Thursday, 25 March 2021

औरतें खेती, कुत्ते गधे से तुलना।

Page-Post/011

“फिर जब हराम के महीने बीत जाएं तो मुश्रिको को जहाँ पाओ मारो, उन्हें पकड़ो और उन्हें घेरो, और घात लगाने वाली जगह पर उनकी घात लगाकर बैठो ” (Al Qur’an 9:5)

सूरह तौबा की इस आयत नम्बर पांच का प्रयोग, इस्लाम के विरोधियों ने इस्लाम की छवि धूमिल करने के लिए खूब किया है कि इस्लाम गैर मुस्लिमों के साथ ऐसा हिंसक व्यवहार करने की शिक्षा मुस्लिमों को देता है,.... क्या वास्तव में, सूरह तौबा मे अल्लाह ने मुस्लिमों को क्रूरता और हिंसा की ही तालीम दी है ॥ आईए देखें 

सूरह तौबा की इन आयतों का ऐतिहासिक परिदृश्य ये है कि पैगंबर सल्ल. को नबूवत मिलने के 13 वर्ष बाद तक बहुदेववादियो ने मुस्लिमों पर बड़े बड़े ज़ुल्म ढाए, जिन ज़ुल्मो को मुस्लिमों ने चुपचाप बर्दाश्त किया और मक्का से बाहर मदीना चले गए, तब इन हिंसक गैर मुस्लिमों ने सोचा कि यदि ये मुस्लिम इस्लाम का त्याग नहीं कर रहे हैं, तो फिर मदीना पर चढ़ाई कर के सारे मुस्लिमों की ही हत्या कर डाली जाए तो इस्लाम जड़ से खत्म हो जाएगा ...
लेकिन पासा उल्टा पड़ा और मदीना पर इन बहुदेववादियो की चढ़ाई के फलस्वरूप जब मुस्लिमों ने आत्मरक्षा मे हथियार उठाए तो हर बार इन अत्याचारियों पर वे गिनती के कुछ मुस्लिम भारी पड़े 
जब मुस्लिमों से सीधे युद्ध मे बहुदेववादी जीतना मुश्किल समझने लगे तो उन्होंने धोखे से मुस्लिमों के खात्मे की योजना बनाई कि ऊपर से तो युद्ध बंद रखने का एक समझौता उन्होंने मुस्लिमों के साथ कर लिया लेकिन पीछे पीछे वो मुस्लिमों की जड़ें काटने की जुगत मे थे 
जब अरब के बहुदेववादियों ने मुस्लिमों के साथ किया हुआ युद्धबन्दी का एक ऐसा ही समझौता तोड़ दिया और धोखे से मुस्लिमों के साथियों की हत्याएं कीं, तो अल्लाह ने भी कुरान मे यह घोषणा कर दी कि मुस्लिमों को भी अब उन बहुदेववादियों से युद्ध बंद रखने की कोई जरूरत नहीं है ''Tum (muslimo) ne mushriko ke sath jangbandi ka jo samjhauta kia tha Allah aur Rasool ab us se bezaar hain'' [9:1]

लेकिन साथ ही जिन बहुदेववादी लोगों ने संधि समझौते को तोड़ा नहीं था, मुस्लिमों को भी उनसे संधि कायम रखने और युद्ध न करने की तालीम अल्लाह ने दी ,
''Siway un mushriko ke jinhone tumhare sath samjhauta kia tha aur usy nahi toda, na he tumhare khilaf (yuddh me) kisi ki madad ki. to tum un mushriko ke sath samjhauta uska samay pura hone tak jaari rakho. beshaq Allah nek logo ko pasand krta hai'' [9:4]

हालांकि बहुदेववादियों ने तो सुलह की आड़ मे धोखे से मुसलमानों के साथियों की जानें ली थीं, लेकिन फिर भी अल्लाह के हुक्म से मुस्लिमों ने उन हत्यारों को 4 महीने पहले से चेतावनी सुना दी कि यदि वे हत्यारे अपने पाप का पश्चाताप करना चाहें, तो इस अवधि मे कर लें ,
''to 4 maheene aur zameen pr aaram se chal phir lo aur ye jaan lo ki tum Allah ke kabu se bahar nahi ja sakte. aur Allah inkar karne walo ko apmanit karta hai''. [9:2]

4 महीने बीत जाने के बावजूद भी जिन व्यक्तियों को कोई पश्चाताप ना हो और वो मुस्लिमों से युद्ध करने को ही पसंद करें, तो ऐसे लोगों के लिए ही सूरह तौबा की वो पांचवीं आयत आई है जिसे बिना उसकी पृष्ठभूमि सामने रखे, जगह जगह लिखकर, बताकर विरोधी इस्लाम को बुरा साबित करना चाहते हैं
लेकिन जरा अपने दिल पर हाथ रखकर बोलिए कि यदि कोई व्यक्ति आपके कुछ पारिवारिक सदस्यों की हत्या कर चुका हो, और फिर भी उसके मन मे कोई पश्चाताप न हो बल्कि वो फिर से आप पर आक्रमण कर के आपके मां बाप, भाई बहनों समेत आपका समूल नाश करना चाहता हो तो क्या आप उस व्यक्ति पर दया दिखाएंगे ?? जी नहीं यदि आप बुद्धिमान होंगे तो समझते होंगे कि उस वक्त दया का पात्र वो हत्यारा नहीं बल्कि आप और आपका परिवार होगा, और निश्चय ही आप बातचीत ,और बातचीत विफल होने पर शक्ति के जरिए आत्मरक्षा के उपाय करेंगे, बिल्कुल यही शिक्षा कुरान मे है

आगे भी देखिए कि यदि इन्हीं दुष्ट हत्यारों मे से कोई युद्ध के मैदान मे पहुंचने के बाद भी मुस्लिमों से युद्ध छोड़कर युद्ध भूमि से बाहर जाना चाहे तो युद्ध के मैदान मे दुश्मन के साथ भी दयालुता और नेकी की क्या खूब तालीम दी है मेरे रब ने, इसी सूरह तौबा की अगली ही आयत यानि आयत 6 मे ..
''Aur agar un mushriko me se koi tumhari sharan chahe to uski hifazat karo taki wo Allah ke shabd sun len . aur fir usko us ki surakshit jagah pahoncha do. kyonki ye wo log hain jo nahi jaante'' [9:6]

आगे की आयतों मे भी आप देख सकते हैं, कि अरब के वे बहुदेववादी किसी भी वादे या कसम या रिश्ते नाते का भी खयाल नहीं करते थे जब वे मुस्लिमों को कमजोर पाते थे.... ऐसे अत्याचारियों के साथ युद्ध भी करने की शिक्षा दी मेरे अल्लाह ने तो वो भी कितनी नेकी की तालीम के साथ ॥

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अबु दाऊद शरीफ़ मे एक हदीस है कि यदि कोई कुत्ता, गधा, सुअर, एक यहूदी, जादूगर या कोई स्त्री किसी बिना किसी खुले स्थान पर नमाज पढ़ते व्यक्ति के करीब से सामने से गुजर जाएं तो नमाज खराब हो जाती है, ( मुस्लिम शरीफ़ के अनुसार नमाज़ मे खलल पड़ जाता है ।)
इस हदीस को आधार बनाकर कुछ लोग ये आरोप लगा रहे हैं कि इस्लाम ने स्त्री को कुत्ते और गधे जैसा बताकर स्त्रियों का अपमान किया है ॥

इस आरोप का सबसे अच्छा जवाब बुखारी शरीफ़ की किताब-9, हदीस-493 मे है कि अम्मी आइशा रज़ि. ने जब नबी सल्ल. के समक्ष इस बात पर एतराज़ जताया कि "आप सल्ल. हमारी (स्त्रियों की) तुलना कुत्ते और गधे से कर रहे हैं ??" तो (इस घटना के उपरांत) अम्मी आइशा रज़ी. ने देखा कि नबी सल्ल. अम्मी आइशा के अपने सामने लेटी होने के बावजूद नमाज पढ़ रहे थे ...."
ऐसे नमाज पढ़कर नबी सल्ल. ने ये जाहिर कर दिया कि आप सल्ल. ने स्त्रियों को कुत्ते या गधे जैसा नहीं माना था, और यदि नमाजी के आगे जाने की मनाही को किसी भली स्त्री ने अपना अपमान समझा हो, तो प्यारे नबी सल्ल. ने स्त्रियों को अपमानित नही किया है ।

वास्तव मे इस हदीस का मंतव्य ये है कि नमाज को पूरी एकाग्रता के साथ पढ़ा जाना चाहिए, लेकिन यदि कुत्ते, गधे या सूअर जैसा कोई जानवर जो किसी व्यक्ति को अपने पास पाकर आक्रामक हो सकता है , या शत्रु पक्ष का कोई व्यक्ति किसी नमाज पढ़ते हुए व्यक्ति के सामने आ जाए तो निस्संदेह नमाज़ी का ध्यान ये सोचकर नमाज़ से हट जाएगा कि कहीं वो जानवर या शत्रु , नमाज़ी को कोई नुकसान न पहुंचा दें, ....इसके विपरीत यदि कोई स्त्री नमाज पढ़ते व्यक्ति के सामने आ जाएगी तो उस स्त्री का रूप सौन्दर्य या शोख परिधान देखकर नमाज़ी का ध्यान नमाज़ से भटक सकता है , और नमाज मे खलल और खराबी आ सकती है. 
जैसा कि इस विषय की हदीस की व्याख्या करते हुए एक बड़े इस्लामी विद्वान इमाम नानवी ने लिखा है कि:-
"यहाँ नमाज मे खलल पड़ने का अर्थ, व्यक्ति का ध्यान इन चीजों की तरफ भटक जाने से नमाज़ से एकाग्रता हट जाना है ." (शरह अल-नानवी 2/266).

अब सोच के देखिए कि क्या इस हदीस मे किसी तरह के जानवर से स्त्री की तुलना की जा रही है ...?? .. हरगिज़ नहीं, क्योंकि जानवरों को देखकर नमाज़ी का ध्यान एक अलग कारण से भटकेगा और इसके विपरीत स्त्री को सामने देखकर बिल्कुल ही अलग कारण से ....

