके मन मे कोई पश्चाताप न हो बल्कि वो फिर से आप पर आक्रमण कर के आपके मां बाप, भाई बहनों समेत आपका समूल नाश करना चाहता हो तो क्या आप उस व्यक्ति पर दया दिखाएंगे ?? जी नहीं यदि आप बुद्धिमान होंगे तो समझते होंगे कि उस वक्त दया का पात्र वो हत्यारा नहीं बल्कि आप और आपका परिवार होगा, और निश्चय ही आप बातचीत ,और बातचीत विफल होने पर शक्ति के जरिए आत्मरक्षा के उपाय करेंगे, बिल्कुल यही शिक्षा कुरान मे है

आगे भी देखिए कि यदि इन्हीं दुष्ट हत्यारों मे से कोई युद्ध के मैदान मे पहुंचने के बाद भी मुस्लिमों से युद्ध छोड़कर युद्ध भूमि से बाहर जाना चाहे तो युद्ध के मैदान मे दुश्मन के साथ भी दयालुता और नेकी की क्या खूब तालीम दी है मेरे रब ने, इसी सूरह तौबा की अगली ही आयत यानि आयत 6 मे ..
''Aur agar un mushriko me se koi tumhari sharan chahe to uski hifazat karo taki wo Allah ke shabd sun len . aur fir usko us ki surakshit jagah pahoncha do. kyonki ye wo log hain jo nahi jaante'' [9:6]

आगे की आयतों मे भी आप देख सकते हैं, कि अरब के वे बहुदेववादी किसी भी वादे या कसम या रिश्ते नाते का भी खयाल नहीं करते थे जब वे मुस्लिमों को कमजोर पाते थे.... ऐसे अत्याचारियों के साथ युद्ध भी करने की शिक्षा दी मेरे अल्लाह ने तो वो भी कितनी नेकी की तालीम के साथ ॥


◆◆◆◆◆◆◆◆


(1) फिर, जब हराम (प्रतिष्ठित) महीने बीत जाएँ तो मुशरिकों को जहाँ कहीं पाओ क़त्ल करो, उन्हें पकड़ो और उन्हें घेरो और हर घात की जगह उनकी ताक में बैठो। फिर यदि वे तौबा कर लें और नमाज़ क़ायम करें और ज़कात दें तो उनका मार्ग छोड़ दो, निश्चय ही अल्लाह बड़ा क्षमाशील, दयावान है (सूरह:9 आयत 5)

जैसा कि हज़रत मुहम्मद ( सल्ल० ) की जीवनी से स्पष्ट है की मक्का में और मदीना जाने के बाद भी मुशरिक  कुरैश , अल्लाह के रसूल ( सल्ल० ) के पीछे पड़े थे । वह आप को आप के सहयोगी मुस्लिमो और सत्य-धर्म इस्लाम को समाप्त करने के लिए हर संभव कोशिश करते रहते । काफ़िर कुरैश ने अल्लाह के रसूल को कभी चैन से बैठने नहीं दिया । वह उनको सदैव सताते ही रहे । इसके लिए वह सदैव लड़ाई की साजिश रचते रहते
 यह सूरह तब नाज़िल हुई जब मुस्लिमो और मक्का के मुशरिकों(बहुदेवावादियों) के बीच हुई संधी को मक्का के मुशरिकों ने तोड दिया और मुस्लिमो पर आक्रमण का प्रपंच रचनें लगे.मुस्लिमो पर जुल्म करने लगे मुस्लिमो को उनके घरो से निकालने लगे तब अल्लाह ने यह सूरह नाज़िल की और उन मुशरिको को, जिन्हों ने संधी तोड़ी थी, को 4 महीने का समय दिया. अगर इन चार महीनों में यह सीधे रास्ते पर नहीं आते हैं तो इन से जंग करो और जंग के समय में, जंग में (डरो नहीं), जहाँ पाओ इन का क़त्ल करो. ज़ाहिर सी बात है कोई भी दुश्मन से अपनी आत्म रक्षा के लिये यही निर्णय लेगा व ऐसा आदेश पारित करेगा.वह जंग अपनी रक्षा के लिए था शांति की अस्थापना करने के लिए था 
जो की यह एक साधाहरण सी मानवीय प्रवर्ती है. प्रश्न उठता है कि आरोप लगानें वालों को इसके आगे वाली आयत(6) नहीं दिखती, क्यू? क्यूंकि भ्रम और अराजकता फैलानें वालों को सिर्फ ऐसी ही चीज़ें दिखती हैं, जिसको वोह गलत ढंग से पेश कर के लोगों में बैर पैदा कर सकें. -- आगे की आयत में अल्लाह कहता है
 (सूरह तौबा 9 आयत 6) में "जो लोग तुम्हारे संरक्षण में आते हैं (शान्ति चाहते है) उनको अपनी सुरक्षा में एक ऐसी सुरक्षित जगह पर ले जा कर पहुँचा दो, जहां पर वोह अल्लाह का पैगाम (शान्ति का पैगाम) सुन लें, अर्थात सुरक्षित हो, क्यूंकि यह वोह लोग हैं जो ग्यान नहीं रखते. इन लोंगों को आयत नंबर 4 और 7 भी नहीं दिखती.सूरह तौबा 9 आयत4 में अल्लाह कहता है "जिन मुशरिकों से तुम्हारी संधी है और उन्होने तुम्हारे विरुद्ध दूसरों का साथ दिया है, तो उनके साथ सन्धि, संधी के समय तक पूरी करो.सूरह तौबा 9 आयत 7 में अल्लाह कहता है "जिन लोगों ने तुम्हारे साथ "खाना-ए-क़ाबा" के पास सन्धि की थी और अगर वोह इस को क़ायम रखना चाहे तो तुम भी सन्धि को क़ायम रखो. 

