Tuesday, 25 May 2021

मस्जिदे अक्सा।

मस्जिद ए अक्सा अथवा बैतुल मुकद्दस इस्लाम की तीसरी सबसे महत्वपूर्ण मस्जिद है, बुखारी शरीफ मे नबी करीम सल्ल. की एक हदीस के अनुसार मस्जिद ए अक्सा मे एक नमाज़ पढ़ने पर 1000 नमाज़ें पढ़ने जितना पुण्य मिलता है ( पहले नम्बर पर काबा शरीफ़ को बताया गया जहाँ एक नमाज़ पढ़ने का सवाब 1,00,000 नमाज़ों जितना, फिर मदीना शरीफ़ स्थित मस्जिद ए नबवी, जहाँ एक नमाज़ का पुण्य 10,000 नमाज़ों जितना, और तीसरे नम्बर पर मस्जिद ए अक्सा है )
ज्ञातव्य हो कि काबा शरीफ को किबला बनाए जाने से पूर्व मुस्लिम कुछ समय तक मस्जिद ए अक्सा की ओर मुंह कर के नमाज़ पढ़ते थे,

एक और हदीस के अनुसार मस्जिद ए अक्सा दुनिया मे बनाई गई इस्लाम की दूसरी मस्जिद है, और इसे इस्लाम की पहली मस्जिद यानि काबा शरीफ़ के बनाए जाने के मात्र 40 वर्ष बाद बनाया गया था ..
फिर इसरा और मेराज की बहुचर्चित घटना मे अल्लाह ने एक ही रात मे नबी सल्ल. को काबा शरीफ़ से बैतुल मुकद्दस की यात्रा कराई थी, इन कारणों से ये मस्जिद मुस्लिमों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है,

यहूदी और ईसाई धर्म ग्रंथों के अनुसार हजरत इब्राहीम अ.स. के बाद कई नबियों ने इस मस्जिद को अपनी इबादतगाह बनाया किन्तु हजरत सुलेमान अ.स. के ज़माने तक यह मस्जिद नष्ट हो चुकी थी और यहूदी धर्म मे कई कुरीतियां बन गईं थीं, हजरत सुलेमान (सोलोमन) ने बैतुल मुकद्दस का पुनर्निर्माण कराया और यहूदी धर्म की कुरीतियों को मिटाया, इसके बाद यहाँ यहूदी साम्राज्य बहुत फला फूला

किन्तु सन् 70 ईस्वी मे रोमनों ने बैतुल मुकद्दस को जलाकर नष्ट कर दिया, और इसे रोमन देवताओं (ज्यूपिटर आदि .) के मन्दिर मे तब्दील कर दिया. 

फिर जब 315 ईस्वी मे रोमन शासक कॉन्सटेण्टाइन ( Constantine ) अपना धर्म परिवर्तन कर के ईसाई बन गया, तो फिर रोमनों ने उस बैतुल मुकद्दस को त्याग दिया जिसे उन्होंने मूर्ति स्थल बना दिया था , और धीरे धीरे इस जगह को यरूशलम के लोगों ने जिनमे यहूदी भी शामिल थे कूडा डालने की जगह बना दिया, उन यहूदियों ने भी बैतुल मुकद्दस को पवित्र स्मारक मानना छोड़ दिया था .

614 ईस्वी मे रोमनों को पारसियों ने पराजित कर दिया, अब यहूदी बिल्कुल आज़ाद थे अपनी मनचाही जगह पर इबादत करने को, पर तब भी यहूदियों ने बैतुल मुकद्दस को इबादत करने के लिए नहीं चुना, हां यरूशलम मे ये भी होता रहा कि अलग अलग साम्राज्यों मे कभी ईसाईयों द्वारा यहूदियों को सताया गया तो कभी यहूदियों द्वारा ईसाईयों को , दोनों ही धर्मों के लोग शांति से जीने के लिए यरोशलम मे उस न्यायप्रिय शासक के आने का इन्तज़ार कर रहे थे जिसकी भविष्यवाणी उनके धर्मग्रंथों मे की गई थी 

उनका ये इन्तज़ार सातवीं शताब्दी मे अरब मे हजरत मोहम्मद सल्ल. के आगमन के उपरांत पूरा हुआ और इस्लाम के दूसरे खलीफा हजरत उमर इब्ने ख़त्ताब रज़ि. के ज़माने मे यरूशलम मे इस्लाम आया, हजरत उमर ने मस्जिद ए अक्सा को यहूदियों की इबादतगाह के कुछ हटकर तामीर करवाया . 
यरूशलम मे मुस्लिमों और एक न्यायप्रिय मुस्लिम शासक के आने से ईसाई और यहूदियों दोनों समुदायों ने बड़ी राहत महसूस की,

ग्यारहवीं शताब्दी मे फिलिस्तीन पर यूरोपीय ईसाईयों ने हमला किया, उन्होंने यहूदियों और मुस्लिमों पर बड़े अत्याचार किए, उन यूरोपीय ईसाईयों ने यहूदियों को उनके मन्दिरों मे जला डाला और मुस्लिमों को मस्जिद ए अक्सा मे जलाकर मारा. बल्कि इन यूरोपीय ईसाईयों ने अरबी ईसाईयों को भी सताने से परहेज़ नही किया , फिलीस्तीन के यहूदी अपनी जान बचाकर स्पेन भाग गए ताकि स्पेन के मुस्लिम शासन का संरक्षण उन्हें मिल जाए ,
सन् 1189 ईस्वी मे इस्लामी फौज के सरदार, हज़रत सलाहुद्दीन अयूबी ने यरूशलम से जालिम यूरोपीय ईसाईयों को निकाल बाहर किया , और यरूशलम मे वापस इस्लामी कानून लागू किया . 
इस इस्लामी शासन मे ईसाई, यहूदी और मुस्लिम सभी बड़ी शांति और मेल मोहब्बत से रहते थे.... सौहार्द की ये स्थिति 19 वीं सदी तक कायम रही जब तक फिलीस्तीन मुस्लिम आटोमन साम्राज्य के अधीन था
1896 में आई थियोडोर हर्ल्ज़ की क़िताब द जेविश स्टेट , जिसमें यहूदी राज्य के गठन की कल्पना की गई थी। हर्ल्ज़ एक यहूदी पत्रकार और लेखक था और वो चाहता था कि यहूदी का अपना राष्ट्र हो... इस किताब से प्रेरणा लेकर एक मकसद के तहत 1897 के पहले ही कुछ यहूदी इस इलाक़े में पहुँचना शुरू हो गए थे. 1903 तक वहाँ 25,000 यहूदी इकट्ठा हो गए थे जिनमें से ज़्यादातर पूर्वी यूरोप से आए थे. उस समय वह इलाक़ा आटोमन साम्राज्य का हिस्सा था और क़रीब पाँच लाख अरबों के साथ यहूदी भी रहने लगे. 1904 और 1914 के बीच और 40 हज़ार अप्रवासी वहाँ पहुँच गए. 1917 पहले विश्व युद्ध के दौरान इस इलाक़े पर तुर्की के आटोमन साम्राज्य का शासन था. इस इलाक़े से तुर्की का नियंत्रण उस समय ख़त्म हुआ जब ब्रिटेन ने आटोमन साम्राज्य को ख़त्म कर दिया. 

अब फिलीस्तीन पर अंग्रेज़ी शासन हो गया और यहूदी यहां यूरोप से आ आकर बसते रहे, जब 15 मई 1948 को ब्रिटेन ने फिलीस्तीन को स्वतंत्र कर देने की घोषणा की तो उसी दिन अनेक सशस्त्र यहूदी आतंकवादियों ने असंख्य निर्दोष फलिस्तीनियों की हत्या कर के यरूशलम पर और फिलिस्तीन के अनेक हिस्सों पर कब्ज़ा कर के ,इस लूटे हुए क्षेत्र को इजरायल नाम दिया ..... तब से लेकर आज तक यरूशलम और फिलीस्तीनी इलाकों पर इज़राइली अतिक्रमण  जारी है, जिन इलाकों को 1948 के बंटवारे में यूएन ने फिलिस्तीन के हिस्से में ही रखा था ... 1967 में यरुशलम को अपने कब्ज़े में करने के बाद से ये इज़राइली आतंकी बार बार मस्जिद ए अक्सा को शहीद करने की कोशिशें करते दिखते हैं, ये वही यहूदी हैं जिनके साथ इतिहास के सम्पूर्ण परिदृश्य मे मुस्लिमों ने सदा भला व्यवहार ही किया, पर इन लोगों ने मुसलमानों को क्या फल दिया ये दुनिया देख रही है..!!