न ही इस हदीस मे किसी भी तरह किसी स्त्री का अपमान किया गया है , बल्कि यहां तो स्त्री के सौन्दर्य के कारण नमाज़ी का ध्यान भटकने की आशंका व्यक्त की गई है, ये तो स्त्री जाति के सौन्दर्य की प्रशंसा ही है, उसका अपमान नहीं ॥

बालात्कार का कानून।

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“फिर जब हराम के महीने बीत जाएं तो मुश्रिको को जहाँ पाओ मारो, उन्हें पकड़ो और उन्हें घेरो, और घात लगाने वाली जगह पर उनकी घात लगाकर बैठो ” (Al Qur’an 9:5)

सूरह तौबा की इस आयत नम्बर पांच का प्रयोग, इस्लाम के विरोधियों ने इस्लाम की छवि धूमिल करने के लिए खूब किया है कि इस्लाम गैर मुस्लिमों के साथ ऐसा हिंसक व्यवहार करने की शिक्षा मुस्लिमों को देता है,.... क्या वास्तव में, सूरह तौबा मे अल्लाह ने मुस्लिमों को क्रूरता और हिंसा की ही तालीम दी है ॥ आईए देखें 

सूरह तौबा की इन आयतों का ऐतिहासिक परिदृश्य ये है कि पैगंबर सल्ल. को नबूवत मिलने के 13 वर्ष बाद तक बहुदेववादियो ने मुस्लिमों पर बड़े बड़े ज़ुल्म ढाए, जिन ज़ुल्मो को मुस्लिमों ने चुपचाप बर्दाश्त किया और मक्का से बाहर मदीना चले गए, तब इन हिंसक गैर मुस्लिमों ने सोचा कि यदि ये मुस्लिम इस्लाम का त्याग नहीं कर रहे हैं, तो फिर मदीना पर चढ़ाई कर के सारे मुस्लिमों की ही हत्या कर डाली जाए तो इस्लाम जड़ से खत्म हो जाएगा ...
लेकिन पासा उल्टा पड़ा और मदीना पर इन बहुदेववादियो की चढ़ाई के फलस्वरूप जब मुस्लिमों ने आत्मरक्षा मे हथियार उठाए तो हर बार इन अत्याचारियों पर वे गिनती के कुछ मुस्लिम भारी पड़े 
जब मुस्लिमों से सीधे युद्ध मे बहुदेववादी जीतना मुश्किल समझने लगे तो उन्होंने धोखे से मुस्लिमों के खात्मे की योजना बनाई कि ऊपर से तो युद्ध बंद रखने का एक समझौता उन्होंने मुस्लिमों के साथ कर लिया लेकिन पीछे पीछे वो मुस्लिमों की जड़ें काटने की जुगत मे थे 
जब अरब के बहुदेववादियों ने मुस्लिमों के साथ किया हुआ युद्धबन्दी का एक ऐसा ही समझौता तोड़ दिया और धोखे से मुस्लिमों के साथियों की हत्याएं कीं, तो अल्लाह ने भी कुरान मे यह घोषणा कर दी कि मुस्लिमों को भी अब उन बहुदेववादियों से युद्ध बंद रखने की कोई जरूरत नहीं है ''Tum (muslimo) ne mushriko ke sath jangbandi ka jo samjhauta kia tha Allah aur Rasool ab us se bezaar hain'' [9:1]

लेकिन साथ ही जिन बहुदेववादी लोगों ने संधि समझौते को तोड़ा नहीं था, मुस्लिमों को भी उनसे संधि कायम रखने और युद्ध न करने की तालीम अल्लाह ने दी ,
''Siway un mushriko ke jinhone tumhare sath samjhauta kia tha aur usy nahi toda, na he tumhare khilaf (yuddh me) kisi ki madad ki. to tum un mushriko ke sath samjhauta uska samay pura hone tak jaari rakho. beshaq Allah nek logo ko pasand krta hai'' [9:4]

हालांकि बहुदेववादियों ने तो सुलह की आड़ मे धोखे से मुसलमानों के साथियों की जानें ली थीं, लेकिन फिर भी अल्लाह के हुक्म से मुस्लिमों ने उन हत्यारों को 4 महीने पहले से चेतावनी सुना दी कि यदि वे हत्यारे अपने पाप का पश्चाताप करना चाहें, तो इस अवधि मे कर लें ,
''to 4 maheene aur zameen pr aaram se chal phir lo aur ye jaan lo ki tum Allah ke kabu se bahar nahi ja sakte. aur Allah inkar karne walo ko apmanit karta hai''. [9:2]

4 महीने बीत जाने के बावजूद भी जिन व्यक्तियों को कोई पश्चाताप ना हो और वो मुस्लिमों से युद्ध करने को ही पसंद करें, तो ऐसे लोगों के लिए ही सूरह तौबा की वो पांचवीं आयत आई है जिसे बिना उसकी पृष्ठभूमि सामने रखे, जगह जगह लिखकर, बताकर विरोधी इस्लाम को बुरा साबित करना चाहते हैं
लेकिन जरा अपने दिल पर हाथ रखकर बोलिए कि यदि कोई व्यक्ति आपके कुछ पारिवारिक सदस्यों की हत्या कर चुका हो, और फिर भी उसके मन मे कोई पश्चाताप न हो बल्कि वो फिर से आप पर आक्रमण कर के आपके मां बाप, भाई बहनों समेत आपका समूल नाश करना चाहता हो तो क्या आप उस व्यक्ति पर दया दिखाएंगे ?? जी नहीं यदि आप बुद्धिमान होंगे तो समझते होंगे कि उस वक्त दया का पात्र वो हत्यारा नहीं बल्कि आप और आपका परिवार होगा, और निश्चय ही आप बातचीत ,और बातचीत विफल होने पर शक्ति के जरिए आत्मरक्षा के उपाय करेंगे, बिल्कुल यही शिक्षा कुरान मे है

आगे भी देखिए कि यदि इन्हीं दुष्ट हत्यारों मे से कोई युद्ध के मैदान मे पहुंचने के बाद भी मुस्लिमों से युद्ध छोड़कर युद्ध भूमि से बाहर जाना चाहे तो युद्ध के मैदान मे दुश्मन के साथ भी दयालुता और नेकी की क्या खूब तालीम दी है मेरे रब ने, इसी सूरह तौबा की अगली ही आयत यानि आयत 6 मे ..
''Aur agar un mushriko me se koi tumhari sharan chahe to uski hifazat karo taki wo Allah ke shabd sun len . aur fir usko us ki surakshit jagah pahoncha do. kyonki ye wo log hain jo nahi jaante'' [9:6]

आगे की आयतों मे भी आप देख सकते हैं, कि अरब के वे बहुदेववादी किसी भी वादे या कसम या रिश्ते नाते का भी खयाल नहीं करते थे जब वे मुस्लिमों को कमजोर पाते थे.... ऐसे अत्याचारियों के साथ युद्ध भी करने की शिक्षा दी मेरे अल्लाह ने तो वो भी कितनी नेकी की तालीम के साथ ॥

ग़ुलाम।

Page-Post/011

“फिर जब हराम के महीने बीत जाएं तो मुश्रिको को जहाँ पाओ मारो, उन्हें पकड़ो और उन्हें घेरो, और घात लगाने वाली जगह पर उनकी घात लगाकर बैठो ” (Al Qur’an 9:5)

सूरह तौबा की इस आयत नम्बर पांच का प्रयोग, इस्लाम के विरोधियों ने इस्लाम की छवि धूमिल करने के लिए खूब किया है कि इस्लाम गैर मुस्लिमों के साथ ऐसा हिंसक व्यवहार करने की शिक्षा मुस्लिमों को देता है,.... क्या वास्तव में, सूरह तौबा मे अल्लाह ने मुस्लिमों को क्रूरता और हिंसा की ही तालीम दी है ॥ आईए देखें 

सूरह तौबा की इन आयतों का ऐतिहासिक परिदृश्य ये है कि पैगंबर सल्ल. को नबूवत मिलने के 13 वर्ष बाद तक बहुदेववादियो ने मुस्लिमों पर बड़े बड़े ज़ुल्म ढाए, जिन ज़ुल्मो को मुस्लिमों ने चुपचाप बर्दाश्त किया और मक्का से बाहर मदीना चले गए, तब इन हिंसक गैर मुस्लिमों ने सोचा कि यदि ये मुस्लिम इस्लाम का त्याग नहीं कर रहे हैं, तो फिर मदीना पर चढ़ाई कर के सारे मुस्लिमों की ही हत्या कर डाली जाए तो इस्लाम जड़ से खत्म हो जाएगा ...
लेकिन पासा उल्टा पड़ा और मदीना पर इन बहुदेववादियो की चढ़ाई के फलस्वरूप जब मुस्लिमों ने आत्मरक्षा मे हथियार उठाए तो हर बार इन अत्याचारियों पर वे गिनती के कुछ मुस्लिम भारी पड़े 
जब मुस्लिमों से सीधे युद्ध मे बहुदेववादी जीतना मुश्किल समझने लगे तो उन्होंने धोखे से मुस्लिमों के खात्मे की योजना बनाई कि ऊपर से तो युद्ध बंद रखने का एक समझौता उन्होंने मुस्लिमों के साथ कर लिया लेकिन पीछे पीछे वो मुस्लिमों की जड़ें काटने की जुगत मे थे 
जब अरब के बहुदेववादियों ने मुस्लिमों के साथ किया हुआ युद्धबन्दी का एक ऐसा ही समझौता तोड़ दिया और धोखे से मुस्लिमों के साथियों की हत्याएं कीं, तो अल्लाह ने भी कुरान मे यह घोषणा कर दी कि मुस्लिमों को भी अब उन बहुदेववादियों से युद्ध बंद रखने की कोई जरूरत नहीं है ''Tum (muslimo) ne mushriko ke sath jangbandi ka jo samjhauta kia tha Allah aur Rasool ab us se bezaar hain'' [9:1]

लेकिन साथ ही जिन बहुदेववादी लोगों ने संधि समझौते को तोड़ा नहीं था, मुस्लिमों को भी उनसे संधि कायम रखने और युद्ध न करने की तालीम अल्लाह ने दी ,
''Siway un mushriko ke jinhone tumhare sath samjhauta kia tha aur usy nahi toda, na he tumhare khilaf (yuddh me) kisi ki madad ki. to tum un mushriko ke sath samjhauta uska samay pura hone tak jaari rakho. beshaq Allah nek logo ko pasand krta hai'' [9:4]

हालांकि बहुदेववादियों ने तो सुलह की आड़ मे धोखे से मुसलमानों के साथियों की जानें ली थीं, लेकिन फिर भी अल्लाह के हुक्म से मुस्लिमों ने उन हत्यारों को 4 महीने पहले से चेतावनी सुना दी कि यदि वे हत्यारे अपने पाप का पश्चाताप करना चाहें, तो इस अवधि मे कर लें ,
''to 4 maheene aur zameen pr aaram se chal phir lo aur ye jaan lo ki tum Allah ke kabu se bahar nahi ja sakte. aur Allah inkar karne walo ko apmanit karta hai''. [9:2]

