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Tuesday, 25 May 2021
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Friday, 30 April 2021
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Thursday, 29 April 2021
असहाबे कहफ़ की आयु।
क्या वास्तव में इंसान 309 वर्षों तक सो सकता है?
असहाबे कहफ़ (कुरान में वर्णित एक घटना) की वैज्ञानिक व्याख्या
हाइबरनेशन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा दुनिया भर में लगभग दो हजार अलग-अलग किस्म के जीव कठोर मौसम, ख़ुराक की कमी और मृत्यु के भय से बचने के लिए लम्बे वक्त के लिये सो जाते हैं । उनके कोशिकाओं के जीन ऐसे भय और खतरों से वाकिफ हो जाते हैं, और हाइबरनेशन नामक एक बहुत लंबी नींद उनपर तारी कर देते हैं। इस प्रक्रिया के दौरान उनके दिल की धड़कन 95 फ़ीसदी तक धीमी हो जाती है, सांस सेकेंडो की बजाय मिनटों की रफ़्तार पर आ जाती है, शरीर का तापमान कम होकर ठंडा हो जाता है, और वो जीव अपने शरीर की पोषण की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए अपने जिस्म की चर्बी और मांसपेशियों पर निर्भर हो जाता है,
अपने जिस्म की चर्बी से पोषण और ऊर्जा प्राप्त करने की इस प्रक्रिया को मेटाबॉलिज़्म या चयापचय कहा जाता है । कुल मिलाकर आप ये कह सकते हैं कि हाइबरनेशन के दौरान एक जानदार के चयापचय की गति बेहद धीमी हो जाती है... हाइबरनेट करने वाले जानवरों में कई क़िस्म के चूहे, चमगादड़, गिलहरियाँ, लँगूर, कुछ पंछियों की नस्लें, साँपों की कई क़िस्में, कई कीड़े और रीछ वगैरह शामिल हैं !
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हाइबरनेशन में जानवर अंदर चर्बी बनाने के लिए भरपूर खाते हैं जिससे हाइबरनेशन में ऊर्जा मिलेगी । हायबर्नेशन में कुछ महीनों रहने के बाद उठने पर जानवर को ज़ोरों की भूख लगने लगटी है, और हाइबरनेशन से उठने के बाद सबसे पहला काम वे जानवर शिकार को ढूंढने का करते हैं ।
सामान्यतः हाइबरनेशन सर्दियों से बचने के लिए किया जाता है और इस मौसम में शिकार भी कम हो जाता है इसलिए जानवर ज़िंदा रहने के लिए लम्बी नींद में सो जाते हैं । अब तक का सबसे लंबा हाइबरनेशन उस चमगादड़ का है जो लगभग 344 दिन तक बिना खाए या पिये सोया रहा था ।
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विज्ञान ये भी साबित करता है कि टेलोमेरेस (Telomeres), जो डीएनए के टुकड़े हैं और सेल के गुणसूत्र के किनारों पर हैं, कोशिकाओं के प्रत्येक विभाजन के वक्त इन में कमी आती है और प्रयोगशाला में उनकी संख्याओं की जांच करके जानवर की बाक़ी उम्र का अनुमान लगाया जा सकता है लेकिन हाइबर्नेशन के दौरान वे बेहद धीमी गति से घटते हुए देखे गए हैं । सरल शब्दों कह सकते हैं कि हाइबर्नेशन के दौरान जानवरों की उम्र बढ़ना लगभग बंद हो जाती है ।