Friday, 30 April 2021

हिन्दू चिता को जलाना।



अपने हिन्दू परिचितों की अर्थी को कान्धा देने और मृतक की अंतिम क्रिया का सामान जुटाने से किसी मुस्लिम को आपत्ति नहीं है... हां कुछ लोग शंका में इसलिये ज़रूर पड़े हुए हैं क्योंकि हदीस मे मुसलमान को मनाही की गई है कि वो किसी व्यक्ति का शरीर आग में जलाए.... 
.... हालांकि बात ये भी है कि इस्लाम की फ़ितरत में बहुत लचक है, और अगर हालात इस तरह बन जाएं कि मुसलमान के अलावा कोई और गैरमुस्लिम की अंतिम क्रिया करने के लिए मौजूद न हो, तिसपर मरने वाला अपने मुसलमान तीमारदारों को ये वसीयत कर गया हो कि मेरी लाश को जलाया ही जाए, तो इन हालात में मुसलमानों के लिए यही सही है कि वो मरने वाले की वसीयत के मुताबिक ही उसकी आख़री रसूमात करें, जैसे कि कश्मीर में होता भी आ रहा है वहां बहुत से बुज़ुर्ग पंडित छूट गए थे जिनकी देखभाल और उनके मरने पर उनकी आखरी रसूमात को अदा करने की ज़िम्मेदारी कश्मीर के मुसलमान निभाते आ रहे हैं...
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..... इधर कोरोना या उसके उसके खौफ़ से मरने वाले हिंदुओं की अंतिम क्रिया करने के लिये कोई हिन्दू मौजूद न हो ऐसा तो नही, लेकिन श्मशानों में भीड़ ज़्यादा होने की वजह से जलाने वालों के फ्री न होने की वजह से शायद मुसलमानों को अपने हिन्दू दोस्तों को जलाना भी खुद ही पड़ रहा है, और एक तरफ तो मुसलमान हदीस के हुक्म से चिंता में हैं, दूसरे भाजपा या कट्टर हिंदूवादी लोगों की ओर से भी उनको आलोचना का निशाना बनाया जा रहा है कि वो हिंदुओं की चिता क्यों जला रहे हैं ??
... ऐसा है तो मैं उम्मीद करता हूँ कि अर्थी को कान्धा देकर मुसलमान उसे शमशान तक ले जाएंगे तो श्मशान में मृतक को मुखाग्नि देने और चिता को पूरी तरह जलाने का काम मृतक के परिजन और डोम राजा कर लेंगे, .... यूँ भी इस बीच भाजपा सदस्य और भी अन्य लोग ये कह चुके हैं कि मुस्लिमों को श्मशान में प्रवेश नही करने देना चाहिए, तो वो लोग श्मशान के अंदर की व्यवस्था को भी खुद सम्हालने का प्रबंध करें, और मुस्लिमों को ऐसी ज़िम्मेदारी से मुक्त करें जो न चाहते हुए भी उन पर पड़ गई है
~ ज़िया इम्तियाज़।

Thursday, 29 April 2021

असहाबे कहफ़ की आयु।

क्या वास्तव में इंसान 309 वर्षों तक सो सकता है?