4 महीने बीत जाने के बावजूद भी जिन व्यक्तियों को कोई पश्चाताप ना हो और वो मुस्लिमों से युद्ध करने को ही पसंद करें, तो ऐसे लोगों के लिए ही सूरह तौबा की वो पांचवीं आयत आई है जिसे बिना उसकी पृष्ठभूमि सामने रखे, जगह जगह लिखकर, बताकर विरोधी इस्लाम को बुरा साबित करना चाहते हैं
लेकिन जरा अपने दिल पर हाथ रखकर बोलिए कि यदि कोई व्यक्ति आपके कुछ पारिवारिक सदस्यों की हत्या कर चुका हो, और फिर भी उसके मन मे कोई पश्चाताप न हो बल्कि वो फिर से आप पर आक्रमण कर के आपके मां बाप, भाई बहनों समेत आपका समूल नाश करना चाहता हो तो क्या आप उस व्यक्ति पर दया दिखाएंगे ?? जी नहीं यदि आप बुद्धिमान होंगे तो समझते होंगे कि उस वक्त दया का पात्र वो हत्यारा नहीं बल्कि आप और आपका परिवार होगा, और निश्चय ही आप बातचीत ,और बातचीत विफल होने पर शक्ति के जरिए आत्मरक्षा के उपाय करेंगे, बिल्कुल यही शिक्षा कुरान मे है

आगे भी देखिए कि यदि इन्हीं दुष्ट हत्यारों मे से कोई युद्ध के मैदान मे पहुंचने के बाद भी मुस्लिमों से युद्ध छोड़कर युद्ध भूमि से बाहर जाना चाहे तो युद्ध के मैदान मे दुश्मन के साथ भी दयालुता और नेकी की क्या खूब तालीम दी है मेरे रब ने, इसी सूरह तौबा की अगली ही आयत यानि आयत 6 मे ..
''Aur agar un mushriko me se koi tumhari sharan chahe to uski hifazat karo taki wo Allah ke shabd sun len . aur fir usko us ki surakshit jagah pahoncha do. kyonki ye wo log hain jo nahi jaante'' [9:6]

आगे की आयतों मे भी आप देख सकते हैं, कि अरब के वे बहुदेववादी किसी भी वादे या कसम या रिश्ते नाते का भी खयाल नहीं करते थे जब वे मुस्लिमों को कमजोर पाते थे.... ऐसे अत्याचारियों के साथ युद्ध भी करने की शिक्षा दी मेरे अल्लाह ने तो वो भी कितनी नेकी की तालीम के साथ ॥

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Page-Post/011

“फिर जब हराम के महीने बीत जाएं तो मुश्रिको को जहाँ पाओ मारो, उन्हें पकड़ो और उन्हें घेरो, और घात लगाने वाली जगह पर उनकी घात लगाकर बैठो ” (Al Qur’an 9:5)

सूरह तौबा की इस आयत नम्बर पांच का प्रयोग, इस्लाम के विरोधियों ने इस्लाम की छवि धूमिल करने के लिए खूब किया है कि इस्लाम गैर मुस्लिमों के साथ ऐसा हिंसक व्यवहार करने की शिक्षा मुस्लिमों को देता है,.... क्या वास्तव में, सूरह तौबा मे अल्लाह ने मुस्लिमों को क्रूरता और हिंसा की ही तालीम दी है ॥ आईए देखें 

सूरह तौबा की इन आयतों का ऐतिहासिक परिदृश्य ये है कि पैगंबर सल्ल. को नबूवत मिलने के 13 वर्ष बाद तक बहुदेववादियो ने मुस्लिमों पर बड़े बड़े ज़ुल्म ढाए, जिन ज़ुल्मो को मुस्लिमों ने चुपचाप बर्दाश्त किया और मक्का से बाहर मदीना चले गए, तब इन हिंसक गैर मुस्लिमों ने सोचा कि यदि ये मुस्लिम इस्लाम का त्याग नहीं कर रहे हैं, तो फिर मदीना पर चढ़ाई कर के सारे मुस्लिमों की ही हत्या कर डाली जाए तो इस्लाम जड़ से खत्म हो जाएगा ...
लेकिन पासा उल्टा पड़ा और मदीना पर इन बहुदेववादियो की चढ़ाई के फलस्वरूप जब मुस्लिमों ने आत्मरक्षा मे हथियार उठाए तो हर बार इन अत्याचारियों पर वे गिनती के कुछ मुस्लिम भारी पड़े 
जब मुस्लिमों से सीधे युद्ध मे बहुदेववादी जीतना मुश्किल समझने लगे तो उन्होंने धोखे से मुस्लिमों के खात्मे की योजना बनाई कि ऊपर से तो युद्ध बंद रखने का एक समझौता उन्होंने मुस्लिमों के साथ कर लिया लेकिन पीछे पीछे वो मुस्लिमों की जड़ें काटने की जुगत मे थे 
जब अरब के बहुदेववादियों ने मुस्लिमों के साथ किया हुआ युद्धबन्दी का एक ऐसा ही समझौता तोड़ दिया और धोखे से मुस्लिमों के साथियों की हत्याएं कीं, तो अल्लाह ने भी कुरान मे यह घोषणा कर दी कि मुस्लिमों को भी अब उन बहुदेववादियों से युद्ध बंद रखने की कोई जरूरत नहीं है ''Tum (muslimo) ne mushriko ke sath jangbandi ka jo samjhauta kia tha Allah aur Rasool ab us se bezaar hain'' [9:1]

लेकिन साथ ही जिन बहुदेववादी लोगों ने संधि समझौते को तोड़ा नहीं था, मुस्लिमों को भी उनसे संधि कायम रखने और युद्ध न करने की तालीम अल्लाह ने दी ,
''Siway un mushriko ke jinhone tumhare sath samjhauta kia tha aur usy nahi toda, na he tumhare khilaf (yuddh me) kisi ki madad ki. to tum un mushriko ke sath samjhauta uska samay pura hone tak jaari rakho. beshaq Allah nek logo ko pasand krta hai'' [9:4]

हालांकि बहुदेववादियों ने तो सुलह की आड़ मे धोखे से मुसलमानों के साथियों की जानें ली थीं, लेकिन फिर भी अल्लाह के हुक्म से मुस्लिमों ने उन हत्यारों को 4 महीने पहले से चेतावनी सुना दी कि यदि वे हत्यारे अपने पाप का पश्चाताप करना चाहें, तो इस अवधि मे कर लें ,
''to 4 maheene aur zameen pr aaram se chal phir lo aur ye jaan lo ki tum Allah ke kabu se bahar nahi ja sakte. aur Allah inkar karne walo ko apmanit karta hai''. [9:2]

4 महीने बीत जाने के बावजूद भी जिन व्यक्तियों को कोई पश्चाताप ना हो और वो मुस्लिमों से युद्ध करने को ही पसंद करें, तो ऐसे लोगों के लिए ही सूरह तौबा की वो पांचवीं आयत आई है जिसे बिना उसकी पृष्ठभूमि सामने रखे, जगह जगह लिखकर, बताकर विरोधी इस्लाम को बुरा साबित करना चाहते हैं
लेकिन जरा अपने दिल पर हाथ रखकर बोलिए कि यदि कोई व्यक्ति आपके कुछ पारिवारिक सदस्यों की हत्या कर चुका हो, और फिर भी उसके मन मे कोई पश्चाताप न हो बल्कि वो फिर से आप पर आक्रमण कर के आपके मां बाप, भाई बहनों समेत आपका समूल नाश करना चाहता हो तो क्या आप उस व्यक्ति पर दया दिखाएंगे ?? जी नहीं यदि आप बुद्धिमान होंगे तो समझते होंगे कि उस वक्त दया का पात्र वो हत्यारा नहीं बल्कि आप और आपका परिवार होगा, और निश्चय ही आप बातचीत ,और बातचीत विफल होने पर शक्ति के जरिए आत्मरक्षा के उपाय करेंगे, बिल्कुल यही शिक्षा कुरान मे है

आगे भी देखिए कि यदि इन्हीं दुष्ट हत्यारों मे से कोई युद्ध के मैदान मे पहुंचने के बाद भी मुस्लिमों से युद्ध छोड़कर युद्ध भूमि से बाहर जाना चाहे तो युद्ध के मैदान मे दुश्मन के साथ भी दयालुता और नेकी की क्या खूब तालीम दी है मेरे रब ने, इसी सूरह तौबा की अगली ही आयत यानि आयत 6 मे ..
''Aur agar un mushriko me se koi tumhari sharan chahe to uski hifazat karo taki wo Allah ke shabd sun len . aur fir usko us ki surakshit jagah pahoncha do. kyonki ye wo log hain jo nahi jaante'' [9:6]

आगे की आयतों मे भी आप देख सकते हैं, कि अरब के वे बहुदेववादी किसी भी वादे या कसम या रिश्ते नाते का भी खयाल नहीं करते थे जब वे मुस्लिमों को कमजोर पाते थे.... ऐसे अत्याचारियों के साथ युद्ध भी करने की शिक्षा दी मेरे अल्लाह ने तो वो भी कितनी नेकी की तालीम के साथ ॥

सूरज डूबना।

Page-Post/011

“फिर जब हराम के महीने बीत जाएं तो मुश्रिको को जहाँ पाओ मारो, उन्हें पकड़ो और उन्हें घेरो, और घात लगाने वाली जगह पर उनकी घात लगाकर बैठो ” (Al Qur’an 9:5)

सूरह तौबा की इस आयत नम्बर पांच का प्रयोग, इस्लाम के विरोधियों ने इस्लाम की छवि धूमिल करने के लिए खूब किया है कि इस्लाम गैर मुस्लिमों के साथ ऐसा हिंसक व्यवहार करने की शिक्षा मुस्लिमों को देता है,.... क्या वास्तव में, सूरह तौबा मे अल्लाह ने मुस्लिमों को क्रूरता और हिंसा की ही तालीम दी है ॥ आईए देखें 

सूरह तौबा की इन आयतों का ऐतिहासिक परिदृश्य ये है कि पैगंबर सल्ल. को नबूवत मिलने के 13 वर्ष बाद तक बहुदेववादियो ने मुस्लिमों पर बड़े बड़े ज़ुल्म ढाए, जिन ज़ुल्मो को मुस्लिमों ने चुपचाप बर्दाश्त किया और मक्का से बाहर मदीना चले गए, तब इन हिंसक गैर मुस्लिमों ने सोचा कि यदि ये मुस्लिम इस्लाम का त्याग नहीं कर रहे हैं, तो फिर मदीना पर चढ़ाई कर के सारे मुस्लिमों की ही हत्या कर डाली जाए तो इस्लाम जड़ से खत्म हो जाएगा ...
लेकिन पासा उल्टा पड़ा और मदीना पर इन बहुदेववादियो की चढ़ाई के फलस्वरूप जब मुस्लिमों ने आत्मरक्षा मे हथियार उठाए तो हर बार इन अत्याचारियों पर वे गिनती के कुछ मुस्लिम भारी पड़े 
जब मुस्लिमों से सीधे युद्ध मे बहुदेववादी जीतना मुश्किल समझने लगे तो उन्होंने धोखे से मुस्लिमों के खात्मे की योजना बनाई कि ऊपर से तो युद्ध बंद रखने का एक समझौता उन्होंने मुस्लिमों के साथ कर लिया लेकिन पीछे पीछे वो मुस्लिमों की जड़ें काटने की जुगत मे थे 
जब अरब के बहुदेववादियों ने मुस्लिमों के साथ किया हुआ युद्धबन्दी का एक ऐसा ही समझौता तोड़ दिया और धोखे से मुस्लिमों के साथियों की हत्याएं कीं, तो अल्लाह ने भी कुरान मे यह घोषणा कर दी कि मुस्लिमों को भी अब उन बहुदेववादियों से युद्ध बंद रखने की कोई जरूरत नहीं है ''Tum (muslimo) ne mushriko ke sath jangbandi ka jo samjhauta kia tha Allah aur Rasool ab us se bezaar hain'' [9:1]