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एक हॉलीवुड फिल्म जिसका नाम पैसेंजर है । फिल्मी कहानी की थीम यह है कि 5000 लोगों और 258 अंतरिक्ष यान के मज़दूरों का समूह एक नए ग्रह होमस्टेड-2 पर जा रहा है, क्योंकि ये नया ग्रह पृथ्वी से 120 प्रकाशवर्ष दूर है तो इंसान के लिए अपनी सामान्य आयु में वहां पहुँच पाना मुश्किल है, क्योंकि सामान्य आयु में वह मुश्किल से सत्तर या अस्सी वर्ष की उम्र जी सकता है ... इसके लिये वैज्ञानिकों ने ऐसे ट्यूब बनाए हैं जिसमें हर किसी को हाइबरनेट किया जाता है ताकि उसकी उम्र बढ़ने की रफ़्तार बेहद मद्धिम हो सके, और 120 साल बीत जाएं और वे एक नए ग्रह पर नई जिंदगी जीने के लिये उतर जाएं। लेकिन उनमें से एक आदमी किसी ख़राबी के कारण जाग जाता है और उसेब पता चलता है कि नए ग्रह पर पहुंचने के लिए अभी तो अस्सी साल और बाक़ी हैं,
तो यहाँ से फिर से हाइबरनेट होने के लिए उसके संघर्ष पर फिल्म शुरू होती है
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अब कुरान के सूरह कहफ के इन कुछ वाक्यों पर विचार करें:
.. फिर हमने उस गुफा में कई वर्षो के लिए उनके कानों पर परदा डाल दिया (11)
और तुम सूर्य को उसके उदित होते समय देखते तो दिखाई देता कि वह उनकी गुफा से दाहिनी ओर को बचकर निकल जाता है और जब अस्त होता है तो उनकी बाई ओर से कतराकर निकल जाता है। और वे है कि उस (गुफा) के एक विस्तृत स्थान में हैं। यह अल्लाह की निशानियों में से है। जिसे अल्लाह मार्ग दिखाए, वही मार्ग पानेवाला है और जिसे वह भटकता छोड़ दे उसका तुम कोई सहायक मार्गदर्शक कदापि न पाओगे (17)
और तुम समझते कि वे जाग रहे है, हालाँकि वे सोए हुए होते। हम उन्हें दाएँ और बाएँ फेरते और उनका कुत्ता ड्योढ़ी पर अपनी दोनों भुजाएँ फैलाए हुए होता। यदि तुम उन्हें कहीं झाँककर देखते तो उनके पास से उलटे पाँव भाग खड़े होते और तुममें उसका भय समा जाता (18)
और इसी तरह हमने उन्हें उठा खड़ा किया कि वे आपस में पूछताछ करें। उनमें एक कहनेवाले ने कहा, "तुम कितना ठहरे रहे?" वे बोले, "हम यही कोई एक दिन या एक दिन से भी कम ठहरें होंगे।" उन्होंने कहा, "जितना तुम यहाँ ठहरे हो उसे तुम्हारा रब ही भली-भाँति जानता है। अब अपने में से किसी को यह चाँदी का सिक्का देकर नगर की ओर भेजो। फिर वह देख ले कि उसमें सबसे अच्छा खाना किस जगह मिलता है। तो उसमें से वह तुम्हारे लिए कुछ खाने को ले आए और चाहिए की वह नरमी और होशियारी से काम ले और किसी को तुम्हारी ख़बर न होने दे (19)
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विज्ञान कहता है कि हाइबरनेशन के दौरान जानदारों के शरीर के कई अंग काम करना बंद कर देते हैं ।
बाहर का तापमान कितना भी हो, दुनिया में अधिकतर गुफाओं का तापमान साल भर एक सा रहता है । असहाबे कहफ का पहला कदम एक गुफा में जाना था । उसके बाद कुरआन ने कहा कि अल्लाह उन लोगों के कानों पर नींद का पर्दा डाल दिया, यहां वास्तव में हमारे अंदर के कान के हिस्से की बात हो सकती है कि हमारे कान किसी तेज आवाज़ की वजह से मस्तिष्क को संकेत भेजते हैं और मस्तिष्क हमें जगा देता है लेकिन असहाबे कहफ़ के मामले में वह कान का हिस्सा पूरी तरह से निष्क्रिय हो गया था