असहाबे कहफ़ (कुरान में वर्णित एक घटना) की वैज्ञानिक व्याख्या
हाइबरनेशन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा दुनिया भर में लगभग दो हजार अलग-अलग किस्म के जीव कठोर मौसम, ख़ुराक की कमी और मृत्यु के भय से बचने के लिए लम्बे वक्त के लिये सो जाते हैं । उनके कोशिकाओं के जीन ऐसे भय और खतरों से वाकिफ हो जाते हैं, और हाइबरनेशन नामक एक बहुत लंबी नींद उनपर तारी कर देते हैं। इस प्रक्रिया के दौरान उनके दिल की धड़कन 95 फ़ीसदी तक धीमी हो जाती है, सांस सेकेंडो की बजाय मिनटों की रफ़्तार पर आ जाती है, शरीर का तापमान कम होकर ठंडा हो जाता है, और वो जीव अपने शरीर की पोषण की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए अपने जिस्म की चर्बी और मांसपेशियों पर निर्भर हो जाता है,
अपने जिस्म की चर्बी से पोषण और ऊर्जा प्राप्त करने की इस प्रक्रिया को मेटाबॉलिज़्म या चयापचय कहा जाता है । कुल मिलाकर आप ये कह सकते हैं कि हाइबरनेशन के दौरान एक जानदार के चयापचय की गति बेहद धीमी हो जाती है... हाइबरनेट करने वाले जानवरों में कई क़िस्म के चूहे, चमगादड़, गिलहरियाँ, लँगूर, कुछ पंछियों की नस्लें, साँपों की कई क़िस्में, कई कीड़े और रीछ वगैरह शामिल हैं !
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हाइबरनेशन में जानवर अंदर चर्बी बनाने के लिए भरपूर खाते हैं जिससे हाइबरनेशन में ऊर्जा मिलेगी । हायबर्नेशन में कुछ महीनों रहने के बाद उठने पर जानवर को ज़ोरों की भूख लगने लगटी है, और हाइबरनेशन से उठने के बाद सबसे पहला काम वे जानवर शिकार को ढूंढने का करते हैं ।
सामान्यतः हाइबरनेशन सर्दियों से बचने के लिए किया जाता है और इस मौसम में शिकार भी कम हो जाता है इसलिए जानवर ज़िंदा रहने के लिए लम्बी नींद में सो जाते हैं । अब तक का सबसे लंबा हाइबरनेशन उस चमगादड़ का है जो लगभग 344 दिन तक बिना खाए या पिये सोया रहा था ।
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विज्ञान ये भी साबित करता है कि टेलोमेरेस (Telomeres), जो डीएनए के टुकड़े हैं और सेल के गुणसूत्र के किनारों पर हैं, कोशिकाओं के प्रत्येक विभाजन के वक्त इन में कमी आती है और प्रयोगशाला में उनकी संख्याओं की जांच करके जानवर की बाक़ी उम्र का अनुमान लगाया जा सकता है लेकिन हाइबर्नेशन के दौरान वे बेहद धीमी गति से घटते हुए देखे गए हैं । सरल शब्दों  कह सकते हैं कि हाइबर्नेशन के दौरान जानवरों की उम्र बढ़ना लगभग बंद हो जाती है ।
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एक हॉलीवुड फिल्म जिसका नाम पैसेंजर है । फिल्मी कहानी की थीम यह है कि 5000 लोगों और 258 अंतरिक्ष यान के मज़दूरों का समूह एक नए ग्रह होमस्टेड-2 पर जा रहा है, क्योंकि ये नया ग्रह पृथ्वी से 120 प्रकाशवर्ष दूर है तो इंसान के लिए अपनी सामान्य आयु में वहां पहुँच पाना मुश्किल है, क्योंकि सामान्य आयु में वह मुश्किल से सत्तर या अस्सी वर्ष की उम्र जी सकता है ... इसके लिये वैज्ञानिकों ने ऐसे ट्यूब बनाए हैं जिसमें हर किसी को हाइबरनेट किया जाता है ताकि उसकी उम्र बढ़ने की रफ़्तार बेहद मद्धिम हो सके, और 120 साल बीत जाएं और वे एक नए ग्रह पर नई जिंदगी जीने के लिये उतर जाएं। लेकिन उनमें से एक आदमी किसी ख़राबी के कारण जाग जाता है और उसेब पता चलता है कि नए ग्रह पर पहुंचने के लिए अभी तो अस्सी साल और बाक़ी हैं,
तो यहाँ से फिर से हाइबरनेट होने के लिए उसके संघर्ष पर फिल्म शुरू होती है
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अब कुरान के सूरह कहफ के इन कुछ वाक्यों पर विचार करें:
.. फिर हमने उस गुफा में कई वर्षो के लिए उनके कानों पर परदा डाल दिया (11)
और तुम सूर्य को उसके उदित होते समय देखते तो दिखाई देता कि वह उनकी गुफा से दाहिनी ओर को बचकर निकल जाता है और जब अस्त होता है तो उनकी बाई ओर से कतराकर निकल जाता है। और वे है कि उस (गुफा) के एक विस्तृत स्थान में हैं। यह अल्लाह की निशानियों में से है। जिसे अल्लाह मार्ग दिखाए, वही मार्ग पानेवाला है और जिसे वह भटकता छोड़ दे उसका तुम कोई सहायक मार्गदर्शक कदापि न पाओगे (17)
और तुम समझते कि वे जाग रहे है, हालाँकि वे सोए हुए होते। हम उन्हें दाएँ और बाएँ फेरते और उनका कुत्ता ड्योढ़ी पर अपनी दोनों भुजाएँ फैलाए हुए होता। यदि तुम उन्हें कहीं झाँककर देखते तो उनके पास से उलटे पाँव भाग खड़े होते और तुममें उसका भय समा जाता (18)
और इसी तरह हमने उन्हें उठा खड़ा किया कि वे आपस में पूछताछ करें। उनमें एक कहनेवाले ने कहा, "तुम कितना ठहरे रहे?" वे बोले, "हम यही कोई एक दिन या एक दिन से भी कम ठहरें होंगे।" उन्होंने कहा, "जितना तुम यहाँ ठहरे हो उसे तुम्हारा रब ही भली-भाँति जानता है। अब अपने में से किसी को यह चाँदी का सिक्का देकर नगर की ओर भेजो। फिर वह देख ले कि उसमें सबसे अच्छा खाना किस जगह मिलता है। तो उसमें से वह तुम्हारे लिए कुछ खाने को ले आए और चाहिए की वह नरमी और होशियारी से काम ले और किसी को तुम्हारी ख़बर न होने दे (19)
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विज्ञान कहता है कि हाइबरनेशन के दौरान जानदारों के शरीर के कई अंग काम करना बंद कर देते हैं ।
बाहर का तापमान कितना भी हो, दुनिया में अधिकतर गुफाओं का तापमान साल भर एक सा रहता है । असहाबे कहफ का पहला कदम एक गुफा में जाना था । उसके बाद कुरआन ने कहा कि अल्लाह उन लोगों के कानों पर नींद का पर्दा डाल दिया, यहां वास्तव में हमारे अंदर के कान के हिस्से की बात हो सकती है कि हमारे कान किसी तेज आवाज़ की वजह से मस्तिष्क को संकेत भेजते हैं और मस्तिष्क हमें जगा देता है लेकिन असहाबे कहफ़ के मामले में वह कान का हिस्सा पूरी तरह से निष्क्रिय हो गया था
फिर अगर सूर्य की रोशनी गुफा में गिरती तो गुफा का तापमान बढ़ जाता, जिससे असहाब की नींद टूट सकती थी... दूसरे, त्वचा पर सूर्य की किरणों के पड़ने से शरीर में फ्री रेडिकल अणुओं की वृद्धि होती है जिससे मनुष्य की आयु बढ़ने लगती है । लेकिन कुरान कहता है कि सूर्योदय और सूर्यास्त के समय, सूरज गुफा के सामने नहीं आता था, ये बात कहानी को एक दिलचस्प अवस्था में ले जाती है । (मतलब गुफा हर समय ठंडी थी)
... विज्ञान का मानना है कि अगर सोता हुआ व्यक्ति लंबे समय तक अपना करवट नहीं बदलता है, तो उसे ब्लड सर्कुलेशन रुकने पर शरीर पर बड़े बड़े ज़ख्मों के होने की बीमारी हो सकती है जिसे प्रेशर अल्सर कहा जाता है लेकिन कुरान कहता है कि असहाबे कहफ़ को नियमित रूप से करवटें बदलाई जाती रहीं (इसलिए वह इस बीमारी से सुरक्षित रहे)
साइंस कहती है कि बहुत लंबे समय तक आँखों को बंद  करके रखना हानिकारक होता है, इसकी वजह से आंखों की ऑप्टिक नर्व को नुकसान पहुँचता है और आदमी अंधा हो सकता है, जबकि लम्बे समय तक आंखें खुली रखने पर भी आंखों का कॉर्निया खराब होने का खतरा पैदा होता है । कोमा के अधिकांश मरीज अगर लौटते हैं तो आंखों की बीमारियों से ग्रस्त होते हैं । अब तो ज़ाहिर है कि इतनी देर तक सोने के लिए नियमित रूप से आँखें फड़कती रहनी जरूरी है ताकि वे नज़रें बर्बाद होने से बच सकें । कुरान कहता है कि तुम उन्हें देखते तो सोचते कि वे जाग रहे हैं (मतलब वे पलक झपक रहे थे) जबकि वे सो रहे थे, और तुम उनसे आतंकित होकर भाग खड़े होते ... जाहिर है अगर आप किसी ऐसे शख़्स को देखते जो कुछ सुनता नही लेकिन आंखें झपक रहा है, ये देखकर आपको डर ही लगेगा, और आप वहां से भागने में ही भलाई समझेंगे,
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आश्चर्य है कि विज्ञान कहता है कि हाइब्रेशन में एक जीवित प्राणी अपने शरीर की ऊर्जा का एक बड़ा हिस्सा इस्तेमाल करता है और जैसे ही वह हाइबरनेशन से बाहर आता है वह तेज भूख की वजह से शिकार करना शुरू कर देता है, कुरान कहता है कि जैसे ही असहाबे कहफ़ नींद से उठते हैं उनमें से एक शख्स दूसरे से कहता है कि "बाज़ार जाकर सबसे अच्छा खाना ले आओ" ।
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इन सभी बिंदुओं से साबित होता है कि कहफ के लोगों ने ह्यूमन हिबर्नेशन की टेक्नोलॉजी हासिल कर ली थी जो दी पैसेंजर मूवी में दिखाई गई थी । अब यह कैसे संभव है ..?? क्या उन्होंने अपने शरीर में किसी भी फल या जड़ी बूटी या किसी जानवर से, जो गुफा में हाइबरनेट कर रहा था कुछ खास चीज़ हासिल की  ये बात अल्लाह बेहतर जानता है... लेकिन कुरान की इस सूरह के कुछ वाक्यों की जांच करने के लिए मैं नासा और अन्य संस्थानों को आमंत्रित करता हूं जो हाइबरनेशन को इस्तेमाल करने के लिये (अंतरिक्ष में जाने के लिये या रोगियों का इलाज करने के लिए) शोध कर रहे हैं । आइए गौर करें और देखें क्या वजह है कि कहफ के साथी इतने देर तक सोते रहे ।
तीन सौ सोलर ईयर को गूगल में लिखकर ल्युनर ईयर (चन्द्रवर्ष) बना दो तो 309 साल बनेंगे । कुरान कहता है:
′′ और असहाबे कहफ़ 9 बरस ऊपर, तीन सौ साल तक अपनी गुफा में रहे ′′
सुब्हान अल्लाह, क्या आँकड़े और ज्ञान है मेरे रब का । ये कुछ जवान थे बाकी राज्य गुमराह था और राजा क्रूर था जो इन्हें पत्थरों से मार डालना चाहता था लेकिन जब इन युवकों ने अल्लाह पर भरोसा किया तो अल्लाह उनके लिए एक रास्ता खोज लिया । और हमारे लिए इसमें एक सबक छोड़ दिया ।
तुर्की के तरसस शहर में एक गुफा है, जिसे असहाबे कहफ की गुफा माना जाता है । असहाबे कहफ की घटना ईसाई धार्मिक पुस्तकों और रोमन इतिहास में भी सेवन स्लीपर के रूप में मौजूद है । लेकिन कुरान ने जो विज्ञान के अनुसार पूरी तरह से वर्णित किया है वह किसी किताब में नहीं मिलता ।
#سائینس_اصحاب_کہف
#اصحاب_کہف_عظیم_معلومات
द्वारा लिखित: @ azeem latif