लेकिन साथ ही जिन बहुदेववादी लोगों ने संधि समझौते को तोड़ा नहीं था, मुस्लिमों को भी उनसे संधि कायम रखने और युद्ध न करने की तालीम अल्लाह ने दी ,
''Siway un mushriko ke jinhone tumhare sath samjhauta kia tha aur usy nahi toda, na he tumhare khilaf (yuddh me) kisi ki madad ki. to tum un mushriko ke sath samjhauta uska samay pura hone tak jaari rakho. beshaq Allah nek logo ko pasand krta hai'' [9:4]

हालांकि बहुदेववादियों ने तो सुलह की आड़ मे धोखे से मुसलमानों के साथियों की जानें ली थीं, लेकिन फिर भी अल्लाह के हुक्म से मुस्लिमों ने उन हत्यारों को 4 महीने पहले से चेतावनी सुना दी कि यदि वे हत्यारे अपने पाप का पश्चाताप करना चाहें, तो इस अवधि मे कर लें ,
''to 4 maheene aur zameen pr aaram se chal phir lo aur ye jaan lo ki tum Allah ke kabu se bahar nahi ja sakte. aur Allah inkar karne walo ko apmanit karta hai''. [9:2]

4 महीने बीत जाने के बावजूद भी जिन व्यक्तियों को कोई पश्चाताप ना हो और वो मुस्लिमों से युद्ध करने को ही पसंद करें, तो ऐसे लोगों के लिए ही सूरह तौबा की वो पांचवीं आयत आई है जिसे बिना उसकी पृष्ठभूमि सामने रखे, जगह जगह लिखकर, बताकर विरोधी इस्लाम को बुरा साबित करना चाहते हैं
लेकिन जरा अपने दिल पर हाथ रखकर बोलिए कि यदि कोई व्यक्ति आपके कुछ पारिवारिक सदस्यों की हत्या कर चुका हो, और फिर भी उसके मन मे कोई पश्चाताप न हो बल्कि वो फिर से आप पर आक्रमण कर के आपके मां बाप, भाई बहनों समेत आपका समूल नाश करना चाहता हो तो क्या आप उस व्यक्ति पर दया दिखाएंगे ?? जी नहीं यदि आप बुद्धिमान होंगे तो समझते होंगे कि उस वक्त दया का पात्र वो हत्यारा नहीं बल्कि आप और आपका परिवार होगा, और निश्चय ही आप बातचीत ,और बातचीत विफल होने पर शक्ति के जरिए आत्मरक्षा के उपाय करेंगे, बिल्कुल यही शिक्षा कुरान मे है

आगे भी देखिए कि यदि इन्हीं दुष्ट हत्यारों मे से कोई युद्ध के मैदान मे पहुंचने के बाद भी मुस्लिमों से युद्ध छोड़कर युद्ध भूमि से बाहर जाना चाहे तो युद्ध के मैदान मे दुश्मन के साथ भी दयालुता और नेकी की क्या खूब तालीम दी है मेरे रब ने, इसी सूरह तौबा की अगली ही आयत यानि आयत 6 मे ..
''Aur agar un mushriko me se koi tumhari sharan chahe to uski hifazat karo taki wo Allah ke shabd sun len . aur fir usko us ki surakshit jagah pahoncha do. kyonki ye wo log hain jo nahi jaante'' [9:6]

आगे की आयतों मे भी आप देख सकते हैं, कि अरब के वे बहुदेववादी किसी भी वादे या कसम या रिश्ते नाते का भी खयाल नहीं करते थे जब वे मुस्लिमों को कमजोर पाते थे.... ऐसे अत्याचारियों के साथ युद्ध भी करने की शिक्षा दी मेरे अल्लाह ने तो वो भी कितनी नेकी की तालीम के साथ ॥

मक्का में गैर मुसलमानों का प्रवेश।

Page-Post/011

“फिर जब हराम के महीने बीत जाएं तो मुश्रिको को जहाँ पाओ मारो, उन्हें पकड़ो और उन्हें घेरो, और घात लगाने वाली जगह पर उनकी घात लगाकर बैठो ” (Al Qur’an 9:5)

सूरह तौबा की इस आयत नम्बर पांच का प्रयोग, इस्लाम के विरोधियों ने इस्लाम की छवि धूमिल करने के लिए खूब किया है कि इस्लाम गैर मुस्लिमों के साथ ऐसा हिंसक व्यवहार करने की शिक्षा मुस्लिमों को देता है,.... क्या वास्तव में, सूरह तौबा मे अल्लाह ने मुस्लिमों को क्रूरता और हिंसा की ही तालीम दी है ॥ आईए देखें 

सूरह तौबा की इन आयतों का ऐतिहासिक परिदृश्य ये है कि पैगंबर सल्ल. को नबूवत मिलने के 13 वर्ष बाद तक बहुदेववादियो ने मुस्लिमों पर बड़े बड़े ज़ुल्म ढाए, जिन ज़ुल्मो को मुस्लिमों ने चुपचाप बर्दाश्त किया और मक्का से बाहर मदीना चले गए, तब इन हिंसक गैर मुस्लिमों ने सोचा कि यदि ये मुस्लिम इस्लाम का त्याग नहीं कर रहे हैं, तो फिर मदीना पर चढ़ाई कर के सारे मुस्लिमों की ही हत्या कर डाली जाए तो इस्लाम जड़ से खत्म हो जाएगा ...
लेकिन पासा उल्टा पड़ा और मदीना पर इन बहुदेववादियो की चढ़ाई के फलस्वरूप जब मुस्लिमों ने आत्मरक्षा मे हथियार उठाए तो हर बार इन अत्याचारियों पर वे गिनती के कुछ मुस्लिम भारी पड़े 
जब मुस्लिमों से सीधे युद्ध मे बहुदेववादी जीतना मुश्किल समझने लगे तो उन्होंने धोखे से मुस्लिमों के खात्मे की योजना बनाई कि ऊपर से तो युद्ध बंद रखने का एक समझौता उन्होंने मुस्लिमों के साथ कर लिया लेकिन पीछे पीछे वो मुस्लिमों की जड़ें काटने की जुगत मे थे 
जब अरब के बहुदेववादियों ने मुस्लिमों के साथ किया हुआ युद्धबन्दी का एक ऐसा ही समझौता तोड़ दिया और धोखे से मुस्लिमों के साथियों की हत्याएं कीं, तो अल्लाह ने भी कुरान मे यह घोषणा कर दी कि मुस्लिमों को भी अब उन बहुदेववादियों से युद्ध बंद रखने की कोई जरूरत नहीं है ''Tum (muslimo) ne mushriko ke sath jangbandi ka jo samjhauta kia tha Allah aur Rasool ab us se bezaar hain'' [9:1]

लेकिन साथ ही जिन बहुदेववादी लोगों ने संधि समझौते को तोड़ा नहीं था, मुस्लिमों को भी उनसे संधि कायम रखने और युद्ध न करने की तालीम अल्लाह ने दी ,
''Siway un mushriko ke jinhone tumhare sath samjhauta kia tha aur usy nahi toda, na he tumhare khilaf (yuddh me) kisi ki madad ki. to tum un mushriko ke sath samjhauta uska samay pura hone tak jaari rakho. beshaq Allah nek logo ko pasand krta hai'' [9:4]

हालांकि बहुदेववादियों ने तो सुलह की आड़ मे धोखे से मुसलमानों के साथियों की जानें ली थीं, लेकिन फिर भी अल्लाह के हुक्म से मुस्लिमों ने उन हत्यारों को 4 महीने पहले से चेतावनी सुना दी कि यदि वे हत्यारे अपने पाप का पश्चाताप करना चाहें, तो इस अवधि मे कर लें ,
''to 4 maheene aur zameen pr aaram se chal phir lo aur ye jaan lo ki tum Allah ke kabu se bahar nahi ja sakte. aur Allah inkar karne walo ko apmanit karta hai''. [9:2]

4 महीने बीत जाने के बावजूद भी जिन व्यक्तियों को कोई पश्चाताप ना हो और वो मुस्लिमों से युद्ध करने को ही पसंद करें, तो ऐसे लोगों के लिए ही सूरह तौबा की वो पांचवीं आयत आई है जिसे बिना उसकी पृष्ठभूमि सामने रखे, जगह जगह लिखकर, बताकर विरोधी इस्लाम को बुरा साबित करना चाहते हैं
लेकिन जरा अपने दिल पर हाथ रखकर बोलिए कि यदि कोई व्यक्ति आपके कुछ पारिवारिक सदस्यों की हत्या कर चुका हो, और फिर भी उसके मन मे कोई पश्चाताप न हो बल्कि वो फिर से आप पर आक्रमण कर के आपके मां बाप, भाई बहनों समेत आपका समूल नाश करना चाहता हो तो क्या आप उस व्यक्ति पर दया दिखाएंगे ?? जी नहीं यदि आप बुद्धिमान होंगे तो समझते होंगे कि उस वक्त दया का पात्र वो हत्यारा नहीं बल्कि आप और आपका परिवार होगा, और निश्चय ही आप बातचीत ,और बातचीत विफल होने पर शक्ति के जरिए आत्मरक्षा के उपाय करेंगे, बिल्कुल यही शिक्षा कुरान मे है

आगे भी देखिए कि यदि इन्हीं दुष्ट हत्यारों मे से कोई युद्ध के मैदान मे पहुंचने के बाद भी मुस्लिमों से युद्ध छोड़कर युद्ध भूमि से बाहर जाना चाहे तो युद्ध के मैदान मे दुश्मन के साथ भी दयालुता और नेकी की क्या खूब तालीम दी है मेरे रब ने, इसी सूरह तौबा की अगली ही आयत यानि आयत 6 मे ..
''Aur agar un mushriko me se koi tumhari sharan chahe to uski hifazat karo taki wo Allah ke shabd sun len . aur fir usko us ki surakshit jagah pahoncha do. kyonki ye wo log hain jo nahi jaante'' [9:6]

आगे की आयतों मे भी आप देख सकते हैं, कि अरब के वे बहुदेववादी किसी भी वादे या कसम या रिश्ते नाते का भी खयाल नहीं करते थे जब वे मुस्लिमों को कमजोर पाते थे.... ऐसे अत्याचारियों के साथ युद्ध भी करने की शिक्षा दी मेरे अल्लाह ने तो वो भी कितनी नेकी की तालीम के साथ ॥