 लेकिन शैतानी प्रवित्ति के लोगों को सिर्फ आयत नंबर "5" दिखती हैं, क्यूंकि इस आयत को बिना संदर्भ के उधृत कर के लोगों में गलत बात फैलाई जा सकती हैं. 

इस्लाम में दुश्मन के साथ भी ज्यादती करना मना है देखिये:
और जो लोग तुमसे लड़ते हैं, तुम भी ख़ुदा की राह में उनसे लड़ो , मगर ज्यादती न करना की ख़ुदा ज्यादती करने वालों को पसन्द नहीं करता
-क़ुरआन , सूरह: 2  आयत:190

अत्याचारियों  और अन्यायियों से अपनी आत्म रक्षा के लिए शांति की स्थापना करने के लिए   युद्ध करना और युद्ध के लिए सैनिकों को उत्साहित करना धर्म सम्मत है ।

इस आयत पर सवाल उठाने वाले वसीम रिज्वी के सहयोगी sanatan sankriti जैसे लोग क्या यह नहीं जानते कि अत्याचारियों  और अन्यायियों के विनाश के लिए ही श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था । गीता में एक पूरा अध्याय इसी विषय पर है। जिसमें श्री कृष्ण अर्जुन को युद्ध करने पर आमादा करते हैं। जबकि वह हथियार रख चुके थे परन्तु श्री कृष्ण ने उनसे कहा कि यह तो कायरता है तुम्हारा धर्म ही युद्ध करना है। युद्ध करो वरना अधर्म हो जाएगा तुम युद्ध में मारे गये तो स्वर्ग को प्राप्त होगे और अगर जीते तो दुनिया की दौलत पाओगे
क्या यह उपदेश लड़ाई-झगड़ा करने वाला या घृणा फैलाने वाला था? यदि नहीं, तो फिर कुरआन के लिए ऐसा क्यों कहा जाता है?