AB Razique Khan भाई हाइबरनेशन करने वाले जानदार मेनली बर्फीले क्षेत्रों में होते हैं.... और आप जानते हैं क़ुरआन में असहाबे कहफ़ की गार की जो डायरेक्शन बताई गई है, वो किसी पोलर एरिया के पास की मालूम होती है, यानी ज़मीन का वो हिस्सा जो हमेशा बर्फ़ से ढका रहता है
चंद महीने पहले मैंने इस पर पोस्ट की थी, पढ़ियेगा https://mbasic.facebook.com/photo.php?fbid=4691547940915368&id=100001806268310&set=a.360259397377599&source=56

सिल्वेस्टर स्टालिन की भी मूवी है डेमोलिशन मैन उसमे भी बर्फ में में पैक करके वो काफी सालों आगे वाली दुनिया मे निकलते हैं ।

Friday, 23 April 2021

औरंगज़ेब।

मंदिर-मस्जिद पर औरंगजेब का अनोखा पहलू
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निःसंदेह इतिहास से यह प्रमाणित होता हैं कि औरंगजेब ने बनारस के विश्वनाथ मन्दिर और गोलकुण्डा की जामा-मस्जिद को ढहा देने का आदेश दिया था, परन्तु इसका कारण कुछ और ही था। विश्वनाथ मन्दिर के सिलसिले में घटनाक्रम यह बयान किया जाता है कि जब औरंगज़ेब बंगाल जाते हुए बनारस के पास से गुज़र रहा था, तो उसके काफिले में शामिल हिन्दू राजाओं ने बादशाह से निवेदन किया कि यदि यह क़ाफ़िला एक दिन ठहर जाए तो उनकी रानियां बनारस जा कर गंगा नदी में स्नान कर लेंगी और विश्वनाथ मन्दिर में श्रद्धा सुमन भी अर्पित कर आएँगी। औरंगज़ेब ने तुरंत ही यह निवेदन स्वीकार कर लिया और क़ाफिले के पडा़व से बनारस तक पांच मील के रास्ते पर फ़ौजी पहरा बैठा दिया। रानियां पालकियों में सवार होकर गईं और स्नान एवं पूजा के बाद वापस आ गईं, परन्तु एक रानी (कच्छ की महारानी) वापस नहीं आई, तो उनकी बड़ी तलाश हुई, लेकिन पता नहीं चल सका। जब औरंगजै़ब को मालूम हुआ तो उसे बहुत गुस्सा आया और उसने अपने फ़ौज के बड़े-बड़े अफ़सरों को तलाश के लिए भेजा। आखिर में उन अफ़सरों ने मंदिर में देखा कि गणेश की मूर्ति जो दीवार में जड़ी हुई है, हिलती है। उन्होंने मूर्ति हटवा कर देखा तो तहखाने की सीढ़ी मिली और गुमशुदा रानी उसी में पड़ी रो रही थी। उसकी इज़्ज़त भी लूटी गई थी और उसके आभूषण भी छीन लिए गए थे। यह तहखाना विश्वनाथ मूर्ति के ठीक नीचे था। राजाओं ने इस हरकत पर अपनी नाराज़गी जताई और विरोध प्रकट किया। चूंकि यह बहुत घिनौना अपराध था, इसलिए उन्होंने कड़ी से कड़ी कार्रवाई करने की मांग की। उनकी मांग पर औरंगज़ेब ने आदेश दिया कि चूंकि पवित्र-स्थल को अपवित्र किया जा चुका है। अतः विश्वनाथ की मूर्ति को कहीं और ले जाकर स्थापित कर दिया जाए और मन्दिर को गिरा कर ज़मीन को बराबर कर दिया जाय और महंत को गिरफ्तार कर लिया जाए। डॉ. पट्टाभि सीतारमैया ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘द फ़ेदर्स एण्ड द स्टोन्स’ मे इस घटना को दस्तावेजों के आधार पर प्रमाणित किया है। पटना म्यूज़ियम के पूर्व क्यूरेटर डॉ. पी. एल. गुप्ता ने भी इस घटना की पुष्टि की है।
  गोलकुण्डा (हैदराबाद) की जामा-मस्जिद की घटना यह है कि वहां के राजा जो तानाशाह के नाम से प्रसिद्ध थे, रियासत की मालगुज़ारी वसूल करने के बाद दिल्ली का हिस्सा नहीं भेजते थे। कुछ ही वर्षों में यह रक़म करोड़ों की हो गई। तानाशाह ने यह ख़ज़ाना एक जगह ज़मीन में दबा कर उस पर मस्जिद बनवा दी। जब औरंज़ेब को इसका पता चला तो उसने आदेश दिया कि यह मस्जिद गिरा दी जाए और गड़ा हुआ खज़ाना निकाल कर उसे जन-कल्याण के कामों में ख़र्च किया गया। यह दोनों मिसालें यह साबित करने के लिए काफ़ी हैं कि औरंगज़ेब न्याय के मामले में मन्दिर और मस्जिद में कोई फ़र्क़ नहीं समझता था। ‘‘दुर्भाग्य से मध्यकाल और आधुनिक काल के भारतीय इतिहास की घटनाओं एवं चरित्रों को इस प्रकार तोड़- मरोड़ कर मनगढंत अंदाज़ में पेश किया जाता रहा है कि झूठ ही ईश्वरीय आदेश की सच्चाई की तरह स्वीकार किया जाने लगा और उन लोगों को दोषी ठहराया जाने लगा जो तथ्य और मनगढंत बातों में अन्तर करते हैं। आज भी स्वार्थी एवं सांप्रदायिक तत्व इतिहास को तोड़ने -मरोड़ने व उसे गलत रंग देने में लगे हुए हैं।
   [साभार: इतिहास के साथ यह अन्याय!!: प्रकाशक - E -20 मधुर संदेश संगम, अबुल फज़्ल इन्कलेव, नई दिल्ली- 25, लेखक - प्रो. बिशम्भर नाथ (बी.एन.) पाण्डेय, पूर्व राज्यपाल उडीसा, (17.08. 1983- 20.11.1988), राज्य सभा सदस्य (25.11. 1988- 24.11. 1994 : मनोनीत), पूर्व चेयरमैन - इलाहाबाद नगरपालिका (1948- 1953), पद्मश्री पुरस्कृत -1976 (समाज कार्य) एवं इतिहासकार]
https://youtu.be/CvSTMDx1QjU

सनातनी ग्रंथो में आतंक व हिंसा।

श्री यति नरसिंहानंद सरस्वती 

【भारतीय धर्म  ग्रंथों मार काट की शिक्षा।  】

निरंतर मुसलमानो , क़ुरआन और नबी सलल्लाहुअलैहिवस की जात को निशाना बनाया जा रहा है और सत्ता के संरक्ष्ण में अशोभनीय भाषा का निरंतर प्रयोग किया जा रहा है आपने क़ुरआन को गुंडों की किताब , जिहादियों की किताब मारकाट की किताब कहा है।  
उच्च शिक्षा ग्रहण करने बाद भी आपको इतना ज्ञान नहीं है कि जब कोई बात सामने आती है तो ये देखा जाता है कि वह किस परिपेक्ष्य में कही गयी है । 
क़ुरआन में जो आयात मार क़ाट से संबंधित हैं वह प्रशासनिक आदेश एवं युद्ध संबन्धित हैं अतः क़ुरआन तो  यह शिक्षा देता है कि यदि किसी व्यक्ति ने किसी एक कि जान बचाई तो उसने समस्त मानव जाति की जान बचाने का कार्य किया । 
बेहतर होता कि आप स्वच्छ हृदय से क़ुरआन का अध्यन करते । 