जंहा पाओ मारो, 24 आयतें।

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“फिर जब हराम के महीने बीत जाएं तो मुश्रिको को जहाँ पाओ मारो, उन्हें पकड़ो और उन्हें घेरो, और घात लगाने वाली जगह पर उनकी घात लगाकर बैठो ” (Al Qur’an 9:5)

सूरह तौबा की इस आयत नम्बर पांच का प्रयोग, इस्लाम के विरोधियों ने इस्लाम की छवि धूमिल करने के लिए खूब किया है कि इस्लाम गैर मुस्लिमों के साथ ऐसा हिंसक व्यवहार करने की शिक्षा मुस्लिमों को देता है,.... क्या वास्तव में, सूरह तौबा मे अल्लाह ने मुस्लिमों को क्रूरता और हिंसा की ही तालीम दी है ॥ आईए देखें 

सूरह तौबा की इन आयतों का ऐतिहासिक परिदृश्य ये है कि पैगंबर सल्ल. को नबूवत मिलने के 13 वर्ष बाद तक बहुदेववादियो ने मुस्लिमों पर बड़े बड़े ज़ुल्म ढाए, जिन ज़ुल्मो को मुस्लिमों ने चुपचाप बर्दाश्त किया और मक्का से बाहर मदीना चले गए, तब इन हिंसक गैर मुस्लिमों ने सोचा कि यदि ये मुस्लिम इस्लाम का त्याग नहीं कर रहे हैं, तो फिर मदीना पर चढ़ाई कर के सारे मुस्लिमों की ही हत्या कर डाली जाए तो इस्लाम जड़ से खत्म हो जाएगा ...
लेकिन पासा उल्टा पड़ा और मदीना पर इन बहुदेववादियो की चढ़ाई के फलस्वरूप जब मुस्लिमों ने आत्मरक्षा मे हथियार उठाए तो हर बार इन अत्याचारियों पर वे गिनती के कुछ मुस्लिम भारी पड़े 
जब मुस्लिमों से सीधे युद्ध मे बहुदेववादी जीतना मुश्किल समझने लगे तो उन्होंने धोखे से मुस्लिमों के खात्मे की योजना बनाई कि ऊपर से तो युद्ध बंद रखने का एक समझौता उन्होंने मुस्लिमों के साथ कर लिया लेकिन पीछे पीछे वो मुस्लिमों की जड़ें काटने की जुगत मे थे 
जब अरब के बहुदेववादियों ने मुस्लिमों के साथ किया हुआ युद्धबन्दी का एक ऐसा ही समझौता तोड़ दिया और धोखे से मुस्लिमों के साथियों की हत्याएं कीं, तो अल्लाह ने भी कुरान मे यह घोषणा कर दी कि मुस्लिमों को भी अब उन बहुदेववादियों से युद्ध बंद रखने की कोई जरूरत नहीं है ''Tum (muslimo) ne mushriko ke sath jangbandi ka jo samjhauta kia tha Allah aur Rasool ab us se bezaar hain'' [9:1]

लेकिन साथ ही जिन बहुदेववादी लोगों ने संधि समझौते को तोड़ा नहीं था, मुस्लिमों को भी उनसे संधि कायम रखने और युद्ध न करने की तालीम अल्लाह ने दी ,
''Siway un mushriko ke jinhone tumhare sath samjhauta kia tha aur usy nahi toda, na he tumhare khilaf (yuddh me) kisi ki madad ki. to tum un mushriko ke sath samjhauta uska samay pura hone tak jaari rakho. beshaq Allah nek logo ko pasand krta hai'' [9:4]

हालांकि बहुदेववादियों ने तो सुलह की आड़ मे धोखे से मुसलमानों के साथियों की जानें ली थीं, लेकिन फिर भी अल्लाह के हुक्म से मुस्लिमों ने उन हत्यारों को 4 महीने पहले से चेतावनी सुना दी कि यदि वे हत्यारे अपने पाप का पश्चाताप करना चाहें, तो इस अवधि मे कर लें ,
''to 4 maheene aur zameen pr aaram se chal phir lo aur ye jaan lo ki tum Allah ke kabu se bahar nahi ja sakte. aur Allah inkar karne walo ko apmanit karta hai''. [9:2]

4 महीने बीत जाने के बावजूद भी जिन व्यक्तियों को कोई पश्चाताप ना हो और वो मुस्लिमों से युद्ध करने को ही पसंद करें, तो ऐसे लोगों के लिए ही सूरह तौबा की वो पांचवीं आयत आई है जिसे बिना उसकी पृष्ठभूमि सामने रखे, जगह जगह लिखकर, बताकर विरोधी इस्लाम को बुरा साबित करना चाहते हैं
लेकिन जरा अपने दिल पर हाथ रखकर बोलिए कि यदि कोई व्यक्ति आपके कुछ पारिवारिक सदस्यों की हत्या कर चुका हो, और फिर भी उसके मन मे कोई पश्चाताप न हो बल्कि वो फिर से आप पर आक्रमण कर के आपके मां बाप, भाई बहनों समेत आपका समूल नाश करना चाहता हो तो क्या आप उस व्यक्ति पर दया दिखाएंगे ?? जी नहीं यदि आप बुद्धिमान होंगे तो समझते होंगे कि उस वक्त दया का पात्र वो हत्यारा नहीं बल्कि आप और आपका परिवार होगा, और निश्चय ही आप बातचीत ,और बातचीत विफल होने पर शक्ति के जरिए आत्मरक्षा के उपाय करेंगे, बिल्कुल यही शिक्षा कुरान मे है

आगे भी देखिए कि यदि इन्हीं दुष्ट हत्यारों मे से कोई युद्ध के मैदान मे पहुंचने के बाद भी मुस्लिमों से युद्ध छोड़कर युद्ध भूमि से बाहर जाना चाहे तो युद्ध के मैदान मे दुश्मन के साथ भी दयालुता और नेकी की क्या खूब तालीम दी है मेरे रब ने, इसी सूरह तौबा की अगली ही आयत यानि आयत 6 मे ..
''Aur agar un mushriko me se koi tumhari sharan chahe to uski hifazat karo taki wo Allah ke shabd sun len . aur fir usko us ki surakshit jagah pahoncha do. kyonki ye wo log hain jo nahi jaante'' [9:6]

आगे की आयतों मे भी आप देख सकते हैं, कि अरब के वे बहुदेववादी किसी भी वादे या कसम या रिश्ते नाते का भी खयाल नहीं करते थे जब वे मुस्लिमों को कमजोर पाते थे.... ऐसे अत्याचारियों के साथ युद्ध भी करने की शिक्षा दी मेरे अल्लाह ने तो वो भी कितनी नेकी की तालीम के साथ ॥

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“फिर जब हराम के महीने बीत जाएं तो मुश्रिको को जहाँ पाओ मारो, उन्हें पकड़ो और उन्हें घेरो, और घात लगाने वाली जगह पर उनकी घात लगाकर बैठो ” (Al Qur’an 9:5)

सूरह तौबा की इस आयत नम्बर पांच का प्रयोग, इस्लाम के विरोधियों ने इस्लाम की छवि धूमिल करने के लिए खूब किया है कि इस्लाम गैर मुस्लिमों के साथ ऐसा हिंसक व्यवहार करने की शिक्षा मुस्लिमों को देता है,.... क्या वास्तव में, सूरह तौबा मे अल्लाह ने मुस्लिमों को क्रूरता और हिंसा की ही तालीम दी है ॥ आईए देखें 

सूरह तौबा की इन आयतों का ऐतिहासिक परिदृश्य ये है कि पैगंबर सल्ल. को नबूवत मिलने के 13 वर्ष बाद तक बहुदेववादियो ने मुस्लिमों पर बड़े बड़े ज़ुल्म ढाए, जिन ज़ुल्मो को मुस्लिमों ने चुपचाप बर्दाश्त किया और मक्का से बाहर मदीना चले गए, तब इन हिंसक गैर मुस्लिमों ने सोचा कि यदि ये मुस्लिम इस्लाम का त्याग नहीं कर रहे हैं, तो फिर मदीना पर चढ़ाई कर के सारे मुस्लिमों की ही हत्या कर डाली जाए तो इस्लाम जड़ से खत्म हो जाएगा ...
लेकिन पासा उल्टा पड़ा और मदीना पर इन बहुदेववादियो की चढ़ाई के फलस्वरूप जब मुस्लिमों ने आत्मरक्षा मे हथियार उठाए तो हर बार इन अत्याचारियों पर वे गिनती के कुछ मुस्लिम भारी पड़े 
जब मुस्लिमों से सीधे युद्ध मे बहुदेववादी जीतना मुश्किल समझने लगे तो उन्होंने धोखे से मुस्लिमों के खात्मे की योजना बनाई कि ऊपर से तो युद्ध बंद रखने का एक समझौता उन्होंने मुस्लिमों के साथ कर लिया लेकिन पीछे पीछे वो मुस्लिमों की जड़ें काटने की जुगत मे थे 
जब अरब के बहुदेववादियों ने मुस्लिमों के साथ किया हुआ युद्धबन्दी का एक ऐसा ही समझौता तोड़ दिया और धोखे से मुस्लिमों के साथियों की हत्याएं कीं, तो अल्लाह ने भी कुरान मे यह घोषणा कर दी कि मुस्लिमों को भी अब उन बहुदेववादियों से युद्ध बंद रखने की कोई जरूरत नहीं है ''Tum (muslimo) ne mushriko ke sath jangbandi ka jo samjhauta kia tha Allah aur Rasool ab us se bezaar hain'' [9:1]

लेकिन साथ ही जिन बहुदेववादी लोगों ने संधि समझौते को तोड़ा नहीं था, मुस्लिमों को भी उनसे संधि कायम रखने और युद्ध न करने की तालीम अल्लाह ने दी ,
''Siway un mushriko ke jinhone tumhare sath samjhauta kia tha aur usy nahi toda, na he tumhare khilaf (yuddh me) kisi ki madad ki. to tum un mushriko ke sath samjhauta uska samay pura hone tak jaari rakho. beshaq Allah nek logo ko pasand krta hai'' [9:4]

हालांकि बहुदेववादियों ने तो सुलह की आड़ मे धोखे से मुसलमानों के साथियों की जानें ली थीं, लेकिन फिर भी अल्लाह के हुक्म से मुस्लिमों ने उन हत्यारों को 4 महीने पहले से चेतावनी सुना दी कि यदि वे हत्यारे अपने पाप का पश्चाताप करना चाहें, तो इस अवधि मे कर लें ,
''to 4 maheene aur zameen pr aaram se chal phir lo aur ye jaan lo ki tum Allah ke kabu se bahar nahi ja sakte. aur Allah inkar karne walo ko apmanit karta hai''. [9:2]