 वेद् में सौ ओ मन्त्र लड़ाई मार काट वाला है 
देखे यहाँ 
👇👇
ते यं द्विष्मो यश्च नो द्वेष्टि तमेषां जम्भे दध्मः
"हम लोग जिस से अप्रीति करें और जो हम को दुःख दे उसको इन वायुओं की बीडाल के मुख में मूषे के सामान पीड़ा में डालें |" [यजुर्वेद 16:65 दयानन्द भाष्य]

वृश्च प्र वृश्च सं वृश्च दह प्र दह सं दह |
"तू वेद निन्दक को, काट डाल, चीर डाल, फाड़ डाल, जला दे, फूँक दे, भस्म कर दे।" भावार्थ: धर्मात्मा लोग अधर्मियों के नाश में सदा उद्यत रहें [अथर्ववेद काण्ड12: सूक्त 5: मंत्र 62 पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी भाष्य]

फिर यह सूरह उस समय मक्का के अत्याचारी मुशरिकों के विरुद्ध उतारी गयी । जो अल्लाह के रसूल के ही भाई-बन्धु  क़ुरैश थे  फिर इसे आज के सन्दर्भ में और हिन्दु भाइयो के लिए क्यों लिया जा रहा है ? क्या हिन्दु व अन्य धर्म वालो को उकसाने और उनके मन में मुस्लिमो के लिए घृणा भरने तथा इस्लाम को बदनाम करने की साज़िश नहीं है तो और क्या है ?


◆◆◆◆◆◆◆



जिस सूरह  तौबा 9/आयत 5 ज़िक़्र किया जाता है उसको पूरा बता देते हैं. यह सूरः तब नाज़िल हुई जब मुसलमानों और मक्का के मुशरिकों(बहुदेवावादियों) के बीच हुई संधी को मक्का के मुशरिकों ने तोड दिया और मुसलमानों पर आक्रमण का प्रपंच रचनें लगे.मुसलमानो पर जुल्म करने लगे मुसलमानो को उनके घरो से निकालने लगे तब अल्लाह ने यह सूरह नाज़िल की और उन मुशरिको को, जिन्हों ने संधी तोड़ी थी, को 4 महीने का समय दिया. अगर इन चार महीनों में यह सीधे रास्ते पर नहीं आते हैं तो इन से जंग करो और जंग के समय में, जंग में (डरो नहीं), जहाँ पाओ इन का क़त्ल करो. ज़ाहिर सी बात है कोई भी दुश्मन से अपनी आत्म रक्षा के लिये यही निर्णय लेगा व ऐसा आदेश पारित करेगा.वह जंग अपनी रक्षा के लिए था शांति की अस्थापना करने के लिए था 
जो की यह एक साधाहरण सी मानवीय प्रवर्ती है. प्रश्न उठता है कि आरोप लगानें वालों को इसके आगे वाली आयत(6) नहीं दिखती, क्यू? क्यूंकि भ्रम और अराजकता फैलानें वालों को सिर्फ ऐसी ही चीज़ें दिखती हैं, जिसको वोह गलत ढंग से पेश कर के लोगों में बैर पैदा कर सकें. -- आगे की आयत में अल्लाह कहता है
 (सूरह तौबा 9 आयत 6) में "जो लोग तुम्हारे संरक्षण में आते हैं (शान्ति चाहते है) उनको अपनी सुरक्षा में एक ऐसी सुरक्षित जगह पर ले जा कर पहुँचा दो, जहां पर वोह अल्लाह का पैगाम (शान्ति का पैगाम) सुन लें, अर्थात सुरक्षित हो, क्यूंकि यह वोह लोग हैं जो ग्यान नहीं रखते. इन लोंगों को आयत नंबर 4 और 7 भी नहीं दिखती.सूरह तौबा 9 आयत4 में अल्लाह कहता है "जिन मुशरिकों से तुम्हारी संधी है और उन्होने तुम्हारे विरुद्ध दूसरों का साथ दिया है, तो उनके साथ सन्धि, संधी के समय तक पूरी करो.सूरह तौबा 9 आयत 7 में अल्लाह कहता है "जिन लोगों ने तुम्हारे साथ "खाना-ए-क़ाबा" के पास सन्धि की थी और अगर वोह इस को क़ायम रखना चाहे तो तुम भी सन्धि को क़ायम रखो. --- . सूरः तौबा में 129 आयतें हैं, लेकिन शैतानी प्रवित्ति के लोगों को सिर्फ आयत नंबर "5" दिखती हैं, क्यूंकि इस आयत को बिना संदर्भ के उधृत कर के लोगों में गलत बात फैलाई जा सकती हैं. 