【क्या ये भी गुंडों वाली किताबें हैं ?】
स्वामी जी अब आप बताइए कि आपके इन धर्म ग्रंथों में जो मार काट खून खराबे की शिक्षा दी गयी है ये कौन से गुण्डई की शिक्षा है
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स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि।
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते॥

अर्थात "अपने धर्म को देखकर भी तू भय करने योग्य नहीं है  तुझे भय नहीं करना चाहिए क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी कर्तव्य नहीं है"    (भगवतगीता अध्याय 2 शलोक 31)

यदृच्छया चोपपन्नां स्वर्गद्वारमपावृतम्‌।
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्‌॥

हे पार्थ! अपने-आप प्राप्त हुए और खुले हुए स्वर्ग के द्वार रूप इस प्रकार के युद्ध को भाग्यवान क्षत्रिय लोग ही पाते हैं
(भगवतगीता अध्याय 2 शलोक 32)

अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं सङ्‍ग्रामं न करिष्यसि।
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि॥

"किन्तु यदि तू इस धर्मयुक्त युद्ध को नहीं करेगा तो स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त होगा" 
(भगवतगीता अध्याय 2 शलोक 33) 

【वेदनिन्दकों को मारने की शिक्षा 】

अथर्ववेद 12/5/62 का उदहारण देते हुए कहता है कि ,” तू वेदनिंदक को काट डाल, चीर डाल,फाड़ दे, जला दे, फूंक दे, भस्म कर दे।”

अथर्ववेद 12/5/68 कहता है कि 

“वेद विरोधी के लोगों को काट डाल, उसके मांस के टुकड़ों की बोटी बोटी कर दे, उसके नसों को ऐंठ दे, उसकी हड्डियां मिसल कर, उसकी मिंग निकाल दे, उसके सब अंगों को, जोड़ों को ढीला कर दे।”

(धार्मिक ग्रंथों मैं नीच जाति के नाम पर शूद्रों पर अत्याचार)
 
1. ब्राह्मण को कठोर वचन कहने वाले शूद्र को शारीरिक दंड देना चाहिए(मनुस्मृति,२-७८,)

2. यदि कोई शूद्र द्धिज(ब्राह्मण,क्षत्रिय,वेश्य) को गली दे तो राजा उसके मूंह मैं दस उँगल की गरम सलाखें उसके मूंह मैं घुसेड़ दे और अगर ब्राह्मण के सामने पाद दे तो उसका लिंग एवं चूतड़ कटवा दे।
 (मनुस्मृति,2,270-282)

3. शील रहित ब्राह्मण पूजनीय होता है।
 (परासर स्मृति,192)

4. परन्तु शुद्र ब्रह्नमा के चरणों से पैदा हुआ है इसलिए हरहाल मैं नीच है। 

5. शूद्र पुराने वस्त्र पहने और अपनी ही स्त्री से प्रेम करे और पराइ स्त्री से परहेज़ कर और यदि वासना तृप्ति हेतु अगर कोई ब्राह्मण शूद्र की पत्नी से संम्भोग करे तो उसे कोई पाप नही लगता
 (बोद्ध्ययन स्मृति एवं  मनु स्मृति 3-12)  

6. ब्राह्मण की झूठन ही शूद्र को कुत्ते की तरह ज़मीन गिरा कर और पत्तल को चटवाने के लिए देना चाहिए। (मनु,3-246,याज्ञवाल्क्य-103)

7.धर्म ग्रंथों मैं शूद्रो को हर प्रकार की शिक्षा  दिक्षा मना है यदि कोई धर्मोपदेश भी दे वेह नरक का अधिकारी होगा 
(मनु,4-48)

7.ऐसा इसलिए है क्यों कि 
"एक्मॆवयु शूद्रस्य: प्रभु: कर्म समादिशत्।
एतेषामेव वर्णाना शुस्रुशामंसूय्या।।

अर्थात "प्रभु ने शूद्र के लिए केवल एक ही कर्म निश्चित किया है कि वेह तीनों वर्णों अर्थात ब्राह्मण क्षत्रिय एवं वेश्य की सेवा करे।"

9.यदि शूद्र का स्वामी उसे दास कर्म से मुक्त भी कर देता है तो उसे दास ही समझा जायेगा।  (मनु,8-444)

तो स्वामी जी इन के।आधार पर बताइये कि आप को ये धर्म ग्रंथ कौनसी गुंडागर्दी की शिक्षा देते हैं ।।
श्री यति नरसिंहानंद सरस्वती  जिनके घर शीशे के होतव हैं वो दूसरों के घरों में पत्थर नहीं मारा करते । 

#अहसन #फ़िरोज़ाबादी





नियोग।



नियोग और नारी 

सत्यार्थ प्रकाश’ के चतुर्थ समुल्लास 
 अगर किसी पुरुष की स्त्री मर गई है और उसके कोई संतान नहीं है तो वह पुरुष किसी नियुक्त विधवा स्त्री से यौन संबंध स्थापित कर संतान उत्पन्न कर सकता है। गर्भ स्थिति के निश्चय हो जाने पर नियुक्त स्त्री और पुरुष के संबंध खत्म हो जाएंगे और नियुक्ता स्त्री दो-तीन वर्ष तक लड़के का पालन करके नियुक्त पुरुष को दे देगी। ऐसे एक विधवा स्त्री दो अपने लिए और दो-दो चार अन्य पुरुषों के लिए अर्थात कुल 10 पुत्र उत्पन्न कर सकती है। (यहाँ यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि यदि कन्या उत्पन्न होती है तो नियोग की क्या ‘शर्ते रहेगी ?) इसी प्रकार एक विधुर दो अपने लिए और दो-दो चार अन्य विधवाओं के लिए पुत्र उत्पन्न कर सकता है। ऐसे मिलकर 10-10 संतानोत्पत्ति की आज्ञा वेद में है।
इमां त्वमिन्द्र मीढ्वः सुपुत्रां सुभगां कृणु।
दशास्यां पुत्राना धेहि पतिमेकादशं कृधि।
(ऋग्वेद 10-85-45)
भावार्थ ः ‘‘हे वीर्य सेचन हार ‘शक्तिशाली वर! तू इस विवाहित स्त्री या विधवा स्त्रियों को श्रेष्ठ पुत्र और सौभाग्य युक्त कर। इस विवाहित स्त्री से दस पुत्र उत्पन्न कर और ग्यारहवीं स्त्री को मान। हे स्त्री! तू भी विवाहित पुरुष या नियुक्त पुरुषों से दस संतान उत्पन्न कर और ग्यारहवें पति को समझ।’’ (4-125)

वेद की आज्ञा है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्णस्थ स्त्री और पुरुष दस से अधिक संतान उत्पन्न न करें, क्योंकि अधिक करने से संतान निर्बल, निर्बुद्धि और अल्पायु होती है। जैसा कि उक्त मंत्र से स्पष्ट है कि नियोग की व्यवस्था केवल विधवा और विधुर स्त्री और पुरुषों के लिए नहीं है बल्कि पति के जीते जी पत्नी और पत्नी के जीते जी पुरुष इसका भरपूर लाभ उठा सकते हैं। (4-143)

आ घा ता गच्छानुत्तरा युगानि यत्र जामयः कृराावन्नजामि।
उप बर्बृहि वृषभाय बाहुमन्यमिच्छस्व सुभगे पति मत्।
(ऋग्वेद 10-10-10)
भावार्थ ः ‘‘नपुंसक पति कहता है कि हे देवि! तू मुझ से संतानोत्पत्ति की आशा मत कर। हे सौभाग्यशालिनी! तू किसी वीर्यवान पुरुष के बाहु का सहारा ले। तू मुझ को छोड़कर अन्य पति की इच्छा कर।’’
इसी प्रकार संतानोत्पत्ति में असमर्थ स्त्री भी अपने पति महाशय को आज्ञा दे कि हे स्वामी! आप संतानोत्पत्ति की इच्छा मुझ से छोड़कर किसी दूसरी विधवा स्त्री से नियोग करके संतानोत्पत्ति कीजिए।