4 महीने बीत जाने के बावजूद भी जिन व्यक्तियों को कोई पश्चाताप ना हो और वो मुस्लिमों से युद्ध करने को ही पसंद करें, तो ऐसे लोगों के लिए ही सूरह तौबा की वो पांचवीं आयत आई है जिसे बिना उसकी पृष्ठभूमि सामने रखे, जगह जगह लिखकर, बताकर विरोधी इस्लाम को बुरा साबित करना चाहते हैं
लेकिन जरा अपने दिल पर हाथ रखकर बोलिए कि यदि कोई व्यक्ति आपके कुछ पारिवारिक सदस्यों की हत्या कर चुका हो, और फिर भी उसके मन मे कोई पश्चाताप न हो बल्कि वो फिर से आप पर आक्रमण कर के आपके मां बाप, भाई बहनों समेत आपका समूल नाश करना चाहता हो तो क्या आप उस व्यक्ति पर दया दिखाएंगे ?? जी नहीं यदि आप बुद्धिमान होंगे तो समझते होंगे कि उस वक्त दया का पात्र वो हत्यारा नहीं बल्कि आप और आपका परिवार होगा, और निश्चय ही आप बातचीत ,और बातचीत विफल होने पर शक्ति के जरिए आत्मरक्षा के उपाय करेंगे, बिल्कुल यही शिक्षा कुरान मे है

आगे भी देखिए कि यदि इन्हीं दुष्ट हत्यारों मे से कोई युद्ध के मैदान मे पहुंचने के बाद भी मुस्लिमों से युद्ध छोड़कर युद्ध भूमि से बाहर जाना चाहे तो युद्ध के मैदान मे दुश्मन के साथ भी दयालुता और नेकी की क्या खूब तालीम दी है मेरे रब ने, इसी सूरह तौबा की अगली ही आयत यानि आयत 6 मे ..
''Aur agar un mushriko me se koi tumhari sharan chahe to uski hifazat karo taki wo Allah ke shabd sun len . aur fir usko us ki surakshit jagah pahoncha do. kyonki ye wo log hain jo nahi jaante'' [9:6]

आगे की आयतों मे भी आप देख सकते हैं, कि अरब के वे बहुदेववादी किसी भी वादे या कसम या रिश्ते नाते का भी खयाल नहीं करते थे जब वे मुस्लिमों को कमजोर पाते थे.... ऐसे अत्याचारियों के साथ युद्ध भी करने की शिक्षा दी मेरे अल्लाह ने तो वो भी कितनी नेकी की तालीम के साथ ॥


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(1) फिर, जब हराम (प्रतिष्ठित) महीने बीत जाएँ तो मुशरिकों को जहाँ कहीं पाओ क़त्ल करो, उन्हें पकड़ो और उन्हें घेरो और हर घात की जगह उनकी ताक में बैठो। फिर यदि वे तौबा कर लें और नमाज़ क़ायम करें और ज़कात दें तो उनका मार्ग छोड़ दो, निश्चय ही अल्लाह बड़ा क्षमाशील, दयावान है (सूरह:9 आयत 5)

जैसा कि हज़रत मुहम्मद ( सल्ल० ) की जीवनी से स्पष्ट है की मक्का में और मदीना जाने के बाद भी मुशरिक  कुरैश , अल्लाह के रसूल ( सल्ल० ) के पीछे पड़े थे । वह आप को आप के सहयोगी मुस्लिमो और सत्य-धर्म इस्लाम को समाप्त करने के लिए हर संभव कोशिश करते रहते । काफ़िर कुरैश ने अल्लाह के रसूल को कभी चैन से बैठने नहीं दिया । वह उनको सदैव सताते ही रहे । इसके लिए वह सदैव लड़ाई की साजिश रचते रहते
 यह सूरह तब नाज़िल हुई जब मुस्लिमो और मक्का के मुशरिकों(बहुदेवावादियों) के बीच हुई संधी को मक्का के मुशरिकों ने तोड दिया और मुस्लिमो पर आक्रमण का प्रपंच रचनें लगे.मुस्लिमो पर जुल्म करने लगे मुस्लिमो को उनके घरो से निकालने लगे तब अल्लाह ने यह सूरह नाज़िल की और उन मुशरिको को, जिन्हों ने संधी तोड़ी थी, को 4 महीने का समय दिया. अगर इन चार महीनों में यह सीधे रास्ते पर नहीं आते हैं तो इन से जंग करो और जंग के समय में, जंग में (डरो नहीं), जहाँ पाओ इन का क़त्ल करो. ज़ाहिर सी बात है कोई भी दुश्मन से अपनी आत्म रक्षा के लिये यही निर्णय लेगा व ऐसा आदेश पारित करेगा.वह जंग अपनी रक्षा के लिए था शांति की अस्थापना करने के लिए था 
जो की यह एक साधाहरण सी मानवीय प्रवर्ती है. प्रश्न उठता है कि आरोप लगानें वालों को इसके आगे वाली आयत(6) नहीं दिखती, क्यू? क्यूंकि भ्रम और अराजकता फैलानें वालों को सिर्फ ऐसी ही चीज़ें दिखती हैं, जिसको वोह गलत ढंग से पेश कर के लोगों में बैर पैदा कर सकें. -- आगे की आयत में अल्लाह कहता है
 (सूरह तौबा 9 आयत 6) में "जो लोग तुम्हारे संरक्षण में आते हैं (शान्ति चाहते है) उनको अपनी सुरक्षा में एक ऐसी सुरक्षित जगह पर ले जा कर पहुँचा दो, जहां पर वोह अल्लाह का पैगाम (शान्ति का पैगाम) सुन लें, अर्थात सुरक्षित हो, क्यूंकि यह वोह लोग हैं जो ग्यान नहीं रखते. इन लोंगों को आयत नंबर 4 और 7 भी नहीं दिखती.सूरह तौबा 9 आयत4 में अल्लाह कहता है "जिन मुशरिकों से तुम्हारी संधी है और उन्होने तुम्हारे विरुद्ध दूसरों का साथ दिया है, तो उनके साथ सन्धि, संधी के समय तक पूरी करो.सूरह तौबा 9 आयत 7 में अल्लाह कहता है "जिन लोगों ने तुम्हारे साथ "खाना-ए-क़ाबा" के पास सन्धि की थी और अगर वोह इस को क़ायम रखना चाहे तो तुम भी सन्धि को क़ायम रखो. 

 लेकिन शैतानी प्रवित्ति के लोगों को सिर्फ आयत नंबर "5" दिखती हैं, क्यूंकि इस आयत को बिना संदर्भ के उधृत कर के लोगों में गलत बात फैलाई जा सकती हैं. 

इस्लाम में दुश्मन के साथ भी ज्यादती करना मना है देखिये:
और जो लोग तुमसे लड़ते हैं, तुम भी ख़ुदा की राह में उनसे लड़ो , मगर ज्यादती न करना की ख़ुदा ज्यादती करने वालों को पसन्द नहीं करता
-क़ुरआन , सूरह: 2  आयत:190

अत्याचारियों  और अन्यायियों से अपनी आत्म रक्षा के लिए शांति की स्थापना करने के लिए   युद्ध करना और युद्ध के लिए सैनिकों को उत्साहित करना धर्म सम्मत है ।

इस आयत पर सवाल उठाने वाले वसीम रिज्वी के सहयोगी sanatan sankriti जैसे लोग क्या यह नहीं जानते कि अत्याचारियों  और अन्यायियों के विनाश के लिए ही श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था । गीता में एक पूरा अध्याय इसी विषय पर है। जिसमें श्री कृष्ण अर्जुन को युद्ध करने पर आमादा करते हैं। जबकि वह हथियार रख चुके थे परन्तु श्री कृष्ण ने उनसे कहा कि यह तो कायरता है तुम्हारा धर्म ही युद्ध करना है। युद्ध करो वरना अधर्म हो जाएगा तुम युद्ध में मारे गये तो स्वर्ग को प्राप्त होगे और अगर जीते तो दुनिया की दौलत पाओगे
क्या यह उपदेश लड़ाई-झगड़ा करने वाला या घृणा फैलाने वाला था? यदि नहीं, तो फिर कुरआन के लिए ऐसा क्यों कहा जाता है?

 वेद् में सौ ओ मन्त्र लड़ाई मार काट वाला है 
देखे यहाँ 
👇👇
ते यं द्विष्मो यश्च नो द्वेष्टि तमेषां जम्भे दध्मः
"हम लोग जिस से अप्रीति करें और जो हम को दुःख दे उसको इन वायुओं की बीडाल के मुख में मूषे के सामान पीड़ा में डालें |" [यजुर्वेद 16:65 दयानन्द भाष्य]

वृश्च प्र वृश्च सं वृश्च दह प्र दह सं दह |
"तू वेद निन्दक को, काट डाल, चीर डाल, फाड़ डाल, जला दे, फूँक दे, भस्म कर दे।" भावार्थ: धर्मात्मा लोग अधर्मियों के नाश में सदा उद्यत रहें [अथर्ववेद काण्ड12: सूक्त 5: मंत्र 62 पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी भाष्य]

फिर यह सूरह उस समय मक्का के अत्याचारी मुशरिकों के विरुद्ध उतारी गयी । जो अल्लाह के रसूल के ही भाई-बन्धु  क़ुरैश थे  फिर इसे आज के सन्दर्भ में और हिन्दु भाइयो के लिए क्यों लिया जा रहा है ? क्या हिन्दु व अन्य धर्म वालो को उकसाने और उनके मन में मुस्लिमो के लिए घृणा भरने तथा इस्लाम को बदनाम करने की साज़िश नहीं है तो और क्या है ?


◆◆◆◆◆◆◆



जिस सूरह  तौबा 9/आयत 5 ज़िक़्र किया जाता है उसको पूरा बता देते हैं. यह सूरः तब नाज़िल हुई जब मुसलमानों और मक्का के मुशरिकों(बहुदेवावादियों) के बीच हुई संधी को मक्का के मुशरिकों ने तोड दिया और मुसलमानों पर आक्रमण का प्रपंच रचनें लगे.मुसलमानो पर जुल्म करने लगे मुसलमानो को उनके घरो से निकालने लगे तब अल्लाह ने यह सूरह नाज़िल की और उन मुशरिको को, जिन्हों ने संधी तोड़ी थी, को 4 महीने का समय दिया. अगर इन चार महीनों में यह सीधे रास्ते पर नहीं आते हैं तो इन से जंग करो और जंग के समय में, जंग में (डरो नहीं), जहाँ पाओ इन का क़त्ल करो. ज़ाहिर सी बात है कोई भी दुश्मन से अपनी आत्म रक्षा के लिये यही निर्णय लेगा व ऐसा आदेश पारित करेगा.वह जंग अपनी रक्षा के लिए था शांति की अस्थापना करने के लिए था 
जो की यह एक साधाहरण सी मानवीय प्रवर्ती है. प्रश्न उठता है कि आरोप लगानें वालों को इसके आगे वाली आयत(6) नहीं दिखती, क्यू? क्यूंकि भ्रम और अराजकता फैलानें वालों को सिर्फ ऐसी ही चीज़ें दिखती हैं, जिसको वोह गलत ढंग से पेश कर के लोगों में बैर पैदा कर सकें. -- आगे की आयत में अल्लाह कहता है
 (सूरह तौबा 9 आयत 6) में "जो लोग तुम्हारे संरक्षण में आते हैं (शान्ति चाहते है) उनको अपनी सुरक्षा में एक ऐसी सुरक्षित जगह पर ले जा कर पहुँचा दो, जहां पर वोह अल्लाह का पैगाम (शान्ति का पैगाम) सुन लें, अर्थात सुरक्षित हो, क्यूंकि यह वोह लोग हैं जो ग्यान नहीं रखते. इन लोंगों को आयत नंबर 4 और 7 भी नहीं दिखती.सूरह तौबा 9 आयत4 में अल्लाह कहता है "जिन मुशरिकों से तुम्हारी संधी है और उन्होने तुम्हारे विरुद्ध दूसरों का साथ दिया है, तो उनके साथ सन्धि, संधी के समय तक पूरी करो.सूरह तौबा 9 आयत 7 में अल्लाह कहता है "जिन लोगों ने तुम्हारे साथ "खाना-ए-क़ाबा" के पास सन्धि की थी और अगर वोह इस को क़ायम रखना चाहे तो तुम भी सन्धि को क़ायम रखो. --- . सूरः तौबा में 129 आयतें हैं, लेकिन शैतानी प्रवित्ति के लोगों को सिर्फ आयत नंबर "5" दिखती हैं, क्यूंकि इस आयत को बिना संदर्भ के उधृत कर के लोगों में गलत बात फैलाई जा सकती हैं. 