फिर अगर सूर्य की रोशनी गुफा में गिरती तो गुफा का तापमान बढ़ जाता, जिससे असहाब की नींद टूट सकती थी... दूसरे, त्वचा पर सूर्य की किरणों के पड़ने से शरीर में फ्री रेडिकल अणुओं की वृद्धि होती है जिससे मनुष्य की आयु बढ़ने लगती है । लेकिन कुरान कहता है कि सूर्योदय और सूर्यास्त के समय, सूरज गुफा के सामने नहीं आता था, ये बात कहानी को एक दिलचस्प अवस्था में ले जाती है । (मतलब गुफा हर समय ठंडी थी)
... विज्ञान का मानना है कि अगर सोता हुआ व्यक्ति लंबे समय तक अपना करवट नहीं बदलता है, तो उसे ब्लड सर्कुलेशन रुकने पर शरीर पर बड़े बड़े ज़ख्मों के होने की बीमारी हो सकती है जिसे प्रेशर अल्सर कहा जाता है लेकिन कुरान कहता है कि असहाबे कहफ़ को नियमित रूप से करवटें बदलाई जाती रहीं (इसलिए वह इस बीमारी से सुरक्षित रहे)
साइंस कहती है कि बहुत लंबे समय तक आँखों को बंद करके रखना हानिकारक होता है, इसकी वजह से आंखों की ऑप्टिक नर्व को नुकसान पहुँचता है और आदमी अंधा हो सकता है, जबकि लम्बे समय तक आंखें खुली रखने पर भी आंखों का कॉर्निया खराब होने का खतरा पैदा होता है । कोमा के अधिकांश मरीज अगर लौटते हैं तो आंखों की बीमारियों से ग्रस्त होते हैं । अब तो ज़ाहिर है कि इतनी देर तक सोने के लिए नियमित रूप से आँखें फड़कती रहनी जरूरी है ताकि वे नज़रें बर्बाद होने से बच सकें । कुरान कहता है कि तुम उन्हें देखते तो सोचते कि वे जाग रहे हैं (मतलब वे पलक झपक रहे थे) जबकि वे सो रहे थे, और तुम उनसे आतंकित होकर भाग खड़े होते ... जाहिर है अगर आप किसी ऐसे शख़्स को देखते जो कुछ सुनता नही लेकिन आंखें झपक रहा है, ये देखकर आपको डर ही लगेगा, और आप वहां से भागने में ही भलाई समझेंगे,
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आश्चर्य है कि विज्ञान कहता है कि हाइब्रेशन में एक जीवित प्राणी अपने शरीर की ऊर्जा का एक बड़ा हिस्सा इस्तेमाल करता है और जैसे ही वह हाइबरनेशन से बाहर आता है वह तेज भूख की वजह से शिकार करना शुरू कर देता है, कुरान कहता है कि जैसे ही असहाबे कहफ़ नींद से उठते हैं उनमें से एक शख्स दूसरे से कहता है कि "बाज़ार जाकर सबसे अच्छा खाना ले आओ" ।
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इन सभी बिंदुओं से साबित होता है कि कहफ के लोगों ने ह्यूमन हिबर्नेशन की टेक्नोलॉजी हासिल कर ली थी जो दी पैसेंजर मूवी में दिखाई गई थी । अब यह कैसे संभव है ..?? क्या उन्होंने अपने शरीर में किसी भी फल या जड़ी बूटी या किसी जानवर से, जो गुफा में हाइबरनेट कर रहा था कुछ खास चीज़ हासिल की ये बात अल्लाह बेहतर जानता है... लेकिन कुरान की इस सूरह के कुछ वाक्यों की जांच करने के लिए मैं नासा और अन्य संस्थानों को आमंत्रित करता हूं जो हाइबरनेशन को इस्तेमाल करने के लिये (अंतरिक्ष में जाने के लिये या रोगियों का इलाज करने के लिए) शोध कर रहे हैं । आइए गौर करें और देखें क्या वजह है कि कहफ के साथी इतने देर तक सोते रहे ।