अगर किसी स्त्री का पति व्यापार आदि के लिए परदेश गया हो तो तीन वर्ष, विद्या के लिए गया हो तो छह वर्ष और अगर धर्म के लिए गया हो तो आठ वर्ष इंतजार कर वह स्त्री भी नियोग द्वारा संतान उत्पन्न कर सकती है। ऐसे ही कुछ नियम पुरुषों के लिए हैं कि अगर संतान न हो तो आठवें, संतान होकर मर जाए तो दसवें और कन्या ही हो तो ग्यारहवें वर्ष अन्य स्त्री से नियोग द्वारा संतान उत्पन्न कर सकता है। पुरुष अप्रिय बोलने वाली पत्नी को छोड़कर दूसरी स्त्री से नियोग का लाभ ले सकता है। ऐसा ही नियम स्त्री के लिए है। (4-145)

प्रश्न सं0 149 में लिखा है कि अगर स्त्री गर्भवती हो और पुरुष से न रहा जाए और पुरुष दीर्घरोगी हो और स्त्री से न रहा जाए तो ऐसी स्थिति में दोनों किसी से नियोग कर पुत्रोत्पत्ति कर ले, परन्तु वेश्यागमन अथवा व्यभिचार कभी न करें। (4-149)
लिखा है कि नियोग अपने वर्ण में अथवा उत्तम वर्ण और जाति में होना चाहिए। एक स्त्री 10 पुरुषों तक और एक पुरुष 10 स्त्रियों तक से नियोग कर सकता है। अगर कोई स्त्री अथवा पुरुष 10वें गर्भ से अधिक समागम करे तो कामी और निंदित होते हैं। (4-142) विवाहित पुरुष कुंवारी कन्या से और विवाहित स्त्री कुंवारे पुरुष से नियोग नहीं कर सकती।
पुनर्विवाह और नियोग से संबंधित कुछ नियम, कानून, ‘शर्ते और सिद्धांत आपने पढ़े जिनका प्रतिपादन स्वामी दयानंद ने किया है और जिनको कथित लेखक ने वेद, मनुस्मृति आदि ग्रंथों से सत्य, प्रमाणित और न्यायोचित भी साबित किया है। व्यावहारिक पुष्टि हेतु कुछ ऐतिहासिक प्रमाण भी कथित लेखक ने प्रस्तुत किए हैं और साथ-साथ नियोग की खूबियां भी बयान की हैं। इस कुप्रथा को धर्मानुकूल और न्यायोचित साबित करने के लिए लेखक ने बौद्धिकता और तार्किकता का भी सहारा लिया है। कथित सुधारक ने आज के वातावरण में भी पुनर्विवाह को दोषपूर्ण और नियोग को तर्कसंगत और उचित ठहराया है। आइए उक्त धारणा का तथ्यपरक विश्लेषण करते हैं।
ऊपर (4-134) में पुनर्विवाह के जो दोष स्वामी दयानंद ने गिनवाए हैं वे सभी हास्यास्पद, बचकाने और मूर्खतापूर्ण हैं। विद्वान लेखक ने जैसा लिखा है कि दूसरा विवाह करने से स्त्री का पतिव्रत धर्म और पुरुष का स्त्रीव्रत धर्म नष्ट हो जाता है परन्तु नियोग करने से दोनों का उक्त धर्म ‘शुद्ध और सुरक्षित रहता है। क्या यह तर्क मूर्खतापूर्ण नहीं है ? आख़िर वह कैसा पतिव्रत धर्म है जो पुनर्विवाह करने से तो नष्ट और भ्रष्ट हो जाएगा और 10 गैर पुरुषों से यौन संबंध बना बनाने से सुरक्षित और निर्दोष रहेगा ?

अगर किसी पुरुष की पत्नी जीवित है और किसी कारण पुरुष संतान उत्पन्न करने में असमर्थ है तो इसका मतलब यह तो हरगिज़ नहीं है कि उस पुरुष में काम इच्छा ;ैमगनंस कमेपतम) नहीं है। अगर पुरुष के अन्दर काम इच्छा तो है मगर संतान उत्पन्न नहीं हो रही है और उसकी पत्नी संतान के लिए किसी अन्य पुरुष से नियोग करती है तो ऐसी स्थिति में पुरुष अपनी काम तृप्ति कहाँ और कैसे करेगा ? यहाँ यह भी विचारणीय है कि नियोग प्रथा में हर जगह पुत्रोत्पत्ति की बात कही गई है, जबकि जीव विज्ञान के अनुसार 50 प्रतिशत संभावना कन्या जन्म की होती है। कन्या उत्पन्न होने की स्थिति में नियोग के क्या नियम, कानून और ‘शर्ते होंगी, यह स्पष्ट नहीं किया गया है ?

जैसा कि स्वामी जी ने कहा है कि अगर किसी स्त्री के बार-बार कन्या ही उत्पन्न हो तो भी पुरुष नियोग द्वारा पुत्र उत्पन्न कर सकता है। यहाँ यह तथ्य विचारणीय है कि अगर किसी स्त्री के बार-बार कन्या ही उत्पन्न हो तो इसके लिए स्त्री नहीं, पुरुष जिम्मेदार है। यह एक वैज्ञानिक तथ्य है कि मानव जाति में लिंग का निर्धारण नर द्वारा होता है न कि मादा द्वारा।
यह भी एक तथ्य है कि पुनर्विवाह के दोष और हानियाँ तथा नियोग के गुण और लाभ का उल्लेख केवल द्विज वर्णों, ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के लिए किया गया है। चैथे वर्ण ‘शूद्र को छोड़ दिया गया है। क्या ‘शुद्रों के लिए नियोग की अनुमति नहीं है ? क्या ‘शूद्रों के लिए नियोग की व्यवस्था दोषपूर्ण और पाप है ?
जैसा कि लिखा है कि अगर पत्नी अथवा पति अप्रिय बोले तो भी वे नियोग कर सकते हैं। अगर किसी पुरुष की पत्नी गर्भवती हो और पुरुष से न रहा जाए अथवा पति दीर्घरोगी हो और स्त्री से न रहा जाए तो दोनों कहीं उचित साथी देखकर नियोग कर सकते हैं। क्या यहाँ सारे नियमों और नैतिक मान्यताओं को लॉकअप में बन्द नहीं कर दिया गया है ? क्या नियोग का मतलब स्वच्छंद यौन संबंधों ;ैमग थ्तमम) से नहीं है ? क्या इससे निम्न और घटिया किसी समाज की कल्पना की जा सकती है? 


पर्दा।

क्या इस्लाम औरतों को पर्दे में रखकर उनका अपमान करता है ? …

» उत्तर : इस्लाम में औरतों की जो स्थिति है, उसपर सेक्यूलर मीडिया का ज़बरदस्त हमला होता है। वे पर्दे और इस्लामी लिबास को इस्लामी क़ानून में स्त्रियों की दासता के तर्क के रूप में पेश करते हैं। इससे पहले कि हम पर्दे के धार्मिक निर्देश के पीछे मौजूद कारणों पर विचार करें, इस्लाम से पूर्व समाज में स्त्रियों की स्थिति का अध्ययन करते हैं।

1. भूतकाल में स्त्रियों का अपमान किया जाता और उनका प्रयोग केवल काम-वासना के लिए किया जाता था। इतिहास से लिए गए निम्न उदाहरण इस तथ्य की पूर्ण रूप से व्याख्या करते हैं कि आदिकाल की सभ्यता में औरतों का स्थान इस सीमा तक गिरा हुआ था कि उनको प्राथमिक मानव सम्मान तक नहीं दिया जाता था—

(क) बेबिलोनिया सभ्यता –
औरतें अपमानित की जातीं थीं, और बेबिलोनिया के क़ानून में उनको हर हक़ और अधिकार से वंचित रखा जाता था। यदि एक व्यक्ति किसी औरत की हत्या कर देता तो उसको दंड देने के बजाय उसकी पत्नी को मौत के घाट उतार दिया जाता था।