यहाँ देखें 

जिन लोगों ने तुमसे दीन के बारे में जंग नहीं की और न तुम को तुम्हारे घरों से निकला,उन के साथ भलाई और इंसाफ का सुलूक करने से ख़ुदा तुम को मना नहीं करता । ख़ुदा तो इंसाफ करने वालों को दोस्त रखता है ।
-कुरआन, सूरा 60 , आयत-8

ख़ुदा उन्हीं लोगों के साथ तुम को दोस्ती करने से मना करता है , जिन्होंने तुम से दीन के बारे में लड़ाई की और तुम को तुम्हारे घरों से निकला और तुम्हारे निकलने में औरों की मदद की , तो जो  लोग ऐसों से दोस्ती करेंगे , वही ज़ालिम हैं ।
-क़ुरआन , सूरा 60 , आयत- 9

इस्लाम के दुश्मन के साथ भी ज्यादती करना मना है देखिये:

और जो लोग तुमसे लड़ते हैं, तुम भी ख़ुदा की राह में उनसे लड़ो , मगर ज्यादती न करना की ख़ुदा ज्यादती करने वालों को दोस्त नहीं रखता ।
-क़ुरआन , सूरा 2 , आयत-190

इस्लाम द्वारा, देश में हिंसा ( फ़साद ) करने की इजाज़त नहीं है । देखिये अल्लाह का यह आदेश: 

लोगों को उन की चीज़ें कम न दिया करो और मुल्क में फ़साद न करते फिरो।
-क़ुरआन , सूरा 26 , आयत-183 

इस्लाम में किसी को जोर ज़बरदस्ती से मुस्लमान बनाने की सख्त मनाही है । क़ुरआन माजिद में अल्लाह के ये आदेश :

और अगर तुम्हारा परवरदिगार ( यानि अल्लाह ) चाहता, तो जितने लोग ज़मीं पर हैं, सब के सब इमा ले आते । तो क्या तुम लोगों पर ज़बरदस्ती करना चाहते हो की वे मोमिन ( यानि मुस्लमान ) हो जाएं ।
-क़ुरआन, सूरा 10 , आयत-99 

दिने इस्लाम में ज़बरदस्ती नहीं है ।
-क़ुरआन , सूरा 2 , आयात-256 

अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया :
 
इस्लामी हुकूमत में किसी ऐसे गैर मुस्लिम नागरिक पर जिसकी जान-माल, इज्जत आबरु की हिफाजत का मुसलमानों ने समझोता किया है, जो व्यक्ति जुल्म करेगा, या उसका हक मारेगा या उस पर उसकी ताकत से अधिक बोझ डालेगा या गैर मुस्लिम नागरिकों की कोई चीज उसकी रजामंदी के बगैर ले लेगा तो मैं अल्लाह की अदालत में दायर होने वाले मुकदमे में उस गैर-मुस्लिम नागरिक की ओर से वकील बनूंगा
 (सुनन अबु दाऊद : 3052)

इस्लाम जंग का भी तरीका बताता है 
जिंग में भी किसी निहते पर वॉर नही करना है 
कोई आत्मसमपर्ण कर दे तो उसे महफूज़ जगह तक छोड़ आना है जहाँ उसका कोई नुकसान ना पहुचे जंग में हारे पेड़ पौदे बुढे बच्चों और औरतो को नुकसान नही पहुचाना है ।

लेकिन कुछ ना समझ अमन के दुश्मन समाज में जहर घोलने वाले लोग क़ुरआन की बिच बिच का आयत कोड करके यह बोल कर की देखो क़ुरआन में यह लिखा है समाज में जहर फ़ैलाने का काम करते है 
जब की इन्हें क़ुरआन तो क़ुरआन अपने खुद की धर्म ग्रंथो के बारे में कुछ जानकारी नही होता है 

अब देखिये वेद क्या कहता है और मनुस्मृति की क्या आज्ञा है 

ते यं द्विष्मो यश्च नो द्वेष्टि तमेषां जम्भे दध्मः
"हम लोग जिस से अप्रीति करें और जो हम को दुःख दे उसको इन वायुओं की बीडाल के मुख में मूषे के सामान पीड़ा में डालें |" [यजुर्वेद 16:65 दयानन्द भाष्य]

वृश्च प्र वृश्च सं वृश्च दह प्र दह सं दह |
"तू वेद निन्दक को, काट डाल, चीर डाल, फाड़ डाल, जला दे, फूँक दे, भस्म कर दे।" भावार्थ: धर्मात्मा लोग अधर्मियों के नाश में सदा उद्यत रहें [अथर्ववेद काण्ड12: सूक्त 5: मंत्र 62 पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी भाष्य]

जो आर्यावर्त देश से भीन देश वाले है वह दस्यु और म्लेच्छ है 
मनुस्मृति 10 /45 मनुसमृति 2/23
सत्यार्थ प्रकास समुलास 8 पृश्ट 225 _226 

 "ऐ आज्ञा पालक लोगों ! तुम्हारे हथियार अग्नि आदि तोप व भाले, तीर व तलवार आदि शास्त्र विरोधियों को पराजित करने और उनको रोकने के लिए प्रशंसनीय और सट्टढ़ हों । तुम्हारी सेना सतर्क व होशियार हो ताकि तुम सदैव विजयी होते रहो ।"
ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 39 मंत्र 2

एक और स्थान पर दुआ यूं लिखी हुई है ।
मैं उसका रक्षक कायनात के स्वामी मान एवं प्रताप वाले अत्यन्त बलवान और विजयी सारी कायनात के राजा सर्व शक्तिमान और सबको शक्ति प्रदान करने वाले परमेश्वर को जिसके आगे समस्त ज़बरदस्त बहादुर आज्ञा पालक सर झुकाते हैं । और जो न्याय से प्राणियों की रक्षा करने वाला इन्द्र है । 
"हर जंग में विजय पाने के लिए आमन्त्रित करता हूं और शरण लेता हूं।”
यजुर्वेद अध्याय 20 मंत्र 50 

एक जगह परमेश्वर दुआ देता है ।
"ऐ मनुष्यो ! तुम्हारे हथियार अर्थात तोप बन्दूक_1 आदि अग्नि धावक शस्त्र और तीर व कमान तलवार आदि हथियार मेरी कृपा से शक्ति शाली और साहस वर्धक कार्य वाले हो तुम दुश्मनों की सेना को पराजित करके उन्हें पछाड़ो । तुम्हारी सेना विश्व व्यायी हुकूमत इस धरती पर स्थापित हो और तुम्हारा शुत्र (घणात्मक खतरनाक तलवार म्यान वाली) पराजित हो और नीचा देखे। (जैसा गाजी महमूद गजनवी और मुहम्मद गौरी ने नीचा देखा ?)
ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 39 मंत्र 2 
(उपरोक्त ऋग्वेद मंत्र भी यही है
       
"ऐ दुश्मनों के मारने वाले जंग के नियमों में माहिर निडर, साहसी, प्रिय, प्रतापी और जवां मर्द तू सब प्रजा को प्रसन्न रख । परमेश्वर के आदेश पर चलो और घ्रणित शुत्र को ( हे महाराज इतनी नाराजी ) पराजित करने के लिए लड़ाई का कार्य पूरा करो । तुमने पहले मैदानों में शत्रुओं की सेना को पछाड़ा है । तुमने इन्द्रियों को पराजित और धरती को विजयी किया है । तुम शक्तिशाली बाजू वाले हो । अपनी बाजू की ताकत से दुशनों को समाप्त करो ताकि तुम्हारे बाजू का जोर और ईश्वर की दया व कृपा से हमारी विजय हो ।
(अथर्ववेद कांड 6 , अनुवादक वरग 95 मन्त्र 3)

मै आसा करता हु की ये  फ़िलहाल मेरे सिर्फ इन चन्द सवालो का जवाब दें 
जो ऊपर वेद और मनुषमृति से with reference है



धरती का निर्माण। 6 दिन में दुनिया।

प्रश्न : Assalaamu alaikum

Facebook के एक ग्रुप में कुछ हिन्दुओं ने कुरआन के बारे मेंये प्रश्न पूछा. कृपया इसका विस्तृत उत्तर दें

1. दो दिन में धरती बनायी (41:9)

2.चार दिन में पहाड बनाये (41:10)

3. दो दिन में सात आकाश बनाये (41:12)

सूरा युनुस 10:3 तुम्हारा रब वही अल्लाह हैं जिसने धरती और आकाशों को 6 दिन में बनाया..