यहाँ देखें 

जिन लोगों ने तुमसे दीन के बारे में जंग नहीं की और न तुम को तुम्हारे घरों से निकला,उन के साथ भलाई और इंसाफ का सुलूक करने से ख़ुदा तुम को मना नहीं करता । ख़ुदा तो इंसाफ करने वालों को दोस्त रखता है ।
-कुरआन, सूरा 60 , आयत-8

ख़ुदा उन्हीं लोगों के साथ तुम को दोस्ती करने से मना करता है , जिन्होंने तुम से दीन के बारे में लड़ाई की और तुम को तुम्हारे घरों से निकला और तुम्हारे निकलने में औरों की मदद की , तो जो  लोग ऐसों से दोस्ती करेंगे , वही ज़ालिम हैं ।
-क़ुरआन , सूरा 60 , आयत- 9

इस्लाम के दुश्मन के साथ भी ज्यादती करना मना है देखिये:

और जो लोग तुमसे लड़ते हैं, तुम भी ख़ुदा की राह में उनसे लड़ो , मगर ज्यादती न करना की ख़ुदा ज्यादती करने वालों को दोस्त नहीं रखता ।
-क़ुरआन , सूरा 2 , आयत-190

इस्लाम द्वारा, देश में हिंसा ( फ़साद ) करने की इजाज़त नहीं है । देखिये अल्लाह का यह आदेश: 

लोगों को उन की चीज़ें कम न दिया करो और मुल्क में फ़साद न करते फिरो।
-क़ुरआन , सूरा 26 , आयत-183 

इस्लाम में किसी को जोर ज़बरदस्ती से मुस्लमान बनाने की सख्त मनाही है । क़ुरआन माजिद में अल्लाह के ये आदेश :

और अगर तुम्हारा परवरदिगार ( यानि अल्लाह ) चाहता, तो जितने लोग ज़मीं पर हैं, सब के सब इमा ले आते । तो क्या तुम लोगों पर ज़बरदस्ती करना चाहते हो की वे मोमिन ( यानि मुस्लमान ) हो जाएं ।
-क़ुरआन, सूरा 10 , आयत-99 

दिने इस्लाम में ज़बरदस्ती नहीं है ।
-क़ुरआन , सूरा 2 , आयात-256 

अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया :
 
इस्लामी हुकूमत में किसी ऐसे गैर मुस्लिम नागरिक पर जिसकी जान-माल, इज्जत आबरु की हिफाजत का मुसलमानों ने समझोता किया है, जो व्यक्ति जुल्म करेगा, या उसका हक मारेगा या उस पर उसकी ताकत से अधिक बोझ डालेगा या गैर मुस्लिम नागरिकों की कोई चीज उसकी रजामंदी के बगैर ले लेगा तो मैं अल्लाह की अदालत में दायर होने वाले मुकदमे में उस गैर-मुस्लिम नागरिक की ओर से वकील बनूंगा
 (सुनन अबु दाऊद : 3052)

इस्लाम जंग का भी तरीका बताता है 
जिंग में भी किसी निहते पर वॉर नही करना है 
कोई आत्मसमपर्ण कर दे तो उसे महफूज़ जगह तक छोड़ आना है जहाँ उसका कोई नुकसान ना पहुचे जंग में हारे पेड़ पौदे बुढे बच्चों और औरतो को नुकसान नही पहुचाना है ।

लेकिन कुछ ना समझ अमन के दुश्मन समाज में जहर घोलने वाले लोग क़ुरआन की बिच बिच का आयत कोड करके यह बोल कर की देखो क़ुरआन में यह लिखा है समाज में जहर फ़ैलाने का काम करते है 
जब की इन्हें क़ुरआन तो क़ुरआन अपने खुद की धर्म ग्रंथो के बारे में कुछ जानकारी नही होता है 

अब देखिये वेद क्या कहता है और मनुस्मृति की क्या आज्ञा है 

ते यं द्विष्मो यश्च नो द्वेष्टि तमेषां जम्भे दध्मः
"हम लोग जिस से अप्रीति करें और जो हम को दुःख दे उसको इन वायुओं की बीडाल के मुख में मूषे के सामान पीड़ा में डालें |" [यजुर्वेद 16:65 दयानन्द भाष्य]