(ख) यूनानी सभ्यता –
इस सभ्यता को प्राचीन सभ्यताओं में अत्यन्त श्रेष्ठ माना जाता है। इस ‘अत्यंत श्रेष्ठ’ व्यवस्था के अनुसार औरतों को सभी अधिकारों से वंचित रखा जाता था और वे नीच वस्तु के रूप में देखी जाती थीं। यूनानी देवगाथा में ‘‘पांडोरा’’ नाम की एक काल्पनिक स्त्री पूरी मानवजाति के दुखों की जड़ मानी जाती है। यूनानी लोग स्त्रियों को पुरुषों के मुक़ाबले में तुच्छ जाति मानते थे।
यद्यपि उनकी पवित्रता अमूल्य थी और उनका सम्मान किया जाता था, परंतु बाद में यूनानी लोग अहंकार और काम-वासना में लिप्त हो गए। वैश्यावृति यूनानी समाज के हर वर्ग में एक आम रिवाज बन गई।

(ग) रोमन सभ्यता –
जब रोमन सभ्यता अपने गौरव की चरमसीमा पर थी, उस समय एक पुरुष को अपनी पत्नी का जीवन छीनने का भी अधिकार था। वैश्यावृति और नग्नता रोमवासियों में आम थी।

(घ) मिस्री सभ्यता –
मिस्री लोग स्त्रियों को शैतान का रूप मानते थे।

(ङ) इस्लाम से पहले का अरब –
इस्लाम से पहले अरब में औरतों को नीच माना जाता और किसी लड़की का जन्म होता तो कभी-कभी उसे जीवित दफ़न कर दिया जाता था।

2. इस्लाम में पर्दे का महत्त्व –
इस्लाम ने औरतों को ऊपर उठाया और उनको बराबरी का दर्जा दिया और वह उनसे अपेक्षा करता है कि वे अपना स्तर बनाए रखें! लगभग 1400 साल पहले ही उनके अधिकार उनको दे दिए और वह उनसे अपेक्षा करता है कि वे अपने स्तर को बनाए रखेंगी।
• पुरुषों के लिए पर्दा – आमतौर पर लोग यह समझते हैं कि पर्दे का संबंध केवल स्त्रियों से है। हालांकि पवित्र क़ुरआन में अल्लाह ने औरतों से पहले मर्दों केपर्दे का वर्णन किया है —
‘‘ऐ नबी (सलल्लाहो अलैहि वसल्लम)! ईमान वालों से कह दो कि वे अपनी नज़रें नीची रखें और अपनी पाकदामिनी (शील) की सुरक्षा करें। यह उनको अधिक पवित्र बनाएगा और अल्लाह ख़ूब जानता है हर उस काम को जो वे करते हैं।’’ – (क़ुरआन, 24:30)
उस क्षण जब एक व्यक्ति की नज़र किसी स्त्री पर पड़े तो उसे चाहिए कि वह अपनी नज़र नीची कर ले।

• स्त्रियों के लिए पर्दा क़ुरआन की सूरा नूर में कहा गया है —
‘‘ऐ नबी (सलल्लाहो अलैहि वसल्लम)! और अल्लाह पर ईमान रखने वाली औरतों से कह दो कि वे अपनी नज़रें नीची रखें और अपनी पाकदामिनी (शील) की सुरक्षा करें और वे अपने बनाव-श्रृंगार और आभूषणों को न दिखाएँ, इसमें कोई आपत्ति नहीं जो सामान्य रूप से ज़ाहिर हो जाए। और उन्हें चाहिए कि वे अपने सीनों पर ओढ़नियाँ ओढ़ लें और अपने पतियों, बापों, अपने बेटों….के अतिरिक्त किसी के सामने अपने बनाव-श्रृंगार प्रकट न करें।’’ –(क़ुरआन, 24:31)

3. पर्दे के लिए आवश्यक शर्तें –
पवित्र क़ुरआन और हदीस (पैग़म्बर के कथन) के अनुसार पर्दे के लिए निम्नलिखित छह बातों का ध्यान देना आवश्यक है —
(i) पहला शरीर का पर्दा है जिसे ढका जाना चाहिए। यह पुरुष और स्त्री के लिए भिन्न है। पुरुष के लिए नाभि (Navel) से लेकर घुटनों तक ढकना आवश्यक है और स्त्री के लिए चेहरे और हाथों की कलाई को छोड़कर पूरे शरीर को ढकना आवश्यक है। यद्यपि वे चाहें तो खुले हिस्से को भी छिपा सकती हैं। इस्लाम के कुछ आलिम इस बात पर ज़ोर देते हैं कि चेहरा और हाथ भी पर्दे का आवश्यक हिस्सा है। अन्य बातें ऐसी हैं जो स्त्री एवं पुरुष के लिए समान हैं।
(ii) धारण किया गया वस्त्र ढीला हो और शरीर के अंगों को प्रकट न करे।
(iii) धारण किया गया वस्त्र पारदर्शी न हो कि कोई शरीर के भीतरी हिस्से को देख सके।
(iv) पहना हुआ वस्त्र ऐसा भड़कीला न हो कि विपरीत लिंग को आकर्षित या उत्तेजित करे।
(v) पहना हुआ वस्त्र विपरीत लिंग के वस्त्रों की तरह न हो।
(vi) धारण किया गया वस्त्र ऐसा नहीं होना चाहिए जो किसी विशेष ग़ैर-मुस्लिम धर्म को चिंहित करता हो और उस धर्म का प्रतीक हो।

4. पर्दा इंसान के व्यवहार और आचरण का भी पता देता है –
पर्दा दूसरी चीज़ों के साथ-साथ इंसान के व्यवहार और आचरण का भी पता देता है पूर्ण पर्दा, वस्त्र (लिबास) की छह कसौटियों के अलावा नैतिक व्यवहार और आचरण को भी अपने भीतर समोए हुए है। कोई व्यक्ति यदि केवल वस्त्र की कसौटियों को अपनाता है तो वह पर्दे के सीमित अर्थ का पालन कर रहा है। वस्त्र के द्वारा पर्दे के साथ-साथ आँखों और विचारों का भी पर्दा करना चाहिए। किसी व्यक्ति के चाल-चलन, बातचीत एवं व्यवहार को भी पर्दे के दायरे में लिया जाता है।

5. पर्दा दुर्व्यवहार से रोकता है –
पर्दे का औरतों को क्यों उपदेश दिया जाता है इसके कारण का पवित्र क़ुरआन की सूरा अल अहज़ाब में उल्लेख किया गया है —
‘‘ऐ नबी! अपनी पत्नियों, पुत्रियों और ईमान वाली स्त्रियों से कह दो कि वे (जब बाहर जाएँ) तो ऊपरी वस्त्र से स्वयं को ढाँक लें। यह अत्यन्त आसान है कि वे इसी प्रकार जानी जाएँ और दुर्व्यवहार से सुरक्षित रहें और अल्लाह तो बड़ा क्षमाकारी और बड़ा ही दयालु है।’’ – (क़ुरआन, 33:59)
पवित्र क़ुरआन कहता है कि औरतों को पर्दे का इसलिए उपदेश दिया गया है कि वे पाक-दामिनी के रूप में देखी जाएँ और पर्दा उनसे दुर्व्यवहार और दुराचरण को भी रोकता है।

6. जुड़वाँ बहनों का उदाहरण –
मान लीजिए कि समान रूप से सुन्दर दो जुड़वाँ बहनें सड़क पर चल रही हैं। एक केवल कलाई और चेहरे को छोड़कर पर्दे में पूरी तरह ढकी हो और दूसरी पश्चिमी वस्त्र मिनी स्कर्ट (छोटा लंहगा) और ब्लाऊज पहने हुए हो। एक लफंगा किसी लड़की को छेड़ने के लिए किनारे खड़ा हो तो ऐसी स्थिति में वह किससे छेड़छाड़ करेगा। उस लड़की से जो पर्दे में है या उस लड़की को जो मिनी स्कर्ट पहने है?
स्वाभाविक रूप से वह दूसरी लड़की से दुर्व्यवहार करेगा। ऐसे वस्त्र विपरीत लिंग को अप्रत्यक्ष रूप से छेड़छाड़ और दुर्व्यवहार का निमंत्रण (Provocation, invitation) देते हैं। क़ुरआन बिल्कुल सही कहता है कि पर्दा औरतों के साथ छेड़छाड़ और उत्पीड़न को रोकता है।