क्या मुल्लों को गिनती नहीं आती हैं?....... 2+4+2=8

इस प्रश्न का उत्तर भाई मुश्फिक सुल्तान ने बहुत अच्छे ढंग से दिया है, वो उत्तर लिखने से पहले मैं अपनी ओर से भी एक बात पाठकों को बता दूं कि जब बात अल्लाह की ओर के दिन की होती है तो वह 24 घण्टे वाला सूर्य दिवस नहीं बल्कि एक निश्चित काल अवधि होता है ये काल अवधि बहुत ज्यादा समय की भी हो सकती है और थोड़े समय की भी जितनी अवधि अल्लाह नियत करना सुनिश्चित करे....
वैसे दिन का अर्थ ही होता है एक निश्चित कालावधि, हमारा सूर्य की चाल के अनुसार 24 घण्टे की समयसीमा मे बंटा दिन भी एक छोटी सी निश्चित कालावधि ही है... 
बहरहाल....पवित्र कुरान को पढ़कर ये बात स्पष्ट पता चलती है कि अल्लाह ने अलग अलग कार्यों के लिए अलग अलग समयावधि के काल नियत कर रखे हैं ये कालावधि कहीं मनुष्यों के हिसाब से 1000 वर्ष है तो कहीं 50,000 वर्ष ... तो इस बात को दिमाग़ मे रखकर समझिए कि कुरान मे धरती और आकाश के निर्माण वाले ये दिन मानवीय संसार के दिन नही बल्कि उनसे सम्भवत: हजारों गुना ज्यादा लम्बा काल है ... बल्कि इस बात को यूं समझना चाहिए कि अल्लाह ने ब्रह्माण्ड के निर्माण के लिए कार्य को 6 समान काल अवधियों के चरणों मे बांट कर किया .... अब मुश्फिक भाई का उत्तर पढ़िए गणित के सम्बन्ध मे

उत्तर

ये आयात सूरह 41 फुस्सिलत की हैं

सबसे पहले यह जान लेना चाहिए कि कुरआन की अधिकतर आयात में आसमानों और धरती को ६ दिन (काल) में बना हुआ कहा गया है. उदाहरण के लिए देखिये कुरआन 7:54, 10:3, 11:7; 25:51, 32:4, 50:38, 51:4 आदि. इसके बाद कुरआन की व्याख्या का एक मूल सिद्धांत ध्यान में रखना चाहिए कि कुरआन की कुछ आयात अन्य आयात की व्याख्या करती हैं. 

अब आइये आपके प्रश्न की और.

इस प्रश्न करने वाले ने यहाँ गलती यह खायी है कि 9-12 आयात के वर्णन को अनुक्रमिक (sequential) समझ लिया है जबकि यहाँ केवल प्रत्येक वस्तु का निर्माण काल बताया जा रहा है और गहरे अध्यन से पता चलता है कि यहाँ भी अन्य स्थानों की तरह 6 ही दिन (काल) में आकाश और धरती का उत्पन्न होना बताया गया है .
इस सूरह 41 की आयत ११ में जो अरबी शब्द ثم "सुम्मा" आया है उसके शब्दकोष में दो अर्थ हैं
१) फिर/इसके बाद
२) इसके अतिरिक्त/इसके साथ ही
यदि यहाँ पहले अर्थ का प्रयोग किया जाए तो सृष्टि निर्माण की संख्या 8 बनेगी और यह उन आयात के साथ विरोध करेंगी जहां सृष्टि निर्माण का समय 6 दिन बताया गया है . लेकिन इस अर्थ का प्रयोग यहाँ उचित नहीं है बल्कि "सुम्मा" का अर्थ "इसके साथ साथ ही (moreover)'' ऐसा करना ही उचित है. इसका कारण यह है कि कुरआन की सूरह 79 नाज़िआत की आयात 27-33 में स्पष्ट वर्णन है कि धरती और आसमानों की निर्माण प्रक्रिया साथ में ही शुरू हुई क्योंकि धरती भी किसी सौर मंडल और आकाशगंगा का ही भाग है. भूविज्ञान से आज हम यह जानते हैं कि धरती पहले पिघली हुई थी जो जीवन उत्पत्ति के लिए अनुकूल नहीं थी बाद में धरती ठंडी हुई और एक ठोस परत (crust) बन गयी. ध्यान रहे कि यह सब कुछ एक लम्बी प्रक्रिया के अधीन हुआ. इसे चट मंगनी पट ब्याह की तरह नहीं समझना चाहिए . इसके बाद धरती पर पानी उत्पन्न हुआ. पानी ने जीवन की उत्पत्ति को संभव बनाया. साथ ही साथ भूतत्त्व परिवर्तन (geological changes) भी हो रहे थे जिनसे पहाड़ उत्पन्न हुए और वे बड़ी बड़ी नदियों के स्रोत बने और अनेक प्रकार के वृक्ष और जानवर एक लम्बी प्रक्रिया से उत्पन्न हुए.
ये सारा वर्णन इन आयात 27-33 में समाया हुआ है. अब इसी वर्णन को सूरह 41 आयात 9-12 में दोहराया गया है और अब आपके प्रश्न का उत्तर भी मिल गया कि आकाश और धरती का निर्माण कैसे हुआ. तो आइये अब हम फिर से आयात 9-12 के वर्णन की गिनती करते हैं
१) धरती को दो 2 दिन (काल) में पैदा किया
२) धरती के ऊपर एक प्रक्रिया के अनुसार चार 4 दिन (काल) में पहाड़ उत्पन्न किये और तरह तरह के जीवों के लिए भोजन एक ठीक अंदाज़े से उत्पन्न किया
३) ثم "सुम्मा" इसके साथ साथ/समानांतर ही आकाश (धरती से अलग जो कुछ है अर्थात सौर मंडल और आकाशगंगाएं आदि) को दो दिन (काल) में बनाकर संवारा. ध्यान रहे कि आयत 11 में आकाश और धरती के साथ साथ निर्माण प्रक्रिया से गुजरने की और इशारा है और यह भी कहा है के आकाश धुवां था जिसे आज का आधुनिक विज्ञान मान चुका है कि शुरू में ब्रह्माण्ड gaseous form में था. तो इन दो दिन (काल) को और धरती के निर्माण के दो दिन (काल) को दो ही गिना जाएगा 4 नहीं .



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#कायनात ( सृष्टि ) की बनावट के दौर (periods- अवधि)
#क़ुरआन में 6 दिन में कायनात बनने का बयान

अल्लाह रब्बुल आलमीन ने पहले माद्दी कायनात (universe) को बनाया।
जैसा कि हमें मालूम है कि इसकी शुरुआत उस आलमी धमाके से हुई जो वैज्ञानिक दृष्टि के हिसाब से लगभग 13.8 बिलियन साल पहले हुई।
उसके बाद ये कायनात आहिस्ता-आहिस्ता तरक़्क़ी (gradual development) के उसूल पर कायम हुई।
ये मामला अंदाज़न 6 दौर (periods) की शक्ल में सामने आया।
ये बात क़ुरआन में सात बार सित्तति अय्याम (छ दिन) के शब्दों में आई है।
क़ुरआन में जिस चीज़ को अय्याम कहा गया है उससे मुराद अवधि (periods) हैं।

क़ुरआन के 6 दिन (सित्तति अय्याम) को अगर विज्ञान की रोशनी में समझने की कोशिश की जाए, तो वह ये होगा:

#1.बिग बैंग (big bang): विज्ञान के अनुसार लगभग 13.8 बिलियन साल पहले एक कॉस्मिक बॉल (cosmic ball) प्रकट हुआ, फिर उसमें एक बड़ा धमाका हुआ, फिर उसके बाद प्रोसेस हुई, जिससे कायनात ज़ाहिर हुई।

#2.सोलर बैंग (solar bang): उस धमाके के बाद खला (खालीपन) में जो प्रोसेस शुरू हुआ, उसके परिणाम में सूरज और उसके आस-पास के ग्रह वुजूद में आये, इसी दौरान हमारी ज़मीन (planet earth) वुजूद में आई।

#3.वाटर बैंग (water bang): ज़मीन के बनने के बाद एक लंबा प्रोसेस जारी हुआ, उसके बाद ज़मीन पर 2 गैसों की तरकीब से पानी बना, और वो समुन्द्रों में भर गया।

#4.प्लांट बैंग (plant bang): इस प्रोसेस के अगले स्टेप में ज़मीन के ऊपर पेड़-पौधे का वुजूद का कार्य हुआ, अलग-अलग नस्ल के पेड़-पौधों से पूरी ज़मीन ढक गयी।

#5.एनिमल बैंग (animal bang): उसके बाद अगला स्टेप सामने आया, और ज़मीन पर अनगिनत तरह के जीव-जंतु वुजूद में आये।

#6.ह्यूमन बैंग (human bang): आख़री दौर में इंसान वुजूद में आया, और धीरे धीरे पूरी ज़मीन पर फेल गया, 
ज़िन्दगी की ये जुदा सूरतें  अलग अलग वुजूद में आई।

इन छ दौर (अवधि- periods) का ज़िक्र क़ुरआन में खास अंदाज में आया है, क़ुरआन का गहरा मुताला (स्टडी) करके मालूम किया जा सकता है।
जहां तक पहले दौर की बात है वो क़ुरआन में बिल्कुल खुले लफ़्ज़ों में हैं।
ये बात क़ुरआन की 2 आयतों में बयान की गई हैं।
पहली आयत ये है-: 
اَوَ لَمۡ  یَرَ الَّذِیۡنَ  کَفَرُوۡۤا  اَنَّ  السَّمٰوٰتِ وَ الۡاَرۡضَ کَانَتَا رَتۡقًا فَفَتَقۡنٰہُمَا ؕ 
क्या वे लोग, जिन्होंने (नबी की बात मानने से) इनकार कर दिया है, ये ग़ौर नहीं करते कि ये सब आसमान और ज़मीन आपस में मिले हुए थे, फिर हमने इन्हें अलग किया, 
(क़ुरआन 21:30)

दूसरी आयत ये है-:
اَفِی اللّٰہِ شَکٌّ فَاطِرِ السَّمٰوٰتِ وَ الۡاَرۡضِ ؕ 
यानी क्या अल्लाह के बारे में शक है जो आसमानों और ज़मीन को फाड़ने वाला है,
इस आयत में फ़ातिर के माना हैं , फाड़ने वाला।

दोनों आयतों में शब्दों के फ़र्क़ के साथ एक ही बात बयान की गई है यानी कायनात शुरू में एक कॉस्मिक बॉल की सूरत में ज़ाहिर हुई, उस कस्मिक बॉल में कायनात के सभी हिस्से मौजूद थे, फिर एक बड़े धमाके से ये पार्ट्स हवा में फेल गए,
फिर एक लंबे प्रोसेस से ये सारे पार्टिकल कायनात के अलग टुकड़ों की सूरत में जमा हो गए।
ये सारा मामला एक इंतहाई खास इंतजाम से हुआ।
इस अमल की कोई दलील इसके सिवा नहीं हो सकती कि एक सर्वशक्तिमान ख़ुदा ने इन सारे कार्य को अंजाम दिया।

मौलाना वहीदुद्दीन खान
अल-रिसाला 2020

✍️ नोट:- कुरआन जिन 6 दिनों का ज़िक्र कर रहा है उन 6 दिनों की अवधि कितनी है इसको अल्लाह के सिवा कोई नहीं जानता, और ना ही हम इसे अपनी तरफ से तय कर सकते हैं, सिर्फ कयास ही लगाया जा सकता है और हम भी इसी कयास की बिना पर इस पोस्ट को शेयर कर रहे हैं।

मस्जिदे अक्सा।

मस्जिद ए अक्सा अथवा बैतुल मुकद्दस इस्लाम की तीसरी सबसे महत्वपूर्ण मस्जिद है, बुखारी शरीफ मे नबी करीम सल्ल. की एक हदीस के अनुसार मस्जिद ए अक्...