तीन सौ सोलर ईयर को गूगल में लिखकर ल्युनर ईयर (चन्द्रवर्ष) बना दो तो 309 साल बनेंगे । कुरान कहता है:
′′ और असहाबे कहफ़ 9 बरस ऊपर, तीन सौ साल तक अपनी गुफा में रहे ′′
सुब्हान अल्लाह, क्या आँकड़े और ज्ञान है मेरे रब का । ये कुछ जवान थे बाकी राज्य गुमराह था और राजा क्रूर था जो इन्हें पत्थरों से मार डालना चाहता था लेकिन जब इन युवकों ने अल्लाह पर भरोसा किया तो अल्लाह उनके लिए एक रास्ता खोज लिया । और हमारे लिए इसमें एक सबक छोड़ दिया ।
तुर्की के तरसस शहर में एक गुफा है, जिसे असहाबे कहफ की गुफा माना जाता है । असहाबे कहफ की घटना ईसाई धार्मिक पुस्तकों और रोमन इतिहास में भी सेवन स्लीपर के रूप में मौजूद है । लेकिन कुरान ने जो विज्ञान के अनुसार पूरी तरह से वर्णित किया है वह किसी किताब में नहीं मिलता ।
#سائینس_اصحاب_کہف
#اصحاب_کہف_عظیم_معلومات
द्वारा लिखित: @ azeem latif
AB Razique Khan भाई हाइबरनेशन करने वाले जानदार मेनली बर्फीले क्षेत्रों में होते हैं.... और आप जानते हैं क़ुरआन में असहाबे कहफ़ की गार की जो डायरेक्शन बताई गई है, वो किसी पोलर एरिया के पास की मालूम होती है, यानी ज़मीन का वो हिस्सा जो हमेशा बर्फ़ से ढका रहता है
चंद महीने पहले मैंने इस पर पोस्ट की थी, पढ़ियेगा https://mbasic.facebook.com/photo.php?fbid=4691547940915368&id=100001806268310&set=a.360259397377599&source=56
सिल्वेस्टर स्टालिन की भी मूवी है डेमोलिशन मैन उसमे भी बर्फ में में पैक करके वो काफी सालों आगे वाली दुनिया मे निकलते हैं ।
Friday, 23 April 2021
औरंगज़ेब।
मंदिर-मस्जिद पर औरंगजेब का अनोखा पहलू
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निःसंदेह इतिहास से यह प्रमाणित होता हैं कि औरंगजेब ने बनारस के विश्वनाथ मन्दिर और गोलकुण्डा की जामा-मस्जिद को ढहा देने का आदेश दिया था, परन्तु इसका कारण कुछ और ही था। विश्वनाथ मन्दिर के सिलसिले में घटनाक्रम यह बयान किया जाता है कि जब औरंगज़ेब बंगाल जाते हुए बनारस के पास से गुज़र रहा था, तो उसके काफिले में शामिल हिन्दू राजाओं ने बादशाह से निवेदन किया कि यदि यह क़ाफ़िला एक दिन ठहर जाए तो उनकी रानियां बनारस जा कर गंगा नदी में स्नान कर लेंगी और विश्वनाथ मन्दिर में श्रद्धा सुमन भी अर्पित कर आएँगी। औरंगज़ेब ने तुरंत ही यह निवेदन स्वीकार कर लिया और क़ाफिले के पडा़व से बनारस तक पांच मील के रास्ते पर फ़ौजी पहरा बैठा दिया। रानियां पालकियों में सवार होकर गईं और स्नान एवं पूजा के बाद वापस आ गईं, परन्तु एक रानी (कच्छ की महारानी) वापस नहीं आई, तो उनकी बड़ी तलाश हुई, लेकिन पता नहीं चल सका। जब औरंगजै़ब को मालूम हुआ तो उसे बहुत गुस्सा आया और उसने अपने फ़ौज के बड़े-बड़े अफ़सरों को तलाश के