7. बलात्कारियों के लिए मौत की सज़ा –
इस्लामी क़ानून में बलात्कार की सज़ा मौत है। बहुत से लोग इसे निर्दयता कहकर इस दंड पर आश्चर्य प्रकट करते हैं। कुछ का तो कहना है कि इस्लाम एक जंगली धर्म है। एक सरल-सा प्रश्न गै़र-मुस्लिमों से किया गया कि ईश्वर न करे कि कोई आपकी माँ अथवा बहन के साथ बलात्कार करता है और आप को न्यायाधीश बना दिया जाए और बलात्कारी को आपके सामने लाया जाए तो उस दोषी को आप कौनसी सज़ा सुनाएँगे?
प्रत्येक से एक ही उत्तर मिला कि मृत्यु-दंड दिया जाएगा। कुछ ने कहा कि वे उसे कष्ट दे-देकर मारने की सज़ा सुनाएँगे।
अगला प्रश्न किया गया कि यदि कोई आपकी माँ, पत्नी अथवा बहन के साथ बलात्कार करता है तो आप उसे मृत्यु-दंड देना चाहते हैं परंतु यही घटना किसी दूसरे
की माँ, पत्नी अथवा बहन के साथ होती है तो आप कहते हैं कि मृत्यु-दंड देना जंगलीपन है। इस स्थिति में यह दोहरा मापदंड क्यों है?

8. पश्चिमी समाज के झूटे दावे –
पश्चिमी समाज औरतों को ऊपर उठाने का झूठा दावा करता है औरतों की आज़ादी का पश्चिमी दावा एक ढोंग है, जिसके सहारे वे उनके शरीर का शोषण करते हैं, उनकी आत्मा को गंदा करते हैं और उनके मान-सम्मान से उनको वंचित रखते हैं। पश्चिमी समाज दावा करता है कि उसने औरतों को ऊपर उठाया। इसके विपरीत उन्होंने उनको रखैल और समाज की तितलियों का स्थान दिया है, जो केवल उन जिस्मफ़रोशों और काम-इच्छुकों के हाथों का एक खिलौना हैं, जो कला और संस्कृति के रंग-बिरंगे पर्दे के पीछे छिपे हुए हैं।

9. अमेरिका में बलात्कार की संख्या सबसे अधिक –
अमेरिका में बलात्कार की दर सबसे अधिक है अमेरिका को दुनिया का सबसे उन्नत देश समझा जाता है। 1990 ई॰ की FBI रिपोर्ट से पता चलता है कि अमेरिका में उस साल 1,02,555 बलात्कार की घटनाएँ दर्ज की गईं। रिपोर्ट में यह बात भी बताई गई है कि इस तरह की कुल घटनाओं में से केवल 16 प्रतिशत ही प्रकाश में आ सकी हैं। इस प्रकार 1990 ई॰ में बलात्कार की घटना का सही अंदाज़ा लगाने के लिए उपरोक्त संख्या को 6.25 से गुना करके जो योग सामने आता है वह 6,40,968 है। अगर इस पूरी संख्या को साल के 365 दिनों में बाँटा जाए तो प्रतिदिन के लिहाज से 1756 की संख्या सामने आती है।
एक दूसरी रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका में प्रतिदिन 1900 बलात्कार की घटनाएँ पेश आती हैं। National Crime Victimization Survey Bureau of Justice Statistics (U.S.Deptt.Of Justice) के अनुसार केवल 1996 में 3,07,000 घटनाएँ दर्ज हुईं। लेकिन सही घटनाओं की केवल 31 प्रतिशत घटना ही दर्ज हुईं। इस प्रकार 3,07,000-3,226 = 9,90,322 बलात्कार की घटनाएँ सन् 1996 ई॰ में दर्ज हुईं। प्रतिदिन के लिहाज से औसत 2713 बलात्कार की घटनाएँ 1996 ई॰ में अमेरिका में हुईं। ज़रा विचार करें कि अमेरिका में हर 32 सेकेंड में एक बलात्कार होता है।
ऐसा लगता है कि अमेरिकी बलात्कारी बड़े ही निडर हैं। FBI की 1990 ई॰ की रिपोर्ट आगे बताती है कि बलात्कार की घटनाओं में केवल 10 प्रतिशत बलात्कारी ही गिरफ़्तार किए जा सके हैं। जो कुल संख्या का 1.6 प्रतिशत है। बलात्कारियों में से 50 प्रतिशत लोगों को मुक़द्दमा से पहले रिहा कर दिया गया। इसका मतलब यह हुआ कि केवल 0.8 प्रतिशत बलात्कारियों के विरुद्ध ही मुक़द्दमा चलाया जा सका। दूसरे शब्दों में अगर एक व्यक्ति 125 बार बलात्कार की घटनाओं में लिप्त हो तो केवल एक बार ही उसे सज़ा दी जाने की संभावना है। बहुत से लोग इसे एक अच्छा जुआ समझेंगे। रिपोर्ट से यह भी अंदाज़ा होता है कि सज़ा दिए जाने वालों में से केवल 50 प्रतिशत लोगों को एक साल से कम की सज़ा दी गई है।

*हालाँकि अमेरिकी क़ानून के अनुसार सात साल की सज़ा होनी चाहिए। उन लोगों के संबंध में जो पहली बार बलात्कार के दोषी पाए गए हैं, जज नर्म पड़ जाते हैं। ज़रा विचार करें कि एक व्यक्ति 125 बार बलात्कार करता है लेकिन उसके विरुद्ध मुक़द्दमा किए जाने का अवसर केवल एक बार ही आता है और फिर 50 प्रतिशत लोगों को जज की नर्मी का लाभ मिल जाता है और एक साल से भी कम मुद्दत की सज़ा किसी ऐसे बलात्कारी को मिल पाती है जिस पर यह अपराध सिद्ध हो चुका है।

*उस दृश्य की कल्पना कीजिए कि अगर अमेरिका में पर्दे का पालन किया जाता। जब कभी कोई व्यक्ति एक स्त्री पर नज़र डालता और कोई अशुद्ध विचार उसके मस्तिष्क में उभरता तो वह अपनी नज़र नीची कर लेता। प्रत्येक स्त्री पर्दा करती अर्था्त पूरे शरीर को ढक लेती सिवाय कलाई और चेहरे के। इसके बाद यदि कोई उसके साथ बलात्कार करता तो उसे मृत्यु-दंड दिया जाता। ऐसी स्थिति में क्या अमेरिका में बलात्कार की दर बढ़ती या स्थिर रहती या कम होती?

10. इस्लामी क़ानून निश्चित रूप से बलात्कार की दर घटाएगा –
स्वाभाविक रूप से जब भी इस्लामी सभ्यता क़ायम होगी, और इस्लामी क़ानून लागू किया जाएगा तो इसका परिणाम निश्चित रूप से सकारात्मक होगा। यदि इस्लामी क़ानून संसार के किसी भी हिस्से में लागू किया जाए, चाहे अमेरिका हो या यूरोप, समाज में शान्ति आएगी।
पर्दा औरतों का अपमान नहीं करता बल्कि उनके शील की पवित्रता और मान की रक्षा करके उन्हें ऊपर उठाता है।


मस्जिदे अक्सा।

मस्जिद ए अक्सा अथवा बैतुल मुकद्दस इस्लाम की तीसरी सबसे महत्वपूर्ण मस्जिद है, बुखारी शरीफ मे नबी करीम सल्ल. की एक हदीस के अनुसार मस्जिद ए अक्...