वृश्च प्र वृश्च सं वृश्च दह प्र दह सं दह |
"तू वेद निन्दक को, काट डाल, चीर डाल, फाड़ डाल, जला दे, फूँक दे, भस्म कर दे।" भावार्थ: धर्मात्मा लोग अधर्मियों के नाश में सदा उद्यत रहें [अथर्ववेद काण्ड12: सूक्त 5: मंत्र 62 पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी भाष्य]

जो आर्यावर्त देश से भीन देश वाले है वह दस्यु और म्लेच्छ है 
मनुस्मृति 10 /45 मनुसमृति 2/23
सत्यार्थ प्रकास समुलास 8 पृश्ट 225 _226 

 "ऐ आज्ञा पालक लोगों ! तुम्हारे हथियार अग्नि आदि तोप व भाले, तीर व तलवार आदि शास्त्र विरोधियों को पराजित करने और उनको रोकने के लिए प्रशंसनीय और सट्टढ़ हों । तुम्हारी सेना सतर्क व होशियार हो ताकि तुम सदैव विजयी होते रहो ।"
ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 39 मंत्र 2

एक और स्थान पर दुआ यूं लिखी हुई है ।
मैं उसका रक्षक कायनात के स्वामी मान एवं प्रताप वाले अत्यन्त बलवान और विजयी सारी कायनात के राजा सर्व शक्तिमान और सबको शक्ति प्रदान करने वाले परमेश्वर को जिसके आगे समस्त ज़बरदस्त बहादुर आज्ञा पालक सर झुकाते हैं । और जो न्याय से प्राणियों की रक्षा करने वाला इन्द्र है । 
"हर जंग में विजय पाने के लिए आमन्त्रित करता हूं और शरण लेता हूं।”
यजुर्वेद अध्याय 20 मंत्र 50 

एक जगह परमेश्वर दुआ देता है ।
"ऐ मनुष्यो ! तुम्हारे हथियार अर्थात तोप बन्दूक_1 आदि अग्नि धावक शस्त्र और तीर व कमान तलवार आदि हथियार मेरी कृपा से शक्ति शाली और साहस वर्धक कार्य वाले हो तुम दुश्मनों की सेना को पराजित करके उन्हें पछाड़ो । तुम्हारी सेना विश्व व्यायी हुकूमत इस धरती पर स्थापित हो और तुम्हारा शुत्र (घणात्मक खतरनाक तलवार म्यान वाली) पराजित हो और नीचा देखे। (जैसा गाजी महमूद गजनवी और मुहम्मद गौरी ने नीचा देखा ?)
ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 39 मंत्र 2 
(उपरोक्त ऋग्वेद मंत्र भी यही है
       
"ऐ दुश्मनों के मारने वाले जंग के नियमों में माहिर निडर, साहसी, प्रिय, प्रतापी और जवां मर्द तू सब प्रजा को प्रसन्न रख । परमेश्वर के आदेश पर चलो और घ्रणित शुत्र को ( हे महाराज इतनी नाराजी ) पराजित करने के लिए लड़ाई का कार्य पूरा करो । तुमने पहले मैदानों में शत्रुओं की सेना को पछाड़ा है । तुमने इन्द्रियों को पराजित और धरती को विजयी किया है । तुम शक्तिशाली बाजू वाले हो । अपनी बाजू की ताकत से दुशनों को समाप्त करो ताकि तुम्हारे बाजू का जोर और ईश्वर की दया व कृपा से हमारी विजय हो ।
(अथर्ववेद कांड 6 , अनुवादक वरग 95 मन्त्र 3)

मै आसा करता हु की ये  फ़िलहाल मेरे सिर्फ इन चन्द सवालो का जवाब दें 
जो ऊपर वेद और मनुषमृति से with reference है



No comments:

Post a Comment

मस्जिदे अक्सा।

मस्जिद ए अक्सा अथवा बैतुल मुकद्दस इस्लाम की तीसरी सबसे महत्वपूर्ण मस्जिद है, बुखारी शरीफ मे नबी करीम सल्ल. की एक हदीस के अनुसार मस्जिद ए अक्...