लिए भेजा। आखिर में उन अफ़सरों ने मंदिर में देखा कि गणेश की मूर्ति जो दीवार में जड़ी हुई है, हिलती है। उन्होंने मूर्ति हटवा कर देखा तो तहखाने की सीढ़ी मिली और गुमशुदा रानी उसी में पड़ी रो रही थी। उसकी इज़्ज़त भी लूटी गई थी और उसके आभूषण भी छीन लिए गए थे। यह तहखाना विश्वनाथ मूर्ति के ठीक नीचे था। राजाओं ने इस हरकत पर अपनी नाराज़गी जताई और विरोध प्रकट किया। चूंकि यह बहुत घिनौना अपराध था, इसलिए उन्होंने कड़ी से कड़ी कार्रवाई करने की मांग की। उनकी मांग पर औरंगज़ेब ने आदेश दिया कि चूंकि पवित्र-स्थल को अपवित्र किया जा चुका है। अतः विश्वनाथ की मूर्ति को कहीं और ले जाकर स्थापित कर दिया जाए और मन्दिर को गिरा कर ज़मीन को बराबर कर दिया जाय और महंत को गिरफ्तार कर लिया जाए। डॉ. पट्टाभि सीतारमैया ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘द फ़ेदर्स एण्ड द स्टोन्स’ मे इस घटना को दस्तावेजों के आधार पर प्रमाणित किया है। पटना म्यूज़ियम के पूर्व क्यूरेटर डॉ. पी. एल. गुप्ता ने भी इस घटना की पुष्टि की है।
गोलकुण्डा (हैदराबाद) की जामा-मस्जिद की घटना यह है कि वहां के राजा जो तानाशाह के नाम से प्रसिद्ध थे, रियासत की मालगुज़ारी वसूल करने के बाद दिल्ली का हिस्सा नहीं भेजते थे। कुछ ही वर्षों में यह रक़म करोड़ों की हो गई। तानाशाह ने यह ख़ज़ाना एक जगह ज़मीन में दबा कर उस पर मस्जिद बनवा दी। जब औरंज़ेब को इसका पता चला तो उसने आदेश दिया कि यह मस्जिद गिरा दी जाए और गड़ा हुआ खज़ाना निकाल कर उसे जन-कल्याण के कामों में ख़र्च किया गया। यह दोनों मिसालें यह साबित करने के लिए काफ़ी हैं कि औरंगज़ेब न्याय के मामले में मन्दिर और मस्जिद में कोई फ़र्क़ नहीं समझता था। ‘‘दुर्भाग्य से मध्यकाल और आधुनिक काल के भारतीय इतिहास की घटनाओं एवं चरित्रों को इस प्रकार तोड़- मरोड़ कर मनगढंत अंदाज़ में पेश किया जाता रहा है कि झूठ ही ईश्वरीय आदेश की सच्चाई की तरह स्वीकार किया जाने लगा और उन लोगों को दोषी ठहराया जाने लगा जो तथ्य और मनगढंत बातों में अन्तर करते हैं। आज भी स्वार्थी एवं सांप्रदायिक तत्व इतिहास को तोड़ने -मरोड़ने व उसे गलत रंग देने में लगे हुए हैं।
[साभार: इतिहास के साथ यह अन्याय!!: प्रकाशक - E -20 मधुर संदेश संगम, अबुल फज़्ल इन्कलेव, नई दिल्ली- 25, लेखक - प्रो. बिशम्भर नाथ (बी.एन.) पाण्डेय, पूर्व राज्यपाल उडीसा, (17.08. 1983- 20.11.1988), राज्य सभा सदस्य (25.11. 1988- 24.11. 1994 : मनोनीत), पूर्व चेयरमैन - इलाहाबाद नगरपालिका (1948- 1953), पद्मश्री पुरस्कृत -1976 (समाज कार्य) एवं इतिहासकार]
https://youtu.be/CvSTMDx1QjU
सनातनी ग्रंथो में आतंक व हिंसा।
नियोग।
पर्दा।
मस्जिदे अक्सा।
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अपने हिन्दू परिचितों की अर्थी को कान्धा देने और मृतक की अंतिम क्रिया का सामान जुटाने से किसी मुस्लिम को आपत्ति नहीं है... हां कुछ लोग शंका म...